सौ वर्षों से हिन्दी सिनेमा दुविधा के पथ पर है।

कौन कहे साहित्य इसे कविता, कथा या रुपक है?

 

इधर जरुरत यन्त्र-मन्त्र, और सही तन्त्र की देखो।

भारतीय लेखन  उत्तम, पाठक को तरसे देखो।

 

आगे दिखे फ़िल्म उस तरफ़, विवाद में साहित्य।

हित इक-दूजे की करते, अनजाने रहता तथ्य।     

 

फ़िल्मों का ये सत्य बोलता सिर पर चढ कर।

पूरी यात्रा हितकर साक्षी निज मन-जन-गण।

 

जन का साथ निभाती फ़िल्में, रंग भरती सपनों में।

भरमाते हैं प्रवचन-शिक्षा-राजनीति अपनों में।

 

अनेक बातें हैं जो फ़िल्मों को साहित्य बनाती।  

सिने-जगत के सिर सार्थक-संवाद ताज पहनाती।

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