सुषमाजी...मेरे पास नहीं है हाईस्कूल का सर्टिफिकेट....

क्यूँकि जिस सस्ते से स्कूल में मैनें पढ़ाई की वो सिर्फ आठवीं तक ही था...परन्तु फिर भी आज मैं चार अलग अलग भाषाओं को लिख व पढ़ सकने योग्य हूँ....
सुबह गायत्री मंत्र के साथ आठ किस्म के श्लोक पढ़कर प्रार्थना की जाती थी जिसमें स्कूल के प्रधानाचार्य के आदेश पर कभी कभी मुझे ही पढ़ाना पड़ता था..जिसकी एक धुंधली सी छाया आज भी मस्तिष्क में अंकित है....

सफेद शर्ट और खाकी पैंट के स्कूली परिधान में हर सुबह घर से पुराने पैंट को जोड़कर सिले गये झोले में किताबें रखे अभिभावकों के सपने को सच करने का बीड़ा उठाये निकलना पड़ता था..पाँच ₹ से लेकर पंद्रह ₹ तक मासिक शुल्क देने के लिये अभिभावकों को दस पंद्रह दिन का विलम्ब शुल्क अतिरिक्त देना पड़ता था..क्यूँकि हमारे घर में कोई बड़ा कारोबार नहीं था..पढाई एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हमेशा प्रथम स्थान लाना ही हमारा उद्देश्य था जिसमें कभी ये न सोचा गया कि क्या पढ़ना और क्या करना पड़ सकता है....।

स्कूल से छुट्टी होने के उपरान्त पिताजी के कामों में हाथ बँटाते बचपन बीत गया..दो जून की रोटी,किराये के मकान,स्कूली फीस,बीमारी व बड़ी बहनों की शादी ब्याह का बोझ उठाये एक अकेले पिता की सभी जिम्मेदारियों का आभास करते हुवे उच्च स्तर की पढ़ाई कर पाने में असमर्थ हुवा विद्यार्थी अब अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करने लगा...।

सस्ते से स्कूल के आठवीं तक ही होने के कारण किसी दूसरे मँहगे स्कूल में एडमिशन करा पाने में असमर्थ विद्यार्थी का उद्देश्य अब किसी कला में महारत हासिल करना बन गया, मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में जाकर रहना और कोई काम सीखना लोहे के चने चबाने जैसा प्रतीत होता था..ऊपर से आज़मगढ़ का नाम और उत्तर भारतीय होना अपने आप में एक बड़ी भूमिका थी..अच्छे बुरे लोगों ने बहोत सारी यादें दीं..बहोत सी कला में महारत दी किन्तु आज ये आभास हो रहा है कि पढ़ाई के असल मायने क्या होते हैं... यदि किसी सरकारी कर्मचारी हेतु आवेदन देना पड़े तो योग्यता दसवीं से ज्यादा, यदि किसी कम्पनी एजेन्सीज में कार्यरत होना चाहें तो योग्यता दसवीं से ज्यादा, और अब तो यदि विदेश अथवा गल्फ जाकर मजदूरी करने हेतु पासपोर्ट का आवेदन किया जाय तो भी योग्यता दसवीं.......

दसवीं के परिक्षापत्र के सम्मिलित न कर पाने वाले आज विदेशों में जाकर काम कर पाने में असमर्थ हो गये हैं...।

देश में रहकर कारोबार करने वाले स्वर्णकार (जिन्हें सबसे अधिक धनवान समझा जाता था) तक असमर्थ हो गये है... देश की अर्थव्यवस्था क्षीण हो गई है...हर तरफ बढती मँहगाई से हाहाकार मचा हुवा है...मिलें व ईंट के भट्ठे तक चपेट में हैं आएदिन कोई न कोई दिवालिया हो जा रहा है...व्यापारी आहत हैं...कर्मचारी आहत हैं...
चल रहा है तो बस भारत माता की जय...हत्या...लूट...आगजनी...मारपीट...फसाद...आंदोलन...वगैरह वगैरह

आपने विदेशों में श्रमिकों पर अत्याचार पर 'ईमाईग्रेट' बना दिया जिसका दुष्प्रभाव यहाँ से विदेश जाकर मजदूरी करने वाले श्रमिकों पर पड़ा...क्या आप जानती हैं लाखों की संख्या में जो वीजे रद्द हुवे है इससे हानि किसे पहुँची है...?

इससे हानि उन्हें ही पहुँची है जिन्होनें ऐसे ही किसी कारण से दसवीं तक पढ़ाई नहीं की....।

जो अपने पासपोर्ट आवेदन के साथ दसवीं का परिक्षापत्र सम्मिलित न कर सके....।

जिनके सिर पर उनके परिवार का बोझ था....।

हाँ....यदि मैं इनके दर्द का आभास कर सकता हूँ तो मुझे गर्व है अपने आठवीं तक की शिक्षा का जिसका आज के समय में कोई उपयोग नहीं है....

हाँ....मेरे पास भी नहीं है हाईस्कूल का सर्टिफिकेट

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