रीति रिवाज़


आज सुबह जब सुमि उठी तो कुछ अजीब सी हालत थी उसकी। बार -बार उबकाई आ रही थी ,सोचने लगी कि ऐसा क्या खाया था कल रात को ? रात के खाने में तो बस दाल रोटी और भिन्डी की सब्ज़ी ही खायी थी, वो भी ताज़ा बनी हुई , अचानक भाग कर बाथरूम में गयी ,लग रहा था कि मितली होगी ,परंतु बस जी मिचला रहा था और कुछ न हुआ। एकाएक मन में विचार कौंध गया कि कहीं---- न, ऐसा नहीं होना चाहिए।

सुमि की शादी हुए दो साल हो चुके थे परंतु अभी परिवार आगे बढ़ाने की बात उसने सोची नहीं थी। ऐसा नहीं है कि उसका मन नहीं होता था कि उसका भी एक प्यारा सा बच्चा हो ,लेकिन चाह कर भी वह बच्चे के बारे में अभी नहीं सोच सकती थी। घर में तो सब चाहते थे कि अब आँगन में किलकारी की गूँज सुनें , रवि भी अब पिता बनना चाहता था। सुमि की सास नन्द सब बहुत शिद्दत से चाहते थे किअब घर का सूनापन मिट जाना चाहिए और इसके लिए सुमि को बहुत बार ताने भी सुनाये जाते थे। "पड़ोस वालो के बेटे की शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ और उनकी बहु ने पोते का मुँह भी दिखा दिया और एक हमारी महारानी है दो साल से भी ऊपर हो चुके हैं... पता नहीं कब भाग खुलेंगे हमारे !" सुमि की सास जब-तब ताना मारने से चूकती नहीं थी।

आज लग रहा है की भगवान ने उन सबकी सुन ली है लेकिन सुमि बिलकुल भी खुश नहीं थी, जानती थी कि उसके माँ पापा अकेले हैं अब और सब बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ उठाते उठाते उनकी कमर टूट चुकी है। छोटी सी तनख्वाह और चार बच्चों की ज़िम्मेदारी , बहुत दुःख देखे हैं उन्होंने। अभी तो शादी में लिया हुआ क़र्ज़ भी नहीं चुका पाए हैं और अब यह नया खर्च ,कैसे उठाएंगे बेचारे।अभी पक्का पता भी नहीं था कि सुमि सचमुच माँ बनने भी वाली है या नहीं और सुमि ने न जाने क्या -क्या सोच लिया !

"सुमि! आज ऑफिस नहीं जाना क्या ? " अचानक पति की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी। घडी की तरफ देखा तो सात बजने ही वाले थे जल्दी से उठी और रोज की तरह रसोई के काम में लग गयी।चाय बना कर सास- ससुर को दी और रवि की चाय लेकर कमरे में गयी तो देखा कि वह अभी सो रहा है ,"अरे !उठो रवि ,साढ़े सात बज गए हैं मुझे जगा के खुद सो गए " अपनी चाय तो रोज़ की तरह ठंडी ही पीनी पड़ी। जल्दी -जल्दी खाना बनाया और अपना और रवि का टिफ़िन पैक करके नहाने चली गयी। नाश्ते का समय नहीं बचा बस यूँ ही निकल गयी घर से। बस में बैठी तो सोचने लगी कि क्या करे क्या न करे ! ऑफिस में सरे दिन यही सोचती रही .जैसे तैसे दिन बीत गया शाम को घर जाते समय केमिस्ट शॉप से प्रेगनेंसी टेस्ट करने के लिए स्टिप्स खरीदी और अपने बैग में रख ली।

अगले दिन सुबह सवेरे चुपचाप उठ कर उसने टेस्ट किया तो टेस्ट पॉजिटिव आया। सही मायनो में उसे यह खबर जान कर खुश होना चाहिए था पर वह तो गहरी चिंता में डूब गयी। सोचा कि यह खबर किसी को नहीं बताएगी और चुपचाप डॉक्टर के पास जाकर एबॉर्शन करवा लेगी। उसी दिन वह लेडी डॉक्टर के यहाँ गयी। अपनी बारी का इंतज़ार कर रही थी। उसकी आँखों में आंसू थे,उसे अपने अजन्मे शिशु से न जाने कैसा लगाव सा हो गया एक ही दिन में। अचानक उठ खड़ी हुई और तेज़ क़दमों से चलती हुई क्लिनिक से बाहर निकल गयी।

उसकी अंतरात्मा ने उसे भीतर ही भीतर झिंझोड़ दिया सोचा -' पगली यह क्या करने जा रही थी तू ? अपने ही हाथों अपनी ममता का गला घोंटना चाहती थी।' एक गहरी सांस लेकर सीधी घर की ओर बढ़ गयी।सास ने दरवाज़ा खोल तो पूछा क्या हुआ आज जल्दी आ गयी ? “तबियत ठीक नहीं है मम्मी जी मई हाफ डे लेकर आ गयी।“ सास ने पूछा कि क्या हुआ, तो कह दिया कि सर में दर्द है। जाकर अपने कमरे में लेट गयी।अपने आप पर खीझ आ रही थी उसे ,उसने सोच कि देखा जायेगा जो होगा सो, आज ही रवि को और घर वालों को खुशखबरी सुना दूंगी।

अब सुमि खुश थी। अपने आने वाले नन्हे मेहमान के सपने संजोंते न जाने कब आंख लग गयी। शाम को जब उठी तो चार बज चुके थे ,उसने सबके लिए चाय बनायी और खुद भी चाय पीते -पीते रवि को फोन करने लगी। रवि रस्ते में था बस दस मिनट में आने ही वाला था। उसने फोन रखने को कहा क्योंकि वह ड्राइव कर रहा था। दस मिनट बाद रवि घर पहुँच गया।आज सुमि को जल्दी आया देख कर खुश था। "आज क्या हुआ भई ,बॉस खुश था? जल्दी छुट्टी दे दी ?" "बॉस तो खुश था या नहीं। पर आज मैं एक ख़ुशी की खबर देने वाली हूँ तुम्हे " रवि ने मज़ाक में कहा " क्या हुआ? प्रमोशन हो गया तुम्हारा----??"

सुमि ने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया हाँ,हो तो गया है और साथ साथ तुम्हारा भी प्रमोशन हो गया है,अब पति के साथ- साथ पापा भी बनने वाले हो तुम! " क्या !!!!सच !!!! " और रवि ख़ुशी से झूम उठा जल्दी से जाकर उसने यह खबर घर में सबको बता दी। सासु माँ आयी और आकर सुमि की नज़र उतार कर उसका माथा चूम लिया। "आज तो भगवान ने मेरी सुन ली। सुमि आज से अपना पूरा ध्यान रख ,काम- वाम करने की कोई ज़रुरत नहीं है अब तू आराम कर,बस खूब खा- पी अपनी और मेरे पोते की सेहत बना। " घर में सब इतने खुश थे कि सुमि अपने मायके की सोच से बिलकुल ही पर हो गयी।शिल्पी जब कॉलेज से आयी तो खबर सुन कर ख़ुशी से नाचने लगी वह “,भाभी आज तो आपने दुनिया की सारी ख़ुशी दे दी मुझे। शिल्पी ने भाभी को गले लगा कर बधाई दी और भाई से आई फोन की फरमाइश भी कर डाली। "भैया अब तो आपको मुझे हर हाल में आई फोन दिलाना ही पड़ेगा सस्ते में नहीं छोड़ने वाली मैं आपको, हाँ ! " सासु माँ कहाँ चुप बैठने वाली थीं झट से बोलीं ,"अरे क्यों नहीं दिलाएगा ,छोटी ख़ुशी नहीं है कोई ,और भाभी के मायके से भी बढ़िया गिफ्ट मिलेंगे हम सबको ,क्यों सुमि ठीक कहा न मैंने। भई पहली ख़ुशी है हमारे घर की कोई कसर नहीं रहनी चाहिए ,कह देना अपने मम्मी -पापा से। " बस यही वो बातें हैं जो सुमि के दिल पर हथौड़े की तरह वार कर देती हैं,तभी सुमि डर रही थी माँ बनने की बात पर। कैसे कह सकेगी वो मम्मी पापा से यह सब ! वे बेचारे जैसे तैसे दोनों छोटे भाइयों को पढ़ा रहे थे। उनके अपने परिवार के खर्चे क्या कुछ कम हैं !उसकी आँखों में पानी आ गया ,जिसे उसने बड़ी कुशलता से सबसे छुपा लिया। वह खून का घूँट पी कर रह गयी। किसी को पलट कर कुछ जवाब देने की हिम्मत न उसकी कल थी न आज है।

अगले दिन माँ को भी फोन पर खुशखबरी सुना दी माँ बहुत खुश थीं। उन्हें किसी बात की चिंता नहीं थी बस अपनी बेटी का सुख देखना चाहती थी।सुमि ने दबी ज़बान में आने वाले खर्चे की बात कही तो बोलीं ,“तू क्यों चिंता करती है हम हैं न ,सब हो जायेगा। तू बस अपना ध्यान रख बेटा। और हो सके तो दो चार दिन के लिए आज मेरे पास ,बहुत मन कर रहा है तुझे देखने का " - "देखती हूँ मम्मा ,बात करूंगी घर पे ,अच्छा अब रखती हूँ कल बात करुँगी आपसे। "

चिंता के मारे सुमि का न कुछ खाने का मन करता न पिने का ,कभी रात को आँख खुल जाती तो न जाने क्या-क्या सोचने लगती। दिन बीत रहे थे और चिंता बढ़ रही थी। कैसी विडम्बना है यह की एक माँ अपने आने वाले बच्चे के जन्म से ही डरी हुई है। क्यों है हमारा समाज ऐसा ? कब बदलेगा यह सब !

सुमि की शादी एक पंजाबी परिवार में हुई थी जबकि वः खुद एक राजपूत परिवार से थी। और यही कारण था की रीति -रिवाजों के नाम पर उसकी सास न जाने क्या क्या बता देती हैं जो सुमि के घर वालों को निभाने के लिए करना ही पड़ता

कल सुमि को चेकअप के लिए जाना है। स्कैन भी होगा कल ,सुमि को पता है की स्कैन से बच्चे का लिंग पता लग जाता है यूँ तो बताते नहीं डॉक्टर लेकिन उसे डर था कि डॉक्टर जान पहचान के हैं ,कहीं बता दिया तो। उसे डर तो इस बात का था की कहीं लड़का न हो अगर ऐसा हुआ तो यहाँ के रिवाज़ के अनुसार पुरे एक वर्ष तक बच्चे का हर छोटा बड़ा खर्च तक नाना-नानी को उठाना पड़ता है। फिर चाहे वह कपडे हों ,खिलोने हों या फिर दवाई ही क्यों न हो। बस बिल भेज दिया जाता है नाना -नानी के पास -वसूली के लिए। कितने लचर है ये रीति रिवाज़ !

सुबह जब वः सास के साथ जा रही थी चेकअप के लिए तो बस मन ही मन यही दुआ कर रही थी की बस उसका आने वाला बच्चा बटा न हो। डरते डरते स्कैन के लिए पहुंची स्कैन हुआ तो सास भी कमरे में ही थीं। डॉक्टर ने कहा ,"बधाई हो जी आपको !एक नहीं जुड़वां बच्चे आ रहे हैं आपके घर। मम्मी जी तो ख़ुशी से फूली न समा रही थीं। पूछ ही बैठी," बेटे या बेटी ?" डॉक्टर ने भेद भरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा बस ख़ुशी ही ख़ुशी है समझ

लो" वही हुआ जिसका सुमि को डर था- दो बेटे ! सुमि की आंखों के आगे मम्मी -पापा के लाचार चेहरे घूमने लगे। एक वर्ष ! पूरा एक वर्ष ! क्या होगा अब ?

उसकी सास बहुत खुश थीं। घर जाते समय रास्ते में बोलीं "आहा !दो-दो पोते।,भगवान ने तो छप्पर फाड़ के दिया है मुझे। अब तो नाना-नानी के बैंक खाली करवा देंगे मेरे पोते !" सुमि के कानों में जैसे पिघला हुआ सीसा उंडेल रहा हो कोई। उससे कुछ कहते न बना।


सुमि अपने लाडलों का जहाँ बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी वहीँ उसे रात दिन यह चिंता भी खाये जा रही थी कि कैसे होगा सब! एक तो पहली बार माँ बनने जा रही थी उसपर दो बच्चे ! उसे यह भी डर था कि सब ठीक से हो जायेगा भी या नहीं ऊपर से अपने मम्मी -पापा की चिंता ! बस इसी उधेड़ -बुन में वक्त बीत रहा था।

रवि सब देख रहा था ,महसूस भी कर रहा था। एक दिन पूछ ही लिया उसने ,"क्या बात है ?तुम खुश नहीं हो ? कई दिनों से देख रहा हूँ कुछ खोई -खोई सी रहती हो?"

"कुछ नहीं ,बस यूँ ही।"

"कुछ तो है ,मुझे नहीं बताओगी ? "

सुमि भरी बैठी थी, रवि ने जब इतने प्यार से पूछा उसकी रुलाई फूट पड़ी।रवि ने फिर पूछा बताओ क्या बात है ?तब सुमि ने कहा , "मेरे मम्मी -पाप यहाँ के रीति -रिवाज़ कैसे निभा पाएंगे ! यही फ़िक्र मुझे दिन रात खाये जा रही है,

एक साल तक सारा खर्च उठाने की हालात में नहीं हैं वे ,तुम तो जानते हो न ! " यह क्या कहे जा रही हो तुम पागल हो गयी हो क्या ?किसने कहा तुम से यह सब ?"मम्मी जी ने " न जाने कहाँ से सुमि में इतनी हिम्मत आ गयी की वह रवि से यह सब कह पायी।

और रवि ने बस इतना कहा ,"पगली इतनी सी बात ! मुझे बताती तो सही, न जाने कब से इस चिंता में गली जा रही हो ! तुम चिंता मत करो मैं सब संभाल लूँगा। सबको समझा दूंगा। आखिर रीति रिवाज़ इंसान ने ही बनाये हैं और इंसान ही निभाता है। तो इंसान इन्हें तोड़ भी तो सकता है। "रवि की बात सुन कर सुमि भाव विह्वल हो गयी और उसके कंधे पर सिर रख दिया।

अपने पति की समझदारी पर गर्व से भर उठी सुमि। आज उसका सम्मान और भी बढ़ गया था सुमि की नज़रों में।

सचमुच अब समय आ गया है कि रूढ़ियों की इन जंजीरो को काट डाला जाये और तोड़ दिए जाएँ ऐसे रीति -रिवाजों के बंधन जो इंसानों की बलि लेने पर आ जायें ।







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