बड़ी सी झुमका पहने वो भीड़ में कुछ अलहदा हीं लग रही थी , वरमाला का रस्म चल रहा था , मैं अपने फुफेरे भाई के पास खड़ा उसे ही एकटक देख रहा था। अब ये मेरे आँखों का पराक्रम था या उसे इस बात का एहसास हो गया था। वो भी मेरे तरफ ही देख रही थी, हर दो मिनट में दोनों की नजरें मिलती थी और झुक जाती थी।

एक घण्टें में वरमाला की रस्म खत्म हुई। तब तक सारे मेहमान खाना खा-पी के आर्केस्ट्रा देखने चले गये थे।
हम भी आर्केष्ट्रा जाने की तय्यारी करके ही आये थे।
पर वरमाला के स्टेज पे जो हुआ था उसके बाद दिल मान नही रहा था कि आर्केष्ट्रा के स्टेज पे जाएँ। इसी सोच में पड़े थे की जाएं की न जाएँ । तब तक सलोनी आके बोलीं चलिए जीजू खा लीजिए। भैया की शादी जिन से हो रही थी .....सलोनी उनकी बहन थी। चूँकि हम एकलौते सदस्य थे लड़के वालों की तरफ से जो मुंह दिखाई की रस्म से लेके खीर भोजनी की रस्म तक लड़कीवालों से मिलते जुलते रहे थे। इसलिए सलोनी से अच्छी जान पहचान हो गई थी।

खाने का वक्त आया तो पता नही क्यों उसने हमे उस लड़की के बगल में ही बैठा दिया, शायद वो हम दोनो को एक दूसरे को ताड़ते हुए देख चुकी थी।
हम इंट्रोवर्ट तो है हीं उस वक्त खासा कन्फ्यूज भी हो गए थे की उसको देखें या फिर खाना खाये.......खैर खाते हुए नजर घुमाया तो साइड व्यू से वो और लाजवाब लग रही थी.....उसके नाक के बगल का तिल हम अभी तक ताड नही पाए थे जो और भी कयामत ढा रहा था। दोनों चुपचाप खा ही रहे थे की पानी का ग्लास उठाते वक्त अनायास ही हम दोनों के हाथ आपस में टकरा गये।इक अजीब सी सिहरन हुई मुझे....... शायद उसे भी हुई होगी पर वो कुछ जाहिर नही कर रही थी........मैं भी बस कनखियों से उसे देखते हुए खाने पे ध्यान लगा रहा था। थोड़े देर में खाना फिनिश करके मैं वहाँ से निकला और भैया के पास पहुंचा......वहां पहुँचते ही पहले तो डाँट मिली फिर हुक्म हुआ की पुरे शादी के वक्त तुम्हे मेरे पास ही रहना होगा। मुझे लगा मैंने कोई जंग जीत ली हो। अंधे को क्या चाहिये दो आँख ......पर यहाँ तो साथ में गूगल ग्लास भी मिल रहा था।

आधे घण्टे बाद जब शादी के मंडप पहुंचे तो..... वो वहाँ पहले से हीं बैठी हुई थी।
पहुँचते- पहुँचते ही पहले नजरें मिली फिर एक दूसरे के तरफ स्माइल उछाला गया, उसके बाद हर एक अंतराल के बाद दोनों की नजरें आपस में मिलती रहीं ......झुकती रही। जहाँ मण्डप में बैठी हुई और लड़कियां और औरतें गाना गा रही थी......वो बस होंठ हिला रही थी। मुझे ये देख के बड़ी हंसी आ रही थी और वो मुझे हंसते देख के मुस्कुरा रही थी।

कुछ देर ऐसा चला फिर मैं मण्डप के बाहर आ गया । थकान इतना था कि नींद आने लगा । कुछ देर बाद कुर्सी खींचने के सरसराहट से नींद खुली तो वो पास ही खड़ी पूछ रही थीं यहाँ बैठ सकती हूँ?...मैंने कहा- हाँ स्यौर!

कुछ पल के चुप्पी के बाद बातचीत का दौर शुरू हुआ उस ने पूछा कि तुम मुझे छुप छुप के क्यूँ देख रहे थे।
मैंने तंज कसते हुए कहा - "गलती थी ......पता नही था की यहाँ किसी के तरफ देखना मना है .......वैसे तुम्हारी भी नज़रें भी हमेशा उधर ही घूम रही थी जिधर मैं खड़ा होता था" ...वो जोर-जोर से हंसने लगी ....मैं भी साथ देते हुए मुस्कुराने लगा।
बमुश्किल दो मिनट का भी वक्त साथ में नही गुजरा की सलोनी जी ........निशा - निशा करते हुए उसे ढूंढने आ गयी। जब वो जा रही थी तो मन कह रहा था उसे रोक लू पर कुछ कह नही पाया सिवाय मुस्कुराने के
। खैर मुझे फिर नींद आने लगी। नीचे एक कमरे में जाके सोफे पे लेट गया। सुबह हुई तो चचेरे भाई विशाल ने जगाया की चलो विदाई का समय हो रहा है।

दिल उससे दूर जाने के ख्याल से ही धक से बैठने लगा।
रात को सिर्फ आँखे ही नही मिली थी , या सिर्फ कुछ बातें ही एक दूसरे से नही बोले गये थे।
एक दूसरे के दिल में कुछ अहसास भी जगाये गये थे.......! कुछ भावनाएं भी पनपाई गई थी , जो पहले कभी नही पनपी थी।

जाने का वक्त हो रहा था , मैं उसे ढूंढ रहा था , पर वो मिल नही रही थी .........बड़ी मशक्कत के बाद सलोनी मिलीं तो उसी से उसका कांटेक्ट नम्बर माँगा .....थोड़े देर तक चुप रहने के बाद उसने कहा ~आपको कांटेक्ट नम्बर दे तो दूंगी पर वो मुस्लिम है......आप कांटेक्ट कर पाइयेगा।

मैं झल्लाते हुये बोला ........मजाक मत कीजिये .....उनका नाम तो आप रात को निशा - निशा करके बुला रही थी , अभी आप उसे मुस्लिम बोल रही है ।।"
वो रुआँसी होके बोली ......"हाँ उसे मैं प्यार से निशा ही बुलातीं हूँ , मेरी सहेली है वो........ इसीलिए शादी में आई थी.उसका पूरा नाम मेहरूनिशा आरा है"

हमारा दिल एक बार फिर से धक दे बैठ गया.....ब्राह्मण का लड़का..... सात साल से शाखा में दण्ड भांजने वाला स्वयंसेवक प्यार भी करेगा तो मुस्लिम लड़की से .....छी छी.......

दिमाग सुन्न हो गया ......कुछ देर तक तो कुछ सुझा ही नही ........फिर अचानक जोर से चिल्लाये की ।
"विशाल बाइक लेके जल्दी आ भाई ..........अभी के अभी घर निकलना है।
विशाल कुछ पूछने को मुंह खोलता तब तक मैं फ़िर से चिल्ला चूका था ......."जल्दी लेके आ बे देर मत कर.....अर्जेन्ट है।"

"आकाश गौरव"

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