मेरी प्रेम कहानी

ठिठुरन भरी सर्दी अब घर वापसी की राह पर हैं. उसकी जगह गुलाबी मौसम ने अपने पाॅव पसार लिये हैं। इस गुलाबी मौसम को और ज्यादा गुलाबी बनाने वाला वेलेंगटाइन डे. यानी वह दिन जब उम्र की सीमाओ को तोडकर हर दिल रूमानी हो जाता है, भी आ रहा हैं। सभी को इस दिन का बेसबरी से इंतजार है और मुझे भी, क्योकी इस बार मन मे थोडा संतोष है की हमेशा की तरह इस रूमानी मौसम मे मैं अकेला नही हूँ। मेरा भी एक साथी है, मेरा भी एक हमराह है जो मेरा ‘वेलेनटाइन’ हैं।

पिछले कुछ सालो मे तस्वीर ऐसी नही थी, हवाओ का रूख कुछ और ही था। पहले वेलेनटाइन डे जितना नजदीक आता मेरी टेंशन बढने लगती, मेरा खून उतना ही ज्यादा खौलता ओर 14 फरवरी के दिन मेरा गुस्सा और दुख दोनो अपने चरम पर होते। मेरे इस गम का कारण था की इस दिन को प्रेम का दिन कहा जाता है प्रेमी-प्रेमीकाओ का दिन कहा जाता है और यही मेरी दुखती रग थी क्योकी प्रेमी तो हम थे पर प्रेमिकाओं को मामले मे अपना बैलेंस जीरो था। मै साल भर भगवान से प्रार्थना करता की इस बार तो कोई लडकी मेरी गर्लफ्रेड बन जाए जिसे मै अपना वेलेनटाइन बनाकर अपने प्लेब्वाय दोस्तो मे सिर उठाकर चल सकू। लेकिन लगता है की भगवान बिजी ज्यादा रहते है, उनके सामने ऐसे प्रार्थना प़त्रो की लम्बी लाइन लगी रहती होगी, इस भीड भाड मे मेरी प्रार्थना उन तक पहुचने से पहले ही कही गुम हो जाती और मेरी मनो इच्छा हमेशा इच्छा ही रह जाती थी।
इस गम को मिटाने के लिये इस पर कुछ मरहम लगाने के लिये 14 फरवरी को हमेशा मेरा कार्यक्रम तय था की गले मे लाल गमछा डालकर वेलेंगटाइन डे का विरोध करना है ओर अपनी संस्कृति को बचाना है। पता नही हमारी इस मेहनत से संस्कृति का कुछ भला होता या नही होता लेकिन इस बहाने हम जैसो को अपने दिल के दर्द से कुछ राहत तो मिल ही जाती थी।
गर्लफ्रेंड ना होने से मुझे कोइ खास परेशानी नही थी, मै आजाद पंक्षी होकर खुश था। लेकिन अपने बाकी दोस्तो और उनकी प्रेमिकाओ को देखकर धीरे-धीरे यह मेरी लिये सबसे बडी परेशानी बन गयी, और यह इतनी बढ गयी की मेरी नाम हैप्पी होते हुए भी मेरी दोस्ती दुख के साथ हो गयी।

मै अपने दोस्तो को देखता तो सोचता, यार उपर वाला भी कैसे कैसे गधो को पहलवान बना देता है ओर अच्छे खासे पहलवान को गधा, जो की स्वंय मै हूँ। निश्चित तौर पर मै अपने दोस्तो से किसी बात मे कम नही था। मै आकर्षक था, स्मार्ट था लेकिन ना जाने क्यो ? इस सब के बाबजूद भी कोई लडकी मुझे घास नही डालती। दूसरी तरफ मेरे दोस्त थे जिनकी सारी जेबे लडकियो से भरी हुई थी। वो एक को छोडते तो दूसरी तुरन्त उनकी बाहो मे मिलती थी। कभी कभी मुझे लडकियो पर भी दया आती की बेचारी किन कमीनो के चंगुल मे फस रही हैं लेकिन थोडी देर बाद मे महसूस करता की लडकियो के प्रति मेरी दया का कारण इंसानियत नही मेरी विवश्ता थी, मेरे मन की जलन थी।
मुझे लगता है की मेरी जलन कुछ हद तक सही भी थी क्योकी मेरे अधिकांषतय सभी दोस्त शराब पीते सिगरट फूकते अयाशी करते, ओर एक मै था जो ना शराब ना सिगरट और लडकी का तो सवाल ही नही था। फिर भी ना जाने ये कमीने ऐसा कौन सा जादू जानते थे जो की अवगुणो की खान होने के बाबजूद लडकिया उनकी तरफ खीची चली आती थी। सभी के गर्लफ्रेड के एकाउण्ट हमेशा फुल रहते थे ठन ठन गोपाल रहे तो बस हम। मै आज तक इस बात को नही समझ पाया कि आखिर ऐसा क्यो था ? क्यो प्रेम के इस मेले मे बस मै ही अकेला था? क्या सच मे लडकियो की पसंद खराब होती है या मुझे अपने बारे मे कोई गलतफहमी थी।

सफलता के घोडे पर सवार व्यक्ती बिना कुछ सोचे आगे बढता रहता है लेकिन असफल व्यक्ति अपने हर कदम, हर एक कमी की छानबीन करता है। मै भी असफलता का झंडा उठाये हुए था अत मैने भी अपने जीवन मे गर्लफ्रेडं के आकाल पर काफी रिर्सच किया और उसके नतीजे मे पाया की लडकियो के मामले मे अपने सूखेपन के बहुत से कारणो मे से एक कारण मै भी था, या कहे की सबसे बडा कारण मै स्वंय था। जब भी मै किसी लडकी को देखकर उसे ट्राई करता, उससे पींगे बढाने की कोशिश करता और मेरी उस कोशिश के बीच वहाँ मेरा कोई दोस्त आकर अपनी टाँग अडा देता तो मै उससे कोइ प्रतिद्वन्दता नही करता क्योकी मुझमे लडकियो के मामले मे उससे टकराने की हिम्मत ही नही थी। इसलिये मै स्वयं अपने आप को आउट मान लेता और रिटार्यट हर्ट होकर दोस्ती का फर्ज निभाते हुए मैदान अपने दोस्त के लिये खाली कर देता। ऐसा करने से दुख तो होता था लेकिन ज्यादा दर्द तब होता जब मेरा दोस्त उस लडकी को सफलतापूर्वक अपना मोबाइल न0 देकर मैदान जीत जाता था।

अगर दिन अच्छा हो और भाग्यवश इस काम मे कोइ टाँग ना अड़ाये और थोडे प्रयास के बाद वो लडकी भी मुझे कनखीयो से देखने लगती, मेरी चोर नजरो की भाषा को समझने का एहसास कराती और स्वंय आगे बढकर मुझे आमंत्रण देती तो ना जाने क्यो उस समय मे मैं सुदबुध खोने लगता, मेरी सोचने समझने की शक्ती बिना बताये हडताल पर चली जाती, मेरी घबराहट अपने शिखर पर होती, ओर उस लडकी को छोडकर मै बाकी सभी चीजो पर इस तरह ध्यान लगा देता जैसे बगुले को हटाकर मै गलती से इस जगह आ गया हूँ। मेरे चेहरे की उडती हुई हवाइयाँ और सौ की रफतार से दौडती दिल की धडकने खुद ब खुद मुझे मेरी मंजिल से दूर कर देती और इस तरह सारे किये कराये पर पानी फिर जाता।
मेरी परेशानी थी की मै लडकियो से दोस्ती करना चाहता था, गर्लफ्रेड बनाना चाहता था और ना जाने क्या क्या करना चाहता था। लेकिन सच तो यह है की मै लडकियो से बात करने मे भी घबराता था। किसी लडकी से बात करते समय मेरी दिमाग के सारे फयूज एक एक करके उडने लगते, मेरे शब्द मेरे गले को ही कसने लगते और......।
लडकियो से बाते उनसे मुलाकाते भले ही ओर लडको के लिये एक हसीन सपने सरीखा हो लेकिन मेरी लिये ऐसी मुलाकाते किसी दुर्घटना से कम नही होती थी और ये दुर्घटना मेरे साथ कई बार घटित हो चुकी थी।

पिछली सर्दीयो की बात है मै काॅलेज मे खाली पीरीयड मे क्लास के बहार खडा होकर चारो तरफ के रंगीन नजारे देख रहा था। मैने देखा की एक खूबसूरत सी लडकी साइंस लैब मे से कंधे पर बैग टाँगे मेरी तरफ ही चली आ रही थी। मेरी पारखी नजरे पूरी सर्तकता से उस पर लगी हुइ थी। फासला कम होने पर उसकी नजरे मेरी नजरो से टकरायी, नजरो के इस पहले टकराव मे ही मैने हथियार डाल दिये और अपनी नजरे झुका ली लेकिन उसकी नजरे मुझ पर ही टीकी रही, उसके चेहरे की चमक दर्षा रही थी जैसे वो मुझे अच्छी तरह जानती है। मैने भी उसके चेहरे का ध्यान करके अपनी याददाश्त के पहीये को बार बार घुमाया परन्तु फिर भी मै उसे पहचान नही पाया, लेकिन मै समझ गया की अवशय वो मेरे किसी दिन की कमाई है, जिससे डरकर मैने मुह मोड लिया होगा। लेकिन इन फिजूल की बातो को नजरअंदाज करके मैने ध्यान किया की वो धीरे धीरे मेरी तरफ ही आ रही थी।
मेरी धडकने उसके बढते कदमो से भी गती से भी तेज गती से बढने लगी। मुझे वो खूबसूरत लडकी एक जल्लाद की भाती नजर आने लगी। मै लडकियो के मामले मे अपनी हैसियत जानता था और ये समझ गया की मै इसका सामना नही कर पाऊगा। अतः अपने बचाव के लिये मैने अपनी किताब खोली और उसके षब्दो को इतनी तल्लीनता से देखने लगा जैसे कुछ पलो मे ही मै इसमे घुसने वाला हू। परन्तु ऐसा होना नही था और ना ही हुआ लेकिन उस लडकी को मेरे पास ही आना था और वो मेरे द्वारा प्रदर्शित सभी बेरूखियो को धता बताते हुए लगातार मेरे नजदीक आती ही जा रही थी ।

वो मुस्कुराते हुए मेरे पास आयी और बोली ‘अरे तुम यहा कैसे, इसी कालेज मे पढते हो?’
उसके बोलते ही मुझे लगा जैसे मेरे उपर किसी ने एटम बम गिरा दिया हो, मेरी आॅखो ने उससे नजरे मिलाने से साफ इंकार कर दिया, मेरे शब्द हकलाहट मे उलझ गये, दिमाग बता ही नही पा रहा था की कहना क्या है। बडी मुशकिल से मेरी जुबान ने मेरा बचाव करते हुए कहा ‘जी हाँ’।
उसके बाद उसने भी कुछ कहा लेकिन मेरे कानो ने कुछ सुना ही नही । बस मेरे मुह से इतना ही निकाला ‘मेरी क्लास शुरू हो गयी है चलता हू।’
इतना कहकर मेने अपनी डूबती साँसो को बचाया। वो दिसम्बर का महीना था, कडाके की ठंड पड रही थी लेकिन क्लास रूम के अंदर जाकर मैने महसूस किया मेरी चेहरा पसीनो से तरबतर था, मेरी हालत ऐसी थी जैसे मै मैराथन दौड जीतकर आया हू। आप इसे भले ही मजाक समझे लेकिन मेरे लिये यह मैराथन जीतने से भी ज्यादा कठिन काम था।
इस घटना मे मैने सिर्फ अपनी कमी के कारण हाथ आया मौका या कहे की मुँह मे रखा लडडू गवा दिया और इसका मुझे महीनो तक अफसोस भी रहा, लेकिन ऐसे अफसोस का क्या फायदा जब जब खुद ही खडी फसल मे आग लगायी हो ?
मै प्रेम की नैया मे बैठने मे असफल था, वही मेरे दोस्त लगातार लव मैच जीतकर सफलता की सीढी चढ रहे थे। उनकी सफलता मेरे मन की जलन को और तेजी से जला रही थी। मेरी असफलता की आग को और ज्यादा हवा दी इन मोबाइलो ने। जब भी मेरे किसी दोस्त का फोन आता तो वो बाकी सब को इगनोर करके तत्काल उस फोन से चिपक जाता, उसकी बातो मे एकदम मिश्री घुल जाती और वो घण्टो फोन पर लगा रहता। मेरे यह बात समझ मे नही आती की आखिर ये साले, घण्टो फेान पर करते क्या हैं? एक दो बार मैने सुनने का प्रयास किया , सभी की लगभग ऐक जैसी ही बाते थी ’’क्या कर रही हो?.........आज क्या बनाया है?........आलू के पराठे, हमे तो गोभी के पसंद हैं..........अब हमे कब खिलाओगी......क्या पापा आ रहे है...........अच्छा गये ..........और बताओ, लगता है तुम्हे सर्दी हो गयी है...... नही आवाज ऐसी आ रही थी।’’ और भी ना जाने कितनी बाल से खाल निकालने वाली बाते, जिनका सिलसिला थमता ही नही था। इन बातो को थोडी देर सुनकर ही मै बोर होने की एक्टींग करता था, जबकी सच्चाई ये थी की जो ’’अंगूर ना मिले वो खट्टे ही होते हैं’’।

मोबाइल से मेरा दर्द बस इतना ही नही था, असल मे इस दर्द का वास्तविक कारण था की इस मोबाइल की वजह से मुझसे छोटे भी गर्लफ्रेड पाने की दौड मे कई कदम आगे निकलने लगे थे और हम गधे की तरह बस उन्हे आगे बढता देख रहे थे। मोबाइल के कारण लव स्टोरी की शुरूवात के प्रयास और सफलता के बीच का रिस्क बहुत कम हो गया, या कहें की लगभग समाप्त ही हो गया था। अब प्यार की स्टार्टिंग से लेकर सारी बातचीत, सारे इजहरार, गुस्सा, रूठना, मनाना और ब्रेकअप सब कुछ मोबाइल फोन पर ही हो जाते हैं, और किसी को कानो कान खबर भी नही होती।
एक जमाना था जब चिटठी, जिसे प्यार की भाषा मे अँगूठा टेक भी ‘लेटर’ कहता था, प्रेमिका तक पहुचाने पडते थे। जिसे प्रेमिका तक पहुचाना अपने आप मे एक जंग मे जाना था और इस महान कार्य को करते समय पकडे जाने पर यह ‘लेटर’ बाकायदा एक पक्का सबूत होता था जो खुद शोर मचा- मचाकर चरित्र की धज्जीया बिखेर देता था। इस दुर्घटना से बचने के लिये प्रत्येक प्रेमी एक दो छोटे चेले पाले रखता था, जो उनके प्रेम की नैया को पार लगाने मे खेवन हार का काम करते थे। वैसे यह समय उन चेलो के लिये एक तरह से ट्रेनिंग टाइम होता था। इस ट्रेनिंग के सहारे ही आगे जाकर वे भी मैदान मे उतरते थे। हम भले ही इस खेल के खिलाडी तो नही बन पाये लेकिन बचपन मे हमने भी यह ट्रेनिग ली थी।
बात उस समय की है जब मोबाइल तो दूर हमारे कस्बे मे टेलिफोन भी नही थे, जमान लेटर और ग्रीटींगस का था। हमारे पडोस मे एक भैया रहते थे ‘बिरजू भैया’ वो मुझे खूब टाफी बिस्कुट खिलाते थे, इसलिये मेरी उनसे खूब पटती थी और मै ज्यादातर उनके आस पास ही मंडराता रहता था। एक बार उन्होने मुझे एक गुलाबी खुशबूदार लिफाफा दिया और कहा ‘‘बेटा हैप्पी, देख वो सामने साक्षी दीदी जा रही है ना, उनको ये लिफाफा दे आ, ध्यान रखना लिफाफा देते हुए तुझे कोइ देखे ना, समझा। मै उस समय उनकी बात समझ तो नही पाया था लेकीन फिर भी मैने हाॅ मे सिर हिला दिया और बिरजू भैया की आज्ञा का पालन करते हुए फुर्ती से लिफाफा साक्षी दीदी तक पहुचा दिया और ईनाम मे उनसे एक रूपया ऐंठकर सब कुछ वहीं भूल गया।
शाम को नुक्कड पर सारे हमउम्र लडको की मिंटीग जुडती थी, मै उन सभी मे सबसे छोटा था लेकिन फिर भी उस मिटीग मे पूरा नेता बनता था। उस शाम भी मै अपने दोस्तो के साथ बैठा था, इनमे साक्षी दीदी का भाई भी था। इस सभा मे प्रेम पत्र चर्चा का विशय थे, सभी लडके लम्बी लम्बी छोड रहे थे, मै इन बातो से थोडा नादान था मुझे सही से उनकी बातो का मतलब समझ नही आ रहा था। लेकिन जब सब लम्बी लम्बी फेक रहे थे तो भला मै कैसे पीछे रहता, इसलिये नासमझी मे शेखी बघारते हुए मैने कह दिया ‘‘ एक ग्रिटीेग तो मैने आज ही साक्षी दीदी को दिया है, बिरजू भैया ने दिलवाया था।’’ साक्षी के भाई ने मुझे घूरकर देखा और गोली की रफतार से अपने घर को दौड गया। बस फिर क्या था मेरे इन दो बोलो से तूफान खडा हो गया। इस तूफान मे साक्षी और बिरजू के परिवार वालो ने एक दिन मे ही दोनो के सिर से इश्क का भूत उतार डाला। इस तरह साक्षी और बिरजू की लव स्टोरी शुरू होते ही ‘दी एण्ड’ हो गयी, लेकिन दोनो के परीवारो की शत्रु स्टोरी का गाजे बाजे से शुभारंभ हो गया। जो बदसतूर अगले कुछ सालो तक जारी रही।
कुछ लोग इस प्रेम कहानी की असफलता के लिये मुझे जिम्मेवार मानते थे परन्तु मैने कभी ऐसा नही माना क्योकी ये सब मुझसे नासमझी मे हुआ था। लेकिन बाद मे उस घटना को सोचकर लगता की आज जो मेरे साथ हो रहा है वो इसी दुर्घटना का परिणाम है। मेरी वजह से दो प्यार करने वाले हमेषा के लिए बिछुड गये। शायद उनहोने मुझे दिल से मुझे ‘श्राप’ दिया होगा, इसी कारण मेरी जवानी यू ही बेरंग और सूखी कट रही थी।

यू बेरंग होती अपनी जवानी मे रंग भरने के लिये मैने काफी जतन किये, बहुत हाथ पैर मारे, फिर भी मुझे सफलता के दर्षन नही हुए। लाख कोषिशो के बाद भी मै किसी लडकी के दिल की धडकन नही बन पाया। धीरे-धीरे प्रेम की सफलता के सारे दरवाजे मेरे लिये बंद होते जा रहे थे और मैं असफलता की गहराइयो मे डूबता जा रहा था। मेरे मन ने भी यह मान लिया था की मैं खत्म हो चुका हू, अब इस रेस से बहार हो चुका हू। लेकिन कमबख्त दिल इस बात को मानने को तैयार ही नही था, वो लगातार इस थ्योरी को झुठला रहा था, मुझे धिक्कार रहा था की ‘‘बुझती हुई लौ भी एक बार भभक कर जलती है’’ और मै तो बिना जले ही बुझने जा रहा हॅू , मुझे भी सबकुछ भूलकर एक बार जोर से जलना चाहिये, एक आखरी कोशिश करनी चाहिये। मैने किसी रोमांटिक हिन्दी फिल्म मे सुना था की जब भी दिल और दिमाग की लडाई होती है तो उसमे जीत हमेशा दिल की होती है, और मेरे केस मे भी यही हुआ। मेरे दिमाग ने दिल के आगे सरेण्डर कर दिया अैर मैने एक अन्तिम रेस के लिए फिर से कमर कस ली।

अपने इस आखीरी प्रयास मे मै कोई कमी नही छोडना चाहता था इसलिए मैने अपनी खामीयो को पहचाना और उन्हे सुधारा। मैने जैसे तैसे अपने डर पर, अपनी झिझक पर काबू पाया, अपनी हेयर स्टाइल चंपू कट से बदलकर आमिर खान स्टाइल करायी। अपने कपडो के संेस को भी थोडा चेक किया और पूरी तरह से मुस्तैद हो गया कम से कम एक लडकी को अपनी गर्लफ्रैड बनाने के अभियान के लिये।
अपनी तैयारीयो को परखने के लिये मै शादी व्याह जैसे फंग्शनो मे जाने लगा जहाँ मेरी आशाए कुछ चमकने भी लगी लेकिन वहाँ पर एक अनार और सौ बीमार वाली स्थती जस की तस थी। चारो तरफ दोस्तो, जानकारो की भीड और समय की कमी के चलते मुझे पूर्ण सफलता के दर्षन नही हुए। लेकिन फिर भी वहा मिली कुछ आंशिक सफलताओ से मेरा स्वंय पर जो अविश्वास था वो विश्वास मे बदलने लगा था।
जल्द ही मुझे अपने नये नये कान्फीडेंस के साथ मैदान मे उतरने का मौका मिल गया। मेरे पडोस मे रहने वाली पिंकी जो हास्टल मे रहकर पढती थी वो विंटर वैकेशन मे घर आयी थी। इस बात का पता मुझे तब चला जब मैने ध्यान दिया की लडके हमारी गली मे कुछ ज्यादा ही चक्कर मार रहे हैं। जब से मैने होश संभाला है अधिकांश्तय मेरे सारे दोस्त और दुश्मन खुलकर उस पर लाइन मारते थे, वैसे मै भी चुपचाप उसपर लाइन मानता था और सबके सामने उसे इस तरह इग्नोर करता जैसे मेरा उसमे कोइ इंट्रेस्ट ही ना हो, लेकिन वो बस दिखाने के दाँत थे अगर मै सच कहू तो वो बचपन से ही मेरी ड्रीमगर्ल थी।
पडोस मे रहने के कारण उससे मेरी हाय हैलो तो थी परन्तु उससे आग कुछ नही और ना ही मेरी कभी हिम्मत हुई की मै उससे आगे बढ सकू। लेकिन इस बार हवा का रूख कुछ और था, जमाना वो ही था लेकिन हम थोडे बदले बदले थे। इस बार मै पूरी तरह से पिंकी को अपने रंग मे रंगने के लिये तैयार था।
अगले दिन वो मुझे छत पर दिखी, मै तो कब से इस मौके के इंतजार मे था, इसे गवाने का तो कोई मतलब ही नही था। मै तीर की तरह छत पर पहुचा उसने मुझे देखा और मैं तो उसे कब से देख ही रहा था, हम दोनो ने हाय हैलो की, पिंकी थोडी खूबसूरत थी इसलिये नकचढी भी थी अतः हाय हैलो के बाद उसने मुझे इग्नोर ही कर दिया। लेकिन मै इतनी आसानी से हार मानने वाला नही था, मैने अपनी तरफ से बातो का सिलसिला शुरू किया ‘‘ कब आयी, कब तक वेकेशन है, पढाई कैसी चल रही है.........आदी बिना मतलब की बातो से स्टार्ट करके धीरे धीरे हमारी बातचीत की गाडी पटरी पर चलने लगी, हमने करीब आधा पौन घंटा बाते की, बातो का यह हसीन सफर और भी लम्बा चलता अगर पिंकी की मम्मी की आवाज लाल बत्ती बनकर बीच मे ना धमकती। मम्मी के बुलाने पर हमारी बातो का सिलसिला टूटा और वो मुस्कुरा कर बाय कहकर चली गयी।
उसके जाने के बाद मैने आपनी आँखे बंद की और इस पल को हमेशा के लिये अपने मन मे कैद करने की कोशिश करने लगा। कुछ पल बाद मै हकीकत मे लौटा, मैने अपनी खुशी पर थोडा लगाम लगाने का प्रयास किया लेकिन मै चाहकर भी ऐसा नही कर पा रहा था। मेरे पाँव जमी पर नही पड रहे थे और मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट के सिवाय कोइ दूसरा एक्सप्रेशन ही नही आ रहा था।
मेरी ये मुस्कान ज्यादा देर तक नही रही, क्योकी इस पर ब्रेक लगाने वाला जल्द ही आ धमका। शाम को मेरे पंजाब वाले मामा घर आये थे। उनके लडके (मेरे ममेरे भाई) अजय की शादी थी इसलिये वो शादी से पहले ही हमे लेने आ गये थे। पापा बिजनिस के सिलसिले मे बिजी थे और वो इतने दिन पहले वहाँ जा नही सकते थे इसलिये उन्होने मुझे और मम्मी को मामा के साथ जाने के लिये कह दिया। हर औरत की तरह मेरी मम्मी भी अपने मायके जाने के लिये हमेषा ही तैयार रहती हैं, वो तत्काल अपनी पैकिग मे लग गयी, परन्तु उनकी बात मानना मेरे लिये स्वय अपने अरमानो की अर्थी निकालना था, और मै अपने अरमानो का गला घोटकर वहा षादी मे जाना नही चाहता था। मैने अपनी तरफ से ना जाने के लिये एक से एक बहाने बनाये, बिजी दुकान का रोना रोया, दोस्त की बहन की शादी की दुहाई भी दी, लेकिन पापा भी मेरे पापा थे, उन पर मेरे किसी भी बहाने का कोइ असर नही हुआ अपितु थोडी देर बाद उन्होने अपनी लाल आखे दिखाकर मुझे वहा जाने का अन्तिम आदेश दे दिया। उनके चेहरे को देखकर मै समझ गया की अब मुझे अपना झण्डा झुकाकर पिताजी की आज्ञा का पलन करना ही होगा।
मै उस रात सो ना सका, मेरी आखे तो चुप थी पर मेरा दिल खून के आँसू रो रहा था। मै मन ही मन कभी अपनी फूटी किस्मत और कभी भगवान को कोसता रहा। लकिन क्या करे ना तो मेरे कोसने से भगवान का कुछ बिगडने वाला था और ना ही किस्मत का, अतः मुझे अपने ऊँचे उडते सपनो के पंख काटकर सुबह की गाडी से मामा के साथ जाना ही पडा।
पाँच घण्टे के सफर के बाद हम नाभा स्टेशन पर उतरे, मामा का घर स्टेशन से थोडी दूर था इसलिए अजय हमे रिसिव करने आया था। उसके चेहरे की मुस्कुराहट देखकर मेरा मन हुआ की कह दू ‘साले मेरे चेहरे की हँसी चुराकर मुस्कुरा रहा है, अबे थोडे दिन बाद भी तो शादी कर सकता था।’ लेकिन अपने मन की बातो को मन मे ही रखकर मै उसके गले लगा । इस मिलन के बाद हम गाडी मे बैठकर घर की तरफ चल दिये। मै रास्ते भर ये ही सोचता रहा की आखिर ये पाँच दिन कैसे कटेंगे।
थोडी देर बाद हम घर पर पहुचे वहाँ पहुचकर लगा जैसे सभी लोग हम पर अपना सारा प्यार लुटाने के लिये तैयार बैठे थे। उन सभी की तरफ से हम पर प्रेम की बारिश सी हो गयी, इस प्रेम वर्षा के बदले मे मुझे भी दस पन्द्रह लोगो के पाँव छूने पडे, सच कहू तो मेरा बचा खुचा मूड वही खराब हो गया क्योकी निजी तौर पर मुझे पैर छूने से सख्त नफरत थी। लेकिन सबके प्रेम के आगे मेरी नफरत को हथियार डालकर उनके पाँवो मे गिरना ही पडा।
रात को अपने ख्यालो की उधेडबुन को सुलझाते हुए ही ना जाने कब मुझे नींद आ गयी, अगले दिन जब सुबह मैने वहाँ घूमकर महसूस किया की मुझे यहाँ भेजकर भगवान ने कोइ गलती नही की है। क्योकी मै अपने घर एक पिंकी को छोडकर आया था लेकिन यहा तो चारो तरफ का मौसम ही पिंक पिंक हो रहा था। सभी एक से एक खूबसूरत थी, आखिर पंजाब था भाई। यह तय करना मुष्किल था की ज्यादा खूबसूरत कौन सी है। उपर वाले ने शायद मेरी ऊँगली कस कर ही पकडी हुइ थी, क्योकी उस खूबसूरती के मेले मे मै ही एक ठीक ठाक सा लडका था जो पूर्णतय लडकियो पर अपना ध्यान केन्द्रित किए हुए था। वहा अधिकांष्तय शादी शुदा या कुछ कम उम्र के लडके थे और जो दो चार मेरे बराबर थे वो शक्ल सूरत स्टाइल मे मेेरे आस पास भी नही थे। आप चाहे तो कह सकते है की मै वहा अंधो मे काना सरदार था।
घर पर आयी अधिकाश लडकिया मेरी हमउम्र कजिन(मामा की लडकी) कोमल की सहेलिया थी। कोमल से बचपन से ही मेरी अच्छी दोस्ती थी, और उसने दोस्ती का फर्ज निभाते हुए एक एक कर उन सभी से मेरा परिचय करवाया। उनसे बाते करते हुए मेरी पारखी नजर ने ताड लिया की यहा अपना दाल गल सकती है।
यह मेरी किस्मत थी की मुझे उनमे से किसी एक को चुनना था, लेकिन ऐसी खुशकिस्मती मुझे जीवन मे पहली बार मिली थी इसलिये मुझे यह काम पहली बार साइकल सीखने से भी ज्यादा कठिन लग रहा था। स्थति एक बीमार और सौ अनार बाली थी और यह बीमार तय नही कर पा रहा था की कौन सा अनार खाया जाये।
मै एक पर अपना विश्वास जमाता तुरन्त ही दूसरी का चेहरा देखकरा मेर मन डोेलने लगता, दूसरी को देखता तो नजर तीसरी वाली के पीछे चल पडती। बहुत सा समय मैने इसी उलझन को सुलझाने मे लगा दिया की इनमे से किसे चुनु। इस उलझन मे ही दो दिन पंख लगाकर उड गये तब मुझे डर भी लगने लगा की कही मै सारा समय अपनी इस बेवकूफी मे ही ना गवा दूँ, अतः इस विश्वयुद्व सरीखी परेशानी से बचने के लिये मैने तय किया की इनमे से जो पहले मेरी तरफ झुकेगी वो ही मेरी होगी।
लेकिन सब कुछ इतना आसान भी नही था की बस मेरे सोचने से ही कोई लडकी मेरी झोली मे आ गिरेगी, इसके लिये मझे मेहनत करनी थी और ऐसी मेहनत से हम कभी भी मुँह नही मोडते थे। थोडी मष्कत के बाद एक लडकी की तरफ से मेरे बढे हुए हाथ को सहारा मिलने लगा, या कहे की मुझे ग्रीन सिगनल मिलने लगा।
उसका नाम था ‘ज्योति’। ऐसा नही था की वो सभी लडकियो मे सबसे खूबसूरत थी लेकिन फिर भी मेरे लिए वो ऐशवर्या राय से कम नही थी । सामान्य हाइट, गेहूआ रंग, और आँखे....आँखे तो सच मे उसे ऐष्वर्या बनाती थी। मुझे लगा जैसे मुझे मेरा आसमान मिल गया, मुझे एक एक सीढी चढते हुए अपने आसमान को पाना था और इसके लिए मै पूरी तरह से तैयार था। मेरी कोइ गर्लफ्रेड नही थी लेकिन मै लडकियो को पटाने के सारे दावपेंच अच्छी तरह से जानता था। मेरे पास वहाँ समय ही समय था जिसमे मै अपना सारा हुनर दिखा सकता था, और मैने दिखया भी। हरपल किसी ना किसी बहाने मै उसके आसपास फटकता रहता, बिना मतलब की बातो की सीढी और तारीफो के पुल बनाता रहता। मेरे सारे तीर लगभग अपने निषाने पर लग रहे थे, बात पूरी तरह से तय थी हम दोनो हवा का रूख समझ गये थे और उसके साथ बहना चाह रहे थे, बस इंतजार था तो दिल की खिडकियो को खोलने की पहल करने का, आखिर प्रपोज करे तो करे कौन?

मै अपने काम मे पूरी तल्लीनता से, पूरे समर्पण, पूरे जोश के साथ रमा हुआ था। लेकिन मै ही तो मछली की आख भेदने मे अर्जुन बना हुआ था, सारा जमाना तो अपनी आखे चारो और कान आठो तरफ लगाये हुए था। जिसे हम अपने दिल का राज समझते थे वो जमाने का अफसाना बन रहा था और हमे खबर भी नही थी। हमारे इस कार्यक्रम की भनक धीरे धीरे उसकी सभी सहेलियो को लग गयी और अन्त मे कोमल भी इस सच्चाई से रूबरू हो गयी।
जब कोमल ने मुझे अपनी अजीब सी नजरो से देखते हुए कहा ’’क्या बात है बच्चे बहुत ऊचा उड रहा है?’’ उस समय मुझे ध्यान आया की वो मुझसे दो महीने बडी थी और उसके इस ‘बच्चे’ शब्द मे मुझे उसका बडप्पन साफ नजर आने लगा, मुझसे इस सबाल का कोइ जवाब नही बना । मेरे दिल ने ये मान लिया की बेटा चुपचाप निकल ले, क्योकी अब तो बनता काम बिगडना तय ही है, बिना जूते पडे ही बच जाए तो गनीमत होगी। लेकिन लगता है की ईशवर मेरे साथ था और उसने कोमल को सदबुद्वी दी, जिसे मै अपने रास्ते की रूकावट समझ रहा था वो तो मेरी नैया की खेवनहार निकली और मुझे मेरी मंजिल तक पहुचने मे सर्पोट करने लगी। मैने कई बार ज्योति से अकेले मिलने की कोशिश की लेकिन फिर भी मै उससे अकेले मिल नही सका। मैने अपनी यह परेशानी कोमल को बतायी और उसने बडी आसानी से शदी वाले दिन अपने कमरे मुझे यह मौका दिला ही दिया।
यह वो मौका था जिसके लिये मैने एक अर्से तक इंतजार किया, बहुत मेहनत की लेकिन इस मौके को पाकर घवराहट के मारे मेरे पाव काप रहे थे। मुझे डर था की मेरा हाल उस खिलाडी की तरह ना हो जाय जो प्रतिभाशाली होते हुए भी अपने पहले मैच मे घवराहट के मारे शुन्य पर आउट हो जाता है। मैने अपने इस दबाव को कम करने के लिए बाबा रामदेव का सहारा लिया और तीन चार लम्बी लम्बी सासे ली जिससे मेरी
डूवती धडकने कुछ शांत हुई। ज्योति से मिलने की जल्दी मे मै वहाँ थोडा पहले ही पहुच गया था। वहा अकेले खडे होकर ना जाने कैसे कैसे ख्याल आ रहे थे, दो तीन बार मुझे लगा की पहले एक नम्बर कर आऊ लेकिन यह सोचकर नही गया की कही वो मुझे ना पाकर वापस ना चली जाय। मै काफी देर अपने दिमाग की इन्ही भूलभुलैया मे उलझा रहा।
तभी ज्योति आयी वो भी थोडी नवर्स थी, उसकी नजरे झुकी हुई थी। वो बोली ’’क्या बात है हैप्पी जी? कोमल कह रही थी की आपने हमे बुलाया है। कुछ काम था क्या?‘‘
उसके बोलते ही मेरे साथ फिर वही कालेज वाला सीन रिपीट होने लगा, लेकिन मै इस बार इसके लिये पूरी तरह तैयार था, ’’नही कुछ काम नही था, बस ऐसे ही, क्या हम आपको बुला नही सकते?’’ मैने पहली बार इस मैदान पर जीतने के लिए कदम रखा।
‘‘नही ऐसा नही है, आप जब चाहे हमे बुला सकते हैं।’’ उसने कहा
मै जानता था की वो क्या सुनने चाहती है और शायद वो भी समझ रही थी की मै क्या कहना चाहता हॅु, लेकिन परेशानी यह थी की हम दोनो ही नबाव बन गये थे, पहले आप पहले आप वाले अंदाज मे हम बाते एक दूसरे पर टाल रहे थे। इसी बीच मुझे लगा की कहीं पहले आप पहले आप के चक्कर मे गाडी ना निकल जाये, अतः लैडिज फस्र्ट के नियम भुलाकर मैने ही पहला कदम बढाया’’ज्योति जी कल को आप चली जायेंगी, फिर आपसे मुलाकात कैसे होगी, क्या हम कभी दोवारा मिलेंगे?‘‘
ज्योति भी कम नही थी उसने कहा ‘‘हाँ हाँ क्यो नही मिलेंगे, दुनिया भले ही बडी हो लेकिन अपनो से फासले बडे नही होते। आप अपना मोबाइल नम्बर दे दीजिये, मै आपको जरूर काल करूंगी।’’
उसके बात खत्म करने से पहले ही मै एक साँस मे बोल पडा ’’999710.......’’
उसने भी तेजी से मेर नम्बर नोट कर लिया।
अब मेरे तरकश मे कोइ तीर नही बचा जो मै उस पर चला सकू, बस होठो पर जबरदस्ती की मुस्कुराहट चिपकाये खडा रहा।
थोडी देर मेरे बोलने का इंजार करके उसने ही इस खामोषी को तोडा ‘‘क्या कुछ और कहना था या बहार चलें।’’
उसके इस झन्नाटेद्वार वक्तव्य से मै लगभग नींद से जागने की एक्टींग करते हुए बोला ‘‘हाँ हाॅ... क्यो नही, लेकिन क्या आपको हमारा साथ इतना अखर रहा है की आप बहार जाना चाहती हैं।’’
उसने कहा ‘‘नही ऐसी बात नही है, मै बस सोच रही थी की कोई और भी काम हो।’’
अब मुझे उसकी तरफ से पूर्ण स्वीकृती मिल चुकी थी, लेकिन आगे बढने मे रिस्क तो था ही। मामला 99 प्रतिशत सेट था पर बचा हुआ एक प्रतिशत मेरी वाट भी लगवा सकता था।
आखिर मैने फैसला कर लिया, जो होगा देखा जायेगा और मै दिल को मजबूत करके बोला ‘‘ज्योति जी मुझे आपसे कुछ और भी कहना है।’’
‘ हाँ तो कहीये, मै सुन रही हू’’ ज्योति ने नजरे नीचे झुकाते हुए कहा।
‘ मुझे आप बहुत अच्छी लगती है, मै आपको पसंद करता हू, आई लव यू’’
मैने अपनी जिन्दगी मे पहली बार किसी लडकी से ये तीन शब्द कहे थे, और मै तैयार था की अगर वो चाहे तो इन शब्दो के प्रतिउत्तर मे मुझे चांटा भी मार सकती है।
मै अपने दोनो जवाबो को सुनने को तैयार होकर एकटक उसे देख रहा था। उसकी नजरे अब भी झुकी हुइ थी और चेहरा और थी ज्यादा लाल हो गया था। वो कापते होठो से बोली ‘‘मुझे तो आप जबसे मिले हो तब से ही पसंद हो, मै भी आपको चाहती हू। लडकी हूँ ना इसलिए कह नही सकी, लेकिन आपने भी ये ढाई शब्द कहने मे बहुत समय लिया।’’ इतना कहकर वो मेरे सीने से लग गयी। उसे अपनी बाहो मे समेटे हुए मुझे लगा मानो मै किसी दूसरी दुनिया मै आ गया हूँ। हम दोनो थोडी देर बिना कुछ बोले इसी तरह खडे रहे, तभी मुझे बहार थोडी आहट सुनायी दी, हम अलग हो गये।
बहार कोमल थी वो अन्दर आयी और बोली ‘‘ अगर आप दोनो की मिटिंग खत्म हो गयी हो तो चलकर तैयार हो जाये शादी मे भी चलना है। वो मुस्कुराते हुए कोमल के साथ चल दी, जाते हुए वो मेरी तरफ पलटी और उसने मुझे फलाइग किस दी, जो सीधे मेरे दिल मे उतरती चली गयी।
मै इतना खुश था की मुझसे यह खुशी संभाले नही संभल रही थी, एक बारगी मुझे डर लगने लगा की इस खुशी के कारण कही मुझे हार्डअटैक ना आ जाये। मेरे दोस्त अक्सर दिल टूटने पर गम मिटाने के लिये शराब पीते थे, मुझे ऐसा मौका कभी मिला नही था। लेकिन उस दिन अपनी पहली सफलता के सागर मे गोते लगाते हुए मैने पहली बार दो पैक विस्की के लगा लिये और शादी मे खूब जमकर डांस किया। मुझे अपने डांस की क्षमता का तब पता चला जब अगले दिन नशा उतरा और मेरे पूरे बदन मे दर्द उठने लगा। मुझे दर्द की चिंता नही थी, आखिर मैने एक जंग जीत ली थी।

अगले दिन उन सभी लडकियो की हास्टल वापसी थी, मुझे यह मालूम था लेकिन नशे के कारण मै जल्दी उठ ना सका । जब मै उठा तो तैयारी पूरी हो चुकी थी। मैने उससे बात करने की कोषिश की लेकिन मुझे कोइ मौका ही नही मिला। वो स्टेशन जाने के लिये गाडी मे बैठ चुकी थी, मैने उसमे एडजस्ट होने का काफी प्रयास किया, लेकिन ज्यादा भीड के कारण मै उसमे घुसपैठ नही कर सका। सिर्फ एक सीट खाली थी ड्राइवर की और ड्राइविंग मुझे आती नही थी। सच कहू तो उस दिन मुझे अपनी इस कमी पर बहुत अफसोस हुआ और मैने तय कर लिया की घर जाकर सबसे पहले ड्राइविंग स्कूल मे दाखिला लेना है। लेकिन यह सब बाद मे होना था फिलहाल तो मै उसे सिर्फ यही पर ही सीआफ कर सकता था। वो थोडी उदासी के साथ मेरे चेहरे पर उदासी छोडकर चली गयी।
वो अपनी राह चली गयी और रह गया तो बस मै, अकेला और तन्हा। हमारी ट्रेन शाम को थी लेकिन बिना उसके शाम पकडनी तो दूर एक एक पल काटना पहाड सरीखा लग रहा था। शाम को हमने वापसी की ट्रेन पकडी। मम्मी ना जाने रास्ते भर किस किस का निंदा रस फैला रही थी लेकिन मै उन्हे अनसुना करके आखे बंद किये ज्योति के ख्यालो मे खोया रहा, और मन ही मन खूब उची उची पतंगे उडाता रहा, आखिर पहला पहला प्यार था इसलिये मै कुछ ज्यादा ही एक्साइटड था।

वैसे मै और भी ज्यादा एक्साइटिड अपने दोस्तो से मिलने के लिए भी था क्योकि मै अपनी खुशी को उनके सामने जल्द से जल्द दिखाना चाहता था। इसलिए घर पहुचने पर बिना वक्त गवाये मै सीधा अपने दोस्तो के पास पहुचा। मै मन ही मन खुशी का यह बम उनके सामने फोडने के लिये उतावला था। लेकिन फिर भर मैने अपने आप पर काबू रखा और उनसे हाय हैलो करके शांत रहा। मै चाहता था की वो खुद ही मुझसे पूछे और थोडी देर बाद मेरे दिल की बात उनमे से एक के होठो पर आ ही गयी ‘‘और लाल, कैसी रही शादी, कुछ सैटिंग वैटिग हुइ या बस ऐसे ही मुफत मे धक्के खा कर आ गया।’’
राजू का सवाल सुनकर मै थोडा मुस्कुराया और फिर मैने एक ही साँस मे सारी कहानी और भी मिर्च मसाला लगाकर बया कर डाली। मेरी दास्ता-ए-इश्क सुनकर उनमे से अधिकांश ने इसे मेरी बनायी कोइ झूठी स्टोरी समझा, लेकिन मेरे चेहरे की चमक ओर अंदाल ए बया ने उन्हे मेरे ऊपर विश्वास करने को मजबूर कर ही दिया। आज तक उनकी लवस्टोरी सुनकर मै जलता था लेकिन जीवन मे पहली बार मैने उनके चेहरे पर मायूसी देखी, और सच कँहू तो उन्हे जलता देख मेरे कलेजे को ठंडक पड गयी।

मेरी इस लव स्टोरी से मेरे दोस्त जल रहे थे लेकिन चैन मेरे दिल को भी नही था क्योकी ज्योति और मेरे बीच की दूरी मुझे सजा के जैसी लग रही थी। मै उसे हर हाल मे मिलना चाहता था, उससे बाते करना चाहता था लेकिन ऐसा कर नही सकता था। मै बार बार अपने मोबाइल को देखकर सोचता की उसका फोन क्यो नही आया, कभी कभी मुझे अपने आप पर गुस्सा आता की मैने जल्दबाजी मै उसका फोन नम्बर क्यो नही लिया, मै ऐसी मूर्खता कैसे कर सकता हूँ। हो सकता है की वो बेचारी किसी मजबूरी या शर्म की वजह से फोन नही कर पा रही हो, आखिर वो एक लडकी है।
कभी दिमाग दूसरी तरफ घूमता और मन मे आता की कही ये मेरे साथ कोई मजाक तो नही था, कही मै उन बेवकूफो मे से एक तो नही जैसे वो रोज बनाती होगी। और भी ना जाने क्या क्या उल्टे सीधे ख्याल मेरा हाल बेहाल कर रहे थे। परन्तु एक बार मन मे उसका मुस्कुराता चेहरा आते ही सारी शंकाये हवा हो जाती, और दिल से आवाज आती की उसका फोन जरूर आयेगा।
मेरा इंतजार लम्बा होता जा रहा था, मुझे हर एक नये नम्बर से आने वाली काॅल पर लगता की ये ज्योती का ही काॅल है, लेकिन ऐसा होता नही था। आाखिर मेरा इंतजार खत्म हुआ लेकिन इंतजार की घडी टूटकर सीधी मेरे सिर पर ही आ गिरी, फोन आया लेकिन ज्योती का नही मेरी मामी का। मेरे हैलो बोलते ही मामी ने हँसते हुए कहा ‘‘अच्छा बच्चे तेरे भी पर निकल आये, चार दिन मे खूब गुल खिलाये है तूने और हमे जरा भी भनक नही लगने दी।’’
उनके शब्द सुनकर मै समझ गया की वो कौन से गुल की बात कर रही हैं परन्तु फिर भी मैने नादान बनते हुए पूछा ‘जी..जी कैसे गुल....’।
‘जी के बच्चे चल मम्मी से बात करा’ मामी ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही मुझे दोबारा झटका दे दिया। मै उन्हे कुछ समझाता, अपनी सफाई देने की कोषिश करता उससे पहले पीछे से मम्मी बोल पडी ‘ अरे तेरी मामी का फोन है क्या ?’ मेरा दिमाग उस समय काम नही कर पा रहा था, घबराहट मे मेरे मुह से निकल गया ‘जी’। ‘ ला फोन दे, मेरी बात करवा।’ मम्मी ने मुझसे फोन छीनते हुए कहा।
मुझसे फोन लेकर मम्मी मुस्कुराते हुए मामी से बात करने लगी, लेकिन जैेसे जैसे बात बात आगे बढ रही थी मम्मी के चेहरे की मुस्कुराहट गंभीरता मे बदलने लगी। उनके चेहरे के हाव भाव देखकर मै समझ गया की बलवा होने वाला है इसलिये फोन कटने से पहले ही मै घर से बहार निकल आया। बहार आकर भी मेरे मन को शांती नही मिल रही थी, मै समझ नही पा रहा था की इस छोटी सी बात का बतंगड कैसे बन गया। खैर जो होना था सो हो गया मुझे तो देखना था की अब क्या होगा। एक अजीब सा डर मेरे को बार बार डराता रहा, वो दिन मेरे लिये एक खतरनाक सपना बन गया । आखिर मै कब तक बहार घूमता शाम को मुझे वापस घर आना ही पडा। जब मै घर पहुचा तब तक पापा भी आ चुके थे, शायद मेरे पापा ही वो डर थे जिससे मै दिन भर डरता रहा। उन्हे देखकर मेरे पैर कापने लगे लेकिन फिर भी मै अपने डर को अपने अंदर कैद करके नार्मल ही बना रहा।
पापा मेरे आने का ही इंतजार कर रहे थे। उन्होने मुझे अपने पास बुलाया। अपने चेहरे पर वो ही चिरपरीचित गंभीरता ओढे हुए उन्होने मुझसे पूछा ‘कहा घूमकर आ रहे हो हीरो, कहा था तू सुबह से?
मै इस सबाल का उत्तर पहले ही सोचकर आया था, मै अपना जबाब पेश करता इससे पहले ही पापा फिर से बोले ‘तूने उस लडकी से, क्या नाम है उसका ‘ज्योती’ तूने कुछ कहा था उससे?’
‘कौन ज्योती? कौन है ये? मैने क्या कहा उससे, कुछ भी तो नही।’ मैने नासमझ बनते हुए जबाब दिया
‘अच्छा तू नही जानता कौन ज्योती, लेकिन तेरी मामी तो कुछ और ही बता रही थी। पापा ने फिर सबाल दागा।
‘क्या बता रही थी मामी? मैने थोडा हकलाते हुए पूछा लेकिन इस बार मेरे चेहरे से मेरा बनाबटी भोलापन बह गया।
पापा मेरे शब्दो की हकलाहट और चेहरे पर आते पसीने को देखकर सारी सच्चाई समझ गये। वे गंभीरता को गुस्से मे बदलते हुए बोले ‘सच बता क्या किया तूने?’
पापा के इस कठोर चेहरे को देखकर मेरी जुबान जम सी गयी और मुझे जबाव की जगह पसीने छूटने लगे। मै जल्द रोता नही था लेकिन ना जाने कैसे उस दिन मेरी आँखो मे आसू आ गये, मैने रूधे गले से कहा ‘‘ साॅरी पापा, लेकिन सारी गलती मेरी ही नही है, ज्योती भी मुझे पसंद करती थी और बात उसने ही आगे बढायी थी।’
मेरी हालत देखकर पापा बहुत जोर से हसे, वो मेरे पास आये और बोले ‘‘इतना परेशान क्यो हो रहा है। डर मत, जो कह दिया सो कह दिया। जवानी मे ऐसी बाते होती ही रहती हैं।’’ मै पापा के इस बदले हुए रूप को समझता उससे पहले ही वो फिर से बोले ‘अरे गधे ज्योति के साथ साथ तू उसके परिवार को भी पसंद है, तेरी और ज्योती की शादी कराना चाहते है वो लोग, यही बात करने को तेरी मामी ने फोन किया था। तेरी मम्मी और तेरे मामा मामी को भी लडकी बहुत पसंद है। फिर मेरे इंकार का तो सवाल ही नही उठता। चलो हम तेरे लिये लडकी ढूढने से तो बचा गये, ये काम तूने खुद ही कर लिया।
मै तो घर ये सोचकर आया था की यहा गुस्से का ताण्डव होगा लेकिन यहा तो उसकी जगह शादी पुराण पढा जाने लगा। इतने इमोशन और ड्रामे के बीच ना जाने कहाँ से मेरे सिर पर ये शादी का बम फट पडा जिसकी आवाज सुनकर मेरा सारा इश्क हवा हो गया, कमरे मे लाइट जलते हुए भी मेरी आखो के सामने अंधेरा छा गया। मै तो दर्शन करने गया था लेकिन घण्टी मेरे गले मै ही बंध रही थी और मै कुछ भी नही कर सकता था। मै मात्र 23 साल का ही था, अभी कालेज खत्म हुआ है, कुछ दिन से दुकान पर जाने लगा था और इतनी जल्दी शादी।
मै पापा से मना नही कर सकता था क्योकी ऐसा करने पर एक लम्बा चौडा भाषण और शायद उसके बाद मेरी धुलाई भी तय थी। इसलिये मैने पापा से ध्यान हटा कर मम्मी को अपना निशाना बनाया। उन्हे खूब मक्खन लगाया की वो मेरी शादी ना होने दे लेकिन मम्मी को तो अपने भाई और भाभी की बात की ज्यादा चिंता थी और इसके लिये वो मेरी चिता बनाने पर आतुर थी। वो मेरी गर्दन फंदे मे फसाकर भी मामा मामी का सिर नही झुकाना चाहती थी। लोग कहते है की औरत को अपने मायके से आयी मिट्टी भी सोने से ज्यादा प्यारी लगती है, और यहाँ तो मेरी मम्मी को उनके मायके की लडकी बहू के रूप मे मिल रही थी, इसलिये उन्होन मेरी बातो पर गौर करने से ज्यादा मौहल्ले मे अपनी इस खुशी का ढोल पीटना ज्यादा जरूरी समझा।
मैने अपने गले मे बंधने जा रही शादी की घ्ंण्टी से बचने की बहुत कोशिष की पढाई, कैरियर, बिजनिस सारे हथकण्डे अपनाये लेकिन हमेशा की तरह मेरा कोइ बहाना मेरे काम नही आया, मैरे सारे हथियार बेकार हो गये और अन्त मे मुझे अपना एकतरफा संघर्ष छोडकर शादी नाम के तूफान के साथ ही बहना पडा। मैने अपने मन को जबरदस्ती ये तसल्ली दी की मेरी शादी मेरी पसंद की लडकी से हो रही है और ऐसे खुशनसीब बहुत कम लोग होते हैं, इसलिये मुझे दुखो का देवदास बनने की जगह खुश होना चाहिये।
मेरे पापा ने बिना वक्त गवाये ज्योती की माता पिता को घर आने को निमंत्रण दे दिया। जल्द ही उन्होने घर आकर हमारा रिष्ता पक्का कर दिया। पापा कुछ ज्यादा ही जल्दी मे थे उनहोने महीने भर बाद ही हमारी मंगनी का प्रोग्राम तय कर दिया। उसी दिन से हमारे घर मंगनी की तैयारी होने लगी। मेरे दोस्त इसकी तैयारी मै इतने जोर शोर से लग गये जैसे मेरी नही उनकी मंगनी हो!.. साले कमीने।
इस बीच दो तीन बार ज्योति का काॅल आया, उसने थोडी प्यार भरी बाते भी की लेकिन उससे ज्यादा बाते मंगनी मे पहनी जाने बाली अपनी और मेरी ड्रेस सेट करने के लिये की, उसकी बाते सुनकर मुझे अहसास हुआ की वो अपने प्रेमिका के रूप को पीछे छोडकर पूरी तरह पत्नी के खांचे मे फिट हो चुकी है, एक ‘परफेक्ट पत्नी’।
आखिर मंगनी का दिन भी आ ही गया, मै अपने माता पिता की इकलोती संतान था इसलिये पापा ने भव्य आयोजन किया। सभी अपनो को निमंत्रण दिया गया, सैकडो की तादात मे कार्ड बाटे गये, सभी दोस्त रिश्तेदार सजधज कर आये थे,खासकर महीलाए, जिनहोने मेकअप करने मे जरा भी कंजूसी नही की थी। बेंकट हाल मे चारो तरफ बहुत भीड थी दोस्तो रिश्तेदारो की भीड मे मुझे वहा पिंकी भी नजर आयी लेकिन मेरी मंगनी असल मे मेरे लिये इश्क के मैदान से रिटायरमैंट का जलसा था, इसलिये मैने कभी हाथ ना आने वाली उस खूबसूरत ट्राफी से नजरे चुराकर उसके लिये मेहनत करने को काम अपने दोस्तो पर छोड दिया।
मुझे हर तरफ से बधाइयाँ मिल रही थी, लोगो से गले मिलते मिलते उन्हे शुक्रिया धन्यवाद कहते कहते मै थकने लगा था वहाॅ हर कोइ मेरी पसंद को देखने के लिये उतावला था और थोडा उतावला मै भी था। आखिर मेरे साथ साथ सभी का इंतजार खत्म हुआ, ज्योति महरूम लहंगा चुंदरी पहनकर आयी, सच कहू तो बहुत खूबसूरत लग रही थी वो। लेकिन ना जाने क्यो मुझे उसके आने पर वो खुषी नही मिली जैसी उससे पहली मुलाकात मे हुई थी। ज्योती ने मुझे देखा और मुस्कुराई, उसे मुस्कुराता देख मेरे मन मे ना जाने कहा से ,ख्याल आया-

तू मेरी आँखो का वो हसीन सपना है,
जिसे देखकर, जिसे पाकर
लगता है,
काश!
मै आँखे बंद ही ना करता।

लेकिन जब आँखे बंद कर ही ली तो अब सपना देखना ही पडेगा, भले ही मुस्कुराकर देखो या आंसू बहाकर, मै इस सच्चाई को समझ गया था और मैने मुस्कुराकर यह सपना देखने का फैसला किया। हम दोनो ने खुशी खुशी एक दसरे को अंगूठी पहनाई। चारो तरफ तालियो का शोर था, वहाँ बजने वााली हर एक ताली हम दोनो के लिये थी, हर कोई हमारी खुशी मे खुश था, हर एक नजर हम दोनो पर टिकी हुई थी, सिवाय मेरे दोस्तो के, उनकी नजरे हमसे ज्यादा ज्योती की सहेलियो पर अटकी हुई थी और वो किसी ना किसी बहाने से उनके चारो ओर मंडरा रहे थे। अपने दोस्तो को फुलफार्म मे बैटिंग की तैयारी करता देखकर मै समझ गया की ये आजाद परिंदे है ऊची उडान तो भरेगे ही, भरने दो ।
मै स्टेज पर अकेला बैठा था, क्योकी मेरे पास बैठी ज्योति तो नाते रिश्तेदारो से मिलने वाले प्यार और आर्शिवाद को संभालने मे व्यस्त थी। इस अकेलेपन की घडी मे मैने नजरे घूमाकर देखा की वहाँ कहीं डीजे पर डांस चल रहा था तो कही शराब के जाम छलक रहे थे, कही मम्मी अपनी सहेलियो मे चहक रही थी तो कही मेरे दोस्त अपनी मस्ती मे मस्त थे और दोस्तो के इस झुण्ड का एक पंक्षी, मै..... मै इन सब के बीच अपने चेहरे पर बडी सी मुस्कान चिपकाये अपनी प्रेमिका.....साॅरी, हाने वाली पत्नी के पास बैठा था, मेरी इस बडी सी मुसकान के पीछे मेरे आंसू छीपे थे, मेरा दर्द छिपा था और अपने दिल का दर्द बस मै ही तो जानता था, आखिर शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गयी थी, ‘मेरी प्रेम कहानी’।


( दोस्तो आपको यह कहानी कैसी लगी, आप कहानी पर कामेंट करके व कहानी को अपने अनुसार रेटिंग देकर या निजी तौर पर मुझे मैसेज करके अपनी राय दे सकते है। मुझे आपके अनमोल विचारो का इंतजार रहेगा।)

(अरूण गौड.)

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