"ए भागवान! इधर आ के सुन ज़रा!”
पति की ऊँची आवाज़ सुन बिमला दौड़ी हुयी आई।
"
अब से अपनी बिटिया को मोहल्ले के छोटे लडको संग भी ना खेलने दियो। ना जाने कौन ससुरा सुरसा-सा मुंह बना इनको खा जाए। अब तो कानून भी सजा नही देगा| बड़ी उम्र वाले तो डरेंगे, कल को बड़ी सजा होगी; समाज में बेईज्ज़ती होती। लेकिन इन नाबालिग शैतानो को तो ना कानून खास सजा देगा, ना समाज पहचानेगा। कपड़ा मुँह पे बाँध कोर्ट ले जाएँगे; फेर तीन साल पीछे मशीन दे के किसी नुक्कड़ पे बिठा देंगे कि जा बेटा कपड़े सी…अब से मैं किसी भी छोरी को घर से बाहर देख लिया तो तेरी खैर ना है।" बड़बड़ाते अतरसिंह ने टी वी बंद किया और चप्पल पहन घर के दरवाज़े की साँकल चढ़ा दी।
हे भगवान! इनका ब्याह करा दे जल्दी। अपने घर को जावें, मेरे जी का जंजाल खतम हो।” बिमला ने बेचारगी से अपनी किशोर उम्र की तीनों छोरियों को देखा जिनके पंख उडने से पहले ही कतरे जा रहे थे।
तभी बड़ी बेटी बोली, “माँ , म्हारे को लठ्ठ चलाना आवे। और मन्ने और भी बहुत कुछ सीख रखा । ऐसे छोरों से तो आपै निपट लूँगी, कपाल फोड़ आऊँगी उसका।”
माँ ने बेटी का माथा चूम लिया।

hindi@pratilipi.com
+91 8604623871
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.