अधूरे सपने

रे मस्टरवा! हरामखोर मतिमंद कहीं का, अभी तक खटिया तोड़ रहा है? इन शब्दों के साथ ठंढे पानी की छुअन से मास्टर की आँखें खुली। यह वो तेरह साल का किशोर था जिसकी दुनिया छोटी सी चाय दुकान तक सीमित थी। उनींदी सी आँखों से उसने आसपास का अवलोकन किया। सर्वप्रथम गुस्से से लाल आँखों और क्रोध से पीसी दातों ने जो उसके मालिक रामाधीन की थी, ने उसका स्वागत किया। शायद इस प्रकार का प्रभात उसकी रोजमर्रा की नियति बन चुकी थी। वह उठा और लड़खड़ाते हुए कदमों के साथ कोयले की ढेर के पास पहुंचा और हथौड़े से कोयले पर दंड पेलने लगा मानो वह अपनी थकान को समेट रहा हो। जल्दी ही चूल्हा तैयार कर दूध वाले का दूध नापने लगा। दूध वाले ने कहा – क्या मास्टर, एतना तेजी मे दूध काहे नापते हो? मास्टर खामोशी से अपना काम करता रहा एकाएक धीमे-से कठोर लहजे मे बोला-तीन पाव कम है। मसूढ़े दिखाते हुए दूध वाला बोला–अरे एक कप चाय कम पिलाना। मास्टर उठा और रामाधीन से बोला –तीन पाव कम दिया है, पैसा कटेगा।


दुकान पर ग्राहकों की भीड़ जुटने लगी, मास्टर के हाथ यंत्रवत चल रहे थे चाय बनाने से लेकर पहुँचाने तक, गिलास धोने से लेकर पानी और बिस्कुट देने तक सारे कार्य यंत्रवत हो रहा था। दूध वाला अपने पैसे के इंतजार मे खड़ा रहकर मास्टर की चिरौरी कर रहा था। तीन पाव दूध के कम पैसे पाकर मास्टर को देखलेने की धमकी देकर वह विदा हुआ। दिन के नौ बज चुके थे बस स्टैंड के पास की वह चाय दुकान ग्राहकों से गुलजार थी। इसी बीच एक DJ वैन “जब लगावे लू तू लिपिस्टिक” गाना बजाते हुए गुजरा। इस गाने ने तो मानो मास्टर के दिलोदिमाग को तारोताज़ा कर दिया। उसका चेहरा खिल उठा और उसके हाथ दुगनी तेज़ी से चलने लगे।

बस अड्डा होने के कारण वैसे वहाँ के अधिकांश ग्राहक नए ही होते थे परंतु कुछ ग्राहक नियमित रूप से चाय पीने और अखबार पढ़ने वहाँ आया करते थे जिसमे पाण्डेय जी प्रमुख थे। पता नहीं पाण्डेय जी से कैसी आत्मीयता थी मास्टर की

कि उनके आते ही सबसे पहले वह कपड़े से उस गंदी-सी बेंच को साफ करता और हाथ जोड़ कर प्रणाम करता। मास्टर रामाधीन के लिए कोल्हू का बैल था। दुकान से लेकर घरेलू जीतने भी कार्य होते थे चुन-चुन कर उसे करवा लेना रामाधीन की प्राथमिकता थी। एक दिन यूँ ही पाण्डेय जी ने मास्टर से पूछा - क्या मास्टर तुम्हारा नाम तो बड़ा बढ़िया है? मास्टर ने झेंपते हुए कहा धत्त, असली थोड़े ही है? पाण्डेय जी ने फिर पूछा – अच्छा एक बात बताओ, शादी करोगे? शर्म की लकीर मास्टर के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रही थी। उसने कहा शादी करने से क्या फायदा? पाण्डेय जी ने मुस्कुराते हुए कहा - बीबी होगी बच्चे होंगे। तपाक से मास्टर ने जबाब दिया – और बड़े होकर गिलास धोएंगे, लात खाएँगे। उसकी अंतर्वेदना को पाण्डेय जी ने परख लिया। दोपहर मे दुकान मे ग्राहक कम ही होते थे। पाण्डेय जी पुनः वहाँ पहुंचे, धीरे से उन्होने पूछा- मास्टर कुछ खाया? मास्टर ने नहीं मे सर हिलाया। भौंचक्के से रह गए पाण्डेय जी,घड़ी देख कर कहा – अरे दो बज गए! अब तक भूखे हो? मास्टर ने कहा- मालिक खाना लेकर आते ही होंगे। पाण्डेय जी ने उसे दस रुपए का नोट देते हुए कहा जाओ जाकर खा लो कुछ, मर ही जाओगे गदहे। मास्टर ने जबाब दिया इतनी आसानी से नहीं पाण्डेय जी अभी बहुत कुछ करना है जीवन मे। पाण्डेय जी अवाक रह गए,एक संवेदनहीन किशोर की ऐसी जिगीषा! पाण्डेय जी ने उसे अपने बगल मे बैठाया और पूछा-

तुम्हारा घर भी है?

हाँ है न

कहाँ है?

दरभंगा

कभी जाते हो?

हाँ गया था पिछली बार होली में

घर मे कौन कौन हैं?

पप्पा है, मैया है और तीन ठो भाई है

क्या नाम है तुम्हारे भाइयों का?

लखन, भरत और शत्रुघ्न

और तुम्हारा मास्टर यही ना?

नहीं मेरा नाम राजाराम है

फिर सब तुम्हें मास्टर क्यों बुलाते हैं? पाण्डेय जी ने पूछा। मुझे नहीं पता लेकिन कोई बता रहा था कि मास्टर माने मालिक होता है सही है ना? हाँ बिलकुल सही है –पाण्डेय जी ने कहा। लेकिन तुम तो नौकर हो? थकी हुई मुस्कुराहट चेहरे पे लाकर राजाराम बोला घर का मालिक तो मैं ही हूँ न? यहाँ से जो पैसे मिलते हैं उसी से तो मेरा घर चलता है, जब मेरे भाई बड़े हो जाएंगे पढ़-लिख जाएँगे तब तो मालिक बनूँगा। वह उठा और वापस अपने काम मे तल्लीन हो गया। पाण्डेय जी निर्निमेष राजाराम को देख रहे थे और मन ही मन विचार कर रहे थे कि इस कलियुग मे आज भी राजाराम हैं। श्रीराम का वनवास चौदह वर्षों की अवधि पर समाप्त हुआ लेकिन इस राम का वनवास अनिश्चितकालीन है। श्रीराम को वनवास कि अवधि मे भी उनके कुल से जाना जाता था लेकिन यह राम अनाम है,गुमनाम है। रामाधीन के अधीन ये नन्हें राम कब अयोध्या लौटेंगे यह बड़ा यक्ष प्रश्न है। आमतौर पर होटलों और ढाबों मे काम करने वाले छोटू घर के बड़े होते हैं, ज़िम्मेदारी नामक चुड़ैल उनका रक्तपान करती है। उन्होने परिवार के लिए क्या किया समाज इससे प्रेरणा नहीं लेता। पाण्डेय जी इन्हीं भावों मे खोये थे कि रामधीन ने कहा – बाबा चाय ठंडी हो गई है, अरे मस्टरवा बाबा को दूसरी चाय दो। पाण्डेय जी ने कहा इसकी आवश्यकता नहीं है रामधीन। पर एक बात कहना चाहता हूँ यह रामधीन नाम तुम्हारे लिए संगतयुक्त है। ना जाने क्यों आज मास्टर के प्रति पाण्डेय जी के हृदय मे आगाध श्रद्धा एवं आदर उमड़ रहा था। बुदबुदाते हुए उन्होने कहा मास्टर तुम सचमुच के मास्टर हो। हे राम! तुम्हारी जय हो।


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