हँसी का बहनापा
अर्पण कुमार

क्या कहता है
हँसी का यह बहनापा,
क्या ढूँढ़ते हैं हम
दो जोड़ी आँखों के
इस महासागर में,
एक बड़े कैनवस पर
बिखरे पड़े गुलाबी रंग की
इस थमती-चलती
सकुचाती-चहकती
हँसी को
ज़रा ध्यान से देखें
चित्रकार के हाथों से
उसकी कूँची
छूट कर
कहीं नीचे तो
गिर नहीं गई है!
देख रहे हो तो देखना
क्षितिज की ओर भी
दूध सी उजली
इस हँसी से
बादल अपने लिए उजास
उधार तो नहीं मांग रहा!
और इधर यह धरती
इतराती अपनी कोख पर
गोल गोल जो घूमती
चली जा रही है,
कहीं चक्कर खाकर
गिर न पड़े यह पगली माँ!

बड़ी बहन के ललाट की
एक नस उभर पड़ी है
तो छोटी बहन की आँखों का
काजल कुछ अतिरिक्त नम
हो आया है
यह बहनापा है
दो युवतियों का
यह युग का
सबसे खूबसूरत संयोग है
योगक्षेम है यह उनका
जो साथ रहेगा
तब भी,
जब वे साथ नहीं रहेंगी
एक दिन
इस तरह

एक आँगन में
कुलाँचें भरती
दो कंठों की
यह किलकारी
दो आँगनों में
बिखर जाएगी
वक़्त के साथ,
उनकी यह हँसी
सूरज की लाली है
और चाँद की चाँदनी
बिखरना
उसका स्वभाव है
और धर्म भी

जब वे हँसती हैं
तो लगता है
कि सृष्टि की कोई
अलौकिक शक्ति
उनमें आ गई हो,
उनकी हँसी में
हो न हो
कुछ तो है
ऐसी योगमाया
जो सुनाई पड़ती है
एक योजन से ही

मासूमियत पर
चहुँओर हो रहे
हमले के इस समय में
उनकी यह निर्दोषता
लड़ लेगी हर कलुषता से
और बचाए रख लेगी
सही सलामत
अपनी यह
लाख टके की हँसी
ठीक वैसे ही
जैसे सुबह की ओस
रात भर की कालिमा को
पीकर भी
बचाए रख पाती है
अपनी शुभ्रता
…...

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