क्यों सिया ही क्यों ??

सिया ने घडी की तरफ नज़र दौड़ाई, देखा.. रात के एक बज रहे हैं ! पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर है ! घर के सबलोग सो चुके हैं ज़रा सी देर को पापा के खर्राटों से उसका ध्यान भंग हो जाता है! इसके बाद फिर वह अपनी दुनियां में मगन हो जाती है ! जहाँ हर्ष और उसके सिवाय कोई और नहीं है! अचानक से उसका बहुत तेज़ जी घबराया ! उसने कमरे की बंद खिड़की को खोल दिया एक सर्द हवा का झोंका उसके बालों को सहलाते हुए पूरे बदन को ठंड से कंपकपा गया ! लेकिन जी का घबराना न रुका तो वह वाश रूम में चली गयी, वहां पर उसने ढेर सारी उलटी कर दी!

आँखों से पानी बह निकला इस भयंकर सरदी में भी उसका शरीर पसीने से भीग गया ! ये क्या हो गया? ऐसा तो उसने कुछ भी नहीं खाया था ! मन ही नहीं हुआ था खाने का ! कई दिनों से उसकी तबियत गडबड चल रही थी और उससे कुछ खाया ही नहीं जा रहा था ! पर उसे खुद का होश ही कब है जो यह सब महसूस करती और डा. से कंसल्ट करती ! जब उलटी आई तो होश आया उसने अपनी उंगलियों पर हिसाब लगाया ! अरे दो महीने हो गए उसका पीरियड्स अभी तक नहीं हुआ था ! तो क्या वह ?? ओह नों ! ऐसा नहीं हो सकता ! वह घर वालों को क्या जवाब देगी या हर्ष को क्या बताएगी ? क्या वे उसपर विश्वास करेंगे ? क्या उसे भी सीता की तरह अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ेगा ? लेकिन अग्नि परीक्षा तो हर्ष के आने पर देनी होगी ! अभी घर में, समाज में, इन सबका सामना कैसे करेगी ? आत्ममंथन चलने लगा ! सोचा अभी हर्ष को फोन करके सब बता दे, फिर मन में आया चलो अब सुबह ही बात करेगी ! अभी कुछ देर पहले ही बात हुई थी! हर्ष ने गुड नाईट विश करते हुए कहा था कि आज बहुत थक गया हूँ अब सोने जा रहा हूँ! ऐसे में उसे जगा कर कुछ भी कहना सही नहीं लगा !

करबटें बदलते हुए सारी रात गुज़र गयी ! रजाई में मुँह ढँककर भी शरीर में गर्माहट का नामोंनिशान नहीं था ! जब सुबह को थोड़ी सी खुली हुई खिड़की की झिरी से सूरज की किरणों ने उसके माथे को चूमा तो वह हलके से मुस्कुरा कर उठ गयी ! रात में कब सो गयी थी, उसे पता ही नहीं चला ! घड़ी में समय देखा सुबह के 10:30 हो रहा था ! तो क्या आज माँ ने उसे चाय के लिए भी नहीं बुलाया ? वह कमरे से निकल कर बाहर आ गयी ! देखा... पापा ऑफिस जाने को तैयार खड़े हैं और माँ किचिन में परांठे सेंक रही हैं !

क्यों सिया बेटा, उठ गयी तुम ? माँ के स्वर में व्यंग्य साफ़ नजर आ रहा था !

माँ, क्या आज ज्योति काम पर नहीं आई ? सिया ने माँ की बात को अनसुना करते हुए उनसे ही सवाल दाग दिया !

क्या तुम्हें नहीं पता कि वो आजकल छुट्टी पर चल रही है? वैसे तुम्हें पता भी कैसे होगा ? खुद का तो होश नहीं है ! घर पर ध्यान कब रहेगा तुम्हारा !

सिया ने कोई जवाब नहीं दिया ! सच ही तो कह रही हैं माँ....उसे कहाँ होश रहा है इन दिनों ? खुद को बिलकुल भूल ही चुकी है ! उसने डाइनिंग टेबल पर रखी चाय की केतली में से एक कप में चाय लौटी और कप को दोनों हाथों से पकड़ कर अपने कमरे में आ गई ! माँ से बहस करने से अच्छा है अपने कमरे में चुपचाप आकर बैठ जाया जाये ! वैसे गलती जब खुद की हो तो चुप रहना ही बेहतर रहता है !

चाय पीते हुए वह हर्ष के बारे में ही सोच रही थी क्यूंकि हम जिससे मन के बंधन में बंधे होते हैं... उससे दूर रहकर भी प्रतिपल उसी से बात करते हैं ! जुबाँ के खामोश होते भी हमारी रूहें आपस में बातें करती रहती हैं ! एक को तकलीफ होने पर दूसरे को पता चल ही जाता है ! तभी उसके मो. फोन की घंटी बज उठी ! देखा तो हर्ष का फोन था !

अरे हर्ष.... कैसे हो तुम ? अभी तुम्हारे बारे में ही सोच रही थी ! उसने जल्दी से फोन उठाते हुए कहा !

मैं बिलकुल ठीक हूँ यार ! तुम बताओ, कैसी हो ? और मेरे बारे में क्या सोच रही थी ?

मैं भी बहुत बढ़िया हूँ ! बस यही सोच रही थी कि इस समय तुम मेरे पास होते !

फिर वही बात ! पता है न, मैं पांच महीने के बाद आ रहा हूँ ! अच्छा अभी फोन रखता हूँ... शाम को बात करूँगा !

हर्ष सुनों..... प्लीज, मुझे तुमसे बहुत जरुरी बात करनी है! मैं रात भर सो भी न सकी थी !

ऐसी क्या बात हो गयी... जो रात भर नही सोईं? मुझे ऑफिस जाने की जल्दी है फिर भी तुम बताओ ! चलो हो जाने दो देर, आज देर ही सही !

हर्ष तुम्हें याद हैं न .... कॉलेज टूर के वो चार दिन !

तो ये जरुरी बात है ! वैसे वो दिन कब, कहाँ, कभी भूलाये जा सकते हैं !

अरे नहीं, ये बात नहीं ! मेरी पूरी बात तो सुनों!

सुनाओ, लेकिन जरा जल्दी कर लो यार !

वे सिर्फ चार दिन मात्र नहीं थे बल्कि ये वो दिन थे, जिन दिनों की वजह से हम दोनों हमेशा हमेशा के लिए एक सूत्र में बंध गए थे !

हूमम्म ! अच्छा तो ये है जरुरी बात! मुझे पता है हम सिर्फ एक दूसरे के लिए ही बने हैं !

नहीं भई, आई हैव कंसीव !

ओह नों ! यह कैसे हुआ ? अब क्या होगा ?

बस यही सोचकर मैं परेशान हूँ कि अब क्या होगा ?

चलो परेशान होना छोडो ! परेशान होने से क्या होगा ! अभी मेरा आना तो पांच महीने बाद ही हो पायेगा.... तुम्हें ही कुछ करना पड़ेगा !

क्या करूँ मैं ?

अबोर्शन !

लेकिन हर्ष वो इतना आसान नहीं है !

सिया बस यही एक तरीका है क्यूंकि अभी हमारी शादी नहीं हो सकती ! पहले दीदी की होगी फिर मेरी ! ओके, चलो अब शाम को बात करते हैं ! हर्ष ने फोन रख दिया !

हर्ष ने कितनी सहजता से कह दिया था! सिया असमंजस की स्थिति में आ गयी थी ! अब वह क्या करेगी ! माँ को बताना इतना सरल नहीं है ! वे वैसे ही आजकल उससे परेशान हैं ! सबकुछ बहुत मुश्किल है! पहाड़ सी परेशानी सर पर आ गयी ! एक तो वह विरह और इंतजार के गम में घुल रही थी ऊपर से ये समस्या ! इसका तो जल्दी से जल्दी कोई न कोई उपाय करना होगा ! उसे समझ आ रहा था कि गलती तो उसकी ही है...... मर्द के अंदर तो एक जानवर रहता है ! उसे ही इतना आगे नहीं बढ़ना चाहिए था लेकिन उसने प्रेम के कारण ही समर्पण किया था! क्या पता था उसका इतना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा ! सारे दर्द उसके हिस्से में आ जायेंगे ! अब उसे दूर दूर तक हर्ष का साया भी नज़र नहीं आ रहा था ! उस सुख के तो वे दोनों ही साझीदार थे फिर दुःख सिर्फ अकेले उसे ही क्यों ?

हर्ष के इंतजार में परेशान वह एक और परेशानी में घिर गयी थी ! हमेशा से ही ऐसा होता आया है... सारा दर्द अकेले औरत के हिस्से में ही आता है ! इतना दर्द झेलने और सहने के बाद भी वह सबको ख़ुशी और प्रेम ही बांटती है और सब कष्ट अपनी झोली में डाल लेती है! उसका नर्म दिल और मासूम मन कभी भी किसी से नफरत कर ही नहीं सकता! तभी तो प्रेम, दया, करुणा और वात्सल्य की मूरत होती है एक औरत !

अब उसे निर्णय लेना ही था एक कठोर निर्णय ! उसे खुद को और अपने प्रेम को समाज के आगे नीचा नहीं दिखाना था फिर परिवार की मर्यादा ! वो भी तो उसके ही हिस्से में आई है! अपने मम्मी पापा को किसी भी हाल में समाज के आगे बदनाम नहीं होने देगी ! क्या वह खुद को ख़त्म कर ले ? नहीं इससे तो समस्या का निदान नहीं बल्कि और ज्यादा बातें बनेगी! हाँ यह अलग बात है कि यह सब देखने सुनने के लिए वह नहीं होगी !

उसे अपनी प्रेगनेंसी से निजात पानी होगी!

आज सिया का सचमुच बहुत मन ख़राब हो रहा था ! कालेज में भी पूरे दिन मन नहीं लगा! उसने घर आकर फ़ौरन टी वी ऑन कर लिया शायद मन थोडा अच्छा हो जाये ! देखा टी वी पर रामायण सीरियल आ रहा है! सीता जी अशोक वाटिका में बैठी हैं! हरे राम! हरे राम! की प्रतिध्वनि से पूरा वातावरण गुन्जायमान हो रहा है ! बीच बीच में उन खर्राटों की आवाजें भी आ जाती हैं जो पहरे पर बैठी राक्षसी के सोने से उत्पन्न हो रहे हैं ! वही पर फ़लों का भरा हुआ एक टोकरा भी रखा हुआ है लेकिन सीता जी ने उसमें हाथ भी नहीं लगाया, वे सुबह से निराहार हैं !

अन्न का त्याग तो उन्होंने उसी दिन कर दिया था जिस दिन रावण साधू का वेश बनाकर उन्हें पंचवटी से उठाकर ले आया था ! अभी तक वे राम का इंतजार करते हुए फलाहारी व्रत कर रही थी परन्तु आज से लगता है, उन्होंने फलों का भी त्याग कर दिया है और शायद ये प्रण ले लिया है कि जब तक राम न आ जाएँ .... वे निराहार ही रहेंगी! हे भगवान, इतना कठोर तप राम को पाने के लिए !

कैसे सहन किया होगा उन्होंने? कैसे रही होंगी... वे राक्षसों के बीच में ?और फिर बार बार रावण का आकर भरमाना ! महान तपस्वी सोने की लंका का स्वामी प्रचंड ब्राह्मण रावण भी सीता जी को राम के मोह से विलग नही कर पाया था !

वे साध्वी बनी इतने बरस तक दिन-रात राम का नाम जपती हुई अशोक वाटिका में ही बैठी रही ! केवल इस विश्वास के सहारे कि राम एक दिन अवश्य आयेंगे !

लेकिन कब? यह वो नहीं जानती थी ! फिर भी वे प्रतीक्षारत थीं !

क्या मैं इतना त्याग कर पाऊँगी? शायद नहीं और सीता जी के जैसा तो नाममात्र भी नहीं !

जबकि सिया तो जानती है बल्कि उसे पक्का पता है कि नियत दिन और तारीख को हर्ष लौट आयेंगे !

आ जायेंगे वे वापस और बना लेंगे उसे हमेशा हमेशा के लिए अपना ! हो जायेगा उसका इंतजार ख़त्म ! फिर भी इस समय जो विरह वेदना सिया झेल रही है वह बहुत दुष्कर है! सच में, पूरी रात जागकर निकल जाती है और अगर झपकी लग भी जाये, तो हडबडा कर आँख खुल जाती है .....लगता है जैसे कि हर्ष उसका हाथ पकड़ कर उसे जगा रहे हो ! एक टीस भरी दर्द की लहर उसके सीने में उठती है! उफ़, कितना कष्टप्रद है यह ! लगता है जैसे शरीर से किसी अंग को काटकर दूर फेंक दिया है या बहुत दूर उछाल दिया है और वह उससे रिसते खून को रोक नहीं पा रही ! जब जाते समय हर्ष ने कहा था कि मात्र छः महीने की ही तो बात है और यह इंटर्नशिप करनी भी जरुरी है ! हर्ष की यह इंटर्नशिप ....लगता है उसकी जान लेकर ही छोड़ेगी ! हर्ष उससे करीब ३००० किलोमीटर दूर हैं ! वे बीच में मिलने भी नहीं आ सकते ! हालाँकि फोन पर रोजाना ही बात हो जाती है परन्तु फोन पर बात करते हुए उससे मिलने की हुड़क कुछ और तेज़ हो जाती है! सिया व्याकुल हो उठती है ! हर्ष तुम मेरे पास में होते, मैं तुम्हे हिलक कर अपने गले से लगा लेती .... और अपने सारे दुःख, दर्द भूल जाती... वह ऐसा सोंचती ! लेकिन सोंचने से कभी कुछ कहाँ हुआ है !

उसे ध्यान आता है कि सीता जी तो नवविवाहिता थी और वे अपना मधुमास मना रही थी! बीच में रावण आ गया और उन्हें राम से अलग कर दिया !

सिया और हर्ष के बीच में आ गयी रावन रूपी नियति, समाज, दुनियांदारी, पैसा और ये इंटर्नशिप सब टांग अडाकर खड़े हो गये! चले गये हर्ष उससे दूर ! वो क्या गये उसका सुख चैन के साथ मन भी संग ले गये !

किस दुनियां में रहती हो ? क्या तुम्हें कतई होश नहीं ? माँ अक्सर डांटते हुए कहती !

सच ही तो कहती हैं माँ ! कहाँ रहा उसे होश या फिर कुछ और याद ? उसे समझ नहीं आता आखिर वह क्यों जी जान से हर्ष को चाहती है? ऐसा उसमें क्या है? जो किसी और में नहीं ! देखा जाये तो वह उसके प्यार में पागल हो गयी है! उसे अपने अंतर्मन में बसा लिया है अब उसके जैसा तो कोई भी नहीं ! उसे याद आता है उसने कहीं पढ़ा था कि अगर कोई औरत किसी को चाहती है तो टूटकर या नफरत करती है तो वह भी टूटकर ! प्यार में जीवन संवार देती है और नफरत में बर्बाद कर देती है !

वो सच्चा प्यार करती है अपने हर्ष से ! किसी नेमत की तरह प्रेम उनके जीवन में उतर आया है ! वह तो इस समय सर से लेकर पाँव तक हर्ष के प्यार में डूबी हुई है तभी तो उसकी हर बात अच्छी लगती है! वे जो कुछ कहना चाहते हैं या कहते हैं फ़ौरन मान लेती है ! यह दिल ऐसा ही होता है! जब उसका जी चाहता है या किसी पर फ़िदा होता है तो वो किसी बड़ी से बड़ी बात का बुरा नहीं मानता और कभी ज़रा सी बात पर ही नाराज़ हो जाता है ! यह दिल भी बड़ा बेदिल होता है!

नियम से हर्ष फोन पर बात करते हैं फिर भी मन में घबराहट या बेचैनी सी क्यों बनी रहती है ? लेकिन इस क्यों का जवाब सिया के पास बिल्कुल भी नहीं है !

आजकल सब बहुत आसान है! हर्ष ने कहा था!

हर्ष की यह बात उसके दिमाग में पूरे दिन मंथन करती रही!

क्या सच में सबकुछ बहुत आसान है? कहने और झेलने में कितना अंतर है ! लेकिन तब भी वह सहेली गीतिका के साथ नर्सिंग होम पहुँची थी!

डॉ.ने पूछा था, पति कहाँ हैं ?

गीतिका ने आगे आकर बात को सँभालते हुए कहा था कि वो बाहर हैं और इसको अभी अपनी पढाई पूरी करनी है ! अगर अभी से बच्चे के चक्कर में आ गयी तो इसका पूरा करियर चौपट हो जायेगा ! प्लीज अभी इसे निज़ात दिला दीजिये!

कितना मुश्किल था लेकिन गीतिका ने किसी तरह डॉ को मना लिया था ! बिना किसी हिचक के ही उसने सारी जिम्मेदारी ले ली थी और खुद ही आगे बढकर साइन भी कर दिए थे ! आज अगर गीतिका उसका साथ न देती तो ?

सिया ने अपने कानों के इअरिंग्स और फिंगर रिंग निकल कर गीतिका को पकड़ा दी थी ! अब वह ओ टी की चाहरदीवारी के भीतर अकेली थी, जहाँ बड़ी बड़ी मशीनें और ओपरेशन के सामान उसके डर को बढ़ा रहे थे ! उसने कसकर आँखे बंद कर ली! हर्ष, कहाँ हो तुम आ जाओ न ! भले ही ये दर्द अकेले मुझे ही सहना है पर तुम्हारे होने भर से ही मैं सारे दर्द को भूल जाउंगी ! ये मेरे दिल की आवाज है हर्ष कि तुम्हारे लिए मेरा प्यार हर दर्द के बाद और मजबूत हो जाता है !

अब डॉ की आवाज उसके कानों में सुनाई आ रही थी! वो कह रही थी, जल्दी एनस्थीसिया लगाओ! उसने डर से अपनी आँखें अभी भी नहीं खोली थी ! उसे कोहनी के पीछे के हिस्से में इंजेक्शन की दर्द भरी चुभन हुई थी! एक तेज़ चीख उसके मुँह से निकली और दिमाग कहीं अवचेतन में चला गया था ! क्या वह चीख उसके हर्ष तक पहुँची होगी ?

प्रेम करने की ये कैसी सज़ा मिली है ? और इंतजार, परीक्षा व त्याग हर बार औरत को ही करना पड़ेगा ! यही एक औरत की नियति है ! चाहें सिया हो या सीता !

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