अपनी छड़ी को जमीन पर टक टक करके वो आगे बढ़ रहा था । कभी इधर तो कभी उधर हो रहा था ।

तभी एक आदमी ने आकर उसे हाथ से थामकर एक जगह लाकर खड़ा कर दिया और कहा, "ये पीली पट्टी है इस पर छड़ी रखकर अब आगे आराम से जाइए "।

'पीली पट्टी ' ये शब्द मेरे दिमाग में घूमता रहा । वो अँधा व्यक्ति जो इस पीली पट्टी को कभी देख नहीं सकता था , न जाने क्या भाव होगा उसके मन में पीले रंग के लिए । वो पीली पट्टी जो उसे मेट्रो स्टेशन में रास्ता दिखाती है ,मगर उसी पीली पट्टी को वो कभी न देख सकता है ,न उसके रंग को समझ सकता है । वो पीली पट्टी उसकी आँखों का सहारा है ,बस उसे उसका स्वरूप नहीं पता ।

हम सब आँख वाले ऐसी कई पीली पट्टीयों से घिरे है। मगर हम आँख वालों ने ज़िन्दगी को फॉर ग्रांटेड ले रखा है ,इसलिए उन पीली पट्टियों का महत्व हम कभी समझ नहीं पाते ।

वही पीली पट्टी जो शायद बहुत बड़ी बात नहीं मगर किसी के लिए पूरा रास्ता है ।

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