वो कौन ?

मैं कल पार्क में बैठी गुनगुनी धुप का आनंद उठा रही थी और साथ ही मोबाइल पर गजल सुन रही थी " तुमसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूँ मैं " तभी मेरे सामने वाली बेंच पर एक सज्जन से लगनें वाले व्यक्ति आ कर बैठ गए मैं ने बस सरसरी निगाहों से उन्हें देखा और गाना सुनने लगी | मुझे अपनी तरफ देखता हुआ पा वो मुश्कुरा उठे , मुझे उसकी मुश्कुराहत कुछ जानी पहचानी सी लगी | मैं अपने दिमाग पर पूरा जोर डाल सोचने लगी की इस इंसान से मैं कब और कहाँ मिली हूँ , लाख सोचने के बाद भी मुझे कुछ याद न आया | मुझे यूँ सोंचता देख उनकी मुस्कराहट और गहरी हो गई , अपनी तरफ मुझे आश्चर्य से देखता हुआ देख वो खिलखिला कर हंस पड़े | उसे यूँ हँसता देख मेरी उलझन और बढ़ गई | मेरी उलझन अब झुंझलाहट में तब्दील होती जा रही थी | मुझे यूँ परेशान देख वो बोले - लगता है तुमने मुझे पहचाना नहीं | मैं ना में सिर्फ अपना सर हिला कर रह गई | और मेरे मन में अनेको सवाल घुमने लगे | फिर अचानक वे उठे अपना सर आसमान की तरफ कर कुछ सोचने लगे |कुछ देर इसी मुद्रा में रहने के बाद धीरे - धीरे मेरे करीब आकर कहा -- "क्या तुम सच में मुझे नहीं पहचान रही हो दिव्या ?"

उनके मुख से अपना नाम सुन मैं चौंक गई और गहरे आश्चर्य के सागर में गोते लगाते हुए पूछ बैठी - "आप को मेरा नाम कैसे मालुम ? हम कभी मिले भी नहीं |" " तुम्हे पूरा विश्वास है दिव्या कि हम कभी नहीं मिले |" " शायद " " शायद ??? यानी कहीं न कहीं तुम्हें लगता है हम एक - दुसरे को जानते हैं " " पता नहीं " " अच्छा अब मैं चलता हूँ " और ,वे अपना सर झुका कुछ सोचते हुए धीरे - धीरे चले गए | मैं दूर तक उन्हें जाता देखती रही | उनके जाने के बाद मेरा मन कुछ अनमना सा हो उठा , मैं अनमने मन से अपने घर की तरफ चल पड़ी |

घर पहुंचकर मैं ने सबसे पहले अपना पुराना अलबम निकाला | पन्ने - पन्ने पलटन लगी | पुराने पड रहे धुंधले चित्रों को देखते - देखते सहसा मेरी आँखें एक चित्र पर ठहर गईं | वह तस्वीर खासी पुरानी थी | जगह - जगह सफ़ेद धब्बे उभर आये थे | लेकिन ,चेहरे का हिस्सा अभी बहुत हद तक सही बचा हुआ था | मैं ने गौर से देखा चेहरा पार्क में मिले अजनबी से मिल रहा था | लेकिन , काफी दिमाग पर जोर डालने के बाद भी मुझे उनका नाम और उनके बारे में कुछ भी याद नहीं आ रहा था | वह तस्वीर अल्बम से निकाल मैं ने अपने पास रख ली |और अगले दिन फिर पार्क में उसी समय पर पहुंची | आज मैं काफी देर तक पार्क में रही लेकिन मुझे वह अजनबी कहीं नहीं नजर आये |

जब शाम ढल गई तो मैं अनमनी सी वहां से उठ कर घर की ओर बढ़ गई | पार्क और मेरे घर के बीच में एक मन्दिर पड़ता था | मन को कुछ शान्ति मिले इस आशा से मैं मन्दिर की सीढियां चढ़ने लगी | तभी एक आवाज ने मेरे चलते क़दमों को रोक दिया -- " आ गई दिव्या ?'

चौंक कर आवाज की दिशा में देखा तो वे कल वाले अजनबी ही थे |

परेशान सी मैं ने अपने कोट की जेब से वह पुरानी तस्वीर दिखाते हुए उन्हें दिखाकर पूछा -- " क्या यह तस्वीर आपकी है ?"

तस्वीर देखते ही उनके चेहरे पर अजीब सी मुस्कुराहट फ़ैल गई और 'हाँ ' की मुद्रा में सर हिलाकर वे शून्य में देखते हुए बोले -" दिव्या ,शायद तुम्हे मैं अपना नाम बताऊँ तो तुम्हारी याददाश्त लौट आये | मेरा नाम जुबैर खान है |"

नाम सुनते ही मैं चौंक कर सिहर उठी 'जुबैर खान - मेरे पापा के करीबी मित्र | जिनकी गोद में खेलते हुए मैं बड़ी हुई ; जिनकी उंगलियाँ थाम मेरे और यास्मिन के कदम स्कूल जाना सीखे -- उन जुबैर अंकल को मैं भूली तो नहीं थी | लेकिन ............

थरथराती आवाज में मैं ने पूछा -"जुबैर अं अन अंकल ,लेकिन आप तो ?" आगे के मेरे शब्द आंसुओं मेरे आंसुओं में डूब गए |

" हाँ बेटा , मैं भागलपुर में हुए दंगे में मारा गया था ,यही न ?"

अब मैं वहीं सीढियों पर बैठकर अपने दोनों हाथ से अपना चेहरा ढंक बिलख पड़ी | दुःख और डर से मेरी हिचकियाँ बंध गईं | दिमाग बार - बार कह रहा था कि 'जुबैर अंकल तो कब के मर चुके हैं |' और एक सवाल बार - बार मुझे मथे जा रहा था कि " जब जुबैर अंकल उस दंगे में मारे गए थे तो ये कौन ? और अगर अंकल बच गए थे तो हम सब ने जिन्हें दफनाया अह किसका शव था ? शव का चेहरा जुबैर अंकल का ही था | फिर यह सब क्या ??????'

लगातार के ऐसे प्रश्नों से मेरी चेतना खोने लगी | मुझे लगा जैसे मैं यहीं बेहोश हो जाऊँगी | तभी आवाज आई 'बीटा पानी पी लो ,कुछ अच्छा महसूस करोगी | लगता है ठंढ के कारण तुम्हारी तबियत बिगड़ रही है |'

मैं ने सर उठाकर देखा तो मन्दिर के पुजारी जी थे ग्लास में पानी लिए खड़े |मैं ने थरथराती आवाज में पूछा -- " अभी जो व्यक्ति यहाँ थे वे कहाँ गए ?"

आश्चर्य से भरकर पुजारी जी ने कहा -" कौन ? किस व्यक्ति की बात कर रही हो बेटा ?"

मुझे लगा मैं अब अपना होश खो दूंगी |लेकिन मैं ने अपने आपको मजबूत किया और पुजारी जी के हाथ से ग्लास ले पानी के कुछ घूँट हलक के नीचे उतार लडखडाते क़दमों से चलते हुए घर आ गई | मुझे अपने आपको स्वस्थ करते में काफी समय लग गया | पूरे घटनाक्रम को एक बार मैं ने फिर से दुहराया और पहने पर यास्मीन का नंबर डायल किया | यास्मीन को जब मैं ने सारी बातें बताई तो वह रोते हुए बोली - "दिव्या ,मुझे लगता है वह अब्बू की रूह थी ;जो शायद तुमसे मिलने आई थी | अब्बू शुरू से ही मुझसे अधिक तुम्हे प्यार करते थे | तुम हर विषय में अव्वल जो आती थी |' और ,फिर यास्मीन की हिचकियाँ बंध गईं | मैं ने चुपचाप फ़ोन काट दिया |

पूरी रात मेरी करवटों में कटी | मैं कुछ भी निश्चय नहीं कर पा रही थी | सुबह मैरे दिमाग में यह ख़याल आया कि 'अगर जुबैर अंकल की रूह मुझसे मिलने आई थी तो वह रूह मेरे घर भी आ सकती है और मैं ने आज पूरे दिन घर पर ही रहने का निश्चय करते हुए स्कूल से छुट्टी ले ली -- जहां मैं पढ़ाने जाया करती थी |

दोपहर में मैं खाना खाकर बिस्तर पर जाकर लेट गई | पूरी रात मानसिक संत्रास के कारण मैं सो नहीं पाई थी |अत: कुछ ही देर में मेरी आँख लग गई | अचानक मेरे घर की बेल जोर - जोर से बजने लगी | लग रहा था जैसे उसे आधे सेकेण्ड के अंतराल पर लगातार दबाया जा रहा है | तनिक गुस्से से उठकर मैं ने दरवाजा खोला तो सामने जुबैर अंकल थे | मैं आँखें फाड़कर उन्हें घूरने लगी | हलकी मुस्कुराहट के साथ उनहोंने कहा -- " मुझे अन्दर आने को नहीं कहोगी ?"

अस्पष्ट शब्दों में मैं ने 'आईये ' कहकर उन्हें अन्दर आने का रास्ता दिया | अन्दर आकर उनहोंने पहले मेरे उस छोटे से फ़्लैट का जायजा लिया फिर कुर्सी पर बैठते हुए प्रश्नों की बौछार कर दी -- " क्या यहाँ तुम अकेली रहती हो ? तुमने शादी नहीं की ? बच्चे और तुम्हारे पति कहाँ हैं ?"

उनके सवालों को संक्षिप्त जवाब दिया मैं ने -" मैं अभी पी.एच.डी.कर रही हूँ और यहीं एक स्कूल में पढ़ाती भी हूँ | जब पी.एच.डी.पूरी कर यूनिवर्सिटी में लेक्चरार हो जाउंगी तभी शादी करूंगी | मैं ने पापा को भी यह बताया हुआ है |"

"हूँ ,ठीक है | क्या मुझे एक कप चाय पिला सकती हो ?"

चाय बनाकर लाते - लाते मेरे अन्दर का भय जा चुका था और मेरी मन:स्थिति अब ऎसी हो गई थी कि मैं जुबैर अंकल से सवाल कर सकूँ | चाय का प्याला उन्हें पकडाते हुए मैं ने सीधे - सीधे पूछ लिया -- " अंकल आप तो भागलपुर के दंगे में मारे गए थे | हम सबने आपके शव को दफनाया भी था | फिर ,अचानक आप कैसे ?"

एक गहरी सांस लेते हुए जुबैर अंकल ने कहा -" हाँ बेटा |"

जवाब सुनते ही मेरी रीढ़ की हड्डियों में सर्द भय फ़ैल गया | कांपती आवाज में पूछा - " फिर आप मेरे पास क्यों और कैसे ?"

वे हल्के से हंस दिए | बोले ,"तुम्हे पता है न कि मैं सरकार के खुफिया विभाग में काम करता था | "

"जी "

"मैं ने दंगा भड़कने की रिपोर्ट एक माह पहले ही सरकार को दे दी थी | जब दंगा फ़ैल रहा था ,मैं ने तब भी एक चेतावनी रिपोर्ट भेजी | लेकिन ,जब तक उस रिपोर्ट पर सरकार अमल कर पाती दंगा अपने वीभत्स रूप में आ गया था |"

"अंकल मैं दंगे के बारे में नहीं आपके बारे में जाना चाहती हूँ " - मैं ने थूक निगलते हुए कहा |

" हाँ बेटा | जिन शरारती लोगों का हाथ दंगे में था मैं ने गवर्मेंट के पास उनके नामों की लिस्ट भी भेजी लेकिन पता नहीं कैसे वह लिस्ट लीक हो गई और .....|"

"और ?" मेरी धडकनें तेज हो गईं | माथे पर पसीने की बूंदें छलक उठीं |

मेरे माथे पर छलक आई बूंदें स्नेह से अपने रुमाल से पोछते हुए अंकल ने कहा - " और बेटा मुझे मार दिया गया | मुझे मारने वाले हिन्दू नहीं मुसलमान ही थे |"

और मुझे भय तथा आश्चर्य में छोड़ अंकल वहां से चले गए | शायद इस बार कभी नहीं आने के लिए |

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