रोज़ाना की भाँति आज भी हाकर राघव के सेहन में अखबार फेंक गया था, लेकिन आजकल उस के अन्दर की पहले जैसी अख़बार के इंतजार की ब्यग्रता तथा पढ़ने की उत्सुकता काफ़ूर होती जा रही है, वरनाा पहले वह हाकर के इंतज़ार में सेहन में जाने कितनी बार चक्कर काटा करता था, बार-बार गेट की ओर उसकी निगाहें उठ जाया करती थीं और हाकर के आने पर उससे कहना नहीं भूलता था.....‘मोहन, जल्दी आया करो’ जबकि मोहन काॅलोनी में आने वाले अन्य हाकरों में सबसे पहले आने वालों में शुमार किया जाता था क्योंकि उसे हाकरी के बाद अपनी नौकरी पर जाना रहता था, जिससे हाकरी तथा नौकरी से प्राप्त रूपयों से वह आज के दौर की बीमार की रात जैसी जि़न्दगी से थोड़ा बहुत नजात पा सके, अपनी गृहस्थी की गाड़ी को घसीट सके, बेटी की शिक्षा को परवान चढ़ाने में कोई व्यवधान न आये.


राघव वज़नदार क़दमों तथा बताशे वाली चाल से चलकर बाहर का दरवाज़ा खोलता है, सामने पड़े अख़बार से उसकी नज़रें टकराती हैं, अन्य-मनस्क भाव से झुककर अख़बार उठाता है और अन्दर जाकर लाॅबी में पड़ी मेढक कुर्सी में धँस जाता है, अख़बार को बग़ल में रक्खी गोल शीशा लगी मेज़ पर रख देता है, मेज़ पर रक्खे चश्मा को उठाकर अपने कुर्ते के दामन से पोंछ कर आँखों पर लगाने के बाद अख़बार उठाता है, पहले पृष्ठ पर नज़रें फिसलाता है ........महँगाई आसमान को नहीं बल्कि सातवें आसमान को छू रही है....अरहर की दाल सौ रूपये किलो.....‘दाल-रोटी खायेंगे प्रभु के गुन गायेंगे’ आम भावना के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा.....प्रधानमंत्री जी, विपक्ष तथा सुप्रिमकोर्ट का कहना है कि महँगाई रोको लेकिन रोके कौन...? केन्द्र तथा प्रदेश एक दूसरे के पाले में गेंदें उछाल रहें हैं, हाथों में एक ज़बरदस्त मुद्दा....ज्वलन्त समस्या पर भी राजनीति......कितनी बड़ी विडम्बना है कि समाधान की बात से सभी नदी के दो किनारे बने हुये हैं, समस्या के समाधान से कोसों दूर हैं, जनता जाए चूल्हे भाढ़ में.....अरहर की दाल की बात तो महँगाई का एक पैमाना मात्र है, परचून की दुकान में जाओ तब पता चलता है कि हर चीज़ के दाम में आग लगी है....सब्ज़ी रसोई से ग़ायब हो चुकी है, प्याज़ सौ रूपये किलो आलू तीस रूपये किलो जनता-जर्नादन के चेहरों पर मुर्दनी छायी है उनकी दिल की गहराईयों से आवाज़ आती है......‘साहेब यह कहा कही का खेल, गेंद को एक दूसरे के पाले में उछालना, बन्द कीजिए, कुछ ऐसा करिये की आवश्यक चीज़ों के भाव नीचे आ जायें, यह वही जनता है जो महँगाई के अंगारों पर चलने के लिये विवश है लेकिन चुनाव के समय चुनावी वादों के दर्प के मायावी जाल में फँसकर अपनी पीड़ा को उसी तरह भूल जाती है जैसे स्त्री असह्य प्रसव-पीड़ा को नवजात का मुँह देखकर भूल जाया करती है.


उसकी नज़रें अख़बार पर धीरे-धीरे आगे फिसलती है.....बादल रूठ गये हैं सूखे की मार तथा तपिश से देश-प्रदेश झुलस रहा है, खेती किसानी चैपट.....खेतों में पड़ी दरारों की तरह किसानों के चेहरों को चिन्ता की दरारों ने घेर रखा है......किसान आत्म-हत्याओं के लिए विवश.....मनरेगा में करोड़ों की लूट, फजऱ्ी खाता खोलकर बैंक के चपरासी के खाते में 14 लाख जमा, फिर उच्चधिकारियों के खातों में कितना जमा होगा सोचने की बात है, मनेरगा तथा वृद्धा-पेन्शन के बदौलत ग्राम प्रधान साइकिल के स्थान पर ‘तवेरा’ पर चलने लगे.....मिलावट तथा नकली-नोटों की बाज़ार गर्म...., ए0टी0एम0 से भी नकली नोट निकल रहे हैं, फ़ज़ऱ्ी एन्काउंटर....चेन-स्नेचिंग की वारदातें बढ़ीं....आतंकवाद तथा नक्सलवाद अपना पाँव पसार रहा है.....भारत को पाकिस्तान से उतना खतरा नहीं है जितना चीन से है, वह चक्रव्यूह रच रहा है, हमारी सीमा के सन्निकट रेल तथा सड़कों का जाल बिछा रहा है, जिससे युद्ध के समय अपनी सेना को पलक झपकते ही अपेक्षित स्थानों पर भेज सके, वह अधिक से अधिक तेल का भण्डारण कर रहा है, उसके इरादे न तो कभी नेक थे और न ही अब नेक देख पड़ रहे हैं, हमें सचेत हो जाना चाहिए वैसे हमारे जाँबाज़ रण-बाँकुरे युद्ध तो जीत लेते हैं लेकिन जाने क्यों हम टेबुल पर हार जाते हैं.....लखनऊ जो बाग़ों का शहर था अब पार्को, मूर्तियों तथा पत्थरों का शहर होता जा रहा है....देश के प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक डा0 जोशी ने कहा है.......‘कितनी बड़ी विडम्बना है कि पार्कों की हरियाली की जगह सड़क के किनारे कच्चे बर्म पर भी इण्टर-लाकिंग टाइल्स लगाई जा रही है, इन्हीं कच्ची जगहों से वर्षा का पानी धरती के अन्दर जाकर जल-स्तर को ऊपर उठाता है लेकिन सीमेण्ट कंकरीट का मोटा बेस बनाकर उस पर इण्टर लाकिंग टाइल्स लगा देने के कारण वह पानी धरती के गर्भ में न जाकर नालियों तथा नालों से होकर गोमती के सिल्ट भरे पेट में गन्दगी के साथ समा जाता है, वर्षा का पानी ज़मीन के अन्दर न जाने से, ‘रिचार्ज’ न होने से, जल-स्तर रोज़-बरोज़ नीचे भागता जा रहा है, आने वाले दिनों में लखनऊ एक-एक बूँद पानी के लिये तरसेगा, महँगा पानी भी आयात करना पड़ेगा अन्य प्रदेशों तथा देशों से’.....राहुल गाँधी का दलित-बस्ती में सबसे ग़रीब महिला के यहाँ रात गुज़ारना उसके बनाये साग तथा जली रोटी का खाना....यह सब नाटक है....नाटक कहने वाले खुद क्यों नही वैसा करते हैं...? स्कूल जाती छात्रा को कार से खींचकर चलती कार में ही उसकी अस्मत को तार-तार करने के बाद उसे सड़क के किनारे फेंककर बलात्कारी दिन के उजाले में भाग निकले....


आजकल अख़बार ऐसी ही ख़बरों से बोझिल रहता है, उसके मन के किसी कोने में विचार उभरा, उसका मन कसैला हो गया उसने अख़बार पढ़ना बंद कर दिया, अख़बार को पर्तो में मोड़कर मेज़ पर पटक दिया और सोचने लगा.....‘क्या ये ख़बरे देश तथा प्रदेश के जि़म्मेदारोें के नज़रों से नहीं गुज़रती होंगी, क्यों नहीं गुज़रती होंगी लेकिन.......?


-पापा, मैं काॅलेज जा रही हूँ, जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती उसकी बेटी की आवाज़ ने उसकी सोच के दौड़ते घोड़े की लगाम खींच लिया, तन्द्रा भंग हो गयी, वह सकपकाकर बेटी की ओर देखने लगा और अख़बार में अभी-अभी कुछ देर पहले पढ़ी छात्रा की ख़बर उसके मस्तिष्क के शिराओं में यकायक कौंध गयी जिसका गला उसने तुरन्त ही दबा दिया, क्योंकि उसके सोच के आइने में उसकी बेटी का भी चित्र उभर आया था, कभी-कभी सोची हुई बात सच हो जाती है, उसने अपनी बेटी की ओर देखा और बिना कुछ बोले आँखों के इशारों से उसे जाने के लिये कह दिया, हालांकि आजकल वह रोज़ाना घट रही घटनाओं से बड़ा सशंकित रहता है जब तक उसकी इकलौती बेटी घर नहीं आ जाती है वह आफि़स से टेलीफ़ोन करके पूँछा करता है...अलका आ गई न.....?


- हाँ, आ गई उसकी पत्नी का उत्तर हुआ करता, पत्नी के उत्तर से उसका मन शान्त हो जाता और अपने आप को सामान्य महसूस करने लगता.....वैसे सामान्य, असामान्य स्थिति का शिकार आज के विषाक्त तथा असुरक्षित वातावरण में वे सभी माँ-बाप हैं जिनके पुत्र-पुत्री तथा परिवार के अन्य सदस्य घर से बाहर जाते हैं और जब तक वह घर वापस नहीं आ जाते हैं उनके दिलों की धड़कनें उनके आने की आहट को सुनने के लिए धड़कती रहती हैं.


उसकी पत्नी अलका को गेट तक छोड़कर लौटी और अपने पति-देव को मुखातिब करके बोली...‘मैं देख रही हूँ आजकल आप बड़ी जल्दी अख़बार पढ़कर फेंक देते हैं वरना पहले तो एक-एक अक्षर चाटते रहते थे, नहाने, नाश्ते तथा आॅफि़स जाने में भी देर हो जाया करती थीं और अब......?


- अब तो अंग्रेजों का राज नहीं है अपना राज हैं, अपने लोग हैं फिर भी माहौल बड़ा खराब हो गया है, वही मन को झिंझोड़ देने वाली ख़बरें रोज़ रहती है, सोचता हूँ अख़बार लेना बंद कर दूँ, पढ़ना बंद कर दूँ, सुबह-सुबह मन में कड़ुवााहट पैदा करने वाली ख़बरें रोज़-रोज़ रहती हैं दूसरे अख़बार न लेने से कुछ बचत ही हो जाया करेगी, फिर मन ही मन सोचता है इस महँगाई में बचत की बात तो ठीक है लेकिन मेरे एक के अख़बार न पढ़ने से क्या दिल में अशान्ति पैदा करने वाली, मन को कसैला करने वाली समस्याओं तथा महँगाई का समाधान हो जायेगा.....?
- मैंने तो आपसे कई बार कहा था आप भी टी0वी0 पर समाचार देख लिया कीजिए, अख़बार लेना बंद कर दीजिए इस निगोड़ी महँगाई में, कुछ पैसे ही बचेंगे, रसोई की शेल्फ तथा डिब्बे जो खाने के सामानों से भरे रहते थे, अब खाली पड़े ऊँघा करते हैं....कई खाली डिब्बे तो मैंने कबाड़ी के हाथ बेंच दिया क्योंकि आज के दौर में उनके भरने की नौबत क्या अब आयेगी भी कभी...? उससे मिले पैसों से एक दिन की सब्ज़ी आ गयी, आज आपने भी पते की बात की है, वरना तो कहते थे......‘अख़बार पढ़ने में क्या मज़ा आता है तुम क्या जानो, यह भी एक नशा है, जब तक नहीं मिले तड़पते हुये वक़्त गुज़रता हैं...और कभी-कभी तो आप जामे से बाहर हो जाया करते थे और तैश में आकर कहते थे....’ अख़बार पढ़ने का आनन्द कुछ ओर ही होता है, बन्दर क्या जाने अदरक की क़द्र...?
- नहीं तुम ठीक कहती थीं कि कुछ पैसे ही बचेंगे अब तो पैसों को दाँत से पकड़ना होगा.
- लेकिन हाकर अगर पूछेगा कि अख़बार बंद क्यों कर रहे है...? तो क्या कहेंगे....?
- कह दूँगा आँखों में कुछ समस्या हो गयी है.
- ठीक है....क्या आज टहलने नहीं जायेंगे आप.....?
- नहीं-नहीं, जा रहा हूँ, गठिया ने अपना सिर उठाना शुरू कर दिया है, अगर टहलने नहीं जाया करूँगा तो डाक्टर सिद्र्धाथ दास तथा डाक्टर जितेन्द्र कुमार के कथनानुसार जोड़-जोड़ जाम हो जायेंगे, अच्छा अब चलता हूँ राघव खूँटी पर टंगी अपनी टोपी उठाकर सिर पर लगाते हुये बोला...विकासनगर के मिनी स्टेडियम तथा रिंग रोड पर स्थित कंचना बिहारी मार्ग के मोड़ के दूसरी तरफ़ स्थित पेट्रोल पम्प तथाा उसके आगे जगरानी अस्पताल के दामन को स्पर्श करता हुआ उसने कल्याण अपार्टमेण्ट के निकट ‘स्वर्ण-जयन्ती-पार्क’ की ओर रूख किया जहाँ लोग काफ़ी दूर-दूर से टहलने आते हैं, अपना मासिक पास बनवाकर, सुना है कि सरकार इसका भी निजीकरण करने जा रही है, आजकल देखने में आ रहा है कि निजीकरण की हवा हर तरफ़ गरम है जाने क्यों....?
    पार्क में टहलने के बाद लोग कुछ देर वहाँ बैठकर सुसताते हैं, देश-प्रदेश की बातों पर माथा-पच्ची करने के बाद ही अपने-अपने घर का रास्ता नापते हैं....आज भी लोग रोज़ की तरह टहलने के बाद बातें कर रहे हैं लेकिन आज उनकी बातों में रोज़ जैसी बातों का नामो-निशान तक नहीं है वह बातें उनकी मस्तिष्क से ऐसे ग़ायब है जैसे गधे के सिर से सींग क्योंकि महँगाई ने सबकी दुखती रग पर हाथ जो रख दिया है, सभी के चेहरे का रंग उड़ गया है उनके चेहरे देखने लायक़ हैं, सभी के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही हैं, उनकी लनतरानियाँ तथा बड़ी-बड़ी बातों के पहले जैसे स्वर नक़्क़ार खाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गये हैं, अब सभी के स्वर एक हो गये हैं, मत-मतान्तर, वाद-विवाद तथा एक दूसरे पर कटाक्ष हिरन हो गये हैं, सभी की सोच एक हो गयी है क्योंकि सभी महँगाई की मार को झेल रहे हैं, आज उनके समवेत स्वर हैं....‘क्या ज़माना आ गया है, अरहर की दाल सौ रूपया किलो, प्याज 100 रूपये किलो मिलेगी.....! कभी ख़्वाब-व-ख़्वाल में भी नहीं था, यक़ीन ही नहीं हो रहा था लेकिन हाथ-कंगन को आरसी क्या की कहावत जब चरितार्थ हुई तो यक़ीन पर मुहर लगानी ही पड़ी...अरहर की दाल तथा प्याज़ वगैरह के साथ ही सब्जि़यों के दाम भी आसमान को छू रहे है टमाटर सौ रूपये किलो, आलू तीस रूपये किलो लेकिन इसका फ़ायदा हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले किसानों को नहीं मिल रहा है, बल्कि बिचैलिये मज़ा मार रहे हैं,...हल्दी न फिटकरी रंग चोखा....जो सब्ज़ी आपको बाज़ार में 30 रूपये किलो मिल रही है बेचारे किसान को उसकी क़ीमत सिर्फ़ 5 रूपये मिली होगी...पैदा करने वाला भी परेषान और खाने वाला भी परेषान, जीना दूभर हो गया है, जि़न्दगी अजीरन हो गयी है...महँगाई सिर पर चढ़कर बैख़ोफ़ बोल रही है, महँगाई ख़ूनी रिष्तों को भी निगल रही है...लोगों की बातें सुनने के बाद राघव का स्वर उभरा....‘सच्चाई यह है कि महँगाई जान बूझकर पैदा की गयी है,’ केन्द्र तथा प्रदेष की सरकारें एक दूसरे पर महँगाई का दोषारोपण छोड़कर ज़हरीली बड़ी मछलियों को अपनी गिरफ़्त में क्यों नही लेती हैं,...? ...‘आज ग़रीब लहरों पे पहरे बिठाये जाते हैं, समुन्दरों की तलाषी कोई नहीं लेता...’ आखि़र सरकार काला बाज़ारियों-जमाख़ोरों के तहख़ानों में छापा क्यों नही मारती हैं...? जहाँ तहख़ानों में चीज़ें भरी पड़ी हैं, वहाँ से थोड़ी-थोड़ी चीज़ें निकाली जाती हैं, जिससे महँगाई के शोलों को हवा मिल सके, दृढ़ इच्छा शक्ति से एक साथ छापा मारकर यदि वहीं चीज़ें भारी मात्रा में तहख़ानों से बाहर ला दी जाय तो चीज़ों के जो दाम अभी आसमान को छू रहे हैं यकायक ज़मीन पर आ जायेंगे लेकिन छापा ईमानदारी से मारना होगा, उस तरह से नहीं कि विगत होली में तहख़ानों में रखे टनों मिलावटी खोया पर छापा मारा गया सैम्पुल ने राज़ फ़ाष किया कि खोया शत-प्रतिषत मिलावटी है, जो सैंथेटिक दूध से बनाया गया है, लेकिन कुछ दिनों के बाद पता चला कि तहख़ानों में सील किये गये खोया का नामोनिषान तक अब वहाँ नहीं है, तो वह खोया क्या ज़मीन खा गयी या आसमान निगल गया....? ऐसा कुछ नहीं हुआ, वही हुआ जो होना था, यानी राजनीतिक दबाव तथा उच्च-अधिकारियों की मिली-भगत से होली के शुभ-अवसर पर बाज़ार में बिकने के लिये खोया आया था, बाज़ार की भेंट चढ़कर लोगों के पेट में चला गया, धीरे-धीरे अपना ज़हरीला असर दिखाने के लिये,
महँगाई की समस्या के बोझ को दिलो-दिमाग़ पर लादे अब लोगों का वहाँ रूकना फाड़े खाने लगा, लोगों ने एक दूसरे के चेहरों की ओर देखा जो एक जैसे लग रहे थे.
लोगों ने अपने-अपने घरों का रूख़ किया, राघव का घर पार्क से नज़दीक रेसफिल एकाडेमी के पास था, इसलिए वह जल्दी अपने घर पहुँच गया.
- आ गये आप....? अच्छा, अब आप नहाकर नाष्ता कर लीजिये, आज तो पराठा मिल जायेगा लेकिन कल सादी रोटी ही मिलेगी क्योंकि डालडा के डिब्बे को गरम करके जितना घी उसमें था उसे निथार लिया है,
- ठीक है....
- और हाँ, रात की सब्ज़ी जो बची थी उसे अलका तथा अजय को दे दिया था आपको बुकनू से ही पराठा खाना पड़ेगा, वेतन लाने यानी पहली तारीख़ तक बुकनू तथा चटनी से ही गुज़ारा करना पड़ेगा, अब तो सब्ज़ी पहली तारीख़ को ही आ पायेगी वह भी किलो में नहीं बल्कि ग्रामों में जब फँूक-फँूककर क़दम रखा जायेगा तब
- ठीक है देवी जी, जैसा हुक्म आपका....
- हुक्म मेरा नहीं महँगाई नासपीटी-निगोड़ी का है...मज़बूरी का है....और हाँ, सबेरे दूध वाला कह रहा था, बहनजी..‘भूसा, चूनी-भूसी बहुत महँगी हो गई है, कल से दूध 50 रूपये लीटर मिलेगा. पचास रूपये..! राघव को जैसे किसी ने उछाल दिया हो.
- घबराइये नहीं मैने उससे कह दिया .....‘भैया, कल से दूध बंद कर दीजिये, पहली तारीख़ को आकर हिसाब कर लीजियेगा.
- फिर चाय....?
- मैने फ़ेरी वाले से नीबू ले लिया है.
- बहुत अच्छा, नीबू की चाय तो स्वास्थ्य-वर्द्धक होती है, पत्नी हो तो तुम्हारी जैसी और उसने अपनी पत्नी को प्रेम-भरी शरारती नज़रों से देखा, पत्नी की नज़रों ने भी उसी रूप में आँखों के कोयों को नचाकर जवाब दिया, होंठों पर मुस्कानें थिरकीं बहुत दिनों के बाद आज, वरना महँगाई ने तो ऐसे आत्मीय-क्षणों को भी निगल लिया है.
- अरे...! अरे....! एक बात तो मैं भूल ही जा रही थी, देवर जी का गाँव से फ़ोन आया था, उनका स्कूल आजकल बंद है, वह, बाबूजी तथा माताजी को कल हम लोगों के पास रहने के लिये छोड़ने आ रहे हैं.
- हाँ, हम लोग जब बंगलौर में थे तभी से बाबूजी तथा माताजी का बहुत मन है, बड़ी तमन्ना है कि वे शहर में रह रहे अपने बेटे के साथ रहें लेकिन...शायद इसीलिए उन्होंने इस बार पहले से नहीं पूँछा, एकदम कल आने का इरादा कर लिया कि शैतान की आँत की तरह बढ़ती महँगाई में कहीं मैं फिर....?
- उसकी पत्नी सोच में डूब गयी, बोली....‘फिर तो इस महीने हाथ और भी खींचना होगा.....?
- इस महीने ही नहीं, आने वाले महीनों में भी... क्योंकि यदि सरकारी दृढ़ इच्छाषक्ति तथा जनता जनार्दन ने तबीयत से पत्थर नहीं उछाला तो...‘आने वाले दिनों में महँगाई और बढ़ेगी’.
- क्या....!.....?

 

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