पंखा तेजी से घूम रहा है ,उतनी ही तेजी से रिया का मन सासुमाँ की कही बात के इर्दगिर्द घूम रहा है।

अन्तर्मन से सेवा करके भी किसी के स्वभाव में बदलाव नही लाया जा सकता क्या ? उद्विग मन का यह प्रश्न उसे रह रहकर अतीत की और खींच रहा है।

पापा की अचानक मृत्यु ने सबको हिला दिया था।
नन्ही 3 साल की पाखी ,12 साल की प्रेक्षा को अकेले छोड़ पवन और रिया दोनों तुरन्त गांव रवाना हो गए ।
गमगीन माँ सहित पूरे घर की जिम्मेदारी एक बहु के रूप में रिया ने बखूबी संभाल ली थी। तीसरे के बाद गहना वगैरह के बंटवारे को लेकर हुए झगड़े में तीनो बेटे माँ को अकेला छोड़ चल दिए ।
सासुमां के व्यवहार से कोई भी उनको अपने पास रखने को राजी नही था ।
अकेली माँ शायद गांव में ही रहेगी,अन्य रिश्तेदारों का भी ऐसा ही अनुमान था।
रिया ने जब कहा कि माँ अब अकेली कैसे रहेगी ,मैं अपने साथ दिल्ली ले जॉउंगी ,तो सब अचंभित थे।
ससुरजी के 12 दिन ठीक से सम्पन्न हो गये थे। माँ का कुछ दिन और गांव में रहने का मन था तो रिया 10-15 दिन और उनके साथ रुक गयी ।

दिल्ली आने पर रिया उनका पूरा ख्याल रखती ताकि पापा की कमी से वह आहत न हो।
किसी भी रिश्ते और छोड़ गए बेटों ने दुबारा कोई संपर्क नही रखा,इसलिए पवन भी माँ के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताता।

समय के साथ माँ का रंग बदलने लगा,अपना अच्छाई का चोला उतार वो असली स्वाभाव में आने लगी। अपनी चुगलियों द्वारा चारों बेटो और रिश्तो में कलह पैदा करने वाली माँ अब पति- पत्नी में गलतफहमियां डालने लगी ।
नादान बच्चो के मन में उनके मम्मी,पापा के प्रति शंकाएं भरती रहती। "मम्मा ,दादी आपके ,पापा के लिए ऐसे वैसे बोल रही थी,प्रेक्षा की बातें सुन ,रिया माँ को समझाती,
"आप क्यों नही अब अपनी आदते छोड़ देती।आप प्रेम से क्यों नही रहती। तीन बेटे चले गए,बचे हुए रिश्तों में क्यों कांटे बोकर जीना चाहती हैं, आप खुद खुश रहें और खुशियां बांटे।

रिया तब दंग रह गयी,जब प्रत्युतर में सासुमां हंसते हुए बोली,
"में यहाँ खुशियां लेने बाँटने नही,मैं तो तेरी छाती पर मुंग दलने आयी हूं,
अभी तो शुरुआत है,आगे आगे मेरे रंग देखती जाना ।"

भौचक्की सी रिया के गाल आंसुओं से भीग गये ।

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