भय

‘‘आज ये सूटकेस बहुत भारी हो गया... ।’’ बड़बड़ाते हुए निर्जन ने दम भर को उसे नीचे रखा और फिर हाथ बदल कर उठाने के बाद सामने स्टेशन की ओर बढ़ गया। दुमका से बस पर निकलते समय जो सूरज पश्चिम दिशा में उतरता दिखाई दे रहा था, वह ढाई-तीन घंटे की यात्रा के बाद जसीडीह पहुँचने तक न जाने कहाँ गुम हो चुका है। अब उसके न होने से चारों तरफ घना अंधेरा था, जिसे स्टेशन के आस-पास फैले नाश्ते-खाने के छोटे-छोटे होटलों और अन्य इमारतों पर जलती रोशनियां दूर कर रही थीं। बस से उतरने के बाद वह रिक्शा भाड़ा बचाने के लिए अपनी भारी अटैची स्वयं ही उठा कर स्टेशन तक आ पहुँचा। पैसे तो उसने बचा लिए, परन्तु उसकी खस्ता हालत ने कान पकड़वा दिए कि दुबारा वह, भारी सूटकेस के साथ, दस-बीस रुपये की वैसी कटौती करने से पहले सौ बार सोचेगा। बारी-बारी से दोनों हाथों में अटैची उठाने के कारण अब उसके दोनों हाथ बुरी तरह दुख रहे थे। रेल्वे इन्क्वायरी वाले बरामदे पर सूटकेस रख, रुमाल से पसीना पोंछते हुए उसकी नजर ट्रेनों की सूचना देने वाले बोर्ड पर पड़ी। जहाँ सूचना के रुप में एक और निराशा उसकी बाट जोह रही थी, उसकी छपरा-टाटा एक्सप्रेस तीन घंटे लेट थी। वह कुढ़ गया, उस लेट का अर्थ था कि अपने जिस रिजर्वेशन पर वह रात दस बजे ही आराम से सो जाने की सोच रहा था, अब उस नींद के लिए उसे आधी रात के बाद भी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अभी भी पता नहीं कि वह लेट केवल तीन ही घंटे का रहेगा या और बढ़ता जाएगा। ‘‘इस लेट के लिए जो भी जिम्मेवार है अगर वह मिल जाए तो मैं उसका खून पी जाउँ।’’ बड़बड़ाते हुए उसने आस-पास किसी बेंच की खोज में नजरें दौड़ाईं, परन्तु उसकी खोज व्यर्थ गई। चलो अंदर प्लेटफार्म पर देखते हैं, सोचते हुए उसने सूटकेस उठाया और धीमे कदमों से ग्रिल के गेट से हो कर भीतर घुसा। वहाँ प्लेटफाॅर्म की स्थिति बाहर से अलग न थी। आस-पास के सारे बेंच भरे हुए थे। अब उस भारी सूटकेस के साथ पूरे प्लेटफाॅर्म पर इधर से उधर तक खाली बेंच की खोज करना उसके बस से बाहर था। उसने सूटकेस वहीं ग्रिल वाले प्रवेश के पास रख दिया और यूँ ही इधर-उधर देखने लगा। उसके सामने, प्लेटफाॅर्म की छत को सहारा दिये, पीलर के पास एक खोमचे वाला उबले अंडे बेच रहा था। उससे कुछ हट कर भिंगोए चने वाले ने अपनी टोकरी रखी हुई थी। दोनों मजे से आपस में बतिया रहे थे। निर्जन ने अपना सूटकेस घसीट कर पीलर के पास किया और उनके पास वाली थोड़ी-सी खाली जगह पर किसी तरह बैठ गया। थोड़ी देर सुस्ताने के बाद उसने आश्वस्त होने के लिए अंडे वाले से पूछा, ‘‘टाटा वाली ट्रेन किस नम्बर प्लेटफाॅर्म से जाएगी, इसी से न ?’’ अंडे वाले ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया, ‘‘हूं....!’’ बात-चीत से समय काटने को उत्सुक निर्जन को उसका वैसा उत्तर निराश कर गया। वह कसमसा कर चुप हो गया। उसका प्रथम प्रयास बेकार गया था। उसने सोचा उसे चुप ही रहना पड़ेगा, लेकिन कब तक! थोड़ी देर बाद उसने फिर प्रयास किया, ‘‘आज वह ट्रेन तीन घंटे लेट है, न।’’ ‘‘तो इसमें कौन-सी नई बात है। पिछले दस सालों से मैं यहाँ अंडे बेच रहा हूँ, कभी इसे समय पर आते नहीं देखा। यह ट्रेन तो रोज ही लेट होती है।’’ अंडे वाले ने रुखी निर्लिप्तता से उत्तर दिया। निर्जन चुप रह गया। थोड़ी देर बाद उसने चाय की तलब पर आस-पास और प्लेटफाॅर्म पर दूर तक नजरें दौड़ाई, परन्तु उसे निराशा हाथ लगी। न चाहते हुए भी वह फिर अंडे वाले से पूछ बैठा, ‘‘कोई चाय वाला नहीं दिख रहा।’’ उसने पहले जैसी उदासीनता से जवाब दिया, ‘‘उनमें से किसी के घर शादी है, सभी चाय वाले आज मेहमानी में गये हैं।’’ फिर पूछा, ‘‘अंडे खायेंगे सर, देसी मुर्गी के हैं ?’’ उसकी बात पर निर्जन चुप ही रहा। पोल्ट्री-फाॅर्म के होते तो शायद वह सोच भी लेता, देसी मुर्गी के तो मंहगे होंगे। जैसे योग वालों ने लौकी को गरीबों की पहुँच से दूर कर दिया है, वैसे ही पोल्ट्री-फाॅर्म वालों ने देसी मुर्गी के अंडों को! अंडे वाले की उस निर्लिप्तता के बाद फिर निर्जन को साहस न हुआ कि वह कोई और बात कर पाता। उसने लम्बी सांस खींचते हुए स्वयं से ही कहा, ‘‘हे ईश्वर, कभी तो यह ट्रेन समय पर भेज दिया करो।’’ अंडे वाले ने इस बार उसकी बात पर कोई टिप्पणी नहीं की। दुमका में दिन भर के थका देने वाले काम के बाद, उसने सोचा था कि ट्रेन में आराम से रात भर सोएगा और अगली सुबह ताजा दम हो कर टाटा पहुँच जाएगा। लेकिन इस लेट ने उसकी सारी योजना को तहस-नहस कर दिया था। उसकी आँखें नींद से भारी हो रही थीं। बीच-बीच में उसे झपकी भी आयी। लेकिन उसने स्वयं को संभाला क्योंकि ट्रेन उस स्टेशन पर ज्यादा देर नहीं रुकती। वह कोई रिस्क नहीं ले सकता, उसे पूरी तरह जागते हुए ट्रेन की प्रतीक्षा करनी होगी। आस-पास कोई चाय वाला भी नहीं था। उसका ध्यान ट्रेनों के आने-जाने की सूचना देने वाले प्लेटफाॅर्म पर लगे लाउडस्पीकरों की ओर लगा था। लेकिन वहां से ट्रेनों की सूचनाएं बड़े लम्बे अंतरालों के बाद दी जा रही थीं। लग रहा था मानों वहां वाला भी झपकियाँ ले रहा है। जब उसकी झपकी टूटती है तब वह सूचनाएं बता देता है। बीच-बीच में आने वाली इक्का-दुक्का सूचनाओं से उसकी ट्रेन अभी भी तीन घंटे लेट चल रही थी। ट्रेन द्वारा अपने लेट को मेकअप कर लेने की उसकी तीव्र इच्छा पूरी हो जाने के आसार नहीं दिख रहे थे। वैसे ही बैठे रहने से नींद उस पर पुनः हावी होने लगी थी। उसने सोचा स्टेशन से बाहर निकल कर चाय पी जाए, थोड़ा टहलने और चाय से नींद फट जाएगी। वह अभी उठने की सोच ही रहा था कि उसकी नजर अपने सूटकेस पर पड़ी और चाय पी कर नींद फाड़ने का उसका सारा उत्साह जाता रहा। इतने भारी सूटकेस को उठा कर बाहर चाय पीने जाना उसे सजा जैसा लगा। इस बीच अपने खोमचे को चारों तरफ से कपड़े से अच्छी तरह ढंक-बाँध कर कहीं गया, अंडे वाला सामने से आता दिखा। हालाँकि उसकी निर्लिप्तता के बाद से उनके बीच कोई वार्तालाप नहीं हुआ था, लेकिन फिर भी निर्जन ने उसकी मदद लेनी चाही। उसके पास दूसरा कोई उपाय भी न था। ‘‘भाई सा’ब, थोड़ी देर मेरा सूटकेस देखिएगा, मैं जरा बाहर से आता हूँ।’’ उसने कहा। अंडे वाले ने उसे देखा और छूटते ही बोला, ‘‘नहीं सर, ई हमसे नहीं होगा।’’ ‘‘अरे भाई, दस मिनट की बात है मैं ज़रा बाहर से चाय पी कर आता हूँ।’’ ‘‘नई सा’ब बात दस मिनट की हो या पाँच मिनट की। हमसे नहीं होगा, हम कोई सामान का जिम्मा नहीं लेंगें।’’ ‘‘अरे यार, सूटकेस भारी है, इसे उठा कर जाना कठिन है। मैं अकेला हूँ अब तुम मदद नहीं करोगे तो कौन करेगा ?’’ उसने यारी के नाम पर मिन्नत की। ‘‘भारी काहे है ? कोई बम-वम है का ?’’ उसकी बात सुन कर निर्जन को बड़ा गुस्सा आया। लेकिन उसने स्वयं को काबू में कर कहा, ‘‘क्या बोल रहे हो, बम काहे होगा ? तुमको क्या मैं नक्सलाईट दिखता हूँ ?’’ अण्डे वाले का सुर पहले जैसा ही था, ‘‘अब किसी का माथा पर तो लिखा नहीं होता कि वह कौन है ?’’ अजीब झक्की है, सोचते हुए निर्जन ने अंतिम दांव चला, ‘‘तुम बोलो तो मैं सूटकेस खोल कर दिखा देता हूँ।’’ ‘‘नहीं सर हमको तो आप माफे कीजिए। हमसे आपके सामान का पहरेदारी नहीं होगा।’’ अंडे वाले ने सारी संभावनाओं पर पूर्णविराम लगाते हुए कहा, ‘‘पीछे से, हमको कहीं जाना पड़ा और आप नहीं लौटे तो आपके सामान को छोड़ कर हम कैसे जाएंगे ?’’ निर्जन को उसकी वैसी बातों से गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उसे चुप रह जाना पड़ा। वह कुछ और कर भी नहीं सकता था। उसने पानी की बोतल उठाई और प्लेटफाॅर्म के छोर तक चला गया। चेहरे पर छींटे मारने के बाद थोड़ा पानी पीने से उसे राहत मिली। वापस लौट कर वह फिर से अपनी उसी जगह पर बैठ गया। सब कुछ पूर्ववत् था। बीच-बीच में रेल्वे इन्क्वारी वाले लाउडस्पीकर पर विभिन्न सूचनाएं दिये जा रहे थे। लेकिन उसकी ट्रेन की कोई अच्छी सूचना अभी तक नहीं आयी थी। वह पूर्ववत् लेट चल रही थी। थोड़ी देर तक तो सब ठीक-ठाक चलता रहा मगर फिर नींद उस पर छाने लगी। वह उठ कर आस-पास टहलने लगा। लेकिन चाय पीने की बात से उसका मन हट नहीं पा रहा था। सूटकेस ऐसे ही छोड़ कर वह जा नहीं सकता था। पता नहीं जब तक वह चाय पी कर लौटे, उसका सूटकेस कहाँ से कहाँ पहुँच जाए। अंत में निर्जन ने सूटकेस न ढोने का एक उपाय ढूंढ लिया। उसने उठ कर सूटकेस को ग्रिल के पास खींचा और उसकी चेन को ग्रिल से लपेट कर ताला लगा दिया। उसे वैसा करने में कोई कठिनाई न हुई। अब वह सूटकेस की ओर से निश्चिंत हो कर चाय पीने जा सकता था। उसने चाबी जेब में डाली और उठ कर बाहर को चल दिया। चाय दुकान पर पहुँच कर उसने स्पेशल चाय का आर्डर दिया और पानी का जग लेकर अपना चेहरा धोने लगा। उसने अपनी आँखों में पानी के खूब छींटे मार-मार कर नींद को दूर भगाया। अब उसे कुछ अच्छा लग रहा था। वह आराम से बेंच पर बैठ कर चाय बनने की प्रतीक्षा करने लगा।

उधर उसके प्लेटफाॅर्म से बाहर निकलने के बाद सबसे पहले उसके सूटकेस पर एक रेल्वे कर्मचारी की नजर पड़ी। उसने जोर से पूछा, ‘‘ई कौन अपना सूटकेस यहाँ ग्रिल के साथ लाॅक किया है ?’’ उसके प्रश्न के उत्तर में कई नज़रें उधर उठ गईं, मगर उसके प्रश्न के उत्तर में ‘हाँ’ की कोई आवाज़ नहीं आयी। उसने फिर पूछा जिसके उत्तर में फिर वही मौन चला आया। किसी के भी आगे न आने से प्लेटफाॅर्म पर आस-पास की हवा में एक अजीब-सा रहस्य घुलने लगा। लोग खुसर-फुसर करने लगे। ‘किसका सूटकेस है ?’ ‘इसे यहाँ कौन रख गया ?’ ‘रख कर ताला भी क्यों लगा गया ?’ ‘इसमें क्या हो सकता है ?’ ‘कहीं बम तो नहीं ?’ अपने प्रश्नों का कोई उत्तर न पा कर वह रेल्वे कर्मचारी इसकी सूचना देने तेजी से इन्क्वारी आॅफिस की ओर बढ़ गया। लावारिस सूटकेस की बात फैलते ही रात की उस सुस्ती में तब तक अलसा रहे जसीडीह स्टेशन पर थोड़ी ही देर में तेज हलचल होने लगी। सुरक्षा बल सतर्क हो गये। लावारिस सूटकेस के लिए आस-पास पूछ-ताछ होने लगी। भय से कोई उस सूटकेस के पास नहीं जा रहा था। ‘‘किसका है रे सूटकेस ?’’ आर.पी.एफ के थानेदार की आवाज वहाँ गूँज गई। मगर उत्तर में कोई सामने न था। तभी अंडे वाले ने थोड़ा खिसक कर पास आते हुए कहा, ‘‘सर, एक आदमी था। हमसे बोल रहा था कि मेरा बक्सा को देखना। हम मना कर दिये थे। लगता है उसी का है।’’ कोई सुराग मिलने की आशा में थानेदार ने उसे घूर कर देखा, ‘‘वो आदमी दिखने में कैसा था ?’’ ‘‘सर जी, छोकड़े जइसा था। जीन्स-शर्ट पहना था। लम्बा कद, गेंहुआ रंग, मोटी मूँछें, दाढ़ी नहीं थी, लम्बा चेहरा। ठीके-ठाक था, दिखने में तो हीरो जइसा लग रहा था।’’ थानेदार ने दांत पीसते हुए कहा, ‘‘अभी दिख जाए तो स्साले को हीरो से जीरो बना देंगे।’’ उधर लाउडस्पीकर पर उद्घोषणा जारी हो गई थी, ‘‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें ! काले रंग का एक सूटकेस प्लेटफाॅर्म के प्रवेश द्वार के पास ग्रिल से जंजीर द्वारा लाॅक है। जिस किसी यात्री का हो वह तुरंत वहां जा कर उसे हटाये ! सभी यात्रियों से अनुरोध है कि वे ग्रिल के पास से दूर हट जाएं। वहाँ एक लावारिस सूटकेस पड़ा है। उस सूटकेस में बम भी हो सकता है।’’ चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई, स्टेशन एक भय की पकड़ में आ चुका था। एक सुरक्षित दूरी बना कर वहाँ भीड़ जुट आयी।

स्टेशन से बाहर चाय वाला फ्राई-पेन भट्ठी पर चढ़ा चुका था। जब निर्जन का ध्यान लाउडस्पीकर की ओर गया। पहले जिस पर काफी देर के अंतरालों पर घोषणाएं हो रही थीं, अब उसी पर बड़ी तेजी से कोई घोषणा दुहराई जा रही थी। उसने सोचा, लगता है कोई नेता-वेता या वी.आई.पी. आने वाला होगा। हुँ...ह यात्रियों के लिए ट्रेन की सूचना दोहराने में इसकी नानी मर रही थी, अब देखो तो कैसे लगातार बोले जा रहा है। आम पब्लिक का तो कोई ख्याल नहीं करता। मगर कोई वी.आई.पी. आ जाए तो सभी उसके सामने बिछ जाने को तत्पर हो जाते हैं। अब देखो कैसे बार-बार एक्के बात दुहरा रहा है, अब इसका मुँह नहीं दुख रहा ? चाय दुकान की कुर्सी पर आराम से बैठते हुए निर्जन ने उस घोषणा पर पहले तो कोई ध्यान नहीं दिया था। उसे वह अपने मतलब की लगी भी नहीं थी। लेकिन एक ही जैसी उद्घोषणा बार-बार दुहराई जाने से किसी का भी उस पर ध्यान अटक जाता है। वही उसके साथ भी हुआ, थोड़ी देर बाद जब उसने उसे ध्यान से सुना तो उसके होश उड़ गये। ‘‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें ! काले रंग का एक सूटकेस प्लेटफाॅर्म के प्रवेश द्वार के पास ग्रिल से जंजीर द्वारा लाॅक है, जिस किसी यात्री का हो वह तुरंत वहाँ जा कर उसे हटाये! सभी यात्रियों से अनुरोध है कि वे ग्रिल के पास से दूर हट जाएं। वहाँ एक लावारिस सूटकेस पड़ा है। उस सूटकेस में बम भी हो सकता है।’’ जब तक चाय वाला चाय को उबाल रहा था, वह घोषणा कई बार दुहराई जा चुकी थी। वह तो पूरा का पूरा उसके ही सूटकेस का विवरण था। संदेह की कोई गुंजाईश न रही। उसके सूटकेस में बम होने की संभावना बतायी जा रही थी। ‘हे भगवान, यह क्या बवाल हो गया। इससे पहले कि बात और बिगड़े उसे अपने सूटकेस को खोलना होगा।’ सोचता हुआ निर्जन एक झटके से उठ कर चाय दुकान से बाहर दौड़ा। उसके पीछे चुक्कड़ में चाय छानते हुए चाय वाला चीखा, ‘‘सर आपकी चाय!’’ लेकिन वह तो तीर की तरह स्टेशन की ओर दौड़ रहा था। वहां चाय के लिए उसे बैठे अभी ज्यादा समय नहीं बीता था। अब उसे दुबारा उठ कर दौड़ शुरु करनी पड़ी। दौड़ने से उसकी साँस फूल गई थी, लेकिन उसे प्लेटफाॅर्म पहुँचने तक कहीं नहीं रुकना था। टाँगों की तरह ही उसका दिमाग भी तेजी से दौड़ रहा था। सबसे पहले इस लाउडस्पीकर को चुप कराना होगा, सोचते हुए उसने अपना रुख रेल्वे इन्क्वारी की ओर किया।

रेल्वे इन्क्वारी आॅफिस में घुसते ही उसने किसी तरह अपनी साँसों को काबू में करते हुए कहा, ‘‘इसे .... इसे बन्द कीजिए... वो ... वो मेरा है।’’ माइक पर लगातार बोल रहे व्यक्ति ने उसे गुस्से से देखा और जोर से पूछा, ‘‘क्या, सूटकेस आपका है ?’’ माईक से हो कर उसकी आवाज पूरे स्टेशन पर गूँजती चली गई। ‘‘...जी, जी मेरा है।’’ निर्जन का उत्तर भी पीछे से आया। लगा मानों रेल्वे इन्क्वायरी में उसका लाइव इन्टरव्यू लिया जा रहा हो। लेकिन वैसा इन्टरव्यू उसे शर्मिन्दा कर रहा था। वह चाह रहा था, उनके वार्तालाप की आवाज प्लेटफाॅर्म पर न जाए, लेकिन वैसा करना उसके हाथ में नहीं था। पहले दौड़ने, अब शर्मिन्दगी और जल्दी-जल्दी बोलने के कारण उसका गला सूख गया था। रेल्वे इन्क्वारी वाले ने उसे डपटते हुए कहा, ‘‘जाइये महाराज, जल्दी से उसे खोलिए। आप तो सब तरफ हड़कंपे मचा दिये हैं। जाने कहां-कहां से चले आते हैं !’’ उसकी आवाज फिर से पूरे स्टेशन पर गूँजती चली गई। वह इन्क्वायरी आॅफिस से निकल कर अपने सूटकेस की ओर चल दिया। प्लेटफाॅर्म पर उपस्थित सारी निगाहें एक साथ उसे घूरने लगी थीं। निर्जन झेंपता हुआ ग्रिल की ओर बढ़ गया। वहाँ आर.पी.एफ. के जवान पोजीशन लिए थे। उसने जब अपने सूटकेस को ग्रिल से खोल लिया, तब वे उसके पास आये और उसे ओर से घेर कर खड़े हो गये। उनकी रायफलों की नालें निर्जन की ओर उठी थीं। उन्हें देख कर उसका दिल जोर से धड़क रहा था, कहीं गलती से भी किसी जवान की रायफल चल गई तो.....? उनमें से एक ने पूछा, ‘‘आपका है ?’’ ‘‘जी...जी’’ उसका तालू सूख गया था। उसका दूसरा इन्टरव्यू शुरु हो गया था। वहाँ तो सस्ते में बच गया था, यहाँ न जाने क्या हो ? यहाँ पुलिस थी। ‘‘अपना सामान स्टेशन पर ऐसे छोड़ा जाता है ?’’ दूसरे ने डपटते हुए कहा, ‘‘हम लोग सोचें कि कोई नक्सली अपना काम कर गया है।’’ ‘‘चलो इसको थाना ले कर चलो।’’ तीसरा बोला। थाना शब्द सुनते ही उसके होश उड़ गये। वह अटकते हुए बोला, ‘‘मैं... मैंने तो ट्रेन पकड़नी है।’’ ‘‘कहां की ट्रेन ?’’ डाँट का एक और चाबुक उस पर सटाक् से पड़ा। बड़ी कठिनाई से वह बोल पाया, ‘‘टाटा.....’’ ‘‘अभी उसको आने में लेट है। पहले हम जाँच तो कर लें कि तुम नक्सली हो कि नहीं ? दिखाओ अपना बक्सा, खोलो इसको !’’ उन लोगों से अपना पीछा छूट जाने की आशा में निर्जन ने जल्दी से सूटकेस का ताला खोला। पहले जो भीड़ उस सूटकेस से दूर-दूर थी, अब कुछ अनूठा तमाशा देखने की आस में और पास सिमट आयी। उस भीड़ में चने वाले के साथ वह अण्डे वाला भी था। सूटकेस खुलने पर सबसे ऊपर तह कर रखा तौलिया था, उसे निकाल कर निर्जन ने पास ही बिछा लिया। फिर सूटकेस में ठूँस-ठंूँस कर रखे अपने सामान को निकाल कर बारी-बारी से उस पर रखता चला गया। दो-तीन जीन्स, आठ-दस टी-शर्ट्स, मोटी-मोटी किताबें, कुछ फाईलें, ब्रश-पेस्ट, शेविंग किट, डियो स्प्रे अदि-आदि। धीरे-धीरे कर उसका पूरा सामान सूटकेस से निकल कर प्लेटफाॅर्म पर आ चुका था। कहीं कोई बम नहीं था। वे सब साधारण चीजें देख कर वहां जमी भीड़ ‘खेला खतम, पैसा हजम वाले अंदाज में’, धीरे-धीरे छँटने लगी। बाकी की खाना-पूर्ति करते हुए उसका टिकट और पहचान-पत्र आदि देख कर संतुष्ट हो लेने के बाद आर.पी.एफ. वाले भी उसे वहीं छोड़ कर अपने थाने की ओर को चले गये। थकान से बुरी तरह चूर निर्जन धम्म् से वहीं बैठ गया। अब उसे अपनी ट्रेन आने से पहले सारी चीजें दुबारा उसी सूटकेस में डालनी थीं।

उधर आर.पी.एफ. वाले थाना में बातें कर रहे थे, ”सर जी, हम सोच रहे थे कि अच्छा हुआ जो ई नकली नक्सली निकला। ‘‘हम तो पहले से ही जानते थे कि वह नक्सली नहीं होगा। ...और न ही उस सूटकेस में कोई बम होगा।’’ थानेदार ने सहजता से कहा। ‘‘आप जानते थे ?’’ सिपाही ने हैरानी से पूछा। ‘‘हां रे, हम चार साल पलामू में पोस्टिंग में रहे हैं। असली नक्सली लोग उग्रवादियों और नकली नक्सली की तरह जहां-तहां भय फैलाने के लिए हमले नहीं करता रहता।’’ थानेदार ने अपना अनुभव बांटते हुए कहा, ‘‘...फिर उग्रवादी लोग भी अगर बम वाला सूटकेस रखता है तो छिपा कर रखता है, ताकि विष्फोट हो सके। एतना ओपेन में नहीं न रखता।’’ ‘‘हां सर आप एक दम ठीक बोले हैं।’’ दूसरे सिपाही ने समझदारी से सर हिलाया। पहला सिपाही कुछ सोचता हुआ बोला, ‘‘सर हम सोच रहे हैं कि अगर वो सच में नक्सली होता और हम लोग उसको पकड़ लेते तो कितना नाम होता और परमोसन भी मिलता।’’ ‘‘हा...हा...हा...।’’ ठहाका लगाते हुए थानेदार बोला, ‘‘नाम और परमोसन के लिए भी असली नक्सली होना जरुरी थोड़े न है। इसको को भी पकड़ कर बम, पिस्तौल और नक्सल साहित्य बरामद करवा दे सकते थे। लेकिन कहीं अलग में मिलता तब न, यहां तो प्लेटफाॅरम पर पूरा भीड़ था और उ अपना सूटकेसो उलट कर दिखा दिया था। सबके सामने ऐसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।’’ उस सिपाही ने समझते हुए कहा, ‘‘हां अब समझा। जैसे नकली नक्सली लोग सरेन्डर कर के सरेन्डर पाॅलिसी का सब लाभ ले लेता है। वैसे ही........।’’ उसके सर जी ने भी समझाते हुए उत्तर दिया, ‘‘ठीके सोच रहे हो, हमारे लिए तो जब तक असली नक्सली न मिले तभी तक अच्छा है।’’

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