कमला

कमलादी, उस ऑफिस की सबसे उम्रदराज महिला थी। अविवाहित , छोटे भाई बहनों को पालने पोसने में ही उनकी अपनी उम्र निकल गई थी। प्योर सिल्क की सुंदर साड़ियों में उनका लंबा , गोरा शरीर खिल उठता। पर अब उम्र ढलान पर थी। वे बढ़िया साड़ी पहनती और नीचे एड़ी के पास उनका दूसरे रंग का पेटीकोट दिखता । ब्लाउज़ भी शायद ही कभी मैचिंग होती । उनकी ब्लाउज़ के बटन शायद ही कभी पूरे होते। आलपीन लगाए रखतीं । सुंदर लंबी पर मैली हो गई सोने की चेन। उनके पूरे व्यक्तित्व में एक बेतरतीबी थी। कई बार लड़कियां चिढ़तीं दी, आप न सलवार समीज़ पहना करिए । आराम रहेगा। बहुत जिद पर उन्होने एक बार सलवार समीज सिलवाया भी पर वह भी उनसे नहीं संभला। इज़ारबंद नीचे लटका रहता। पुरुष सदस्य कभी कभी आपस में मुस्कुरा देते । लड़कियां चिढ़ उठतीं इस कमलादी के मारे तो इज्ज़त बचाना मुश्किल है।

विनीता चिढ़ाती –“दी, मुझे गोद ले लीजिये । रिटायर होने के बाद ये सुंदर साड़ियाँ, गहने मुझे दे जाईएगा।

एक बार कमलादी चार दिनों तक ऑफिस नहीं आई तो लोगों ने हल्ला उड़ा दिया कि उनकी शादी हो रही है। सच इस उम्र में शादी करेंगी क्या ? 40-45 की तो होंगी ही। अल्का ने कहा “अरे हाँ मैंने उन्हें साड़ियों की दुकान पर देखा तो था।” सबने मान लिया शायद शर्म से न बोल पायीं हों । अल्का ने कहा “वे लाल रंग की बनारसी साड़ी ले रहीं थीं। इस उम्र में लाल साड़ी पहनेंगी।”

“क्यों लाल रंग पर युवाओं का पेटेंट है क्या ?” विनीता ने कहा ।

वे आईं। थोड़ी सुस्त, थोड़ी थकी थकी सी । सब लंच होने का इंतज़ार कर रहे थे। सब जानना चाह रहे थे पर बात छेड़ने की हिम्मत किसी में न थी। वह दिन ऐसे ही निकल गया। दूसरे दिन कमलादी ने बताया छोटे भाई की शादी कर रही हूँ । बस यही बचा रह गया था। चार बहनों और एक भाई का परिवार था उनका । तीन बहनों की शादी हो गई, वे अपने अपने घर में हैं। अब इसकी भी हो रही है । चलो जिम्मेवारी खत्म । बहू जमशेदपुर की है । बहुत ही सुंदर । एक मौंटेसरी स्कूल में पढ़ाती है। वे बहुत उत्साह में थीं। उनहोने टिफ़िन खोला। दो रोटियाँ और रेडिमेड अचार बस । उनका टिफ़िन बहुत सादा रहता । बोलीं, “अब मौसूमी आ जाएगी तो अच्छा टिफ़िन लाऊँगी । अभी तो माँ बीमार रहती है कोई बनानेवाला नहीं।”

वैसे परिवार के हर विवाह के समय कमलादी को अपना विवाह न होना याद आ जाता था। वे अपने मन को तरह तरह से समझातीं । विनीता से वे जरा खुल गई थीं - देखो विनीता शादी करने से क्या फायदा, मेरी बहन ए ग्रेड नर्स है बहुत बढ़िया वेतन है उसका । उसका पति सिर्फ समाजसेवा करता है। मेरी बहन अणिमा नौकरी करती है और जब तब घर आए उसके बेकार दोस्तों के लिये नाशते खाने का प्रबंध करती है। मैं बहुत कुढ़ती हूँ उसे देखकर। उसके पैसों का भी हिसाब लेता है। बहन का ए टी एम बहनोई के पास रहता है। कम से कम मैं अपनी मालकिन तो हूँ। विनीता ने कहा –“हाँ दीदी सो तो है।”

कमलादी ने एक दिन कहा कि उन्हें लाल रंग की बनारसी साड़ी पहनने का बड़ा शौक है। उन्होने ली भी है पर संकोच वश नहीं पहनती । विनीता ने कहा “आप पहन लीजिये।”

“नहीं सब हँसेंगे, इतनी उम्र हो गई ।”

“क्यों हँसेंगे, आपकी मर्जी । किसी की परवाह मत कीजिये दी जो मन में हो खा पहन लीजिये। भाई के विवाह में पहन लीजिये ।”

“अच्छा देखूँगी ।” कमलादी ने कहा।

विनीता ने धीरे से कहा “दी, अगर आपको कोई अच्छा सा आदमी मिल जाए तो विवाह कर लीजिये, उम्र का मत सोचिए। एक साथी तो होगा।”

विनीता को उनसे बहुत सहानुभूति होती थी। विनीता स्वयं भी इस विभाग में वर्षभर पहले ही आई थी । स्वयं पिता की जगह पर अनुकंपा की नौकरी में । उसके पीछे भी दो भाई बहन थे। वह कभी कभी डरती हुई कमलादी में अपने भविष्य की छाया देखती। बड़ा संस्थान था वह । कई लोग उसके आगे पीछे करते पर विनीता को किसी पर विसवास न था। न कोई वैसा विशेष पसंद कि वह कोई निर्णय कर लेती। छोटी बहन का विवाह नहीं हुआ था सो परिवार से जाति में ही विवाह करने का दबाव भी था। उसकी माँ उन सारे रिशतेदारों से डरती थी, जो पिता के मरने के बाद कभी उनकी मदद को नहीं आए। वे खानदान की बदनामी से डरती थीं , खानदान, जो सिर्फ तमाशा देख रहा था कि वे इस दुर्दिन से कैसे बाहर आते हैं?

दिन कमलादी ऑफिस से निकलकर पास के बुक स्टॉल पर खड़ी थी। विनीता उनके पीछे गई । कमलादी ने उसे देखा तो किताब रखकर तेजी से दूसरी ओर चली गई। विनीता ने सोचा बेकार ही उसने आज शादी वाली बात छेड़ी, वे नाराज़ हो गईं हैं शायद। बुक स्टाल वाले अख्तर भाई इस जगह पर वर्षों से थे। सबका परिवार, हाल चाल वे जानते थे। कोई बात उनसे छिपी न थी । विनीता ने कहा “लगता है दी नाराज़ हैं मुझे देखकर चलीं गईं।”

अख्तर भाई ने कहा कि

“अरे नहीं, ऐसी बात नहीं ।”

वे उनकी छोड़ी हुई किताब उठाकर रखने लगे । विनीता ने देखा – “ स्त्री- पुरुष सम्बन्धों की कहानियाँ ” । वह अख्तर भाई के सामने अककचा सी गई । अख्तर भाई बोले,

“कमला बस ऐसी ही किताबें ले जाती है । बेचारी!”

विनीता को कमलादी के लिए बेचारी शब्द बहुत बुरा लगा।

5

उनके भाई की शादी में एक सामूहिक उपहार लेकर ऑफिस के सब लोग गए। धूम धाम से विवाह हुआ। भाई के विवाह के कुछ दिन बाद वे आईं । टिफ़िन टाइम में विनीता से संकोच से कहा “शादी के दिन पहनने के लिए मैंने लाल बनारसी खरीदा था , पर भाई को पसंद आ गई उसने कहा कि यह मौसूमी पर खूब अच्छी लगेगी । मैंने दे दी।” वे वैसा ही टिफ़िन लाती । दो सादी रोटियाँ। सब्जी रोज ही कैंटीन वाले से ले ली जातीं । कहती – “बेचारी मौसूमी क्या करे सुबह उठ नहीं पाती ।” कैंटीन वाला उनसे कई बार पैसे उधार ले चुका था। उसने कब क्या लौटाया, कब नहीं इन सबका हिसाब रखने का अभ्यास नहीं था कमलादी को। धीरे धीरे उनका पहनना ओढ़ना और साधारण होता चला गया । उनकी साड़ियाँ उनके एंटिक गहने सब मौसूमी को पसंद आने लगे।

कमलादी जब नौकरी में आईं उन दिनों बहुत कम ही लड़कियां नौकरी में थीं । अविवाहित नौकरीपेशा लड़की जैसे सबकी काल्पनिक प्रेयसी । हर कोई हाथ आजमाना चाहता। कोई निस्वार्थ भी मदद को हाथ आगे बढ़ाता तो उसके नाम के साथ ईर्ष्यालु जन कहानियाँ गढ़ने में तनिक देर न करते। विभाग के ही स्टाफ नरेश ने एक दिन टिफ़िन में कहा – “ऐसे वे एक बार शादी करती करती रह गईं थी।”

“अच्छा कब ?” मंडली ने आँखें फैलाई। “अरे वो जो रिफ़ंड सेक्शन के विसवास दा हैं न , उनसे प्रेम था इनका । खूब घूमते फिरते थे दोनों साथ में। जमाना देखे, तो देखे । फिर ? फिर एक दिन विसवास दा अपने गाँव गए और वहाँ से शादी कर लौटे। पगला गई थीं कमलादी ।”

“फिर ?”

“फिर क्या, उन्होने प्रेम और विवाह दोनों से तौबा कर ली। बहुत दिनों तक ड्यूटी पर नहीं आईं ।” बाद में सुपरवाइजर हिमांशु सर उनके घर गए। उन्हें बहुत समझाया –“जो धोखा देते हैं कमला , उन्हें मुंह छिपाना चाहिए, धोखा खाया व्यक्ति तो निर्दोष होता है। तुम क्यों घर बैठ गई हो। वह तुमसे प्रेम तो करता था पर तुम्हारी जिम्मेवारियाँ देख डर गया। ऐसे कायर आदमी का क्या भरोसा ? जो हुआ अच्छा हुआ। बाद में तुम्हें इन जिम्मेवारियों से अलग करना चाहता, तो तुम कुछ कर पातीं क्या? आत्मा मर जाती तुम्हारी । हमारे समाज का चलन ही उल्टा है । यहाँ धोखा देने वाला व्यक्ति ही शान से चलता है।” उनहोने ही बहुत तरह से उन्हें समझा बुझा के ऑफिस आने पर राजी किया। वे आने लगीं पर दिन दुनिया से एकदम असंपृक्त । अपने ऊपर भी उन्होने ध्यान देना बिलकुल छोड़ दिया। रमेशर पाड़े को जब खबर मिली कि हिमांशुजी के कहने पर वे ऑफिस आने को राजी हुईं हैं। तो वे बड़बड़ाने लगे ,

“ब्राह्मण की बेटी है कमला बनर्जी, ई ..... ओकर वेलविसर बनल है। रिजर्वेसन पाकर सुपरभाईजर बन गया तो क्या सब जगहिया एही आगे रहेगा । हमलोग मर गए हैं का? सुनते हैं कि ओकर घरे पर भी गया था।” दुहेजू रमेसर पाड़े दुबारा विवाह के लिए छटपटा रहे थे। दो बेटों और दो बेटियों के पिता, किसी भी तरह एक मादा जुटा लेना चाहते थे। उन्होने थोड़े दिन कूद फांद की, पर कमलादी की तरफ से कोई रिस्पोंश न मिलता देख आखिर पट पड़ गए। विनीता बोल पड़ी “पड़ेवा को शर्म नहीं । उसके बेटे की अब ब्याह की उम्र हो रही है। अब भी लड़कियों को घूर घूर कर देखने की आदत है। मैं तो उसे देखते ही किनारे से निकल जाती हूँ। प्रणाम भी नहीं करती।” नरेश ने कहा “अरे वह एकबार लेडीज केस में मार भी खा चुका है।”

विनीता बोली “रिटायर होने के पहले फिर एकबार मार खाएगा, तोंदियल, गंजू कहीं का ।”

एक दिन विनीता ने विवाह कर लिया। ऑफिस में किसी को खबर नहीं थी । छुट्टी लेकर गई और विवाह कर लौटी । कमलादी ने उसे सबसे पहले देखा – नवविवाहिता के रूप में रंगीन साड़ी और भर हाथ चूड़ियाँ। मेहँदी अभी छूटी न थी। वह उन्हें देख पाँव छूने को झुकी, कमलादी के मुंह से आशीर्वाद न निकला । वे बोलीं “अरे , तुम तो बहुत चालाक निकलीं , शादी कर ली, तुम्हारी जिम्मेवारियां.....? ” विनीता को बहुत दुख हुआ पर उनकी कुंठा वह समझती थी । बोली “हाँ दी, जल्दी में ठीक हो गया, बता नहीं पाई ।” कहकर आगे बढ़ गई। सब अपनी अपनी दुनिया में व्यसत थे। हर दशहरे में कमला दी अपने बहन भाई के बच्चों के लिए बहुत कपड़े लत्ते खरीदती थी । उनकी माँ अब बहुत बीमार रहने लगीं थीं । बिस्तर पर थीं। सारे क्रिया कर्म बिस्तर पर ही होते थे। वे सोचती थीं माँ की बहुत सेवा करता है भाई। वे बुढ़ापे में किसके सहारे रहेंगी। बेटे से सेवा करवा लेना आसान है पर भाई से! पता नहीं कैसे गुजरेगा उनका बुढ़ापा। उनके सारे गहने मौसूमी के नाम लिए लॉकरों में पहुँच चुके थे। बहनों को चाहे भी तो कुछ नहीं दे सकती थीं । घर की सुख सुविधाओं के लिए तरह तरह के लोन लिए गए थे। उनकी पूरी तनखवाह लोन की ईएमआई चुकाने में जाती थी। वे पछताती थीं कभी कभी । जाने किसपर । जाने क्यों... ?

उनके रिटायर होने का वक़्त आ रहा था। अपनी बची छुट्टियाँ उनहोने ले रखी थीं। एक दिन बाज़ार से लौटते हुए उन्हें विनीता ने देखा । वे ऑटो पर थीं । उनके खरीदे कार पर भतीजा स्कूल जाता था। ऑटो जल्दी से निकल गया । विनीता को अफसोस हुआ सड़क पर मिलती तो जरा हाल चाल पूछ लेती। वो मोड़ पर मुड़ी तभी किसी ने उसे पीछे से पुकारा – “विनीता”। देखा, कमलादी ने भी उसे देख लिया था । वे जल्दी जल्दी उसकी ओर आ रहीं थीं। विनीता रुक गई। कमलादी नजदीक आईं । “सोन रे विनीता, मोनेर कोथा तो तोमाकई बोली । तोमार थिके एकटा काज छिलो। तुई आमा र जोन्ने एक टा वोर (वर) खुजे दिबी ?” ( सुनो विनीता, मन की बात तुमसे ही तो करती हूँ । तुमसे एक काम है । क्या तुम मेरे लिए एक वर खोज दोगी?)

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