"कितनी साँसों को सुनकर मूक हुए हो?

कितनी साँसों को गिनना चूक गये हो?

कितनी सांसें दुविधा के तम में रोयीं?

कितनी सांसें जमुहाई लेकर खोयीं?

कितनी सांसें सपनों में आबाद हुई हैं

कितनी सांसें सोने में बर्बाद हुई हैं??"


टेबल में रखे किसी कागज़ में लिखी इन पंक्तियों को बुदबुदाते हुए अम्मा ने जोर की आवाज़ में जीतू से पुछा-"ये कैसा कागज़ है रे जितुआ,मेरी समझ तो आ नहीं रहा,कम से कम अपनी यूनिवर्सिटी के कागज़ तो संभाल के रख बेटा!!"

बाहर बरामदे में अपने नगण्य बालों वाली दाढ़ी को पूर्णतः विलुप्त करने में व्यस्त जीतू ने उस्तरा संभालते हुए जवाब दिया - 'कविता है अम्मा,सुमन जी की कविता है। आज यूनिवर्सिटी में कार्यक्रम है,उसी में पढना है ये। बड़ा प्रोग्राम है,रात का खाना भी वहीँ होगा,इसलिए देर हो जायेगी,तुम इंतज़ार ना करना।'

"हे भगवान्! मतलब आज सांझ समय घर सूना रहेगा,बिट्टी की लगुन है आज,पास गाँव में जाना होगा,मैं समझी तू ले चलेगा,खैर बस से चली जाउंगी।" मन में अकेलेपन का भार महसूस करते हुए अम्मा ने अपने अकेलेपन के इकलौते साथी टीवी की ओर रुख किया। प्रौढ़ावस्था में जिस टीवी को हमारे माँ-बाप इडियट बॉक्स कहते हैं,यही इडियट वृद्धावस्था आते आते उनका इकलौता सच्चा साथी बन जाता है।

जितेन्द्र कुमार दुबे उर्फ़ जीतू,ये मुख्य शहर से 32किमी दूर बसे नगना गाँव के इकलौते पढ़े लिखे लोगों में से एक हैं।10वीं तक गाँव के माध्यमिक शाला में पढने के बाद जनाब ने ना केवल शहर की यूनिवर्सिटी से बीए-एम् ए किया बल्कि हिंदी साहित्य में गोल्ड मैडल लेकर उसी यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक में नौकरी भी पा ली।

माँ की जिद के चलते गाँव में ही बसे रह गये,परन्तु रोजाना 32कि.मी. दूर अपने गाँव की मिटटी की खुशबू को ,कविताओं के शब्दों में लपेटकर ले जा,शहर के छात्रों के जीवन को महकाने का काम कर रहे हैं। परिवार के नाम पे मात्र एक बूढ़ी माँ है,जिसे टीवी से ख़बरें सुनकर गाँव भर में ब्रॉडकास्ट करने का शौक है।

यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम के लिए अति-उत्साहित जीतू ने सोफे पे अपनी जुराबों में पैर डालते हुए अम्मा को कुरेदना चालु किया-'ये क्या दिन भर बस ख़बरें सुनती रहती हो और गाँव भर को डराती फिरती हो। चोरी,लूट,हत्या,आगजनी ये सब तुम्हारे दिमाग में भर गया है। कभी तो कुछ और भी देख लिया करो अम्मा'

"अरे बेटा! तू नहीं समझेगा आज की दुनिया को। तेरी दुनिया तो उन्हीं पीले पन्नों में सिमटी है,जहाँ तू खुद से ही गुटर-गूं करके तू दिन गुजार देता है।

ना जाने ये सिलसिला कब रुकेगा?" निश्चेष्ट सांस छोड़ते हुए अम्मा बुदबुदाई। "आए दिन का ये लूटपाट,हत्या,दुर्घटना,ना जाने कितने लोग रोज़ मरते हैं,फिर भी कोई सुधार नहीं,कोई समझदारी नहीं। भगवान् ने भी अब इंसानों को दिल की जगह एक अतिरिक्त बेरहम दिमाग देके भेजना चालू कर दिया है,सारी भावनाएं,सारी दया तो मानों इंसान इतवारी बाजार में बेच आता है,मुझे तो पल पल तेरी फ़िक्र लगी रहती है बेटा!"

"अरे माँ,तुम खामखाँ डरती हो,मुझे भला क्या होगा। और रही बात दुर्घटना की तो अगर दुनिया में सब अच्छा ही अच्छा होता तो फिर सब कितना नीरस हो जाता।"

प्रोफ़ेसर के अंदाज से कविता सुनाते हुए जीतू ने अपनी बात को आगे बढाया -

"अपनी इच्छाओं का ही विस्तार है,

जिन्दगी जैसी भी है स्वीकार है।

है दिया आनंद फूलों ने जहाँ,

पत्थरों ने भी किया उपकार है"

"समझीं अम्मा,ये परेशानियां,दुःख ये सब जीवन के विभिन्न रंग हैं। इसलिए ये कभी नहीं रुकेंगी,तुम बेकार ये ख़बरें देखना छोड़ो भी अब।

कोई रोक सकता है क्या ये सिलसिला बोलो?"

प्रश्नवाचक दृष्टि और मंद मुस्कान के साथ जीतू ने माँ को निहारा।

"इन सारी परेशानियों की एक है जड़ है - जल्दबाजी। किसी को अमीर बनने की जल्दबाजी है तो वो चोरी करता है,डाका डालता है। किसी को ताकतवर बनने की जल्दबाजी है तो वो हत्या,आगजनी करवाता है। किसी को मंजिल पे पहुँचने की जल्दबाजी है तो वो सड़कों पे इंसानियत को रौंदता हुआ आगे बढ़ जाता है। ये जल्दबाजी ही हर फसाद की जड़ है रे जितुआ...." माँ के इस विश्लेषण को अनसुना करते हुए जीतू ने अपने कदम तेजी से अपनी बाइक की ओर बढाए। पीछे बूढी माँ ने अपने चिरपरिचित स्वर में आवाज लगाई - "अरे ओ जितुआ,तू कोई जल्दबाजी ना करना रे!! आराम से आया जाया कर,और सुन! अपनी गाडी की बत्ती सुधरवा ही लेना आज,दो दिन से बंद पड़ी है।"

"रहने दे माँ,अब इस खटारा की हेडलाईट कौन सुधारवाए अब,वैसे ही रोज सांझ के पहले वापस आ जाता हूँ।" जीतू ने जवाब दिया।

"नहीं बेटा,आये दिन हादसे हो रहे हैं,ना जाने ये सिलसिला कब रुकेगा"माँ चिंता मिश्रित स्वर में बुदबुदाई।

एक हंसी के साथ जीतू ने जवाब दिया - "तुम्हारे सिलसिले का तो पता नहीं,पर अब मैं नहीं रुक पाउँगा-चलता हूँ,देर से लौटूंगा।तुम अपना ध्यान रखना और लगुन पे काकी के साथ ही जाना,अकेले नहीं।" कहकर जीतू युनिवर्सटी की ओर चल पड़ा।

ऊँची नीची पगडंडियों से गुजरता हुआ जीतू अपने गाँव को नजरों में भरते हुए शहर को रवाना हुआ। इस गाँव में कुल जमा विकास के नाम पे एक टूटा सा स्कूल,बदहाल सरकारी अस्पताल और हुक्के-ताश से रोशन पंचायत भवन ही तो था। इन उबड़-खाबड़ रास्तों को पक्का करने का काम बीते हफ्ते ही चालू हुआ था। दूर गाँव के मजदूर सडकों पर डामर का जाल बिछाते और रात-बिरात इसी डामर से सनी काली सड़कों के काले धुंए और घुप्प अँधेरे में गुमनामी की चादर ओढ़ अपनी काली किस्मत को कोसते हुए सो जाते। सड़क किनारे पड़े इन लाचारो को देख साहित्य प्रेमी जीतू कॉलेज के दिनों का एक शेर बुदबुदाने लगा -

" कितने तफ़क्कुरात से आज़ाद हो गया ,

वो आदमी जो ईंट पे सर रख के सो गया।

इक और खेत पक्की सड़क ने निगल लिया

इक और गाँव शहर की वुसअत में खो गया"

( तफ़क्कुरात-चिंताएं, वुसअत-विस्तार)

इन्हीं ख्यालों में उलझा जीतू यूनिवर्सिटी पहुंचा।हिंदी दिवस समारोह का पुरस्कार वितरण है आज। बीते दिनों आयोजित हिंदी पखवाड़े में ना केवल छात्रों बल्कि प्राध्यापकों ने भी भाग लिया था। कविता लेखन की श्रेणी में कई पुरस्कार बांटे गए। अंततः "सहृदय कवि" की श्रेणी में पुरस्कार की घोषणा हुई। "सहृदय कवि" का पुरस्कार जाता है श्री जितेन्द्र कुमार दुबे को।

मंच ये ये घोषणा सुन जोरदार तालियों के बीच जीतू जमीन से 2 इंच ऊपर उड़ता हुआ पुरस्कार लेने पहुंचा। मंच पर पुरस्कार लेने से पूर्व जीतू ने सभाकक्ष में अपनी बात रखी - "ह्रदय तो सभी के पास होता है-ये अंग भगवान् का दिया हुआ है। परन्तु ह्रदय में संवेदना मनुष्य अपनी सोच से जगाता है। संवेदना होने ही पर एक ह्रदय - सहृदय बन पाता है-एक कोमल और दयालु दिल वाला इंसान। ये पुरस्कार मेरा नहीं,बल्कि मेरी इन संवेदनाओं का है जो मेरे दिल में हर दुखी आत्मा के प्रति हैं। इसलिए पुरस्कार में मिलने वाली इस "कलम" को,इस पेन को मैं हमेशा अपने दिल के पास रखूँगा।" ये कहते हुए जीतू ने उस पेन को अपनी शर्ट की जेब में किसी मैडल की तरह खोंस लिया। नीचे उतरकर आने पर हर बधाई देने वाले इंसान को "संवेदना" का मर्म समझाकर जीतू गौरवान्वित महसूस कर रहा था। मानों संवेदना पर उसे पीएचडी प्राप्त हो गई हो।

शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रंखला के बाद प्रोफेसरों के लिए रात्रिभोज का आयोजन था। रात 10 बजे तक खाने पीने और विवेचना का सिलसिला जारी ही था कि तभी जीतू के मोबाइल पर आये एक कॉल से उसके चेहरे का रंग ही उड़ गया।

"क्या हुआ हमारे सहृदय कवि,किसने आपके ह्रदय में प्रेमबाण बेध दिया" चिंतामग्न जीतू को देख चुटकी लेते हुए तिवारी जी ने सवाल दागा। जीतू ने हड़बड़ी में जवाब दिया -"माँ का एक्सीडेंट हो गया है,मुझे जाना होगा" और ये कहकर वो सीधे गाडी की तरफ भागा। गाडी को वायुवेग से उड़ाता हुआ जीतू गाँव की तरफ बढ़ने लगा। माँ के बारे में सोच कर उसकी गाडी और धडकनें दोनों बिजली की रफ़्तार से भाग रहीं थी।

लैम्पपोस्ट से जगमागते शहर की सीमा को छोड़कर जैसे ही वो ग्रामीण सीमा में दाखिल हुआ तो गाड़ी की खराब हैडलाईट के चलते स्याह अँधेरे में गुम अपने गाँव को देख अनायास ही चिडचिडाहट महसूस हुई। खराब हेडलाईट और उबड़ खाबड़ रास्ते पर रौशनी का इंतजाम ना होने पे जीतू खुद में ही बडबडाने लगा "ओह,कहाँ फस गया मैं,इस खटारा की हेडलाईट को सुबह सुधरवा ही लेना था। इस घुप्प अँधेरे में ना रास्ता दिख रहा है ना मंजिल। पिछले 32 सालों में मैं और ये दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गई पर ये गाँव अभी तक बदहाली से अटा पड़ा है। लानत है ऐसी जगह पे जहाँ मोबाइल के नेटवर्क आ जाते हैं पर बिजली नहीं पहुँच पाती। हे भगवान्,ना जाने माँ का क्या हाल होगा।"उबड़ खाबड़ रास्ते पर धचके खाती जीतू की पुरानी गाडी अपना पूरा जोर लगा के सरकारी अस्पताल की तरफ भागे जा रही थी। हर गड्ढे के आने पर अब गिरे-तब गिरे वाला हाल था,पर जीतू की हड़बड़ी इन मुश्किलों से कहीं ज्यादा थी।

अभी गाँव में दाखिल हुए जरा ही देर बीती थी कि जीतू की गाडी एकाएक सड़क पर आये किसी बड़े अवरोध से टकराकर एकदम अनियंत्रित हो गई और झटका खा कर आगे जा गिरी। थोडा आगे जाकर जीतू गिरा और चिल्लाया - "ना जाने कैसे बड़े बड़े पत्थर सड़कों पे डाल रखे हैं। इन आदमकद पत्थरों को किसी नेता की शकल देकर स्मारक बना किसी चौराहे पे क्यूँ नहीं सजा देते..जाहिल साले"जीतू के ताजे ताजे सहृदय दिल ने एक धीमी आवाज ने कहा जरुर कि एक बार जरा उस पत्थर को रास्ते से अलग कर दो,कोई और भी गिर सकता है,पर माँ की चिंता में डूबे क्रोध ने इस आवाज का दम घोंट तेजी से आगे बढ़ना उचित समझा और कपड़ों पर लगी धूल झाड़ता हुआ जीतू दुबारा अस्पताल की तरफ भागा।


अस्पताल पहुँचते ही काकी से जीतू ने पुछा -"क्या हुआ माँ को काकी?""क्या बताएं बेटा,बड़ा बुरा समय आ गया है। हम दोनों बिट्टी की लगुन के बाद बस पकड़कर अपने गाँव उतरे ही थे कि पीछे से आती बेलगाम गाड़ी ने जानबूझकर अम्मा को टक्कर मार दी,वो तो भला है कि मैंने तेजी से उन्हें खींच लिया,पर झटका लगने से अम्मा छिटक कर जा गिरीं। बड़ी मुश्किल में अस्पताल लाये हैं बेटा और तुम्हें खबर की। राम जाने कौन से जल्दबाजी रहती है इन दुष्टों को,मानों किसी की जान की कोई कीमत ही नहीं।राम जाने ये सिलसिला कब रुकेगा ? "


घबराया जीतू माँ के पास पहुंचा,देखा तो सर पे पट्टी बंधी है और हाथ पैर में चोटें आईं हैं। डाक्टर ने मरहम पट्टी कर सुबह डिस्चार्ज करने का आश्वासन दिया है। रात भर जीतू माँ के सिरहाने पड़ा रहा। जब अपनों पर बन आती है तो सारी दुनियादारी कोरी नजर आती है। जिन दुर्घटनाओं को सुबह जीतू जीवन के रंग कह रहा था वो एक पल में खुशियों को कैसे बेरंग कर जाती हैं- ये अहसास उसे अन्दर से कचोट रहा था।


"जल्दबाजी,अम्मा सही कहती थीं,पता नहीं सालों को कौन सी जल्दी थी जो अम्मा को टक्कर मार के चलता बना।भगवान् करे कुत्ते की मौत मरे हरामजादा। जरा भी नहीं लगा साले को कि रुक के थोड़ी इंसानियत दिखाता।" इन्हीं बद्दुआओं में उलझा हुआ जीतू अस्पताल के अन्दर बनी गणेश प्रतिमा के सामने बैठ प्रार्थना करने लगा। एक याचक की तरह वो गणपति से माँ की सलामती और उस कार वाले की दुर्गति एकसाथ मांगने लगा। हाथ उठाये गणपति आशीर्वाद की मुद्रा में जीतू को वरदान दे रहे हैं,ऐसा महसूस करते हुए जीतू की कब आँख लग गई उसे पता ना चला।


सुबह होते ही जीतू माँ के पास पहुंचा - "अब तुम ठीक हो ना माँ,सहमे स्वर में जीतू ने आवाज दी।"हाँ बेटा,मैं ना कहती थी कि जल्दबाजी ही हर फसाद की जड़ है,हर रोज मैं टीवी पे देखती हूँ दुर्घटनाएं,देख आज मुझ अभागन के साथ भी हो गई। ना जाने ये सिलसिला कब रुकेगा??खैर जाने दे ये बातें,तू सुना तेरा कार्यक्रम कैसा रहा?"
"अरे माँ वो तो बहुत ही शानदार था,मुझे "सहृदय कवि" का पुरस्कार और ये पेन" कहते हुए जीतू अपनी शर्ट की जेब टटोलने लगा। पर जेब से पेन नदारद था। "मेरा पेन,आखिर गया कहाँ,यहीं तो रखा था" ये सोचते हुए अचानक जीतू के दिमाग में कल रात पत्थर से टकरा जाने वाली घटना कौंध गई। एक ठंडी सांस भरते हुए जीतू बोला-"इन सबके चक्कर में मेरी सहृदयता का पुरस्कार भी गिर गया,खैर छोड़ो माँ,चलो घर चलते हैं"

अस्पताल के कागज़ लेने जैसे ही जीतू बाहर गेट पर पहुंचा तो यहाँ एक कोहराम सा मचा हुआ था। सड़क बनाने वाले कई मजदूर एक 12-15 साल के लड़के को अपनी गोद में उठाये विलाप कर रहे थे। लड़के के दोनों पैर बुरी तरह जख्मी थे और उनसे खून रिस रहा था। शायद हड्डियाँ भी टूट गईं थीं,लड़के की भावमुद्रा देख लगा मानों वो जोर से कराहना चाह रहा था,पर आवाज नहीं निकल रही थी,शायद लड़का गूंगा था। इस वीभत्स दृश्य को देखते हुए ही सहसा जीतू की नजर कोने पे खड़ी एक 7-8 साल की लड़की पर पड़ी,जो किसी चमचमाती कलमनुमा चीज से खेल रही थी।जीतू को समझने में देर ना लगी कि ये उसका ही पेन था। अपने मन में उस लड़की को चोर घोषित करते हुए जीतू ने तुरंत उसके हाथ से पेन छिना कर डपटा- "क्यूँ रे,ये पेन तुझे कहाँ से मिला" प्रतिउत्तर में रुआंसी लड़की अपनी माँ के पीछे छुपकर बोली,'भाई के नजदीक पड़ा था।'इतने में ये तमाशा देख जीतू की अम्मा सामने आईं और उस मजदूर औरत से पुछा-"क्या हुआ तेरे लड़के को,कैसे चोट खा गया"


मजदूर औरत बिलखती हुई बोली -"क्या बताएं अम्मा हम गरीबन की जिन्दगी..दूर गाँव से यहाँ सड़क बनाने के काम से आये थे,साथ में मेरा लड़का भी हाथ बटाता था,बेचारा जन्म से ही गूंगा है। रोज की तरह काम धाम निपटा के सूखी रोटियां चबा के हम पगडण्डी से लगे खेत किनारे सो रहे थे।ये अभागा भी डामर बिछी सड़क किनारे ही सो रहा था,ना जाने कैसे नींद में पलटियां खाते थोड़ा कच्ची सड़क के पास जा पहुंचा। देर रात ना जाने कैसे यमराज का कोई दूत अपनी गाडी समेत इसके पैरों को कुचलते हुए इसके ऊपर से गुजर गया। दाता ऐसा श्राप किसी को ना दे,बेचारा गूंगा है,हादसा होने पे चिल्ला भी ना पाया। पैर की हड्डियाँ टूटने की वजह से रात भर कलपता रहा,किसी के पास ना जा पाया मदद के लिए। तड़के इसकी बहन ने इसकी हालत देख हम लोगों को बुलाया,तब जाकर आनन् फानन में इसे यहाँ लेकर आ पाए हैं।"


"अरे रे!! कितना बुरा हुआ रे! कीड़े पड़े ऐसे नालायकों को जो इस बेचारे गूंगे पे गाड़ी चढ़ा के आगे बढ़ गए। अरे जरा सी इंसानियत होती तो एक बार तो पलट के देखते इस बेचारे को। राम जाने कौन सी जल्दी मची है इस संसार को। हर दिन दुर्घटना,राम जाने ये सिलसिला कब रुकेगा??खैर अच्छा हुआ रे जितुआ जो तू कल जल्दी आ गया,वर्ना मैं भी इस अभागे की तरह अस्पताल में तड़पती रहती"

अम्मा और मजदूर औरत की इन बातो को सुनकर जीतू को सारा माजरा समझने में देर ना लगी। रात को जिस अवरोध से जीतू टकराया था वो कोई आदमकद पत्थर ना था,बेचारा वो तो एक जीता जागता इंसान था। पत्थर तो दरअसल जीतू का दिल हो गया था जो जल्दबाजी में अपनी सहृदयता को भूल बैठा। उसे कुचलकर एक बार पलट के देखना तो दूर उल्टा उसी नन्हीं जान को कोस कर वो आगे चल पड़ा। कल मंच पे पुरस्कार लेते समय बोला गया अपना ही संवेदनाओं का भाषण उसे कोरी बातें लगने लगीं।उसे महसूस हुआ कि गाडी के गिरने पर उस पेन का छिटककर गिर जाना एक संयोग नहीं बल्कि एक संकेत था। अब उसे लग रहा था कि उसकी "सह्रदयता का मैडल" स्वरुप ये पेन उस लड़की ने चोरी नहीं किया,बल्कि हक़ से छीन लिया था,इस वजह से कि जो उसके गूंगे भाई पर अमानवीयता का बोझ डाल कर बेफिक्र हो आगे बढ़ जाए तो "सहृदय" हो ही नहीं सकता.

जो गालियाँ और लानते कल वो अम्मा को गिराने वाले कार चालक को दे रहा था,वो सभी उलाहने उस गूंगे के मूक श्राप की तरह उसके कानों में गूंजने लगी।अपने किये के पछतावे के लिए क्षमा मांगने हेतु जैसे ही जीतू गणेश जी की प्रतिमा के सामने मुड़ा तो उसे लगा कि कल तक आशीर्वाद देने वाले गणपति के हाथ, आज श्राप देते हुए उस पर अपना क्रोध और तिरस्कार बरसा रहे हों।

आज जल्दबाजी,अपना-पराया,सहृदयता,दुर्घटना,प्रायश्चित जैसी अनंत भावनाओं में उलझे जीतू की आँख में पछतावे के आंसू झिलमिलाने लगे,और अम्मा के गले लग सिसकते हुए वो बस यही कह पाया - "अम्मा जल्दबाजी का ये सिलसिला कभी नहीं रुकेगा"

"जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है,

आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है.

उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया,

मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है"

(शायर - नवाज देवबंदी)


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