द हीरो

जि़ला पंचायत में आज नए मुख्य कार्यपालक अधिकारी आ रहे हैं।

दफ़्तर के सभी कर्मचारी नए साहब के स्वागत में प्रस्तुत, कार्यालय के बाहर परिसर में खड़े हैं। हाथों में गेंदे के फूलों की मालायें हैं और चेहरों पर मातहती विनम्रतायें। साहब के आने से पहले उनका नाम यहाँ आ पहुँचा है -देवराज सिंह! जैसा कि नाम है सम्पन्न-सा, सुना है दिल्ली में पले-पढ़े हैं। बड़े बाप के बेटे हैं। नौकरी में कुल जमा ढाई-तीन साल हुये हैं और पिछले दफ़्तर में चार कर्मचारियों को सस्पेंड किया है। चपरासी को तो सुना, सिर्फ़ इसलिए सस्पेंड कर दिया था क्योंकि ड्यूटी पर उसकी झपकी लग गई थी ...सो यहाँ का स्टाॅफ अपनी नौकरियों की सलामतियों के ख़्याल के साथ सर्तक खड़ा है। ‘‘एक नौकरी में एक परिवार पलता है, बड़े साहब लोग कहाँ ये सब जानते हैं!’’ चपरासी रामचरित ने क्लर्क मनोहर से कहा। वो पुराने दफ़्तर के अनजाने चपरासी के बारे में सुनकर देर से उदास है। उसके तीन बच्चे हैं और वो दफ़्तर के बाद घंटों बीडि़याँ बनाने का काम करता है। थकान की एक हल्की ख़ुमारी हर वक़्त उसकी आँखों में झिलमिलाती है और आज वो याद कर रहा है इस महीने ड्यूटी पर कितनी बार उसका मन सो जाने को हुआ है। यकींनन वो डरा हुआ है। डरे हुये तो बाक़ी सब भी हैं और यहाँ खड़ा हर कर्मचारी अपने कामों-कत्र्तव्यों में बिल्कुल नए सिरे से दक्ष हो जाना तय कर रहा है। बहरहाल, साहब की जीप परिसर मंे आती दिखी; कई दिल एक साथ धड़के। जीप रुकी और अपने नाम-से प्रभावषाली साहब ने जि़ला पंचायत कार्यालय की ज़मीन पर पहला क़दम जमाया -ऊँचा कद, कसा षरीर, गोरा शहरी चेहरा और चेहरे पर सिंह जैसा भाव। कर्मचारियों ने सलाम ठोकने वाले अदबो-अंदाज़ में एक-एक कर अभिवादन किया, फूलमालायें पहनायीं और रामचरित ने तो आगे बढ़कर पैर छू लिये; इस नौकरी में उसका बड़ा परिवार पलता है। ‘‘ये सब तो ठीक है।’’ औपचारिक परिचय के बाद साहब ने बोलना षुरू किया और उन्नीस-बीस जोड़ी आँखें और उन्नीस-बीस दिल अपने नए सामंत के दरबार में बाअदब हो गए। ‘‘एक बात मैं क्लियर कर देना चाहता हूँ, लापरवाही... अनुशासनहीनता...’’ वे पंक्तिबद्ध एक-एक कर्मचारी के चेहरे पर नज़र डालते हुये टहलने लगे। दृश्य कुछ ऐसा था जैसे शिक्षक के सामने कुसूरवार छात्र परेड की मुद्रा में खड़े हों। ’’चुगलखोरी... भ्रष्टाचार... और राजनीति... ये सब मुझे अपने आॅफि़स में हर्गिज़ नहीं चाहिये।’’ उत्तर में अनुमोदन के सब मस्तक ऐसे हिले जैसे बुज़्ाुर्ग कि़स्सागो की कहानी के बीच-बीच में नन्हे बच्चे हामियाँ भर रहे हों। ‘‘वैसे तो आप लोगों ने मेरे बारे में सुन ही लिया होगा और अगर नहीं सुना है तो...’’ अधिकारियों वाले लहजे़ में अधिकारी मुस्कुराया, ‘‘...अब तो हमें साथ ही काम करना है।’’ स्टेनो शिल्पा ने गले में पड़ा दुपट्टा नीचे को खींच लिया। चपरासी रामचरित ने अपने सिर की टोपी छूकर उसके होने पर यक़ीन किया। बड़े बाबू ने जेब से रूमाल निकालकर सूखे होंठ पोंछे। कम्प्यूटर आॅपरेटर मुरारी ने अपनी मुद्रा ‘सावधान’ की बना ली और क्लर्क मनोहर ने ज़ेब का सेलफ़ोन स्विच आॅफ कर दिया। ‘‘ये समय आॅफि़स का है और हम सब को आॅफि़स में होना चाहिये; एम आई राइट?’’ आगे बढ़ गये युवा अधिकारी की तेज़ चाल से हमक़दम होने के लिये स्टाॅफ को लगभग दौड़ना पड़ा। टेबिल पर पहुँचते ही साहब ने फ़ाइलें पलटना शुरू कर दिया। एक फ़ाइल पर हाथ रुका, फिर देर तक रुका रहा। सहसा घंटी बजी। स्टाॅफ़ के दिल धड़के, प्यून दौड़ा, क्लर्क मनोहर को तलब किया गया है। पहला हुक्म: पहली तामील ? ‘‘मनोहर, ये जनपद पंचायत भांडेर की फ़ाइल है, माध्यमिक और प्राथमिक स्कूलों के मध्याह्न भोजन बजट का कुल ब्यौरा है इसमें।’’ ‘‘जी सर।’’ ‘‘हमारे कार्यालय से स्कूलों को सौ प्रतिशत उपस्थिति के आधार पर बजट राशि जारी की जाती रही है आज तक।’’ ‘‘जी ।’’ ‘‘हूँऽह!’’ -अधिकारी के माथे पर बल था -‘‘लेकिन अटेंडेंस तो औसतन सत्तर प्रतिशत के आसपास है; लगभग सभी की!’’ ‘‘जी।’’ ‘‘अच्छा! जोशी जी को भेजिये। मैं आपको बाद में बुलाता हूँ।’’ ‘‘लेकिन सर! छोटे सर तो मेडीकल लीव पर हैं।’’ ‘‘अच्छा! ठीक है, एक आदेश तैयार करवाकर लाइये कि स्कूलों को जारी बजट राशि सौ प्रतिशत से घटाकर सत्तर प्रतिशत की जाती है। आदेश से, मुख्य कार्यपालक अधिकारी, जि़ला पंचायत; और मुझसे साइन करवाने के बाद ये आदेश जारी कर दीजिये।’’ ‘‘नहीं सर!’’ मनोहर के मुँह से ऊँची आवाज़ निकल गई।

आला साहब ने फ़ाइल से सिर उठाकर उसकी ओर देखा। एकबारगी तो उसकी पिंडलियों का लहू काँप गया फिर सूखे होठों पर ज़्ाुबान फेरता वो दुबला-नाटा-काला क्लर्क बोला,

‘‘सर, इस इलाक़े के गाँव ग़रीब हैं। सालों से अकाल का डेरा रहा है; फिर बुन्देलखण्ड में उपजता ही क्या है! ...जब से स्कूलों में दिन का खाना शुरू हुआ है, ऐसे कितने ही बच्चे जी गये हैं जो भूख से मर सकते थे।’’ ‘‘मुझे आपसे योजना की तारीफ़ नहीं सुननी है; आदेश का पालन कीजिये!’’ ‘‘मैं बस इतना निवेदन कर रहा हूँ सर कि...’’ वो कहते-कहते रुक गया जैसे अपना अंजाम सोच रहा हो। खिड़की के बाहर तेज़ धूप में एक व्यथित टिटही रह-रहकर चीख रही थी। ‘‘अपनी बात पूरी कीजिये।’’

‘‘सर, कोई भी डिसीज़न लेने से पहले प्लीज़, आप एक बार स्कूलों की विजि़ट...!’’ ‘‘ओ आई सी! तो अब आप मुझे सिखायेंगे कि निर्णय कैसे लिये जाते हैं!’’ आला साहब ने अपनी कुलीन उँगलियाँ एक-दूसरे में फँसाते हुये कहा।

मनोहर चुप रह गया।

‘‘तो आप ये कहना चाहते हैं कि सत्तर प्रतिशत की अटेंडेंस पर सौ प्रतिशत बजट देना उचित है! बचा हुआ तीस परसेंट भ्रष्ट स्वसहायता समूहों को ऐश करने के लिये देते रहें? ’’

‘‘कहाँ का भ्रष्टाचार सर?’’ - क्लर्क की आँखें अपने सबसे ऊँचे अधिकारी की आँखों में थीं, - ‘‘माध्यमिक स्कूलों को प्रति छात्र चार रुपये दिए जाते हैं जबकि प्राथमिक के बच्चों को तो ढाई रुपये ही प्रति देती है सरकार। आप ही सोचिये, ढाई रुपये में एक बच्चे का पेट कैसे भर सकता है? कुल सौ प्रतिशत बजट भी सत्तर परसेंट अटेंडेंस के लिये कम पड़ता है। कितने स्वसहायता समूह, शिक्षक-पालक संघ के लोग और हेडमास्टर हमारे दफ़्तर में कम बजट की शिकायतें लेकर आते रहते हैं। जब से ये योजना हमारे जि़ले में आई है, मैं ही इसकी फ़ाइल पूरी करता रहा हूँ। ...बजट घटाना बच्चों के मुँह से निवाले छीनने जैसा निर्णय है सर। मेरा निवेदन है आपसे, प्लीज़ ऐसा आदेश मत दीजिये सर! ग़्ारीब बच्चों की भूख आपने देखी नहीं है!’’

‘‘और आपने देखी है?’’ अधिकारी की आँखों में सुर्ख डोरे उतरने लगे।

‘‘जी सर, मैंने देखी है!’’ उसने सिर झुकाते हुये कहा। एक क्लर्क धड़कते दिल, काँपती टाँगों और पहाड़-सी दृढ़ता के साथ अपने आई.ए.एस. रैंक अधिकारी के सामने था। ...कमज़ोरों के हक में खड़ा एक कमज़ोर!

‘‘तो आप ये कह रहे हैं कि मेरा डिसीज़न ग़लत है!’’ ‘‘मैं बस इतना निवेदन कर रहा हूँ कि जिस डिसीज़न से सैंकड़ों बच्चों की भूख जुड़ी है उसे लेने से पहले कम-से-कम एक विजि़ट उन स्कूलों की...!’’

‘‘बस!’’ अधिकारी साहब खड़े हो गये; मनोहर को अपना परिवार याद आने लगा।

‘‘अब या तो आप अपने बर्ताव के लिए माफी माँगिये और ये आदेश तैयार करवाकर लाइये या...!’’ एक पल का मारक मौन साधा अधिकारी साहब ने; मनोहर का दिल बेतरह धड़क रहा था। ‘‘हम कल बात करेंगे।’’ ‘‘सर वो...!’’ ‘‘अब आप जा सकते हैं।’’

केबिन से बाहर निकला तो मनोहर के चेहरे पर सनाका था। परवश -सा यंत्रचलित अपनी सीट पर आ बैठा। शिल्पा, बड़े बाबू, मुरारी और रामचरित: सबकी आँखों में प्रश्नों के इन्द्रधनुष उतर आये,

‘‘क्यों बुलाया था बड़े साहब ने?’’ ‘‘क्या कह रहे थे?’’ ‘‘चेहरा क्यों उतरा हुआ है ; साहब ने डाँटा क्या?’’ ‘‘कैसा मिजाज़ है सर का?’’

हर सवाल का उसने ऐसा जवाब दिया कि जवाबों में दरअसल कुछ नहीं मिला सवालों को। मनोहर क्या जानता नहीं, सहकर्मी मित्र नहीं होते! कभी-कभी वो अपार अविश्वास से सोचता है कि दिनों-महीनों-सालों एक ही दफ़्तर में काम करते लोग सहकर्मी-प्रतिस्पर्धी-आलोचक ...शत्रु तक बने रहते हैं; बस, मित्र नहीं हो पाते! एक बार आॅपरेटर मुरारी तीन रोज़ आधा-आधा घण्टा लेट आया तो बड़े बाबू ने उसकी रिर्पोट डाल दी। वेतन कटी बेचारे की जबकि उसने मौखिक अनुमति तो ले ही रखी थी। उसकी बीवी को बच्चा हुआ था और अस्पताल, घर, दफ़्तर के बीच अकेला, परेशान मुरारी उन दिनों खाने के डिब्बे के बिना आता था। यहाँ सब एक-दूसरे के लिये आस्तीनों में विषधर छुपाये रखते हैं। इसी मुरारी ने स्टेनो शिल्पा की शिकायत कर दी थी कि वो देर-देर तक सेलफ़ोन पर बातें करती रहती है; यद्यपि काम में शिल्पा का हाथ कोई नहीं पकड़ सकता। आॅफि़स की सबसे मेहनती कर्मचारी को पूरे स्टाॅफ के सामने छोटे सर ने डाँटने के लहजे में बातें सुनाई थीं; पर अपनी बारी पर जिस शिल्पा की आँखों से टप-टप मोती झड़ रहे थे, वही शिल्पा चपरासी रामचरित की उस ज़रा भूल को लेकर सीधी बड़े साहब के पास पहुँच गई थी कि वो पूर्व दिवस में आॅफि़स का एक पंखा चालू छोड़ गया था। रामचरित कह भी नहीं पाया कि उस दिन दफ़्तर बंद करते वक़्त बिजली गुल थी ...और बड़े साहब ने जो फटकारा था उसे; केबिन के बाहर तक आवाज़ आ रही थी। पूरे दो दिनों तक उसने न खैनी-दर-खैनी खाई, न चाय-पे-चाय पी; लेकिन यही रामचरित कभी छोटे साहब, कभी बड़े साहब तो कभी दूसरी तरफ़ बैठने वाले स्टाॅफ़ के पास बैठा-खड़ा बतियाता रहता है कि फलां ने ये कहा-वो किया! ...तो भी मनोहर को ये वाला दफ़्तर उस दफ़्तर से बेहतर लगता है जहाँ वो दो साल पहले तैनात था। वहाँ छोटे साहब-बड़े साहब की राजनीति में निरीह मातहत ऐसे इस्तेमाल किये जाते थे कि मनोहर को दुष्यन्त कुमार की पंक्तियाँ रह-रहकर याद आतीं,

तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिये, छोटी-छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं।

कईयों की तरह मनोहर का तबादला भी सिर्फ़ इसलिये किया गया क्योंकि वो रिटायर होने जा रहे बड़े साहब और ऊँची पहुँच वाले छोटे साहब के बीच बैटल बन चुके दफ़्तर में न इस ओर आ पाया, न उस तरफ़ जा पाया; और बावजूद इसके कि उसका दिल बड़े साहब को पसन्द करता था, उन्हीं ने उसे बाहर कर दिया।

‘‘अब बता भी दीजिये मनोहर जी, क्या हुआ सर के केबिन में?’’

चंट सुन्दरी शिल्पा की मीठी मनुहार भी जब उसने टाल दी, सहकर्मियों के उमड़ते दिलों में ठंडा अफसोस उतर गया; एक मनोरंजक किस्सा हाथ लगते-लगते रह गया। उस पूरा दिन मनोहर का दिल रह-रहकर बोलता रहा। दो टुकड़ों में बँटा मनोहर आमने-सामने था। जब भी सर के केबिन से घंटी की आवाज़ आती और रामचरित काम लेकर इधर-उधर दौड़ नहीं जाता, उसे लगता, हो-न-हो वही तलब हुआ है। दिल की दीवारों के पीछे एक मनोहर काँप रहा था और दूसरा-बिल्कुल ही नया मनोहर- बरगद-सा विराट, दृढ़ और शांत था।

‘‘क्या ज़रूरत थी साहब से इतनी बातें करने की? भूल गये, घोड़े की पिछाई और अफ़सर की अगाई कभी नहीं करनी चाहिये। अब जो लात पड़ेगी तेरी नौकरी पर...!’’ कमज़ोर मन गिनाने लगा: झंग बूढ़े माँ-बाऊजी की दवाईयाँ, ...सोनू-मोनू के स्कूल की फ़ीस, ...रुपये-रुपये का सामंजस्य बैठाती रेवती, ...रोज़ की तरकारी, गेहूँ, तेल! गीली आँखो से कमज़ोर मन चुप हो गया। अब ज़हन में दिल के दूसरे हिस्से की आवाज़ बुलंद थी,

‘‘धिक्कार है ऐसी जि़न्दगी पर; पूरी उमर साली, अपना पेट भरने की फिकर में ही बीत जाये अगर तो जानवर-इंसान में फ़र्क क्या? अगर तेरे बीच में पड़ जाने से सैंकड़ों बच्चों को भरपेट खाना मिलता रह सकता है तो पीछे मत हट मनोहर! जीवन में और कितना अन्याय देखोगे-सहोगे? दिल उसे चित्रशाला में ले गया: -राशन की दुकान से मिलता घटिया अनाज, मिलावटी तेल! -टूटे नाले, उखड़ी सड़क, आवारा जानवरों और कूड़े-करकट से गंधाती उसकी बस्ती! -अफ़सरों का ज़रा-ज़रा बातों पर अपमानित करता-सा बर्ताव!

मन मसोसता बच्चा मनोहर! ...मन मसोसता तरुण मनोहर! ...मन मसोसता युवा मनोहर! ...मन मसोसता प्रौढ़ मनोहर ??

‘‘नहीं!’’ उसके मुँह से निकल गया। सहकर्मी अपने कामों के बीच उसे देखने लगे और किसी ने ध्यान दिया, उसका चेहरा कभी बुझा-बुझा-सा हो जा रहा है, कभी दीये की लौ-सा दिपदिपाता। अपने में वो गहरा डूबा दिख रहा था और अंततः किसी ने कहा, ‘‘आज घर नहीं जाना है क्या? उठिये, दफ़्तर की छुट्टी हो चुकी है।’’ ‘‘हाँआँ!’’ वो चौंका और बाहर निकल आया।

सिटी बस से घर लौटते मनोहर ने बोझिल पलकें मूँद लीं और खिड़की से सिर टिका लिया। दिन भर की तपी हवा अब ठंडा रही थी। बहती हवा के स्पर्श में हल्का सुकून था। मनोहर को याद आया, आज उसने लंच नहीं किया; पेट में भूख महसूस होने लगी थी ; आग जैसी भूख! सहसा उसने सोचा उन भूखे बच्चों के बारे में जिन्हें दिन भर स्कूल के मिड डे मील की प्रतीक्षा रहती है। उसके घर के पास ऐसा एक सरकारी स्कूल है और उसने देखे हैं भोजन की कतार में खड़े बच्चे; आतुरता, प्रतीक्षा और भूख में जिनका अंग-अंग थिरकता-सा है और जब वे खाना खाते हैं चेहरों पर परमआनंद का ऐसा भाव होता जैसे नन्हे कृष्ण माखन खा रहे हों। परम आनंद! नन्हे कृष्ण! भरपेट खाना!

घर पहुँचा तो बरामदे में बाऊजी को खाट पर सोते पाया। वे सख़्त बीमार रहते हैं। रात-रात भर जागते हैं और जब कभी उनकी आँख लग जाती है, परिवार सुकून की साँस लेता है। मनोहर खाट के पास, पाटों के फ़र्श पर बैठ गया। बाऊजी के सोते चेहरे पर कैसी पवित्र शांति है; कल को अगर उसने साहब से माफ़ी नहीं माँगी और सस्पेंड हो गया तो बाऊजी शायद महीनों पलकें न झपकायें। पहले से ही दस कष्ट झेल रही जर्जर काया क्या पता ये सदमा सह ही न पाये! वो सिहर उठा और बाऊजी को निर्निमेष निहारने लगा; उनके चेहरे पर कैसी सम्पन्नता है! बाऊजी!! भारी मन से वो उठ आया। देहरी के भीतर पाँव रखा तो माँ पर नज़र पड़ी। सधे हाथों से पुराने चिथड़ों-कपड़ों के तार बनातीं, दरी बुनतीं माँ को उसने ग़ौर से देखा। माँ के चेहरे पर सृष्टि रचयिता-सी व्यस्तता है। ‘बेस्ट आउट आॅफ़ द वेस्ट’ ये सब चीज़ें, तार-तार लत्तों से बुने आसन-दरियाँ, सीकों के बीजने, पुराने पैंटों से सृजित थैले ...हाँ, बिल्कुल सब चीजें़ इतनी ख़ूबसूरत इसलिये बन जाती हैं क्योंकि उनकी बुनाई में एक तार माँ अपनी आत्मा से खींचकर मिलाती हैं। जब बाऊजी पोस्टमैन थे और माँ दूसरों के घरों में खाना बनाती थीं और मनोहर की पढ़ाई के अलावा उसकी तीन बड़ी बहनों की शादियों और इस छोटे-से मकान के लोन के लिये वर्षों तक अथक परिश्रम से रुपया-रुपया जुटाना था, तब एक क्लान्ति माँ के चेहरे का स्थायी भाव बन गई थी, पर जब मनोहर को क्लर्की मिल गई सो भी सरकारी, घोर दुनियावी माँ ने जैसे बाहरी दुनिया से वैराग्य ले लिया। अब वे पूरा समय पोती-पोते के साथ खेलने, बाऊजी की सेवा करने और घर को सजाने-सँवारने में लीन रहती हैं और साध्वी-सी सुन्दर दिखती हैं। ...अगर नौकरी जायेगी तो भी क्या माँ ऐसी ही सुन्दर दिखती रहेंगी? माँ!! उसके दिल में हूक उठी और सृजन के ताने-बाने में उलझी माँ ने चैंककर दरवाज़े की ओर देखा, ‘‘अरे मनु, तू कब आ गया? मैं ऐसी मग्न थी कि ...बैठ, मैं पानी लाती हूँ।’’

माँ कमर पर हाथ टिकाती उठ ही रही थी कि रेवती पानी का लोटा-गिलास रख भी गई। मनोहर ने नज़र भर जाती हुई पत्नी को देखा। रेवती के सिर से कभी पल्ला नहीं सरकता और काम करता हाथ कभी नहीं थमता। दो छोटे कमरों के इस घर में उसका जीवन ऐसा रचा है जैसे फूल में ख़ुशबू। परिवार की ही नहीं, बाहर पूस की झोपड़ी में बँधी श्यामा गाय की, मुँडेर की गौरयों की, गली के कुत्तों की भी अन्नपूर्णा है रेवती। उसकी ज़रा-सी वेतन में सब कैसे ढाँपे रहती है वो, मनोहर नहीं जानता। अगर वो सस्पेंड हो गया तो इस अन्नपूर्णा के हाथ ख़ाली हो जायेंगे। रेवती!! उसने अपनी कल्पना में पत्नी के माथे का पल्ला पीछे सरक जाते हुये देखा। ‘‘मनु, कहाँ खोया है? और ये मुँह कैसा हो रहा है तेरा? दफ़्तर में कोई बात हुई क्या?’’ ‘‘नहीं तो!’’ वो बेवजह मुस्कुराया। तभी रेवती चाय का ट्रे लेकर आई। प्याली पकड़ते हुये नज़रें मिलीं और उसने आँख मार दी। पत्नी शर्माती -मुस्कुराती आगे बढ़ गई और वो सोचने लगा, कल दफ़्तर में चाहे जो हो; परिवार आज तो ख़ुश रहे।

‘‘पापा आ गये! पापा आ गये!’’ सोनू-मोनू पड़ोस से खेलकर लौटे और चहकते हुये उससे लिपट गये। सात साल की सोनू और पाँच साल का मोनू- उसके बचपन के दो चेहरे! जीवन के दो उद्देष्य! साँसों की दो सार्थकतायेें! दोनों बच्चे गोद में आ चढ़े। उनके स्पर्शों से मनोहर का दिल हिल गया। सोनू!! मोनू!!

‘‘कल साहब से माफी माँग लेना!’’ दिल के भीतर से एक बोला और प्रतिक्रिया में दूसरे ने गोद से बच्चों को उतार दिया। वो उठा और बस्ती में घूमने निकल आया। इस बस्ती में उसके घर जैसी कुछेक ही पक्की छतें हैं और कुछेक छतों के नीचे ही उस जैसी पक्की आमदनी। बाकी यहाँ के कुल बाशिन्दे छोटे कारीगर, कुटीर दुकानदार या हम्माल-मेहनतकश हैं। ज़ाहिर है, लोग उसका लिहाज करते हैं, आते-जाते दुआ-सलाम कर लेते हैं और उसे ‘मनोहर बाबू’ कहकर पुकारते हैं। उनकी एकमत राय है कि मनोहर बाबू के जीवन में कोई कष्ट नहीं है। जूते की सिलाई कसते राधेश्याम मोची ने अपनी गुमठी दुकान से उसे सलाम किया और प्रतिअभिवादन में वो बस मुस्कुराया। कल अगर वो सरकारी नौकरीमंद न रहा तो ये राधेश्याम मोची, ...ये मोहन धोबी, ...ये रमेश कारीगर, ...क्या इन सब के पास तब भी उसके लिये अभिवादन बचेंगे? चलते-चलते बस्ती से निकलकर मुख्य सड़क के किनारे आ गया। उसका पड़ोसी हरिराम कुशवाहा यहाँ सब्ज़ी का ठेला लगाता है और शाम के वक़्त उसका सात साल का बेटा विभोर उसकी मदद को साथ खड़ा रहता है। मनोहर पास पड़ी बैंच पर बैठ गया है - कमज़ोर! क्लान्त!

‘‘नमस्ते मनोहर बाबू! क्या हाल हैं?’’ हरिराम हमेशा की तरह ख़ुश मिला। वो फुर्सत में था और ठेले पर सजी चटख हरी, कत्थई, पीली, जामुनी सब्जि़यों को पानी के हल्के छीटों से चमका रहा था और नन्हा विभोर खनकती चिल्लर से खेल रहा था।

और तभी एक ग्राहक आ गया; मनोहर उत्तर देने से बच गया। उसने विभोर को अपने पास बुलाया,

‘‘क्यों विभोर, तू हर रोज़ स्कूल जाता है ?’’ ‘हाँ।’’ ‘‘तेरे स्कूल में खाना मिलता है ना?’’ ‘‘हाँ। ’’ अबकी हाँ में ज़्यादा ख़ुषी घुली थी। ‘‘आज क्या खाया?’’ ‘‘आज तो मंगलवार था ना, आज हमें खीर-हलवा-पूड़ी मिली थी। और पता है अंकलजी, मैं अम्मा से हर दिन पूछता हूँ, मंगलवार कब आयेगा, मंगलवार कब आयेगा क्योंकि मंगलवार को हमारे स्कूल में इत्ता मीठा खाना मिलता है...!’’ ‘‘और बाकी दिनों?’’ ‘‘बाकी दिनों भी मैं ख़ूब खाता हूँ दाल, भात, रोटी। एक दिन तो थाली में रसगुल्ला था; इत्ता बड़ा रसगुल्ला! ’’ उसकी उँगलियों में काल्पनिक रसगुल्ला आ गया और चेहरे पर मिठास। ‘‘अगर तुझे स्कूल में भरपेट खाना मिलना बंद हो जाये तो?’’ उसके प्रश्न से बच्चा डर गया और दौड़कर अपने पिता से जा लिपटा -मनोहर का द्वन्द जाता रहा। अगली सुबह दफ़्तर जैसे उसी का इन्तज़ार कर रहा था। सीट पर बैठ भी नहीं पाया कि रामचरित ने आकर आदेश सुनाया, ‘‘बड़े साहब ने आपको तलब किया है।’’

मनोहर दो पल खड़ा रहा जैसे अपना कतरा-कतरा इकट्ठा कर रहा हो फिर कदम-कदम आगे बढ़ने लगा। ‘‘मनोहर बाबू, कोई दिक़्क़त है?’’ - रामचरित ने उसका कंधा छूकर पूछा।

‘‘अब नहीं है।’’ वो ऐसी आवाज़ में बोला जो रामचरित ने पहले कभी नहीं सुनी थी।

उसे सामने पाते ही मुख्य साहब का फ़ाइल पर चलता पेन थम गया।

‘‘तो मनोहर, क्या तय किया है आपने? कल के बर्ताव के लिए माफ़ी माँगकर ये आदेश तैयार करवायेंगे या नहीं?’’ तक़रीबन जीत चुके व्यक्ति जैसी गर्वीली प्रसन्नता में साहब ने पूछा।

‘‘सर, मेरा वही निवेदन है, डिसीज़न लेने से पहले एक विजि़ट...!’’ ‘‘क्या??’’ ऊँचा अधिकारी पल भर को ऐसे चैंका जैसे रात में सूर्य देख रहा हो; पर अगले ही क्षण उस चेहरे पर निर्णय का रंग था और आँखों में प्रशंसा , दया और कठोरता की चमक।

‘‘ठीक है। हम विजि़ट पर चलते हैं सिर्फ आप और मैं; पर सोच लीजिये, अगर सरकारी आदेश में रुकावट के दोषी पाए गये तो आप पर कार्यवाही की जायेगी।’’

सर, और अगर मैं दोषी नहीं पाया गया तो? - मनोहर ने कहा नहीं, बस सोचा।

मुख्य साहब की जीप में जब मनोहर भी साथ रवाना हुआ; पीछे दफ़्तर में अंदाज़े-अनुमान-अटकलें तेज़ बरसते ओलों की तरह हर तरफ़ बिखरने लगीं,

‘‘सर मनोहर को विजि़ट पर साथ क्यों ले गये? और अगर ले भी गये तो सिर्फ़ उस अकेले को ही क्यों?’’

‘‘मनोहर ने ऐसी कौन-सी जादू की छड़ी घुमा दी साहब पर कि दूसरे ही दिन वो उनकी नाक का बाल हो गया?’’

‘‘ये मनोहर बड़ा घुन्ना है!’’

‘‘अरे तुम्हें साहब का मिजाज़ नहीं पता। ये दूध पिला-पिलाकर मारते हैं। देखना सबसे पहला पनिशमेंट भी इसी मनोहर को मिलेगा ; बहुत ओवर स्मार्ट है ना वो! हुँऽह!’’

बातों-बुराईयों के बाहर चुप खड़ा रामचरित जा चुकी जीप की ओर देख रहा था, ‘‘भगवान आपके साथ रहे मनोहर बाबू; मेरे बच्चे भी सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं!’’

जीप बढ़ रही थी। चमकीली काली सड़कों, ट्री-गार्डों में पले पुसे फूल-पेड़ों और ख़ूबसूरत षहरी बस्ती से आगे वे तरक्की के कच्चेपन जैसी सड़क पर आ चुके थे। ‘‘किस गाँव की तरफ चलें मनोहर?’’ ड्राइवर की बगलवाली सीट पर बैठे साहब ने बिना पीछे देखे पूछा। ‘‘जहाँ आप चाहे सर।’’ मनोहर की आवाज़ में निपट सरलता थी और चेहरे पर गहरे विश्वास का भाव जिसे महसूसते अधिकारी साहब चिढ़ गए -ये मामूली कर्मचारी! शेर के जबड़े में सिर है फिर भी...!

पर वे चुप रहे। मन बोझिल है; कल रात उन्हें देर से नींद आई थी। मातहत के मानमर्दन, माफ़ी और अपने बड़प्पन की कल्पनायें करते रहे थे और अभी जो घट रहा है बिल्कुल ही बौखला देने वाली बात; नितांत अनपेक्षित! -अब तक इस क्लर्क को सस्पेंड क्यों नहीं किया? -क्यों एक मामूली कर्मचारी के कहने पर मैं विजि़ट पर चला आया ? -मैं इसे बर्दाश्त कर रहा हूँ, क्यों ? क्यों ? क्यों? आला अफ़सर के चेहरे पर गुस्से का नहीं अनमनेपन का भाव था। पलटकर देखा; क्लर्क का चेहरा शांत था। इसे मुझसे राई-रत्ती भर भी डर नहीं लगता ?? ...बताऊँगा इसे! एक उच्च अधिकारी के कुल प्रशासनिक प्रभाव-वैभव-दम्भ से देवराज का चेहरा धूप में जलती झील-सा चमकने लगा। कंटीले झाड़ों और नुकीले पत्थरों वाली गर्द-गुबार की राह-राह एक गाँव तक जाकर जीप रुकी। शिलालेख पर अंकित था -सनातनपुर। सरकारी जीप रुकती देख इधर-उधर चबूतरों पर बैठे, काम करते लोग उठ आये और सरपंच इतनी जल्दी उपस्थित हो गया कि महानगरीय अधिकारी साहब को बहुत-बहुत आश्चर्य हुआ। शहरी लोग नहीं जानते; गाँव होता है, एक बड़ी कुटुम्बनुमा रचना! तरक्की में भले देहात षहरों से पिछड़े हों, पर सामाजिकता में वे शहरों से कहीं श्रेष्ठ हैं। जहाँ सब एक-दूसरे की ख़बर रखते हैं, अदब-लिहाज निभाते हैं और शत्रुता में भी शालीनता बरतते हैं ; इन इंसानी मुक्ताओं, नीलम हीरांे, मणियों से बनी प्रार्थना की माला में मेरुमणि होता है गँवईपन! ...निखालिस हिन्दुस्तानी गँवईपन!! तो आगे-आगे सरपंच, पाँच-सात तरुण-अधेड़-वृद्ध चले रहे थे। बीच में अभिजात्य अधिकारी साहब और पीछे-पीछे काला-नाटा-दुबला क्लर्क मनोहर। गाँव में स्कूली उम्र के बच्चे नहीं दिख रहे थे; सनातनपुर के सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ-सरपंच ने सरकारी अफ़सर को ख़ुश करने का एक मौका पाया, ‘‘सर, जब से सरकारी ने स्कूल में खाना देना षुरू किया है, स्कूल टाइम में गाँव का एक बच्चा आपको आवारा घूमता नहीं मिलेगा! जो पढ़ाई के नाम पे अपना जी दुकाते फिरते थे, वे मौड़े भी स्कूल जाने लगे हैं और तो और साहब...’’ - प्रौढ़ सरपंच के चेहरे पर भविष्य की सुनहली रोशनी उतर आई, - ‘‘...जिन मौडि़यों की पढ़ाई छुड़ा दी गई थी, दिन के खाने के लोभ में माँ-बापों ने फिर से उनका नाम स्कूल में लिखा दिया है!’’ पर अधिकारी का ग़ौर इस पर नहीं वरन् अपने नये अचम्भेनुमा अनुभव पर था; खपरैल बखरियों और पक्के चबूतरों-बरामदों के बीच पटियों की सड़क आसमान में बादल की पतली लकीर-सी थी (जिसे इन्द्रवाहक ऐरावत के प्रस्थान का धूल-मार्ग माना जाता है।) दरख़्तों की धूल, सुलगते चूल्हों का धुँआ, मवेशियों की गंध और कच्चे मकानों की महक से मिली-बनी ऐसी शांत ख़ुशबू कण-कण में व्याप्त थी जैसे माँ के आँचल की सुगन्ध!! प्रभाव ऐसा था जैसे जि़न्दगी को यहाँ किसी भी किस्म की जल्दबाज़ी नहीं रहती। और जिन्हें जल्दबाज़ी थी, आला अफसर हुजूर गाँव पार करते हुये प्राथमिक स्कूल पहुँच गए। सरकारी रंग से पुते दो छोटे कमरों और बित्ते भर बरामदे के विद्यालय के बाहर दो-तीन अधिकृत चेहरे स्वागत में मुस्तैद खड़े मिले। इस दफ़ा मुख्य साहब को आश्चर्य नहीं हुआ। स्कूल के बाहर नीम तले एक कमउम्र संविदा शिक्षिका ने ब्लैक बोर्ड पर हिन्दी का शुरुआती परिचय अभी-अभी दर्ज किया था और नन्हे विद्यार्थी अपनी स्लेटों पर आड़ी-टेड़ी लकीरों में वर्णमाला का सौन्दर्य साधना सीख रहे थे, अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अः सिंह साहब शिक्षिका के समानान्तर खड़े होकर पहली कक्षा के कोमल विद्यार्थियों का अक्षरज्ञान परखने लगे। फटी नेकर, टूटे बटनों की षर्ट वाले एक गुलगुल-श्यामल बच्चे की तोतली ज़्ाुबान महर्षियों की सनातन भाषा की नवीनतम संवाहिनी थी, ‘‘छोता अ, बला आ, छोती इ, बली ई...’’

मनोहर कक्षा के ठीक पीछे खड़ा था और टाटपट्टी पर पंक्तिबद्ध बैठे विद्यार्थियों को निहार रहा था। उनके बस्ते सस्ते हैं, अध्ययन सामग्री मामूली है और अधिकांश यूनीफार्म में नहीं हैं; जो हैं उनके स्कूली कपड़े घिसे, रंगहीन-से और कहीं तो फटे भी हैं पर ये बच्चे...’’ -मनोहर सोच रहा है- ‘‘...इस ग़रीब देहात के ये नन्हे नागरिक इन असुविधाओं के बीच अपना भविष्य तराश रहे हैं। क्या पता इनमें से कोई विद्यार्थी कल डाॅक्टर हो, इंजीनिर, वैज्ञानिक या देवराज सिंह की तरह आई.ए.एस. ; पर क्या, तब वो भी स्कूली बच्चों के खाने में कटौती का आदेश देगा? दिल्ली और सनातनपुर के आई.ए.एसों. की आत्माओं में कुछ तो फ़र्क रहेगा ?? काश ! एक आई.ए.एस. सनातनपुर का हो!’’ सोचते-सोचते मनोहर मुस्कुराया और इसी पल उसे किसी ने छुआ। पैंट का पाँयचा खींचता अंतिम पंक्ति का एक सूखा-साखा छात्र अनसुनी-सी आवाज़ में निवेदन कर रहा था, ‘‘ये बोतल दे दो।’’ मनोहर के हाथ में पानी भरी प्लास्टिक की पारदर्षी बोतल थी जो किसी रेलयात्रा में उसने ख़रीदी थी और इस्तेमाल के बाद भी उसकी सयानी पत्नी ने फेंकी नहीं थी बल्कि मनोहर दफ़्तर आते इसी तरह की बोतलों में पीने का पानी लाता रहा है; अच्छे थर्मस वो सिर्फ़ अपने बच्चों के लिये ख़रीदता है। ‘‘क्यों?’’ धीमे स्वर में उसने पूछा। ‘‘मेरे पास पानी की बोतल नहीं है। अम्मा शीशी में पानी देती है।’’ बच्चे की नन्हीं उँगली बस्ते के बगल में रखी काँच की छोटी शीशी पर थी। ‘‘अरे!’’ मनोहर का मुँह पलभर को खुला रह गया फिर वो उँकडू बैठा, बच्चे का सिर प्यार से सहलाया, अपनी बोतल उसकी छोटी शीशी के आगे रखी और फिर सीधा खड़ा हो गया, कुछ इस भाव से जैसे उस बच्चे को जानता ही न हो; पर पिछले दो पलों की जो घटना थी, विद्यार्थियों के उस पार खड़े आला अफ़सर ने देखी थी जबकि स्कूल के अधिकृत लोग अपनी समस्यायें-व्यवस्थायें निवेदन की आवाज़ में बता रहे थे। तभी इंटरवल की घंटी बजी। बच्चे परिन्दों के चैंककर उड़े झुण्ड-सा हल्ला मचाने लगे। इस बीच अधिकारी साहब स्कूल के पीछे मध्याह्न भोजन पकाते स्वसहायता समूह को देख आए थे; वे तीन-चार आदिवासी औरतें थीं जिनकी सस्ती साडि़यों के किनारे तार-तार थे और जिनमें से एक बता रही थी कि जब से उसे ये काम मिला है, उसके परिवार में एक दिन भी फाका नहीं हुआ है। सिंह साहब को शिद्दत से याद आए अपने षब्द, ...स्वसहायता समूहों पर तय अपनी राय ! वे खिन्न चेहरे से स्कूल के भीतर लौट आये और दिल्ली के साहब ने बुन्देलखण्ड में भूख का अनुशासन देखा। सारे बच्चे चुपचाप कतारबद्ध खड़े थे। उनके हाथों में ख़ाली थालियाँ थीं और आँखों में काउन्टर पर रखा ताज़ा, महकता खाना। कहीं से कोई पिन-ध्वनि तक नहीं! इतने सारे बच्चे बिना किसी डर-डाँट के कायदे से खड़े हैं; आई.ए.एस. देवराज सिंह-मुख्य कार्यपालक अधिकारी जि़ला पंचायत- के लिये ये नन्ही गँवई पाठशाला जि़न्दगी के नए सबक सिखाने वाला स्कूल है। पंगत शुरू हुई और यही समय था जब अधिकारी को अपनी महत्ता सिद्ध करती थी। सिंह साहब ने अपने क्लर्क का निडर चेहरा देखा और अगले क्षण ऊँचे माथे पर गहरी शिकन थी। आदेश दिया गया, इनमें से एक बच्चे को अलग बैठाकर खिलाया जाये। एक बच्चा आला अफ़सर की कुर्सी के ऐन सामने भूमि पर प्रस्तुत किया गया। वो एक आठ साला दुबला लड़का था जिसकी आँखें भीतर को धंसी थीं, सीने की हड्डियाँ गिनी जा सकती थीं और रंग भुड़भुड़ा होने से ज़्यादा काला दिख रहा था। उसके कपड़े मैले नहीं थे; पर उन पर अलग-अलग रंग के धागों से जगह-जगह सीवन थी। बच्चे की बड़ी आँखें भय से और बड़ी दिख रही थीं। उसके भूखे हाथों ने भरी थाली के दोनों किनारे कसके पकड़ लिये थे। ‘‘डरो नहीं। खाना खाओ जैसे रोज़ खाते हो।’’ साहब ने कहा। बच्चा खाने लगा। अधिकारी और क्लर्क की आँखें उसकी थाली पर थीं और बच्चे को अपनी थाली छिन जाने का भय सता रहा था -ये बात साफ़ नज़र आने लगी थी। पनीली तुअर दाल में टिक्कड़ जैसी रोटी का कौर डुबोता वो इतनी जल्दी-जल्दी खा रहा था कि हर वक़्त उसका मुँह पूरा भरा हुआ था और निगलते हुये उसकी आँखों में बार-बार पानी आ जा रहा था। अधिकारी साहब गिन रहे थे, एक, ...दो, ...तीन, ...चार! ...पाँच! ...छह!! ...सात!!! बच्चा सातवीं रोटी खा रहा था।

बस एक पल लगा निर्णय लेने में। क्लर्क को वहीं खड़ा छोड़ आला साहब तेज़ी से उठकर चले आये; पर बाहर को आते क़दम कमज़ोर पड़ रहे थे, मुड़कर देखे बिना रहा नहीं गया,

...बची हुई डेढ़ रोटी बच्चा अपने स्कूली बस्ते में छुपा रहा था।

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