सिनेमा को आज साहित्य की एक विधा के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। साहित्य अर्थात मानव के लिये हितकर पठनीय सामग्री। अब सिनेमा हितकर है या नहीं; इसपर भले ही अलग-अलग मत मिल जायें; किन्तु यह निर्विवाद तथ्य है कि सिनेमा-साहित्य का जादू जमाने के सिर चढकर बोलता है। और इस साहित्यिक करिश्मे की उम्र अभी मात्र सौ वर्ष ही है।

सौ वर्ष पूर्व दुंढीराज गोविन्द फालके को यह उम्मीद नहीं थी कि उनके क्रान्तिकारी विचार का भारत में कोई स्वागत करने वाला भी ना होगा; जबकि वह दौर भारत की आजादी के लिये दीवाने क्रान्तिकारियों का था। फिल्मों के लिये क्रान्तिकारियों ने भले उपेक्षा बरती हो, फिल्मों ने क्रान्तिकारियों का बहुत सहयोग किया। 1937 में सवाक फिल्में बनना शुरु हुई तो फ़िल्म ‘आनन्द मठ’ का ‘वन्दे-मातरम’ तो आजादी का मूल-मन्त्र ही बन गया। ‘आनन्द-मठ’ उपन्यास की रचना संभवतः ईस्वी 1882 तक हुई, इसीमें रचित गीत को 1951 में हेमेन गुप्ता ने अपनी बांग्ला फ़िल्म ‘आनन्दमठ’ में लिया। हेमेन गुप्ता का क्रान्तिकार्य से सम्पर्क होना संभव है, क्योंकि बंगाल उस समय सभी क्रान्तिकारियों का प्रशिक्षण-केन्द्र था। क्रान्तिकारियों में यह गीत एक प्रेरक-मन्त्र की तरह स्वीकृत हो चुका था; और क्रान्तिकार्यों के लिये जन-सामान्य का मन सदैव नत-मस्तक रहता है; तो हेमेन गुप्ता ने जनता की पसन्द को फ़िल्माया; यही जन-रंजन फ़िल्मों की असाधारण सफ़लता का सूत्र बना है। इस तरह अपनी शैशवावस्था से ही फ़िल्मों का सामाजिक/सांस्कृतिक योगदान सिद्ध है।

 

साधु-सन्तों से लेकर शिक्षाविदों-सामाजिक नेताओं तक और सामान्य गृहस्थों से लेकर आम-जन तक ने फिल्म-विधा को साहित्य में शुमार करने से नकारा था। ‘राजा हरिश्चन्द्र’ जैसे जन-श्रद्धास्पद नाम के बावजूद हीरोइन बनने के लिये वैश्याओं तक ने इन्कार किया तो एक सुन्दर युवक ‘अन्नाहरि सालुंके’ को रानी तारामती बनाकर काम चलाना पड़ा था। आज मल्लिका सहरावतों और शर्लिन चोपड़ाओं के नक्से-कदम पर चलकर ‘प्ले-बॉय-कवर’ पर छपने को हज्जारों कुलीन बालिकायें तैयार हो जायें, तो परिवार-समाज के पास सहमति के सिवा कोई रास्ता भी नहीं है; यह परिवर्तन सिनेमा की ही देन है। साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है; थोड़ा और ऊपर उठकर यह भी कह दिया जाता है कि साहित्य समाज-परिवर्तन में कारक बनता है। अब गत सौ वर्षों में सर्व-समाज को बदलने की छोड़िये; समाज का दर्पण कहलाने लायक कौनसा छपा साहित्य आया? सामाजिक जागरण में लगी अनगिनत संस्थाओं में कितनी होंगी, जिनका महत्व निर्विवाद हो? महात्मा-गाँधी को छोड़कर कितने राजनेता सौ-सवासौ करोड़ जनता के दिल को छू पाये? इस तुलना-सूची को लम्बा करने की बजाय सिनेमा के प्रभाव को बिन्दु-बिन्दु उकेर दिया जाये, तो बात एकदम स्पष्ट हो जायेगी –

  • 3 मई’1913 को भारत की पहली फ़िल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ की एक ही रील बनी थी। चाहें तो उसे पहली ‘हिन्दी-फिल्म’ का गौरव दें, बाकी इसके निर्माता-निर्देशक-सितारे-केमरा-टेकनीक आदि सभी ‘खांटी-मराठी-माणुस’ हैं। ‘हिन्दी-मराठी-भाई-भाई’ का यह उद्घोष भले ठाकरे-बन्धुओं को अखरे, किन्तु हिन्दी सिनेमा ने इस स्वर को लगातार ऊँचा किया है। सबके विरोध और उपेक्षा को सहते हुये आज स्थिति यह है कि सलमान की ‘किक’ के हजारों प्रिन्ट एकसाथ सारी दुनियां में रीलीज होते हैं, और कई जगह सप्ताह भर हाऊस-फुल के बोर्ड चमकते हैं; जरा शंकराचार्य जैसी धार्मिक-संस्थायें स्वयं को जांचकर देखलें कि उनके चेले-चपाटे उनकी कितनी सुनते हैं और कितने दिन तक सुनेंगे-मानेंगे? ‘सांई-राम’ विवाद ने कईयों की कलई उतार दी है।

 

  • दादा साहेब फ़ालके ने अपनी हीरोईन (!) को; जो दस रुपया मासिक वेतन पर किसी रेस्टोरॉन्ट में काम करता था; उसे मात्र 15/- प्रतिमाह का लालच देकर खींचा था। फ़िल्म में एक्टिंग के साथ-साथ सिनेमेटोग्राफी का काम भी उसीके जिम्मे था, अर्थात फिल्म-निर्माण-प्रक्रिया में टीम-वर्किंग का मेहनती और महत्वपूर्ण हिस्सा रहे सालुंकेजी; जबकि आज कैटरीना-दीपिका-करीना करोंड़ों का करार पूरे नाज-नखरों सहित पाती है, ‘सेलिब्रिटि’ कहलाती है।

 

  • शिक्षा, धर्म, समाज-सुधारक और राजनेता आदि मिलकर जो प्रभाव आम आदमी के मानस पर नहीं छोड़ पाते, वह कार्य सिनेमा के ‘आमीर’ तालियों की गड़-गड़ाहट के साथ कर देते हैं। अमिताभ की पुकार पर दुनियां भर से सैलानी ‘गुजरात में कुछ दिन बिताने’ आ जाते हैं। प्रधान-मन्त्री बनने के लिये लता मंगेशकर का द्वार खटखटाते हैं मोदी! संजयदत्त के लिये ‘टाडा-कानून’ के नियमों को ढीला होना पड़ता है, जबकि केन्द्रीय मन्त्री महोदय ‘राजाजी’ और सन्त-शिरोमणि आसारामजी की बेल पाने की आशाओं पर बार-बार तुषारापात होता है। यह है सिनेमा का प्रभाव! सिनेमा के लिये सलमान का यह डायलॉग उल्लेखनीय है, - ‘मेरे बारे में  ज्यादा मत सोचो। दिल में आता हूँ, समझ में नहीं आता।’

 

  • जो-जो संस्थायें सिनेमा का घनघोर विरोध करती थी, उन सभी की एक-एक करके बखिया उधेड़ रही है सिनेमा। शिक्षा, राजनीति, सम्भान्त-कुल-परिवार, सामाजिक नेता आदि सभी पर चोट करती हैं फ़िल्में और चोट जोरदार होती है, तब भी ‘ओह माय गॉड!’ मुँह पर आते-आते रुक जाता है कि कहीं परेश रावळ न फंसा दे! धर्मनीति, अर्थनीति, न्याय-नीति, समाजनीति और सेक्सनीति सहित सभी नीतियों पर सिनेमा का असर पड़ा है। भारत में सम-लैंगिक विवाहों का प्रभावी रूप से चर्चा में आना ही कल तक हास्यास्पद लगता था, अब तो सब ‘दोस्ताना’ सा होने लगा है। ‘मैं अपने हनीमून पर अकेली आई हूँ’ जैसा डायलॉग ‘रानी-क्वीन’ को सौ-करोड़-क्लब में शामिल करवा देता है। पोर्न-स्टार लियोनी को न सिर्फ दर्शक स्वीकार कर लेता है, बल्कि उसे ‘किसी की पत्नी’ होने का सुख-गौरव भी मिल जाता है। माना कि भारत में ‘विश्वामित्र’ को ‘राजर्षि’ होने का समानजनक स्थान प्राप्त है, माना कि यहाँ ‘मेनकाओं’ को भी स्वीकारा जाता है; किन्तु हिरोईनों का कपड़ों की तरह ब्वाय-फ़्रेन्ड बदलने के अनगिनत प्रसंग जग-जाहिर होने पर भी उनके ‘स्वयंवर-समारोहों’ के लाईव-शो पर प्रतिष्ठित ‘कुँवारों’ का कतार-बद्ध खड़े होना तो भारत की नवीनतम पहचान ही कहा जायेगा ना! और यह पहचान सिनेमा की देन है।

 

  • टीवी के परदे पर सिनेमा घर-घर में बैठकर राज कर रहा है। ‘प्राइम-टाईम-शो’ के लिये पूरे परिवार की दिनचर्या तक बदल दी जाती है। आजकल सांस्कृतिक आयोजनों में दर्शक नहीं जुट पाते, कि कोई रामायण-महाभारत या सत्यमेव जयते का शो छोड़ना ही नहीं चा्हता। टीवी और सिनेमा का फर्क तेजी से मिटने लगा है। उम्र के आठवें दशक पर भी महानायक अमिताभ बच्चन को केन्द्र में रखकर फ़िल्में और टीवी सीरीयल की स्क्रिप्ट बनती है। कौन कहेगा कि फ़िल्मी नायकों को थोपा जा रहा है; जबकि स्वतन्त्र भारत के प्रथम राजनैतिक संगठन के नैतृत्व के बारे में आमजन सहित स्वयं उसी दल के लोग ऐसा कहने लगे हैं। अर्थात राजनीति का ग्राफ़ नीचे की तरफ़, फ़िल्मों का ग्राफ़ ऊपर की तरफ़! अब तो राजनीति का ग्राफ़ थोड़ा ऊपर करने या नीचे जाने से रोकने के लिये भी फ़िल्म से जुड़े लोग ही बुलाये जाते हैं; और उनके गैर-कानूनी, अनैतिक कामों को सरकारी कवच प्राप्त हो जाता है। 

 

  • साहित्य की हर विधा को अब बनाने-संवारने लगी हैं फ़िल्में! ध्यान से देखा जाये तो कहानी-गीत, नृत्य-संगीत, नाटक-तमाशे, चित्रकला-मूर्तिकला-भवन निर्माणकला, उत्सव-मेले, रीति-रिवाज आदि हर साहित्यिक-सांस्कृतिक विधा पर फ़िल्मी प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है। समाज से ही सारी खुराक पाकर अब फ़िल्में इस कदर ‘वयस्क’ हो गई हैं कि समाज को समझाने-चलाने-नियंत्रित करने की भूमिका में हैं। दक्षिण भारत के एनटी रामाराव, एमजी रामचन्द्रन से लेकर चिरंजीवि तक सिनेमा पर्दे से होते हुये राजनेता और फ़िर मन्दिरों वाले भगवान का स्थान प्राप्त कर चुके हैं। रजनीकान्त से बड़ा जन-नायक कौन है आज? स्व-घोषित ‘जगद्गुरुओं’ और मीडीया द्वारा उठाये-गिराये-नचाये-जिताये गये केजरीवालों-मोदियों के लिये आत्म-मन्थन का अवसर बनाया है फ़िल्मों ने। आम आदमी को जितना सिनेमा ने पढा-गढा है, उतना पढने-गढने का ‘मनोकुमारिय दावा’ अन्य कौन करेगा? “रोटी-कपड़ा-मकान के साथ कितना पढूं जमाने को, कितना गढूं जमाने को” याद करें।

 

  • दादा साहेब फ़ालके ने यह तकनीक हॉलीवुड से उठाई। 1910-11 में जब विश्व-मानस प्रथम-विश्वयुद्ध की आशंकाओं  में डूब-उतरा रहा था, भारत का यह लाल स्वामी विवेकानन्द के ‘विश्वगुरु-भारत’ सपने को साकार करने वाली इस नितान्त उपेक्षित विधा पर माथा खपा रहा था। आज के ‘प्रथम राजगुरु’ बाबा रामदेव और ‘प्रथम जनसेवक’ मोदी के ‘भारत-मा’ दावों की सचाई को देखना अभी बाकी है, किन्तु ‘सिने-मा’ के सर्व-व्यापी प्रेम की धारा में तो आबाल-वृद्ध नर-नारी निमज्जित ही हैं।

अक्सर हिन्दी कहानी लेखकों पर हालीवुड फिल्मों की चोरी का आरोप लगता है, यह बात दो आयामों में गलत है। पहली बात तो यह कि साहित्य में लेन-देन चलता है, शुभ है। दूसरी बात यह कि सिनेमा मूलतः मनोरंजन का माध्यम है। छपे साहित्य की तरह सिनेमा समाज-सुधार का कोई बड़ा दावा नहीं करता। इन दोनों बातों से बढकर तथ्य यह भी कि मनोरंजन की भाषा साजिद और फहरा खान की तरह भारत के निर्देशक बेहतर समझते हैं। इसका बेहतर नमूना है सलमान की ‘किक’। भारत की हाल-फ़िलहाल प्रदर्शित हुई सौ-करोड़ी-फ़िल्मों की भेलपूरी बनाकर पेश कर दिया है साजिद नदियादवाला ने।

 

आगे देखते हैं कि इस धार के प्रहार से कौन बचता है, कौन इस धारा में बहता है और कौन-कौन इस प्रवाह के दुष्परिणामों को भाँप कर भावी भारत को बचाने के लिये प्रयत्नशील होता है। जय हो!

 

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