‘प’ से पापा

ये जो पिंजड़े में लटका हुआ दिन भर ‘राम कहो, राम कहो’ रटता रहता है न? आंटी की नाक बिलकुल इसी सुग्गे की नाक जैसी है। लंबी.लबी, नुकीली.नुकीली। पप्पू जाने कैसी गोलियों से खेला करता है-गोल.गोल, चमकीली.चमकीली। आंटी की आंखें भी तो वैसी ही हैं। और आंटी के होंठ? वो तो बिलकुल चाकलेट हैं, जिसे मैं अबी.अबी चूस बी रई हूँ। चाकलेट जैसा मीठा.मीठा प्यार करती है आंटी मुझे। आंटी मुझे भौत अच्छी लगती है। सच, मैं आंटी को खूब प्यार करती हूँ। कबी.कबी आंटी मुझे गोद में उठाके फिरकी की तरह नाचने लगती है। बड़ा मज्जा आता है उस समय। फिर वो मुझे नीलू आंटी के घर बी ले जाती है। वईं तो बंटी रहता है, जो हर समय बैठा.बैठा आंखें नचाया करता है। एक बात मेरी समझ में नईं आती। आंटी इत्ती बड़ी क्यों है? इत्ते बड़े.बड़े कपड़े क्यों पहनती है? मैं छोटी.सी क्यों हूँ? मुझे बित्ता भर के कपड़े क्यों पहनने दिए जाते हैं? ये भी कोई बात है! अच्छा कितना मजा आए कि मेरे कपड़े आंटी को पहना दिए जायं और मुझे आंटी के। थोड़ी देर को तो आंटी बौखला जाएगी। नाक फुला.फुलाकर गुस्सा करेगी, पूछेगी किसने उसके कपड़े पहिनने की कोसिस की? जब वो यों गुस्सा कर रई होगी तो मैं चुपके से भीतर से निकल छम.छम करती आ जाऊँगी। बिलकुल दुलहन की तरह। आंटी का गुस्सा मुझे देखते ही पानी हो जाएगा। और वो दौड़कर मुझे प्यार करने लगेगी। गोदी में भरकर नानी को दिखाने ले जाएगी। कहेगी, ‘‘देखो मम्मी! पिंकी तो अबी से दुलहन बन गई।’’ नानी कुछ कहे, इससे पहले ही वो मुझे नानाजी के पास लेकर चल देगी।

मुझे तमासा क्यों बनाया जाता है? क्या मैं दुलहन नईं बन सकती? क्या एक मम्मी ही दुलहन बन सकती है? अरे जादा दिन थोड़ेई हुए हैं। कैसी गुडि़या.सी बनी बैठी थी उस कोने में! आखिर मैं कोई बात भूल थोड़ेई जाती हैँू। आंटी की गोद से ही तो ये सारा तमासा देख रई थी। जाने क्यों मम्मी मुझे अब उत्ती अच्छी नईं लगती, जित्ती पहले लगती थी। यों मम्मी में खराबी क्या है? देखने में आंटी से जादा अच्छी लगती है-गोरा चिट्टा रंग, गोल.गोल नाक, नीली.नीली आंखें। पर कोई मुझसे कहे कि आंटी और मम्मी में तुम्हें कौन जादा पसंद है, तो मैं लपककर आंटी की गोद में चढ़ जाऊँ। बिना सोचे समझे। पर इसमें सोचने की बात भी क्या है? मम्मी जब यहाँ आती है तो खूब.खूब प्यार करती है, ढेर.ढेर खिलौने लाती है और टाफी, बिस्कुट, मिठाइयां और भौत से कपड़े। पर मुझे मम्मी के मुँह से अजीब.सी बदबू आती मालूम देती है। न... न... मम्मी के दांत गंदे नईं हैं। वो तो खूब साफ.साफ, चमकीले.चमकीले हैं-बिलकुल बिजली के लट्टू की तरह। पर न जाने क्यों, मम्मी मुझे प्यार न किया करें तो अच्छा रहे। पर अब इस बात को मम्मी से कहे भी कौन? आंटी तो कह नईं सकती। मुझे भी नईं कहने देगी। मुँह से एक बोल बी निकला नईं कि कान की चाबी कसके उमेठ दी जाएगी। पर एक बात है। इस बार मम्मी आई तो मुझे उसका खिलौना सबसे अच्छा लगा। बिस्तर पर पड़ा हुआ हाथ.पांव जोर.जोर से फटकार रहा था। जैसे किसी से लड़ रहा हो। मैं तो डर गई। अरे भई माना कि तुम और खिलौनों के मुकाबले जादा बड़े हो, जादा अच्छे हो, पर ऐसा भी क्या कि किसी को अपने पास ही न आने दो, सबको दूर से ही डरा दो! खैर... सहमे.सहमे कदमों से पास गई। मेरे पास जाते ही उसने हाथ.पैर चलाना बंद कर दिया और मुटुर.मुटुर ताकने लगा। मैं तो देखती ही रह गई। बिलकुल मेरी गुडि़या की तरह लग रहा था। इत्ता ही तो फरक है कि मेरी गुडि़या छोटी.सी है, बोलती.चालती नईं, चुपचाप पड़ी रहती है, जैसे बिठा देती हूँ, बैठ जाती है और जैसे लिटा देती हूँ-लेट जाती है। और ये गुडि़या से बड़ा है, बोल लेता है, हाथ.पैर चलाता है, और पास जाते ही चुप होकर मुझे देखने लगता है। मेरा मन किया कि उसे प्यार करूँ। आगे बढ़कर डरते.डरते उँगली से छुआ। वो कुछ नईं बोला। उसने मेरी एक उंगली अपनी मुट्ठी में पकड़ ली। मुझे बड़ा अच्छा लगा। खुस होकर उसे अपनी ओर खींचने लगी। न जाने क्या हुआ, वो चिल्लाने लगा। मैं डर गई। कईं मम्मी आ गई तो मेरी खैर नईं। मैंने उसका मुँह अपने हाथ से कसकर बंद कर दिया, ताकि उसके मुँह से आवाज ना निकले। उसके मुँह से आवाज तो नईं निकली, पर मेरे गाल पर तड़ातड़ किसी के चाँटे पड़ने की आवाज आने लगी। चाँटे इत्ती जोर के थे कि मेरी आंखों में आंसू आ गए और मैं जोर.जोर से रोने लगी। रोते.रोते मारने वाले की ओर देखा। मम्मी थी। अब उसने अपना खिलौना उठा लिया था और उसे हाथ से धीरे.धीरे पीट रही थी। खिलौने की भी बदमासी देखो। जब मैंने प्यार किया तो चिल्लाने लगा और जब मम्मी उसकी बार.बार पिटाई कर रई है, तो कुछ नईं कहता। छिः! गंदा कहीं का! मम्मी मुझे घूर.घूरकर देख रई है। उसने मेरे कान इत्ती जोर से उमेठे हैं कि दर्द करने लगे हैं। आखिर मेरी गलती क्या थी? रोते.रोते सोच रई हूँ। तबी आंटी आ जाती है। मुझे गोद में लेकर पुचकारने लगती है और गुस्सा होकर मम्मी की ओर देखती है। मम्मी कुछ नईं कहती। चुपचाप चली जाती है।

आंटी अपने होठों के रंग वाली चाकलेट खाने को देती है और मुझे नानाजी के पास ले जाती है। नानाजी से कहती है, ‘‘देखो पापा! दीदी ने पिंकी को बिना बात कित्ता मारा। ऐसी भी कोई मां होती है पापा?’’ पापा! ये ‘पापा’ क्या होता है? आंटी नानाजी को पापा क्यों कहती है? और खुद पापा कहती है तो मुझे क्यों नईं कहने देती? उस दिन आंटी की देखा.देखी नानाजी को पापा कहा, तो आंटी बोली, ‘‘नईं बेटा! ये तेरे नानाजी हैं। इन्हें नानाजी कहो। कहो ना.. ना.... जी!’’ वाह! ये भी कोई बात है? तुम तो कहो ‘पापा’ और हम कहें नानाजी! हुँ! हम तो इनको नानाजी कब्बी नईं कहेंगे। ‘‘ऊँ...ऊँ... हम तो पापाजी कहेंगे।’’ मैंने मना करते हुए आंटी से कह दिया। ‘‘नईं पिंकी! तेरे पापा तो देख वो हैं।’’ आंटी ने दरवाजे के बाहर इशारा किया और वहाँ वोई रोनी सूरत वाला आदमी दिखाई दिया, जिसने मेरी मम्मी के साथ मंडप में खूब.खूब चक्कर काटे थे। वो आदमी मेरा पापा कैसे हो सकता है? भला बताओ तो? पा... पा..! कित्ता प्यारा नाम है। उसमें पापा जैसा कुछ भी तो नईं दिखाई देता। फिर ये पहले कहाँ था? आंटी कहती है-मैं भौत बड़ी हो गई हूँ। चार बरस की। पर मैंने उस आदमी को भौत थोड़े दिनों सेई देखा है। वो मेरा पापा कैसे हो सकता है? फिर अगर पापा होता तो हमेसा अपने पास न रखता? ये तो कुछ दिन यहाँ रह के चला जाता है और मम्मी को भी साथ ले जाता है। ऐसे लोग कईं पापा होते हैं? और मम्मी को भी देखो। हर समय फिरकी की तरह इसके पीछे नाचती रहती है। जब ये नईं आया था, तब तो मम्मी बड़े प्यार से बातें करती थी। अब इसको क्या हो गया? इस मेरे गंदे ‘पापा’ ने मम्मी के ऊपर कोई जादू तो नईं कर दिया?

जादू मुझे बड़ा अच्छा लगता है। उस दिन एक मदारी आया था। कैसे जादू के खेल दिखा रहा था। चीज़ गायब करने वाला जादू वो मुझे भी सिखा देता तो मज्जा आ जाता! सबसे पहले तो मैं अपने इस गंदे पापा को ही फूंक मारके गायब कर देती! थोड़ा जादू और सीख लेती तो नानी की कहानी वाले राच्छस की तरह मच्छर बना देती। हाँ नईं तो! मेरी मम्मी को हर समय अपने साथ.साथ लिए घूमता है। मम्मी भी अजीब है। अजीब.अजीब बातें करती है। इस ‘पापा’ के आने से पहले मुझे कित्ता प्यार करती थी! आंटी से भी जादा! और अब? अब तो इस ‘पापा के ही साथ रहती है, और दिनभर उस ‘खिलौने’ को गोदी में लिए.लिए फिरती है। मुझे गोद में नईं लेती। मन करता है कि मम्मी के तड़ातड़ तमाचे मारूँ। जैसे मम्मी मुझे रुला देती है, वैसेई मैं भी मम्मी को खूब रुलाऊँ। इत्ता रुलाऊँ कि मम्मी की आंखें लाल हो जाएं। उसी दिन की तरह!

उसी दिन की तरह! तब मम्मी दिनभर यईं रहती थी। आंटी स्कूल चली जाती थी और मम्मी मुझे गोद में लिए रहती थी। मेरे साथ खेलती थी, मुझे टाॅफियां, बिस्कुट देती थी और खूब हँसती थी। उस दिन मम्मी कमरे में थी। पता नईं मेरे मन में क्या आया-मैंने सोचा मम्मी को डरा दिया जाए। कमरे में हौले.हौले घुसी। फिर मम्मी के पीछे जाकर जोर से ‘हौ.हौ’ कर दिया। मम्मी ने मेरी ओर देखा तो मैं हैरान रह गई। उसकी आंखें लाल थीं और उनसे बड़े.बड़े आंसू टपक रहे थे। हाथ में एक फोटो थी, कांच में जड़ी। वो उसेई देख रई थी। मुझे देखते ही उसने फोटो अलग रख दी और मुझे गोद में लेकर जोर.जोर से प्यार करने लगी। उसकी आंखों से आंसू अब बी टपक रहे थे। मुझे दया आ गई। मैंने पूछा, ‘‘म... मी... क्यों... लो... ती?’’ तब मैं ठीक.ठीक बोल बी तो नईं पाती थी। मेरी बात सुनकर भी मम्मी का रोना बंद नईं हुआ। और बढ़ गया। उसने मुझे गोद में लिए.लिए ही फिर फोटू उठा ली, और उसे देखने लगी। वो कभी फोटू को देखती, कभी मुझे देखती और रोने लगती। मैं बड़ी चकित हुई। मैंने फोटू की ओर देखा। उसमें तो मम्मी ही बैठी थी, पर मम्मी के साथ एक आदमी भी था। मुझे वो आदमी बड़ा अच्छा लगा। मैंने इस फोटू को पहले कब्बी नईं देखा था। मैंने मम्मी से पूछा ‘‘म...मी... ये... कौन!’’ उस आदमी के ऊपर मैंने उंगली रख दी। पर ये देखकर मुझे बड़ा गुस्सा लगा कि मम्मी का रोना बंद नहीं हुआ। रोते.रोतेई बोली, ‘‘ये... ये तेरे पापा हैं पिंकी।’’ अच्छा! तो, ये पापा नाम उस आदमी का था, जो मम्मी के साथ तस्वीर में बैठा था! वोई तो मैं कहूँ कि मैंने ‘पापा’ नाम कईं सुना है। कहाँ सुना है, ये याद ही नईं आ रहा था। अब याद आ गया। मम्मी नेई उस आदमी के बारे में बताया था कि वो मेरा ‘पापा’ है। पर मैंने उस पापा को कब्बी नईं देखा। वो कहाँ चला गया? यहाँ क्यों नईं आता? वो तस्वीर में ही कित्ता अच्छा लगता था, सचमुच में तो भौत अच्छा लगता होगा। फिर आंटी इस गंदे से आदमी को ‘पापा’ कहने के लिए मुझे क्यों परेशान करती है? मैं तो इसको कब्बी ‘पापा’ नईं कऊँगी। मेरा पापा तो वोई वाला पापा है-जो तस्वीर में मम्मी के साथ बैठा है। वो मेरे पास क्यों नईं आता? शायद डरता होगा कि मैं भी इस गंदे पापा की तरह उसे तंग करूँगी। पर ऐसी बात थोड़ेई है। वो मेरे पास आ जाए तो मैं उसे खूब प्यार करूँ। कब्बी लड़ाई.झगड़ा नईं करूँ। वो जैसा कहे, वैसाई करूँ। पर वो आता क्यों नईं?

सबेरे से आंटी मुझे सजाने में लगी है। अजीब.अजीब तरह के रंग.बिरंगे कपड़े पहना रई है। मेरे बाल भी उसने अजीब तरह से बना दिए हैं। मुँह पर पाउडर.क्रीम पोत दी है। बड़ा अच्छा लग रहा है ये सब। नानाजी आंटी से सबेरे कह रहे थे कि आज पिंकी को क्लब ले जाएंगे। कोई शो.वो है। जभी तो कैसी अजीब.अजीब शकल बना दी है आंटी ने मेरी। कह रई थी, ‘‘बिलकुल कुँजडि़न मालूम होती है। पहला इनाम इसी को मिलेगा पापा!’’ लाॅन में धूप फैली है। आंटी चुपके से वहाँ आ गई है। कैमरा लेकर मुझसे कहती है, ‘‘पिंकी उधर खड़ी हो।... यों... इस तरह! शब्बाश! अब ज़रा हँस दे जोर से! बस!’’ इसके बाद किट्ट की आवाज होती है और आंटी भागती हुई मेरे पास आती है-‘‘बस पिंकी! अब तू इस कैमरे में बंद हो गई।’’ हट्! झुट्टी कईं की। उस जरा.से डिब्बे में मैं कैसे बंद हो जाऊँगी? मैं तो यहाँ खड़ी हूँ। शाम तक आंटी मुझे इधर.उधर दिखाती रहती है। बस येई बात तो खराब लगती है। मैं कोई गुडि़या हूँ जो मुझे हर जगह दिखाया जाता है? समय हो गया है। नानाजी बार.बार चिल्ला रहे हैं-‘‘जल्दी करो... जल्दी करो।’’ लो भाई। अब आंटी मुझे लिए.लिए फाटक से बाहर आ गई है। कार बाहर खड़ी है। नानाजी आगे बैठे हैं और एक गोल.गोल चरखी पर हाथ रक्खे हैं। आंटी मेरे साथ पीछे बैठ जाती है। कार चलने लगती है-घर्र...र्र...र्र कित्ते बड़े.बड़े बल्ब हैं। कैसा सोर मच रहा है। ये परदा क्यों पड़ा है? ये खुलता क्यों नईं? ये कित्ते सारे बच्चे हैं? कैसे अजीब.अजीब कपड़े पहने हैं। ये लड़का तो भौत गंदा है। कैसे गंदे.गंदे कपड़े पहने है। बिलकुल भिखारी मालूम पड़ता है। कैसा टुकुर.टुकुर मुझे ताक रहा है। ये ऐसे कपड़े क्यों पहने है? बढि़या कपड़े पहन ले और बाल सँवार ले तो कित्ता अच्छा लगे। ‘‘ए...ए... इधर आओ।’’ मैंने उसे अपने पास बुलाया है। उसकी आंखें मुझे देख चमकने लगती हैं। दौड़कर पास आ जाता है। ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘मुन्ना।’’ ‘‘वाह! तुम्हारा नाम तो बड़ा अच्छा है। मेरा नाम पिंकी है।’’ ‘‘तुम्हारा नाम जादा अच्छा है।’’ वो कहता है। ‘‘तुम भिखारियों जैसे गंदे कपड़े क्यों पहने हो?’’ ‘‘पता नईं, मम्मी ने आज ऐसा बना दिया मुझे।’’ वो कहता है, ‘‘और तुम भी तो कैसे अजीब.से कपड़े पहने हुई हो?’’ ‘‘नईं तो!’’ मैंने कहा है, फिर अपने कपड़ों की ओर देखकर झेंप जाती हूँ, ‘‘अरे सचमुच! पता नईं क्यों आंटी ने मुझे ऐसा बना दिया।’’ ‘‘तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं?’’ ‘‘मम्मी! मम्मी तो नईं, मेरी आंटी बैठी है उधर-नानाजी के पास?’’ ‘‘और पापा?’’ ‘‘पापा!’’ मैं अटक जाती हूँ-‘पा...’’ ‘‘क्यों, क्या पापा नईं आए?’’ वो मुझसे पूछता है। ‘‘नईं।’’ मुझे उस लड़के पर गुस्सा आने लगता है। उसने पापा की बात यहाँ क्यों छेड़ दी? अब ज़रूर वो मुझे अपने ‘पापा’ के बारे में बताएगा। ‘‘क्यों, तुम्हारे पापा कहाँ हैं?’’ ‘‘मुझे नईं पता।’’ मैं लौटने लगती हूँ, ‘‘हम तुमसे नईं बोलेंगे।’’ मुन्ना आँखें बड़ी.बड़ी कर मुझे देखता है-‘‘अरे! तुम गुस्सा क्यों हो गईं?’’ वो मुझे मनाने लगता है। बड़ा अच्छा लगता है। मुन्ना वाकई भौत अच्छा है। मैं खुस हो जाती हूँ और उससे फिर बातें करने लगती हूँ।

तभी कोई रेडियो जैसी आवाज में बोलता है। फिर एक आदमी एक बच्चे की उंगली पकड़ उसे सामने बने इस्टेज पर ले जाता है! वो बच्चा सिपाही बना है। उसे देखके सब ताली पीटते हैं। बारी.बारी से सब बच्चों को वो आदमी वहाँ ले जाता है। मुन्ना को भी ले जाता है, फिर मुझे भी ले जाता है। मैं वहाँ जाकर देखने लगती हूँ-आंटी कहाँ बैठी है। थोड़ी देर में ही वो मुझे दिखाई दे जाती है। वो मुझे देख तालियां बजा रई है। सभी लोग तालियां बजा रहे हैं। मुझे नीचे पहुँचा दिया जाता है, किंतु लोग तालियां बजाना बंद नईं करते। कित्ता सोर मच रहा है। आंटी मेरे पास आ गई है। मुझे प्यार कर रई है। कोई रेडियो जैसी आवाज में फिर बोलने लगता है। पता नईं क्या.क्या बोलता है, पर मैं तो इत्ता ही सुन पाती हूँ: ‘‘पिंकी... पहला इनाम।’’ तालियाँ फिर बजने लगती हैं। आंटी मुझे नानाजी के पास ले जाती है-‘पापा... पापा...। मैंने कहा था ना, पिंकी को पहला इनाम मिलेगा।’’ नानाजी हँसते हुए मुझे गोद में ले लेते हैं और प्यार करने लगते हैं।

ये सामने से तो मुन्ना चला आ रहा है। पर ये किस आदमी की उंगली थामे है? उसके साथ एक औरत भी है। मुन्ना बड़ा खुस है। लगता है कोई इनाम उसे भी मिल गया। सचमुच कित्ती अच्छी बात है कि मुझे भी इनाम मिला और मुन्ना को भी मिल गया। ‘‘पिंकी, पिंकी, तुझे पहला इनाम मिला। मजा आ गया।’’ ‘‘तुझे कोई इनाम नहीं मिला?’’ ‘‘मुझे तीसरा इनाम मिला है। पर इससे क्या, पहला तो तुझी को मिला है न!’’ मुन्ना मुझसे बड़ा है, पर कित्ती प्यारी.प्यारी बातें करता है। ‘‘मुन्ना ये लोग कौन हैं?’’ ‘‘अरे इन्हें नईं जानती?’’ मुन्ना हँसता है, फिर औरत की ओर इशारा करता है, ‘‘ये मेरी मम्मी हैं और ये मेरे पापा!’’ दूसरी बार का उसका इशारा आदमी की तरफ है। अच्छा! तो येई इसका पापा है। इसकी मम्मी भी साथ, इसका पापा भी साथ। तभी ये बार.बार मेरे पापा के बारे में पूछ रहा था। ‘‘हल्लो बेबी!’’ मुन्ना का पापा कहता है और मुझे गोद में लेने लगता है। मुझे अच्छा नईं लगता। मैं उसकी गोद से फिसलकर नीचे आ जाती हूँ। मुन्ना के मम्मी.पापा हँसने लगते हैं। नानाजी और आंटी भी हँसते हैं। फिर उनमें आपस में बातें होने लगती हैं। मैं चुपके से अलग खिसक आती हूँ। मुन्ना भी मेरे पास आ जाता है। ‘‘तुमने मेरी आंटी को देखा?’’ मैं मुन्ना से पूछती हूँ। ‘‘हाँ, तेरी आंटी बहुत अच्छी है।’’ मुन्ना कहता है, ‘‘पर तेरी आंटी के साथ वो दूसरे कौन हैं?’’ ‘‘वो! अरे वो तो मेरे नानाजी हैं।’’ मैं खुस होकर कहती हूँ। तभी लगता है मुझसे कुछ गड़बड़ हो गई। मुन्ना के साथ उसके मम्मी.पापा हैं। दूसरे बच्चों के साथ भी उनके मम्मी.पापा हैं। मम्मी तो अब गंदी हो गई है, पर मेरा पापा क्यों नईं आया? कित्ता मजा आता अगर वो ‘तस्वीर वाला पापा’ यहाँ मेरे साथ होता! ‘‘मुन्ना तेरा पापा कहाँ से आया?’’ मैं पूछती हूँ। ‘‘मेरा पापा?’’ मुन्ना मुँह टेढ़ा करता है, ठोड़ी पर उंगली धर लेता है और आंखें बंद करके सोचने लगता है। मुन्ना ज़रूर कोई गहरी बात सोच रहा होगा, मैं जानती हूँ। ‘‘भगवान के यहाँ से आया होगा।’’ मुन्ना बताता है, ‘‘मम्मी कहती है, हम सब भगवान के यहाँ सेई आए हैं।’’ मुन्ना बात तो ठीक कहता है। एक बार आंटी बी तो कह रई थी कि सब भगवान के यहाँ से आते हैं। ‘‘अच्छा, तो मेरा पापा भगवान के यहाँ से क्यों नईं आता?’’ मैं उससे पूछती हूँ। ‘‘क्या पता? कहीं वो तुझसे गुस्सा तो नईं है?’’ ‘‘क्यों, गुस्सा क्यों होगा?’’ ‘‘तूने कोई शैतानी की होगी तो गुस्सा हो गया होगा।’’ शैतानी तो मैं कब्बी करती नईं। पर आंटी क्यों कहती है कि ये बड़ी शैतान लड़की है। ज़रूर पापा इसी वजह से नईं आता होगा। ‘‘चल पिंकी, घर चलें। देर हो गई है।’’ आंटी आकर मुझसे कहती है। मैं मजबूरी में मुन्ना की तरफ देखती हूँ। उसे भी मेरा जाना अच्छा नईं लग रहा। ‘‘पिंकी! बाय! बाय!’’ काफी दूर निकल आने के बाद मुन्ना हाथ हिलाता है। मैं भी ‘बाय बाय’ करती हूँ।

‘‘मेरा पापा कहाँ है आंटी?’’ मैं पूछती हूँ। ‘‘पापा!’’ आंटी चैंक गई है, ‘‘तेरे पापा तेरी मम्मी के साथ सिमला गए हैं। उनकी चिट्ठी आई है। तुझे बहुत याद कर रहे थे।’’ ‘‘ऊँ हूँ! वो ‘गंदा आदमी’ मेरा पापा नईं है। वो तस्वीर वाला पापा...’’ तड़ाक से एक तमाचा गाल पर पड़ता है। मैं हैरान हूँ। आंटी को ये क्या हो गया? मेरी आंखों से आंसू निकल रहे हैं और आंटी की आवाज कानों में पड़ रई है, ‘‘अपने पापा को गंदा आदमी कहती है।’’ ‘‘वो मेरा पापा नईं है... वो मेरा पापा नईं है।’’ मैं रोते.रोते बी जोर से चिल्लाने लगती हूँ... जिद करके। अब आंटी भौत मारेगी, मैं सोचती हूँ। पर बड़ी देर तक कुछ नईं होता। डरते.डरते आंटी की ओर देखती हूँ।

अरे! आंटी तो रो रई है! उसकी आंखों से भी आंसू निकल रहे हैं। मैंने आंटी की बात नईं मानी न? इसीलिए आंटी रो रई है! ‘‘आंटी! आंटी! रोओ मत। हम पापा को गंदा आदमी नईं कहेंगे। तुम रोओ मत।’’ आंटी और जोर से रोने लगती है। फिर झपटकर गोद में उठा लेती है और प्यार करने लगती है। देखा! आंटी खुस हो गई न! पर वो रोना बंद क्यों नईं करती? अजीब बात है।

चारों ओर कैसे बढि़या बच्चे दिखाई दे रहे हैं। कोई हँस रहा है, कोई भाग रहा है, कोई सोर मचा रहा है। मुझे ये सब अच्छा नईं लग रहा। आंटी की याद आ रही है। घंटी बजने लगी है। अब क्या होगा? सब बच्चे अंदर भाग रहे हैं। वो देखो आंटी वाली मैडम आ रई है। आंटी इससे देर तक बातें कर रई थी, फिर मुझसे बोली थी, ‘‘पिंकी! ये तेरी मैडम हैं। इनके साथ.साथ रहना और जैसा बताएं वैसा करना।’’ ‘‘चलो, पिंकी! क्लास में चलो।’’ मैडम कहती है। मैं उनके साथ.साथ चलने लगती हूँ। मैडम मुझे सबसे आगे वाली सीट पर बिठा देती है।

मैडम पढ़ा रई है। ‘‘बच्चो! क से होता है कबूतर! क से, बच्चो, क्या होता है?’’ ‘‘कबूतर!’’ सब बच्चों के साथ.साथ मैं भी कहने लगती हूँ। ‘‘ख से होता है खरगोश। ख से क्या होता है?’’ ‘‘खरगोस।’’ मन नईं लग रहा। आंटी ने कैसी जगह भेज दिया। यहाँ कोई बी तो दोस्त नईं। मुन्ना होता तो अच्छा रहता। उस दिन कित्ती अच्छी.अच्छी बातें कर रहा था। आंटी ने उस दिन बेकार बुला लिया, नईं तो उससे बातें करने में बड़ा मजा आ रहा था। आंटी इस समय क्या कर रई होगी-पप्पू के लिए-मम्मी के उस खिलौने का येई तो नाम बता रई थी आंटी उस दिन? स्वेटर बुन रई होगी। खाली समय में वो येई काम किया करती है। उस दिन आंटी कह रई थी, वो खिलौना मेरा छोटा भैया है। अगर वो भैया है तो मम्मी मुझे उससे खेलने क्यों नईं देती? उस दिन जरा.सा छू दिया तो पीटने लगी थी। अच्छा वो तस्वीर वाला पापा इस समय कहाँ होगा? मुन्ना कह रहा था कि वो भगवान के यहाँ होगा। भगवान उसे मेरे पास क्यों नईं भेजता? ‘‘प से क्या होता है बच्चो?’’ ‘‘प से पापा!’’ मैं जोर से चिल्लाती हूँ। मेरी आवाज तेज है और मैडम तक पहुँच गई है। मैडम घूर.घूरकर देख रई है। बच्चे भी मुझे देख रहे हैं। क्या बात है? लगता है कुछ गड़बड़ हो गई। ‘प’ से पापा नईं होता होगा। ‘‘पिंकी! तुम्हारा ध्यान कहाँ था?’’ मैडम पूछती है। मेरे मुँह से डर के मारे एक शब्द भी नईं निकलता। ‘‘मीनू! तुम बताओ-‘प’ से अभी हमने क्या बताया था?’’ ‘‘ ‘प’ से पतंग मैडम।’’ ‘‘शाब्बाश! अच्छा तो पिंकी, ‘प’ से क्या होता है?’’ ‘‘पतंग!’’ ‘‘ठीक है! अब अपना ध्यान पढ़ने में लगाओ!’’ मैडम कहती है, फिर पढ़ाने लगती है, ‘‘फ से होता है फल! फ से क्या होता है बच्चो?’’

‘‘आहा! हमारी पिंकी रानी तो पढ़ रई है।’’ दूर से नानाजी के साथ आती हुई आंटी कह रई है। वो बड़ी खुस है, ‘‘देखना पापा! पिंकी डाक्टर बनेगी, डाॅक्टर।’’ ‘‘हाँ, तब किसी को अकाल मौत मरने तो नईं देगी।’’ आंटी का चेहरा फक्क पड़ जाता है। मेरी समझ में नईं आता कि आंटी और नानाजी आपस में क्या बातें कर रहे हैं। ‘‘पापा! अब उस कहानी को भूल जाओ।’’ अचानक आंटी जोर से चिल्लाकर कहती है। मैं डर जाती हूँ। आंटी को ये क्या हुआ! इत्ता गुस्सा तो आंटी को कब्बी नईं आया! मैं आंटी की तरफ देखना बंद देती हूँ और स्लेट पर फिर से लिखना शुरू कर देती हूँ। आंटी पास आती है, ‘‘जरा देखें तो सही, पिंकी रानी क्या पढ़ रई है?’’ इत्ती मुश्किल के बाद अब लिख पाई हूँ-‘प’ से पापा! तभी मुझे मैडम याद आ जाती है और डरकर अपने लिखे हुए को हाथ से मिटाने लगती हूँ। आंटी मेरा हाथ पकड़ लेती है-‘‘इसे क्यों मिटा रई है पिंकी।’’ ‘‘आंटी! मैडम कहती है ‘प’ से पतंग होती है... ‘प’ से पापा नईं होता।’’ ‘‘नईं पिंकी! मैडम झूट कहती है। ‘प’ से पापा होता है।’’ पता नईं क्यों आंटी की आवाज मोटी हो गई है। मैं खुस हो गई हूँ। ताली बजाकर जोर से चिल्लाने लगती हूँ, ‘‘ ‘प’ से पापा होता है... ‘प’ से पापा होता है।’’ कल क्लास में जाऊँगी तो मैडम से कहूँगी, ‘‘मैडम! मेरी आंटी भी कहती है कि ‘प’ से पापा होता है।’’

स्लेट पर मैंने जो लिखा था, वह मिट गया है। अब मैं जल्दी.जल्दी फिर से लिखने लगती हूँ- ‘प’ से...

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