उसकी मुस्कानें

ना जाने क्या बात है उसमें..जानता हूँ वो मेरी नहीं है,न कभी हो सकती है..फ़िर भी उसके एहसास में खो जाता हूँ ! वो आसपास होती है तो लगता है दुनिया इतनी भी बुरी नहीं...! भूल जाता हूँ पिताजी का चिड़चिड़ापन.,माँ की चिंता से भरी आँखें..दीदी की दरवाज़े पर अटकी निगाह और घर-बाहर की न जाने कितनी कमियाँ सिर्फ़ कुछ देर उसे देखने से.. उसकी बातें सुनता हूँ बिना कुछ बोले देर तक, तो वो बिगड़कर कहती है- "जय, यू आर नॉट गुड ! तुम मेरी बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते..!" और भी बहुत कुछ बड़बड़ाने लगती है और मैं मुस्कुरा देता हूँ.. पगली ये नहीं जानती कि मैं उसी की बातें तो सबसे ज़्यादा ध्यान देकर सुनता हूँ..!

जब माँ बाज़ार चलने को कहती हैं, चुपचाप थैला उठाकर साथ चल देता हूँ. हमारे मुहल्ले के दूसरी ओर डिफेंस कॉलोनी का सबसे ऊँचा बँगला है उसका.. दूर से उसकी छत पर बैठे पंछियों को देखता हूँ..ऐसे ही न जाने कितने उसके आसपास मँडराते रहते हैं..वो सबसे कितना घुल मिलकर बात करती है..! उसकी हँसी..उसकी बातें..उसका बचपना आँखों में मस्त बदली जैसे घुमड़ जाता है ! मैं फ़िर दूर कहीं खो जाता हूँ..माँ टोकती हैं तो मुस्कुरा देता हूँ..! जब माँ किसी काम के बारे में बात कर रही होती हैं तो उन बातों में भी कहीं ना कहीं उसकी ज़िक्र के तार आ जुड़ते हैं..मुझे कहीं और खोया देखकर माँ ज़रा नाराज़ होकर कहती हैं -"तेरा ध्यान जाने कहाँ रहता है.." मैं फ़िर चुपके से मुस्कुरा देता हूँ !

पिताजी जब शराब के नशे में चूर,गालियाँ बकते हुए देर रात घर में दाखिल होते हैं.,अक्सर सीढ़ियों पर लड़खड़ा जाते हैं. मैं किताबें खुली छोड़ उन्हें सम्हालने दौड़ पड़ता हूँ..उनके बिखरे व्यक्तित्व को समेटकर उन्हें उनके बिस्तर तक पहुँचाता हूँ..उनके मिट्टी सने जूते उतारकर रखता हूँ..चादर उढाता हूँ और उनकी मच्छरदानी लगाकर सिरहाने पानी का जग रखता हूँ ,उस वक्त उस शराब की तीखी दुर्गन्ध और पिताजी की बोझिल हो चुकी आवाज़ से रिसते अपशब्दों के बीच भी, मुझे वो याद आ जाती है..मैं सोचता हूँ कि उसने तो ऐसे शब्द जीवन में सुने तक न होंगे..उसके जन्मदिन पर उसके डैडी शहर के सबसे प्रतिष्ठित लोगों के बीच शैम्पेन की झाग उगलती बोतल लहराते हैं ..वहाँ खुशबुओं के मीठे बवंडर उठा करते हैं..इस दुर्गन्ध में तो उसे गश ही आ जाये..! अगर कभी ऐसा हो.,और मैं जल्दी से उसे अपनी बाहों में समेट लूँ....क्या-क्या सोचता रहता हूँ..! और इसी बात पर फ़िर मुस्कुरा देता हूँ !

जीजा जी इस महीने भी दीदी को लेने नहीं आये. दीदी छुप-छुपके रोती हैं..शायद जीजा जी का किसी और के साथ....! पर उन्होंने तो खुद दीदी को चुना था, और दीदी ने उन्हें..दीदी कितनी खुश थीं..जाने कैसे, लेकिन हमारी हैसियत से कहीं आगे जाकर माँ-पिताजी ने दीदी की शादी के इंतज़ाम किये थे..मैंने संकोच के कारण उसे नहीं बुलाया था फ़िर भी वो ज़ोया और ज़ुबिन के साथ आई थी और निमंत्रण न देने के लिये मुझे डाँट भी लगाई थी-" यू आर रीअली नॉट गुड..मुझे इनविटेशन नहीं दिया जय के बच्चे ! मैं खुद आ गई, सोचा तुम्हें टाइम नहीं मिला होगा..चलो अब जल्दी से मुझे गुलाबजामुन खिलाओ वरना माफ़ नहीं करूँगी.!" और मैं उसे गुलाबजामुन देकर और माफ़ी माँगकर मुड़ा ही था कि उसने मुझे रोक लिया.,मेरे पास आई और अपना जूठा गुलाबजामुन मुस्कुराकर मेरे होंठों से लगा दिया....! मैं जबतक सँभल पाता वो अपना गुलाबी दुपट्टा लहराते हुए चली गई..! जब भी दीदी की शादी से जुड़ी कोई चीज़ देखता हूँ.,या गुलाबजामुन.,.वो याद आ जाती है ...और मुस्कुरा देता हूँ.!

हर रात मैं उसकी मुँदी आँखें महसूसता हूँ..हर सुबह उसके सपनों से अँगड़ाई लेकर जागता हूँ..!

वक़्त-बेवक़्त उसकी मुस्कानें मुझपर छा जाती हैं.

वो धीरे-धीरे गुनगुनाती है- "कभी-कभी मेरे दिल में
खयाल आता है...
कि जैसे तू मुझे चाहेगी
उम्रभर यूँ ही...!
उठेगी मेरी तरफ़
प्यार की नज़र यूँ ही......."
-और आगे का गीत अधूरा छोड़कर चुप हो जाती है..!
.
मेरे दिल में कहीं उसकी आवाज़ के मीठे सुर बस जाते हैं. जैसे कोई बोल उठता है वो बातें, जो मैं कभी उससे नहीं कह सकता.!

क्योंकि "मैं जानता हूँ कि तू ग़ैर है..
मगर यूँ ही.....,
कभी-कभी मेरे दिल में
खयाल आता है...."
-मन ही मन उसका गीत पूरा करता हूँ और धीरे से मुस्कुरा देता हूँ !


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