रेलवे आरक्षण केन्द्र पर लाइन में खड़ा आदर्श थोड़ी-थोड़ी देर पर उचककर बुकिंग विन्डो की ओर देख लेता है . ये  लाइन है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती , न घटती है न आगे बढती है . घंटे भर से वहीं पड़ा हुआ है आदर्श, कभी तनिक दायें-बायें हो लेता है और फ़िर सर खुजाते हुए वापस अपनी मुद्रा में पूर्ववत्. लाइन में खड़े-खड़े उद्विग्न होते हुए भी  उसे बच्चन का डॉयलाग याद आता है, “हम जहाँ खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है” जिसे वह सिर झटक कर किनारे कर देता है . वैसे, इस जड़ता की वजह वह अच्छी तरह समझता है . हर जगह भ्रष्टाचार है, इन दलालों की क्या मजाल ! लेकिन इन्हें भी वर्दी वाले रक्षकों का वरदहस्त प्राप्त है, और ये ही क्यों ? अधिकारी भी . दरअसल, ‘आम आदमी’ के प्रतिनिधि ईमानदर बाबू की भाषा में कहें, तो ‘सब मिले हुए हैं’. छप्पन इंची ‘नेशनलिस्ट’ के बाद ‘इनसे’ भी आदर्श को अन्य लोगों की तरह बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन अब तो आदर्श ने लगभग तय कर लिया है, ‘इस देश का कुछ नहीं होना’.

अपने पीछे वाले अंकल जी को ‘कनविन्स’ कर व आगे वाले हमउम्र को संकेत देकर आदर्श थोड़ी साईड में दीवार से लग कर खड़ा हो गया . दीवार पर कनखियों से उसने नज़र डाली, ए-4 साइज के कागज़ पर ‘मर्दाना कमजोरी, सुस्ती, ढलती उम्र......सम्पर्क करें, हाशमी दवाखाना’ टाइप का ब्लैक एन्ड व्हाइट विज्ञापन ! चेहरे को थोड़ा विकृत करते हुये उसने नजर फ़ेर ली. बायीं जेब से अपना स्मार्टफ़ोन निकाला, उसका दहिना अँगूठा चौड़ी स्क्रीन पर उछल-कूद करने लगा . सेटिंग में जाकर ब्राइटनेस बढाई और फ़ेसबुक खोल फटाफाट लॅागिन कर डाला, ज़ुकरबर्ग बाबा की चौपाल में हाज़िर ! फ्रेण्ड-रिक्वेस्ट ? स्वीट एन्जल ! उसने झट से प्रोफाइल खोला और चेक करने लगा, नाम- स्वीट एन्जल , उम्र- 27 वर्ष, ग्रेजुएट, इन्ट्रेस्टेड इन मेन एण्ड वीमेन ! किताबें पढना और नये दोस्त बनाना पसन्द है. प्रोफाइल पिक्चर ? आदर्श ने प्रोफाइल पिक्चर के लिंक पर टच  किया और चित्र के सामने आने का इन्तज़ार करने लगा, ओह! नेटवर्क इरॅर ! उसने पेज़ रीफ़्रेश किया . पेज़ ओपन होने पर तस्वीर की जगह लिखा हुआ था- ‘बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला’. मुँह में कुछ बुदबुदाते हुये आदर्श ने फोन लॅाक किया, और फिर ज़ेब के हवाले . “स्वीट एन्जल! न जाने कैसे-कैसे लोग हैं, फेक आईडी बनाकर लोगों को डिस्टर्ब करते रहते हैं”.

लाइन जस-की-तस पड़ी हुयी है, अंकल जी बड़ी शिद्दत से अपनी  नाक की सफ़ाई कर रहे हैं . महिलाओं की पंक्ति पुरुषों की अपेक्षा काफ़ी छोटी है, सो कुछ स्मार्ट लोग किसी तरह से ‘स्त्री-शरीर’ के जुगाड़ में लगे हुये हैं ताकि आसानी से टिकट हथिया सकें. आदर्श एक अच्छी सी गाली उच्चरना चाहता है, लेकिन अपने कपड़ों का ध्यान कर रह जाता है . कपड़े, जो ओहदे का अहसास कराते हैं. एक प्राइवेट कम्पनी में सेल्स मैनेजर के पद पर कार्यरत है आदर्श. सुबह ऑफिस पहुँचा ही था कि मौसी का नाम मोबाइल स्क्रीन पर चमका, फोन कान से लगाते हुए आदर्श ने खुद को सेवाकार्य के लिये तैयार कर लिया . कुशल-मंगल पूछने के बाद आसीस देते हुए मौसी उस बात पर आ गयीं, जिसके लिये आदर्श खुद को तैयार कर रहा था- “बेटा ! तुम तो जानते हो, आजकल ये भी घर से बाहर निकलते नहीं और अब उमर भी तो हो गयी है” “निशा की पुणे वाली बुआ को तो जानते हो, एक बार तो आयी थी तुम्हारे रहने में, देखा होगा तुमने”. आदर्श बीच-बीच में ‘हूँ’ ‘हाँ’ करके अपनी भूमिका निभा रहा था. “कह रही थी, भाभी एक बार घूम जाओ....बच्चों को भी साथ लाना” “मैं सोच रही थी बेटा, तुम टिकट निकलवा देते तो अच्छा होता” “देख लो तुम्हें कोई दिक्कत न हो तो.....” “ठीक है, मौसी. हो जायेगा......” आदर्श ने मौसी को आश्वासन दिया . “ जुग-जुग जियो बेटा, मातारानी की कृपा तुम पर बनी रहे और थोड़ा खाया-पिया करो, बहुत दुबले होते जा रहे हो......” आदर्श ने फोन कट किया और कुर्सी पर थोड़ी देर के लिए फैळ गया.  

टिकट मिलने की कोई गुंजाइश अब आदर्श को दिख नहीं रही थी , और इससे अधिक तप वह कर भी नही सकता था . इसलिये उसने वापस आने का निश्चय किया और ऑफिस जाने की बजाय सीधे कमरे पर चला आया . कमरा, एक बैचलर के कमरे जैसा ही . कपड़े चेन्ज कर आदर्श बिस्तर पर लेट गया और मोबाइल पर नज़रें गड़ा दी . एक मैसेज था, उसी स्वीट एन्जल का – “हाय ! मैं नताशा , प्लीज एड मी.” आदर्श ने रिक्वेस्ट स्वीकारी और दोनों ने चैटिंग शुरू की . परिचय संबंधी संवाद हुआ , अचानक ‘बॅाय’ कहकर नताशा चली गयी, ऑफलाइन !

अगली सुबह, जैसे ही आदर्श ने लॉगिन किया, नताशा का मैसेज मिला- “अब उठ भी जाओ यार ! कितना सोते हो ? गुड मार्निंग.” आदर्श  के लगातार आते सवाल उसकी उत्सुकता का परिचय देते थे, जिनमें से एक-तिहाई सवालों के जवाब ही नताशा दे पाती . आदर्श ने चालीस मिनट के संवाद में तीसरी बार पूछा था- “तुमने अपनी पिक्चर क्यों नहीं लगायी  ?”   “ओह ! यार, छोड़ो भी........लगता है, तुम्हें कुछ काम नहीं. लेकिन मुझे है......चलती हूँ, बॅाय ! फिर मिलेंगे .” एक बार फिर से टालकर नताशा चली गयी .

आदर्श ख़ुश था, उत्साहित भी. आदर्श के जीवन में फेसबुक और फेसबुक में आदर्श की दिलचस्पी समय के साथ बढती जा रही थी . दिन का चौथाई और रात का आधा हिस्सा नताशा की पोस्ट्स को बार-बार पढ़ने, लाइक और कमेण्ट करने में बीतता. नताशा अपनी वॅाल पर जिन्दगी से जुड़ी बहुत सारी बातें, अनुभव, कोटेशन और पिक्चर्स आदि साझा करती थी . आदर्श के लिए सबकुछ बहुत खूबसूरत था. ‘ग्रीन सिग्नल’ मिलते ही दोनों चैटिंग शुरू कर देते . नताशा ऑनलाइन थी, आदर्श ने चैट शुरू की. हाय-हेलो के बाद फिर से पूछ ही लिया, “तुम अपनी प्रोफाइल पिक्चर क्यों नहीं अपलोड करती ?” पाँच मिनट के इन्तजार के बाद नताशा का जवाब मिला- “यार ! मैं एक लड़की हूँ, मेरे लिये यह सेफ़ नहीं. मैं फेसबुक पर अपनी फोटो सबके साथ साझा नहीं कर सकती.”

“क्यों ? दुनिया में तुम्हीं तो एक लड़की हो !” “अच्छा ! मुझे तो भेज सकती हो न ?”

“हाँ ! तुम मेरे रिश्तेदार लगते हो, न ? तुमसे तो मैं कभी मिली भी नहीं, तुम पर कैसे भरोसा कर लूँ ?”  यह कहते हुये भी अपनी एक पिक्चर मैसेज़ बॉक्स में भेज कर नताशा ने जल्दी से लॅाग आउट कर लिया, मानो कोई उसका परीक्षाफल बताने जा रहा हो और वह असफ़ल होने के डर से सोने का बहाना कर रही हो, सुनना न चाहती हो . यह बात जरूर सोचने वाली थी, नताशा का एक अजनबी को फ़ोटो भेजना उचित था अथवा अनुचित . लेकिन  प्यार उचित-अनुचित की परवाह कब से करने लगा . नताशा के साथ भी कुछ ऐसा ही घट रहा था, और प्यार के दस्तक देने की सूचना उसे भी अब जाकर कुछ-कुछ मिली थी . यह भी अज़ीब ही है कि कुछ दिनों के फेसबुकिये वार्तालाप में ही, जिससे कभी मिले नहीं उसके लिए प्यार जैसा कुछ महसूस होने लगता है . लेकिन इसे मात्र सतही आकर्षण कहकर सहज नहीं किया जा सकता, जरूर यह उससे अधिक था, कुछ और भी . संभवतः यह व्यक्ति की संवेदनाओं और सृजनशीलता का ही परिणाम है, दरअसल हमारे साथ जो कुछ भी घट रहा होता है, उसे लेकर शुभ-अशुभ कल्पनाओं में ही हम जीने लगते हैं. और फिर सबकुछ कितना करीब महसूस होने लगता है, मानव-मन के विकार भी शायद यही हैं . और जीवन का अकेलापन ऐसा होने को और भी सुलभ बनाता है .

खैर, यह नताशा का धैर्य था या फिर मन को संयत करने के लिये आवश्यक समय, फोटो भेजने के लगभग 32 घण्टे बाद अब जाकर धड़कते दिल के साथ उसने फेसबुक खोला . नताशा का इनबॉक्स भर गया था, उस एक फोटो पर आदर्श ने हर घण्टे एक से दो कॉम्प्लिमेंट दिए थे . ब्यूटीफुल, प्रीटी, लवली, क्यूट , स्वीट और भी बहुत कुछ. नताशा की ख़ुशी उसे इतने कमेंट्स पढ़ने की अनुमति भी नहीं देती थी.

आदर्श ऑनलाइन दिखा, नताशा ने टाइप किया- “ ऑर यू  क्रेज़ी ! इतनी भी क्या तारीफ़, मैं सच में कोइ ‘एन्जल’ थोड़े ही हूँ.” आदर्श ने प्रशंसा के दो-चार शब्द और लिख दिए.

“फ़ोटो तो देख चुके, अब क्या फैसला किया ? दोस्ती को यहीं विराम दें !”

“तुम्हें क्या लगता है , इतने दिन से इस फ़ोटो के लिए मैं अपनी जिन्दगी के अधिकांश पल तुम्हारे साथ जीता रहा, और कैसा फ़ैसला ?” आदर्श ने आगे लिखा- “तुम्हें याद है, उस दिन मैंने तुमको ‘आई लव यू’ कहा था, और तुम! तुमने रिप्लाई किया था- “क्या बात है यार ! तुम भी मुझसे प्यार करते हो और मैं भी खुद को बहुत प्यार करती हूँ .” “याद आया ? अच्छा, अब तुम भी कुछ कह दो, न !”

“क्या ?”

“कुछ भी.”

“बताओ, क्या कहूँ !”

“अरे कुछ भी, जो तुम्हारा दिल करे.....तब से मैं ही तो बोल रहा हूँ, तुम तो कुछ कहती ही नहीं.”

“अच्छा ! चलती हूँ , अपना खयाल रखना. और फेसबुक की बजाय खुद को समय दो.”

नताशा फिर चली गयी, यह उसकी शर्म नहीं बल्कि उसके दिमाग को मन-मेघों द्वारा पूरी तरह आच्छादित न कर पाने के संकेत थे. उसके मन पर उसके दिमाग का शासनकाल अभी शेष था, जब तक कि प्रेम का भूत पूरी तरह उस पर सवार न हो जाए.

नताशा के मन, इच्छाओं और वक्त तथा परिस्थितियों के बीच जैसे ‘रेस’ चल रही थी, कभी वक्त के आगे उसकी इच्छायें घुटने टेकती नज़र आतीं तो कभी उसका मन वक्त से नज़रें चुरा परिस्थितियों से बचकर आगे निकल जाता. इन सब के बीच नताशा ने आज आदर्श को अपना मोबाइल नम्बर आखिरकार दे ही दिया. अब फोन पर बातें होतीं, वही पुरानी बातें तोड़-मरोड़ कर कलात्मक ढंग से पेश की जातीं, जैसे दोनों प्रखर वक्ता हो. अंतर बस इतना था, तब दृश्य-साधनों से सन्देश परस्पर पहुंचाये जाते थे, अब श्रव्य रूप में उनका आदान-प्रदान परस्पर होता था. बातचीत का सिलसिला उतार-चढ़ाव के साथ सुबह-शाम की भांति चल रहा था. आज आदर्श ने नताशा से मिलने के लिए ‘हाँ’ करवाने की जिद ठान रखी थी. तरह-तरह की धमकियां और कसमें देकर आखिर उसने हाँ करवा ली और बिना कहे फोन रख दिया.

आदर्श ख़ुश था, अपनी विजय पर. जबकि नताशा को बिल्कुल भी उत्साह नहीं था, लेकिन अब उसने निर्णय कर लिया था- आदर्श को हकीक़त से मिलाकर अपना सब कुछ हारकर भी वह अपनी दुनिया में वापस लौट आना चाहती थी, जहाँ वह है और उसके बेटे रोहन का पूरा भविष्य.

अगले दिन, निर्धारित समय पर आदर्श और नताशा आमने-सामने थे. आदर्श उत्साहित था किन्तु आश्वस्त, जबकि नताशा के मन में डर था और जल्दी भी. अपनी बातें कहने के लिए बेताब दोनों थे. आदर्श ने हँसते हुये कहा- “इतना प्यार करती हो बच्चों से , अभी से दूसरों के बच्चे साथ लेकर घूमने लगी.”

“यह मेरा बेटा रोहन है !”

“अच्छा ! तुम्हारा बेटा है, क्यों ? किसी पेड़ से तोड़कर लायी हो क्या ? इसका बाप कहाँ है ?”

“वो , अब इस दुनिया में नहीं रहा.”

“व्हाट ? क्या रोहन सच में तुम्हारा बेटा है, ऑर यू मैरिड ?”

“हाँ .”  

“ओके........”

थोड़ी देर के लिए, सबकुछ शांत हो गया, आदर्श, नताशा और आसपास की हर एक चीज़.

आदर्श ने धीरे से पूछा- “क्या हुआ था तुम्हारे पति को ? कोइ एक्सीडेंट था क्या ?”

“उसके मरने के कुछ दिनों पहले मुझे पता चला, जब वह हॉस्पिटलाइज्ड हुआ. उसे एड्स था, ही वाज़ एचआईवी पॉजिटिव.”  “भेंट-स्वरूप मुझे भी यह रोग लगाकर, रोहन के साथ मुझे छोड़कर वह हमेशा के लिये चला गया.”

आदर्श अवाक् था, नताशा बोलती गयी-“अब, मुझे भी एड्स हो चुका था. कैसे हुआ ? यह जानना ज्यादा जरूरी नहीं था, जैसा कि एड्स को लेकर हमारा समाज कुछ ज्यादा ही जागरूक है और आवश्यकता से अधिक समझ रखता है.”

“समाज की धारा से कटकर मैं रोहन के साथ जीवन-पथ पर बढ़ी जा रही थी, फिर तुम आए. जो कुछ भी हुआ, एक हादसा. मेरी असावधानी का परिणाम.”

“जानते हो आदर्श ! हम लोग पॉजिटिव होने से नहीं, बल्कि लोगों के, बाकी समाज के निगेटिव होने की वजह से मरते हैं.”  “वैसे ठीक ही करते हैं लोग, फिर जीने की इच्छा ही नहीं रह जाती......”

नताशा की सांसें गहरी मालूम होती थीं.

फिर से चुप्पी फैल गयी, इस बार अबोला थोड़ा लम्बा रहा.

जब हम बहुत ज्यादा सोच रहे होते हैं या फिर कुछ अधिक ही महसूस कर रहे होते  हैं, ऐसे में वाचिक शब्दों का अकाल सा पड़ जाता है .

“हाँ ! मैं तुम्हारी गुनहगार हूँ . मानती हूँ, मैंने धोखा किया तुम्हारे साथ, छिपाया, तुम्हारे करीब आती गयी, सब गलत था.”  “मुझ्रे सब कुछ पहले ही बता देना चाहिए था, लेकिन क्या तुम मुझे माफ़ नहीं करोगे ?”

“तुम, मुझसे शादी करोगी ?” आदर्श ने अपनी नज़रें नताशा के चेहरे पर गड़ा दी.

“क्या ? पागल हो गए  हो ? नहीं, कभी नहीं. यह कैसा प्रश्न है ?”

“प्लीज़, लौट जाओ आदर्श ! तुम्हारे लिए.....तुम्हारा भविष्य, तुम्हारा परिवार....सब कुछ तो है. प्लीज़ आदर्श.”  “और मुझे भी लौट जाने दो, अपनी दुनिया में.”

आदर्श के पास कहने को कुछ नहीं था, कुछ देर शांति........और फिर दोनों लौट गये, भटके हुये पथिक की तरह. न तो किसी को रास्ता पता था और न ही मंजिल तय थी.

दिन बीत रहे थे , आदर्श को पिछली सारी बातें याद आती है, वह अपनी ही बातों को डायलॅाग की तरह दोहराता है, आदर्श के साथ हमेशा ही ऐसा होता है. जब भी वह खाली होता है या लेटा होता है वह अपनी ही बातों को मन ही मन दोहराता है, किसकी किस बात का उसने किस तरह जवाब दिया था, कब उसका लहज़ा एकदम सटीक था और कब उसे थोड़ा आराम से बोलना चाहिए था . और ऐसा करते हुए कभी-कभी वह जोर से बोलने लगता है. आदर्श नहीं जानता, और लोग भी ऐसा करते हैं या सिर्फ यह उसके अकेले की कला है. नताशा के एक-एक  शब्द, फोन पर बात करते हुये उसका अंदाज, सबकुछ आदर्श के ज़ेहन में दर्ज़ है. कब वह बात करते हुए अचानक से एकदम चुप हो जाया करती थी, ऐसा लगता था जैसे उसकी आवाज़ कुछ आर्द्र हो आयी हो, लेकिन फिर जब बोलती, तो बिल्कुल सामान्य. आदर्श ने इस बारे में कई बार पूछा भी था, लेकिन वह हंस कर या किसी और बहाने से टाल जाती.

नताशा के ‘हाँ’ कहने भर की देरी थी, उसने सन्डे का भी इन्तज़ार  नहीं किया. ऑफिस से छुट्टी ले वह मिलने के लिए पहुँच गया था, निकलने से पहले उसने तीन बार अपनी हेयर-स्टाइल बदली. हर बार उसे कुछ अजीब सा लग रहा था, और आखिर में बाल वैसे ही कर लिए, जैसा वह प्राय: पीछे की ओर कंघी करता है. शर्ट के साथ भी ऐसा ही हुआ, नयी शर्ट जो उसने बनवायी थी. पहनने पर उसे कंधे कुछ झूलते हुये लग रहे थे, और कॅालर भी बड़ा लग रहा था . ये दर्जी भी साला ! हर बार कुछ न कुछ नया कर के देता है, सारी ‘क्रिएटिविटी’ मेरे कपड़ों पर ही दिखानी होती है इसे. शिकायत करने पर रटा-रटाया जवाब मिलता है, ‘सर ! मार्केट में यही नया ट्रेंड है, आप केयर करियेगा.’ खैर, आदर्श ने अपनी ब्लू शर्ट निकाली और उसे पहन कर गया, नयी वाली का ‘माइल्ड ग्रीन’ कलर भी उसे जम नहीं रहा था.

बस में चढ़ते हुए भी वह बहुत ख़ुश था, बस थोड़ी ही दूर गयी थी कि उससे कुछ अधिक उम्र की एक महिला अपने दो बच्चों के साथ बस में चढ़ी. आदर्श ने सहर्ष अपनी सीट ऑफर की और खुद सीट से लगकर खड़ा हो गया. बीच-बीच में बच्चों को देखकर मुस्कुराता भी रहा. आज पूरे रास्ते आदर्श अपनी सीट दूसरों को देकर खड़े ही सफ़र कर सकता था. लेकिन अगले दो स्टॉपेज के बाद बस पूरी तरह भर गयी, जितने लोग बैठे हुए थे, लगभग उतने ही लोग खड़े भी थे. आदर्श समझ गया कि अगर यही हालत रही तो, पहुँचते-पहुँचते उसके कपड़ों की दशा दर्शनीय नहीं होगी. खास करके पीछे वाले अंकल जी, जरा सा भी ब्रेक लगता या बस उछड़ती , ऊपर ही ढह जाते. एक-दो बार होने के बाद आदर्श ने उन्हें सविनय, पकड़ के खड़े रहने की सलाह दी, लेकिन वह सज्जन तो जैसे मन बना के चढ़े थे कि आज पूरा रास्ता आदर्श के सहारे ही गुजारना है. और आखिरकार उस महिला के उठते ही यथाशीघ्र आदर्श ने अपनी सीट पुनः ग्रहण की. आदर्श पहुँचा, तो अभी नताशा नहीं आयी थी. कॉल करने पर पता चला कि अभी दस मिनट में वह वहां होगी. मौके का लाभ ले आदर्श सामने दिख रहे सैलून में पहुंचकर अपना चेहरा फिर से दुरुस्त कर लिया.

हर दिन, पुरानी बातों का सिलसिला रुक-रूककर आदर्श के सामने फ़्लैशबैक की तरह चलता रहता. आदर्श ने बाहर जाना बहुत कम कर दिया था, ऑफिस से भी छुट्टी लेने लगा था, फेसबुक तो लगभग बंद ही हो गया. वक्त गुजर रहा था, आदर्श को नहीं लगता कि उसे प्यार में धोखा मिला है, उसने तो धोखे से प्यार पाया था. अगर नताशा सबकुछ पहले ही बता देती , तो शायद वह नताशा से मिल नहीं पाता.

अब , फोन पर भी वार्तालाप संक्षिप्त हो गया था, न उत्साह था......न ही स्वप्न. हकीक़त ने जैसे सबका ग्रहण कर लिया था. नताशा फोन करती, पूछती-

“कहाँ  हो ? कैसे ?...........मुझे माफ़ नहीं किया ?”

आदर्श के पास इन सारी बातों का कोई जवाब नहीं था, बस एक प्रश्न था- “क्या तुम मुझसे शादी कर सकती हो ?”  और फोन कट जाता.

कुछ दिनों तक  ऐसे ही चलता रहा. नताशा के पास अब ज्यादा वक़्त नहीं था, वह अच्छी तरह जानती थी. उसने आदर्श को फोन कर बुला लिया- “हाँ, मैं शादी के लिए तैयार हूँ , तुम आ जाओ .”

आदर्श को इस जीत की कोई ख़ुशी न थी, बस संतोष था, इस बात का कि वह नताशा के लिये कुछ कर पा रहा है, शायद उसे कुछ दे सके.

नताशा का संशय ठीक था, उसका अनुमान सही साबित हुआ. शहर के एक होटल का ‘डेकोरेटेड हाल’,   आदर्श के कुछ दोस्तों और सहकर्मियों की मौजूदगी में ‘इंगेजमेंट’ की पार्टी के बाद नताशा सिटी हॉस्पिटल के प्राइवेट वार्ड में थी. नताशा न ख़ुश थी.....न ही निराश ! बस स्तब्ध थी और क़िस्मत का करिश्मा निहारे जा रही थी .

“कहाँ ले जाती, ये सुंदरता मुझसे छिपाकर ?” आदर्श नताशा के बेहद क़रीब आ गया था .

नताशा ने धक्का देकर अपने को अलग कर लिया, “मुझे एड्स है, आदर्श ! क्या चाहते हो......चिल्ला-चिल्लाकर कहूँ ?”

“क्यों ? ये बचे हुये लम्हे भी मुझे अपने साथ जीने का हक नहीं दोगी ,

क्या ?”

नताशा की आँखों से आंसू बहे जा रहे थे, “नहीं, कभी नहीं. मैं तुम्हें मौत से भी बदतर इस जिन्दगी के लिए न्यौता नहीं दे सकती..........तुम्हें जीना होगा, आदर्श ! मुझसे दूर रहकर, मेरे लिए......रोशन के लिए......”

“तुम ! जीओगे, न...... हाँ ! तुम जरूर जीओगे और मुझे भी अपनी यादों में जिन्दा रखना.”

“रोशन कहाँ है ? आदर्श !....जरा, उसे बुलाना.”

आदर्श दौड़ता हुआ बाहर गया. जब तक वह रोशन को साथ लेकर आता , नताशा एक बार फिर बना बताए...... ‘बॅाय’ कह कर जा चुकी थी.

नताशा के जाने के बाद आदर्श ने घर के पीछे एक समाधि जैसा बनवाया है, जहाँ वह अपनी यादों को ताजा करने के लिये जाता रहता है .

नताशा को गए हुये आज तीन साल हो गया , आदर्श फिर से फेसबुक के साथ जिन्दगी जीना सीख गया है, लेकिन अब वह अपना नहीं बल्कि नताशा का अकाउंट चलाता है  और उत्साह के साथ रोशन के लिये अपनी जिंदगी का एक-एक पल खर्च किए जा रहा है. उसने दो घण्टे पहले फेसबुक पर अपडेट किया था-

“दोस्तों ! जा रहा हूँ, अपने यार से मिलने........कुछ बातें करनी है . हाँ ! सही समझा. नताशा ! उस से कहूँगा कि खुदा से कहे- अगर वह दे सके तो तुम्हारी बाकी की जिन्दगी भी मुझे दे दे, क्योंकि मुझे प्यार हो गया है, इस जिन्दगी से. अब मैं जीना चाहता हूँ..........नताशा के लिए , उसके रोशन के लिए.............और उसके आदर्श के लिए भी .”

छ: साल का रोशन आदर्श की गोद में बैठा हुआ है, और अपनी नाजुक अंगुलियों से आदर्श की ठोढ़ी को छूकर ‘सेपल्चर’ पर खुदे हुए शब्दों का मतलब पूछता है........

“एचआईवी का वायरस किसी की ज़िन्दगी छीन सकता है, दो जिस्मों के मेल के बीच दीवार बन सकता है लेकिन दो रूहों के बीच मोहब्बत को कम नहीं कर सकता. जिन्दगी खत्म हो जाती है , मोहब्बतें फिर भी जिन्दा रहती हैं..................आई लव यू , नताशा ! एण्ड इट्स फॉरएवर.”

 

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