तब मैं पाँचवीं में पढता था,अपने बाल मित्र धनपत यादव के बाबा के ब्रह्मभोज में गया।दूर होने के कारण मैं साइकिल से जल्दी ही ही घर से निकला था ताकि जल्दी से मैं खाकर वापस आ सकूँ।आधे घंटे प्रतीक्षा के बाद मैंने कहा,"यार धनपत मुझे दूर जाना है देर हो गयी तो घर पे पिटाई हो जायेगी।मुझे खिला दो,और मैं चला जाऊं।"

धनपत मुझे अपने पिता नत्थूलाल के पास मुझे ले गया,उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा,"बेटा ! हम भी जल्दी चाहते हैं पर पंडित जी लोग अभी तक आये ही नहीं इसलिये अभी खिलाना हम शुरू न कर पाए।"

मैं - "तो जो आये हैं उन्हें ही पहले खिला दीजिये,पंडित जी लोग जब आएंगे तब खा लेंगे।"
नत्थूलाल - "पंडित श्रेष्ठ होते हैं,जब तक वे लोग श्रीगणेश न कर दें तब तक कोई नहीं खा सकता।कोई दूसरा पहले खा लेगा तो सारा भोजन जूठा हो जायेगा और पंडित जी लोग उस भोजन को ग्रहण नहीं करेंगे।"

मैं - "तो पंडित जी लोगों का जूठा हम सब क्यों खाएं ?"
नत्थूलाल - " अरे बेटा, पंडित जी लोग ब्राह्मण देवता हैं,उनका जूठा प्रसाद होता है।"

मैं चुप हो गया,अँधेरा हो चला था।पंडित जी लोग आये,पंगत बैठी।मैंने सोचा कि जल्दी से इन्हें खिलाकर अपनी प्रतीक्षा समाप्त करें और मैंने खिलाने के लिये दही की बाल्टी उठाई और धनपत ने चूड़ा।तब तक धनपत के पिता ने उसके हाथ से चूड़ा लेकर नीचे रखते हुए बोले,"पंडित जी लोग हमारे हाथ का छुआ न खाएंगे,वे ब्राह्मण के हाथ का परोसा ही खाएंगे।"
मैंने भी बाल्टी रख दी और धनपत से धीरे से पूछा,"धनपत ! हम लोग अछूत हैं क्या ?"
धनपत - "होंगे,तभी तो वे हमारे हाथ का परोसा न खाएंगे।"
मैं चुप हो गया।एक मोटे से जनेऊधारी पंडित जिनके श्यामल शरीर से पसीना ठप-टप चू रहा था,आये और चूड़ा उठाकर बाँटना शुरू किये।पंडित जी लोगों का भोजन भी इन्होंने ही पकाया था,इसलिये गर्मी से बेचारे बेहाल थे।और धोती के अलावा सारे कपडे उतार दिए थे।बड़े परिश्रम से इन्होंने चूड़ा बाँटकर दही उठाया।मैं इनके करीब ही था।इनके शरीर का पसीना टप-टप चू रहा था,जब ये दही देने के लिए झुकते तो इनका सारा पसीना दही में गिरकर उसकी मात्रा बढ़ा रहा होता।

मुझे रह-रहकर मकरध्वज के जन्म की कहानी का स्मरण हो रहा था।मैं बड़ा बेचैन था,अपनी बेचैनी आखिर किससे कहूँ,कहीं लोग सुनकर मेरा मजाक न उड़ाएं।इसलिये चुप ही रहा,लेकिन ये सोचकर कि यही पसीने वाली दही हमें भी खानी पड़ेगी,मैंने धनपत को बुलाया।

पंडित जी सबको सब्जी दे रहे थे।मैंने धनपत से कहा,"देखो पंडित जी की मैल पसीने में मिलकर सब्जी में गिर रही है,क्या यही सबको खिलाओगे ?"
(मैंने जानबूझकर मकरध्वज वाली बात न की थी उससे,क्या पता वह भी मेरा मजाक उड़ाने लगता)
धनपत - "पंडित जी के कारण हम इतनी सब्जी बेकार थोड़ी करेंगे।और बाबूजी कह रहे थे कि पंडित जी का जूठा प्रसाद होता है तो पसीना मिली सब्जी भी प्रसाद ही होगी।"

मेरा बताना आखिर बेकार गया,लेकिन कहीं किसी विप्रध्वज का जन्म न हो ये सब्जी,दही खाने से,इसलिये मैं घबराया हुआ था और फिर से मकरध्वज की कहानी बिन बताये मैं इस सब्जी,दही से बचने का कोई उपाय ढूंढ रहा था।बहुत सोचने के बाद भी जब मुझे कोई उपाय न सूझा तो मैंने कलेजा मजबूत कर अपनी शंका कह देने का निश्चय किया।मैंने धनपत को एक किनारे ले जाकर उससे कहना शुरू किया।

मैं - "यार धनपत,तुमने मकरध्वज के जन्म की कहानी सुनी है ?"
धनपत - "हाँ, तो ? "
मैं - "हनुमान जी का पसीना मगरमच्छ के मुँह में गिरा था,उस पसीने से मकरध्वज का जन्म हुआ था।कहीं इन पंडित जी के पसीने से ढेर सारे पंडितध्वज का जन्म हो गया तो ?"
धनपत - " बेवकूफ ! हनुमान जी भगवान थे।"
मैं - " हाँ तो,पंडित भी तो ब्राह्मण देवता हैं।"
धनपत गंभीर सोच में पड़ गया।वह इतनी सारी दही,सब्जियां फेंकना नहीं चाहता था।

पंडित जी लोग भोजन कर चुके थे।धनपत के पिता जी,जिनकी उम्र 50 वर्ष रही होगी,सभी भोजन कर चुके पंडित लोगों के चरण स्पर्श कर रहे थे और उन्हें पाँच रूपये दक्षिणा में दे रहे थे।मुझे घोर आश्चर्य हो रहा था कि पंगत के पंडितों में 70 वर्ष से लेकर 5 वर्ष के ब्राह्मण बालक भी थे और धनपत के पिता उन 5 वर्ष के बालकों का भी चरण स्पर्श करते और 5 रूपये उनके हाथों में सौंपते।

उससे भी घोर आश्चर्य इस बात पर हो रहा था कि ये पाँच-दस वर्ष के ब्राह्मण बालक जब तक अपने पिता की उम्र के व्यक्ति से अपने चरण स्पर्श कराकर पाँच रूपये न ले लेते,तब तक पंगत से उठते न थे।

पंगत चली गयी,मैंने धनपत के पिता जी से पूछा, " चाचा जी,आप सबको पैसे क्यों दिए उनके खाने के बाद ?
नत्थूलाल - " बेटा, जब तक पंडित जी को हम दक्षिणा न देंगे,दिवंगत आत्मा को शांति न मिलेगी।"
मैं - "और छोटे-छोटे बच्चों के पाँव क्यों छू रहे थे ?"
नत्थूलाल - " बेटा, वो ब्राह्मण देवता हैं इसलिये।"

धनपत अभी तक चिंतातुर खड़ा था और कुछ भी न बोला था।उसने मेरा हाथ पकड़ा और जहाँ चूड़ा-दही,चीनी,सब्जी-पूड़ी रखी थी,वहां ले गया।
धनपत - "इस सब खाने को छुपाना है।"
मैं - " क्यों ?"
धनपत - "दिमाग मत ख़राब कर,किसी को बताना मत।"
और हम दोनो पंडित जी के पसीनेयुक्त सभी व्यंजन छुपा दिए।

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