साल 2010,
इंजीनियरिंग का तीसरा सेमेस्टर,
रात के दो बजे रहे थे। मूवी देखने के बाद मुझे नींद आने लगी थी। मैं सोने से पहले फेसबुक देख रहा था, उस समय फेसबुक एकदम नया था। यानि किसी को हाय हेलो भेजना होता तो गलती से अगले के वाल में जाके लिख आते, कुछ ऐसी ही स्थिति थी। तो रात के दो बजे मैंने देखा तो पाया कि सिर्फ एक ही आनलाइन थी। कौन थी मुझे भी नहीं पता, कब मैंने उसे एड किया हुआ है ये भी नहीं पता, अपनी तो नयी आईडी बनी थी, सबको लंगर में रिक्वेस्ट भेज दिया, क्या भारत क्या पाकिस्तान सब तरफ से कुछ-कुछ लोग जुड़ गए।
हां तो आज पहली बार मेरी उससे बात हो रही है।वो गुवाहाटी की है और अभी 12th में है। उससे मेरी बात शुरू हुई, एक घंटे तक धड़ाधड़ चैटिंग, नया नया चस्का, वैसे चैटिंग कम और संस्कृति का लेन-देन ज्यादा हो रहा था।
उस रात मुझे ये महसूस हुआ कि मेरा बचपना अभी तक गया नहीं है, उस एक बचपने के चलते कुछ भी बात कर देता हूं। नहीं पता चल पाता कि क्या गलती हुई, हां कई एक बार शर्मिंदा भी होना पड़ा है। एक बात और ये पता चली कि मुझे सच में लड़कियों से बात करना नहीं आता। मैं जब अपने कालेज के दोस्तों को हेडफोन लगाए धीमी आवाज में बात करते देखता था तो मुझे लगता था कि ये दुनिया का सबसे बड़ा आर्ट है। मतलब इतने घंटे तक किसी से बात कर लेना। उस समय यही लगता कि यार कोई इतना ज्यादा कैसे बात कर लेता है, कहां से इतना कुछ लाता होगा बात करने के लिए, कैसे इतना कोई सोच लेता होगा। ऐसे सवाल इसलिए भी घूमते क्योंकि मेरे इर्द-गिर्द ऐसे बहुत से दोस्त थे। कभी-कभी हीन जैसा महसूस हो जाता कि यार ये काम मुझे क्यों नहीं आता।
लेकिन उस रात बड़ा कांफिडेंस आया जब उसने चैटिंग के बीच में कहा कि चलो फोन पर बात करते हैं। यानि जिसकी किसी से बात न होती हो उसे कोई लड़की रात को दो बजे अचानक बात करने का निमंत्रण दे। पहले तो ऐसा कभी न हुआ, सब कुछ चमत्कार जैसा लग रहा था। मेरी स्थिति "बेटा मन में लड्डू फूटा" वाली हो गई। उसके पास एक आल इंडिया रिलाइंस फ्री वाला नंबर था तो फिर क्या सुबह 5 बजे तक बात हो गई। मुझे बहलाने, फुसलाने और तारीफ टाइप का मीठा बात करने उस समय बिल्कुल नहीं आता था, डोंट वरी अभी भी नहीं आता ये सब। हंसना मत यार मैंने न ये कला सीखने की भी कोशिश की थी लेकिन नहीं सीख पाया।
हां तो उस रात बंगाल, उड़ीसा के रास्ते होते हुए असम की पूरी संस्कृति मुझ तक छत्तीसगढ़ पहुंच रही थी। मैं भी ठहरा निट्ठला, बैकलाग पेपर क्लीयर नहीं हुआ था और यहां मैं एक अलग ही दुनिया की पढ़ाई की बातें कर रहा हूं, लैंग्वेज सीख रहा हूं, कल्चर अपना रहा हूं।

उस रात बात करते-करते एक समय ऐसा भी आया कि जैसे दोनों हल्की नींद में बात कर रहे हों, अचानक से उसने मुझे एक संज्ञा दे दी, वो मुझे 'GG' कहने लगी यानि कि गाड गिफ्ट। मुझे लगा कि मैं पहली बार ही तो बात कर रहा हूं ये कुछ ज्यादा ही हो गया।
एक लड़की से फेसबुक में बात हुई और तुरंत नंबर मिला। इस बात को लेकर मुझे उतनी खुशी नहीं हुई होगी, जितनी खुशी इस बात के लिए थी कि लो बेटे हमने आज घंटों बात किया है, एकदम जी भर के बात किया है। एक दोस्त से शेयर भी कर दिया कि देख भाई ये हुआ है। इंग्लिश तो थोड़ा बहुत सीखा है, असमिया के दो-चार शब्द भी सीखे हैं। असल में मेरी इंग्लिश उस समय कबाड़ थी, और हिन्दी तो मेरी पहले से ठीक थी। तो मैं उसे हिन्दी सिखाता, वो मुझे इंग्लिश। अपनी बात होने लगी। भाषाओं के लिए मेरा पागलपन इतना कि मैंने उसे असमिया सीखने के नाम से बड़ा परेशान कर देता था।

एक दिन उसने बताया कि उसके पापा मुस्लिम हैं, मम्मी क्रिश्चियन है, रिश्तेदारों में देखें तो पारसी और बौध्द धर्म भी पल्लवित होता है। आगे वो बताती कि उसके घर में लगभग सभी धर्मों के रंग मिल जाते हैं। यहां मैं बताना चाहूंगा कि नार्थ ईस्ट वाले कुछ मामलों में वाकई खास हैं, उनका हास्य विनोद भी कमाल होता है। 'बच्चे मन के सच्चे' वाला उनका निरालापन कई बार दिल छू लेता है।
हां तो जब वो धर्म के बारे में बतायी तो मैंने कहा अच्छा तुम्हें पता है मैं हिन्दू हूं, देखो तुम्हारे घर में ये एक रंग नहीं है। तुमने शायद ये रंग पहले नहीं देखा है अच्छे से, इसलिए मैं तुम्हारे लिए इतना खास हो जा रहा, शायद इसलिए तुम मुझे GG पुकारती हो, इतना बड़ा क्रेडिट।पता नहीं झूठ-मूठ का बोलती हो या बस ऐसे ही।
उसने कहा- अच्छा तो तुम हिन्दू हो, हां यार एक हिन्दू की कमी है हमारा फैमली में। एडजस्ट होने का मन हो तो प्लीज यू कैन एप्लाय। और हां gg तो तुम हो ही मेरे लिए।
ऐसा वो बोली फिर हम दोनों हंसने लग गए।

नार्थ ईस्ट के लोगों के बारे में एक विशेष बात ये भी है कि उनकी हिन्दी थोड़ी टूटी-फूटी होती है..हां ये विशेष है। भले ही नार्थ ईस्ट आते आते खड़ी बोली हिन्दी रूपी गाड़ी का पिस्टन बुरी तरीके से बैठ जाता है लेकिन इस टूटी हिन्दी में भी उनका संवाद करने का तरीका हमसे काफी बेहतर होता है। हां तो उस लड़की का बातचीत करने का ढंग कुछ ऐसा था कि
तुम क्या कर रहा है?
तुम कहां जा रहे है?
घर में सब कैसा है?
वगैरह वगैरह.....
एक बात जो उसकी याद आ रही है वो ये कि जब भी बातचीत होती, हाय हेलो होता, उसका दूसरा या तीसरा सवाल लगभग यही होता कि "घर में सब कैसा है?" ..वो लगभग हर दूसरे दिन ये सवाल कर देती।
इन छोटी-छोटी चीजों की वजह से वो मेरे लिए आम से खास हो जाती। यानि कोई जो आपसे हजार किलोमीटर दूर है, उसके दूसरे सवाल में आपके घरवालों का ख्याल हो। ये छोटी-छोटी चीजें कितना उनको खास बना देती है। हमारे यहां के लोग हाय, कैसे हो, के बाद पेट के बारे में पूछते हैं कि खाना हुआ कि नहीं और सब्जी भाजी को लेकर घंटों घसीट लेते हैं।
लेकिन नार्थ ईस्ट वालों के बारे में मैंने ये पाया कि ये एक छोटी सी चीज लगभग हर किसी के व्यवहार का एक हिस्सा है। माने यही तो हमारा सबसे बड़ा धन है, इन्हीं सब की वजह से तो भारतीय संस्कृति विश्व प्रसिद्ध है।

हमारी बातचीत को लगभग एक महीना हो चुका था। इस महीने भर में कभी वो अपनी मासी से मेरी बात करवाती तो कभी अपनी बहन से, और कहती कि लो अब इनको हिन्दी सिखाओ। बाप रे उनकी हिन्दी इतनी डांवाडोल थी मेरा पसीना छूट जाता उन्हें सिखाते-सिखाते। उसने फेसबुक में कभी अपनी फोटो नहीं डाली, उस समय ऐसा था कि उसे फोटो भेजने भी नहीं आता था। उसने मेरी इच्छा मानते हुए किसी दोस्त की मदद से अपनी तस्वीरें मुझे ई-मेल में भेजी। दो तस्वीरें थी, एक में उसने पारंपरिक असमिया ड्रेस पहना हुआ था (ठीक वैसा जैसे पूर्वोत्तर के चाय बागानों में पत्तियाँ तोड़ने वाली महिलाएं पहनती हैं) और दूसरी तस्वीर में नेशनल लेवल बालीवाल चैम्पियन ट्राफी हाथ में लिए हुए थी। इस बीच बातचीत होते-होते हम एक दूसरे के लिए खास हो गए लेकिन प्रेम-विलाप का उपक्रम कभी न हुआ।

उसकी मम्मी गुवाहाटी की मेयर रह चुकी हैं। और पापा बिजनैसमैन हैं, उसने मुझे ये भी बताया कि गुवाहाटी में सबसे बड़ी गैलरी की दुकान उन्हीं की है। मेरी उससे कभी दिन में बात नहीं हुई, वो स्कूल में रहती तो अधिकतर मेरी बात शाम या रात के समय ही होती। दिन में कभी-कभी फेसबुक में बात हो जाती।अब फोन में बात हो जाती तो फेसबुक में उतना ध्यान नहीं रहा, भला भरे पेट में कैसे खाना खाया जाए वाली स्थिति थी।
एक बार ऐसा हुआ कि कुछ दिन से मेरे पास नेट नहीं था,
उसने एक दिन शाम में कहा -तुम कहां रहता है दिनभर, मैंने फेसबुक में मैसेज किया था।
मैंने बताया कि अभी नेट पैक नहीं डलवा रहा। देखता हूं कुछ दिन में डलवा लूंगा।
आप यकीन नहीं करेंगे आधे घंटे के अंदर उसने मेरे फोन में रिचार्ज करा दिया।
मैंने उस समय औपचारिकता स्वरूप में बोल दिया कि अरे यार क्यों करवाया रिचार्ज, क्या जरूरत थी।

अगले दिन अपने दोस्तों को बताया, अब ये सब बातें पेट में रहती कहां है। मैंने अपने दोस्तों से जब शेयर किया तो उन्होंने कहा भाई मजे हैं तेरे। साला यहां तो हमारी वाली ले दे के पेट्रोल डलवाती है। तू सही फंसाया है भाई मजा ले, जल्दी से एटीएम तक बात पहुंचा, कैश ट्रांसफर करवा भाई, कौन सा तुझे मिलना है उससे।

सच बोलूं एक दो रात तो ठीक से सो नहीं पाया। मेरी वाली तेरी वाली, फंटी वगैरह ये शब्दावलियां मुझे चुभने लगी, आज भी ये सब कहीं सुन लेता हूं तो बात मुझे ये बात इतनी चुभ जाती है कि शायद आप इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। चाहे सामने वाला अपनी किसी खास के बारे में बता रहा हो, लेकिन भाई मुझे ये नहीं पसंद, भले उस समय मेरे पास इस बात का कोई तोड़ नहीं था लेकिन आज साफ कहता हूं कि इस घिनौने लैंग्वेज पैटर्न से मुझे चिढ़ है। हां मेरी ये उत्तेजना सहज है क्योंकि मुझे औचित्य कहीं न कहीं अपने पक्ष में नजर आ रहा है।
एक तरफ मेरे दोस्त जो हाल फिलहाल में सुख-दुख के साथी थे। एक तो आसपास का माहौल ऐसा कि समझ न आए कि क्या सही क्या गलत। उसने रिचार्ज करवाया, इस बारे में मैंने लड़की से और कोई बात नहीं की।
एक अपराध-बोध मन ही मन मुझे घेरे जा रहा था, एक द्वन्द्व जो मुझे दीमक की तरह अंदर से खोखला करने को तैयार था।
कभी लगता कि मैंने क्यों ये बात अपने दोस्तों को बता दी। कभी लगता कि खुद से दगाबाजी हो रही है भाई। मन तो किया कि चिल्ला चिल्लाकर उद्घोष कर दूं कि ये सब मुझे स्वीकार नहीं है।अपरिपक्वता के उस समयकाल से खुद को निकाल लेना थोड़ा मुश्किल जान पड़ रहा था।

आखिरकार ये बात वहीं कहीं दबकर खत्म हो गई। दोस्तों की सलाह सुनके एक बार ध्यान भटका जरूर था लेकिन सच्चे मन से कहता हूं कभी कोई लालच का भाव न आया। मेरे बचकाने मन ने फिर से हमेशा की तरह मेरा साथ निभाया,मुझे संभाल लिया।
मुझे अपने दोस्तों के बीच कूल बने रहने के लिए जबर्दस्ती झूठ बोलना पड़ता था कि हां बे अपना तो फुल रिचार्ज हो रहा है भाई। बस अब बैंक से कैश स्वाइप कराने की देर है।

हां तो अब बात आती है मेरे पहले सपने की। मंगलवार की रात थी। रात के दो-तीन बजे के आसपास का समय होगा, मैं चौंककर उठा, हल्का पसीना भी आ रहा था। मैंने उस लड़की के पापा को अस्पताल में देखा। मैंने देखा कि उनको हार्ट अटैक आया है, दूसरा स्टैज है और आईसीयू में भर्ती हैं। रिश्तेदार धीरे-धीरे अस्पताल पहुंच रहे हैं और जो पहुंच चुके हैं वे बाहर इंतजार कर रहे हैं। इतने में मेरी नींद टूटी।
सुबह मैंने लड़की से बात करने की कोशिश लेकिन उसका फोन नहीं लगा, जिस लड़की से पिछले महीने भर से रोज मेरी बात हो रही थी, पिछले पांच दिन से उसका फोन बंद था। पांच दिन के बाद उसका मुझे फोन आया,
मैंने कहा - यार कहां थी तुम! कब से तुम्हें फोन लगा रहा हूं कुछ जरूरी बात बतानी थी।
उसने भरी हुई आवाज में कहा - पापा को हार्ट अटैक आ गया था, सेकेंड स्टैज था। अभी सब ठीक है। हास्पिटल में ही बिजी था इसलिए बात नहीं कर पाई। हां gg तुम क्या बोल रहा था बताओ।
मैंने कहा- नहीं कुछ नहीं बस ऐसे ही।
मैंने उस दिन बात टाल दी और फिर उसे कभी न बताया कि जिस दिन अटैक आया था उसके ठीक एक दिन पहले ही मैंने सब कुछ हूबहू सपने में देख लिया था।


क्रमशः ....

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