भूत से मिलना है, भूत को जानना है तो आइए आ लोगों को भूत (काल) में ले चलता हूँ। काफी पुरानी बात, घटना। शाम का समय था। गाँव के बाहर रमैनी साहू के बगीचे में कुछ गँवई लोग जमा थे। कुछ तो अपने मवेशियों के साथ थे तो कुछ अपनी बकरियों के। रामखेलावन तो लग्गी से सूखी लकड़ी तोड़ने में लगा हुआ था। दरअसल रमैनी साहू का बगीचा बहुत ही बड़ा लगभग 8-9 एकड़ में फैला हुआ था। इसमें आम के पेड़ों की बहुलता थी। देशी के साथ ही दशहरी और मालदह के पेड़ थे। बीच-बीच में कहीं-कहीं महुए आदि के भी पेड़ थे। यह बगीचा गाँव वालों के सुख-दुख का साथी था। रमैनी साहू ने बगीचे में एक ओर किनारे खपड़ैल का एक छोटा घर बनवा दिया था और साथ ही एक कुआँ भी खुदवाया दिया था। रामखेलावन को इस बगीचे की देख-रेख का जिम्मा सौंपा गया था। रामखेलावन का घर-परिवार, उठना-बैठना सबकुछ इस बगीचे तक ही सीमित था। रामखेलावन के पहले, उसके पिताजी इस बगीचे की देख-रेख करते आ रहे थे, और उनके बाद यह जिम्मेदारी रामखेलावन निभा रहा था। रमैनी साहू गाँव वालों को कभी भी इस बगीचे में आने से मना नहीं करते थे। यहाँ तक कि गाँव के लोग-बाग अपने मवेशियों, बकरियों आदि को इस बगीचे में चराया भी करते और थोड़ी बहुत सूखी लकड़ी भी तोड़ लेते। कभी-कभी तो लोग रमैनी साहू से पूछकर कोई डाल आदि भी काट लेते और बगीचे में उत्तर तरफ की बसवाड़ी में से बाँस भी। हाँ पर रमैनी साहू एक काम बराबर करवाते, बगीचे में अगर कोई पेड़ सूख आदि जाता या आँधी आदि में गिर-उर जाता तो वे तुरंत नया पौधा लगवा देते और बगीचे के कुएँ से नियमित उसे पानी आदि दिलवाते और उसे पेड़ की शक्ल देने के बाद ही चैन लेते। दरअसल रमैनी साहू को पेड़-पौधों से बहुत ही प्रेम था। वे इन्हें प्रकृति का अनुपम उपहार और महत्वूर्ण अंग मानते थे।

हाँ, तो लकड़ी तोड़ते-तोड़ते अचानक राम खेलावन की नजर कुएँ की ओर गई। उसने क्या देखा कि एक छोटा बच्चा कुएँ की जगत पर चढ़ने की कोशिश कर रहा है। लकड़ी तोड़ना छोड़कर वह चिल्लाते हुए कुएँ की ओर दौड़ा। उसकी चिल्लाहट सुनकर और भी लोग उसके पीछे-पीछे भागे। अरे यह क्या कुएँ के पास जाने पर तो उसे कोई बच्चा दिखाई नही दिया और ना ही उसे कुएँ में कुछ गिरने की आवाज ही आई। कुएँ में झाँककर देखा गया तो उसका जल एकदम शांत था। राम खेलावन एकदम पसीना-पसीना हो गया था और साँस ले-लेकर बोल रहा था कि उसने एक बच्चे को जगत पर चढ़ते हुए देखा था। खैर लोगों को लगा कि शाम का समय है, हो सकता है कि उसे भ्रम हो गया हो। लोग फिर अपने मवेशियों की ओर लौटने लगे ताकि उन्हें हाँककर गाँव की ओर बढ़ जाएँ। राम खेलावन भी तोड़ी हुई लकड़ियों को इकट्ठा करने में जुट गया था पर रह-रहकर उसका ध्यान उस कुएँ की ओर चला जाता। वहीं पास में बैठे, तंबाकू मल रहे नेवची काका का ध्यान बराबर राम खेलावन पर था। उन्होंने तंबाकू मलने के बाद उसमें से थोड़ा राम खेलावन को देते हुए बोल पड़े, “राम खेलावन, तूने इस बच्चे को पहली बार देखा है, या इससे पहले भी?” राम खेलावन नेवची काका की बातों को समझ न सका और बिना कुछ बोले बस प्रश्नवाचक दृष्टि से नेवची काका की ओर देखा। नेवची काका राम खेलावन के थोड़े और करीब जा कर पूछ बैठे, “अच्छा राम खेलावन एक बात बताओ, तुम्हें भूत-प्रेतों से डर तो नहीं लगता!” राम खेलावन नेवची काका के प्रश्न की असलियत से अनजान, हँसते हुए बोल पड़ा, “नेवची काका, अगर भूत-प्रेत से डरता तो रात को इस बगीचे में अकेले कैसे रहता?” राम खेलावन की यह बात सुनते ही नेवची काका बोल पड़े, “तो सुन रामखेलावन, दरअसल तूने जिस बच्चे को देखा था, वह बच्चा न होकर एक भूत ही था। एक आत्मा थी। और मैंने भी कई बार इस बच्चे को वहाँ जगत पर खेलते हुए, कभी हँसते हुए तो कभी रोते हुए देखा है।” अरे यह क्या नेवची काका की यह बात सुनते ही तो राम खेलावन थोड़ा डर गया और घबराते हुए बोल पड़ा, “भूत!!” “हाँ, राम खेलावन, भूत।” रमैनी काका ने कहा।

इसके बाद नेवची काका भी सूखी लकड़ियों को बिटोरने में राम खेलावन की मदद करते हुए बोले, “दरअसल, तुम्हें एक सच्चाई बताता हूँ। 25-30 दिन पहले की बात है। मैं एक दिन रमैनी साहू के घर गया। दरअसल मुझे मढ़ई छाने के लिए बाँस चाहिए थे। मुझे पता चला कि रमैनी साहू तीर्थ यात्रा पर गए हैं, और 15-20 दिन के बाद आएँगे। फिर मैं किससे बाँस मागूँ? यही सब सोचते हुए घर आ गया। घर आने के बाद मैंने अपने बेटों से कहा कि आज की रात हम लोग चोरी से रमैनी साहू की बँसवारी में से बाँस काटेंगे। तुम लोग एक काम करना की बाँस काटना और मैं कुएँ के पास बैठकर रामखेलावन पर नजर रखूँगा कि वह कहीं जगकर बगीचे में न आ जाए। फिर क्या था, आधी रात के समय मैं और मेरे दोनों बेटे यहाँ आ गए। मैं इस कुएँ की तरफ आ गया ताकि तुम पर नजर रख सकूं और मेरे बेटे बाँस काटने में लग गए। अचानक मैं क्या देखता हूँ कि एक छोटा सा बच्चा ठेहुने के बल (बकैयाँ) चलते हुए कुएँ की जगत की ओर बढ़ रहा है। मैं तो अवाक हो गया, इतनी रात को अकेले एक छोटा बच्चा यहाँ आया कैसे? पहले मैंने सोचा कि तुम्हें जगाऊं, पर फिर डर लगा कि तुम सोचोगे कि मैं इस समय यहाँ क्या कर रहा हूँ? फिर मैं धीरे से उस लड़के की ओर बढ़ा, अरे यह क्या, मैं ज्योंही लड़के के पास गया, वह बहुत ही तेज खिलखिलाया और फिर गायब ही हो गया। मैं पूरी तरह से डर गया और फिर बिना देर किए अपने बच्चों की ओर भागा। फिर क्या, उन लोगों ने जो भी बाँस काटे थे, उन्हें लेकर फटाफट निकलने को कहा। बच्चों को भी लगा कि शायद तुम जग गए हो, फिर क्या था, हम लोग तेजी में उन बाँसों को लेकर अपने घर की भाग निकले और उन्हें ले जाकर घर के पिछवाड़े रख दिए।”

इसके बाद राम खेलावन ने लकड़ियों का गट्ठर बाँधकर उसे अपने सर पर उठा लिया और अपने साथ-साथ नेवची काका को भी अपने साथ आने का इशारा करते हुए चलने लगा। खपड़ैल में एक किनारे उन लकड़ियों को रखकर उसने ढेंकुली से कुएँ से पानी निकाला और हाथ-पैर धोने के बाद नेवची काका को भी हाथ-पैर धोने के लिए कहा। हाथ-पैर धोने के बाद नेवची काका भी उसी कुएँ के पास पड़ी एक टूटी खाट पर बैठ गए। राम खेलावन ने कहा कि, नेवची काका आज भउरी (लिट्टी) चोखा लगा रहा हूँ, आप भी खाने के बाद ही घर जाइएगा। नेवची काका ने हाँ में सर हिला दिया। इसके बाद फिर से नेवची काका अपनी धोती की खूँट से चुनौटी निकाले और तंबाकू मलने लगे। पास में ही राम खेलावन गोहरा सुनगाते हुए बोला, “नेवची काका, मेरे बाबू (पिताजी) ने एक बार एक घटना का जिक्र किया था। अब मुझे भी लगने लगा है कि यह बच्चा कौन है?” इसके बाद भवरी बनाते-बनाते ही रामखेलावन ने कह सुनाया, “बाबू बता रहे थे कि एक बार एक पती-पत्नी इसी रास्ते से होकर अपने घर की ओर जा रहे थे। रात होने को आ गई थी और उन्हें अभी काफी दूर जाना था। तो वे दोनों यहाँ मेरे पास आए और रात को रुकने के लिए विनती किए। मैंने हाँ कर दी। स्त्री की गोद में एक दूधमुँहा नवजात बच्चा भी था। मैं और उस स्त्री का पती कुएँ के पास ही बैठकर कुछ दुख-सुख की बात कर रहे थे, तभी पता नहीं उस स्त्री को क्या सूझा कि वह कुएँ से पानी निकालने लगी। मैंने कहा कि बहू रुको, मैं निकाल देता हूँ, पर मैं निकाल लूँगी, यह कहते हुए उसने ढेंकुली को कुएँ में डालना चाहा, अरे यह क्या, तभी उसका संतुलन बिगड़ा और उसकी गोदी में चिपका हुआ बच्चा कुएँ में जा गिरा। फिर क्या, मैं दौड़कर कुएँ में कूद गया, उस बच्चे को बाहर निकाला पर वह भगवान को प्यारा हो गया था।” इसके बाद आलू छिलते हुए राम खेलावन ने कहा कि काका, बाबू बता रहे थे कि उस स्त्री ने जानबूझ कर उस बच्चे को कुएँ में फेंक दिया था। बाबू का कहना था कि उस व्यक्ति ने बातों-ही-बातों में बता दिया था कि वह लड़का उसकी बहिन का था, जिसने इस बच्चे को जन्म देते ही स्वर्ग सिधार गई थी। वे लोग उसी के गाँव से इस बच्चे को लेकर आ रहे थे। उस आदमी ने यह भी बताया था कि उसकी पत्नी नहीं चाहती थी कि वह बच्चा उन लोगों के साथ रहे, उसका पालन-पोषण उन्हें करना पड़े। इसके लिए जान बूझकर उसने बच्चे को कुएँ में गिरा दिया।

इसके बाद राम खेलावन फिर बोल पड़ा, “नेवची काका, दरअसल बाबू ने मुझे इस घटना का जिक्र किसी से न करने के लिए कहा था, क्योंकि उन्हें लगा था कि कहीं लोग इस कुएँ का पानी पीना बंद न कर दें।” फिर राम खेलावन लिट्टियों को अहरे पर उलटने-पलटने लगा। यह सब जानने के बाद नेवची काका को बहुत सारी बातें क्लियर हो गई थीं। दरअसल 5-6 महीना पहले ही ठीक दुपहरिया में एक महिला इस कुएँ में गिर गई थी, उसे निकालकर अस्पताल पहुँचाया गया था, कैसे भी करके उसकी जान बची थी। दरअसल उस महिला को अपनी बैलगाड़ी में लेकर नेवची काका ही तो अस्पताल गए थे। दरअसल उस स्त्री का पति बार-बार कह रहा था कि जैसी-करनी, वैसी भरनी, पर नेवची काका समझ नहीं पा रहे थे। फिर उस आदमी ने नेवची काका को बताया था कि काका यह कुएँ में ऐसे ही नहीं गिर गई, इसे मेरे भाँजे ने धक्का देकर गिरा दिया था। दरअसल 2-3 साल पहले इसने मेरे भाँजे को इसी कुएँ में फेंक दिया था, आज मेरे भाँजे ने बदला ले ही लिया। अब नेवची काका को उस आदमी की बात समझ में आ रही थी। दरअसल ये लोग वे ही थे जिसका जिक्र राम खेलावन के बाबू (पिताजी) ने रामखेलावन से किया था।

आज वह कुआँ सूख गया है पर रात को कभी-कभी उस कुएँ के आस-पास किसी बच्चे के रोने-हँसने की आवाज कुछ लोगों को सुनाई दे जाती है।

यह कहानी एक सुनी हुई घटना पर आधारित है, जिसे कहानी का रूप देने के लिए काल्पनिकता के साथ सहेजा गया है। इस कहानी का जिक्र बातचीत में ही मेरे अनुज, परम मित्र श्री मनीष शर्मा जी, सिवान, बिहार ने किया, तो फिर मैंने देर न करते हुए इसे शब्दों में पिरोते हुए, काल्पनिकता की चादर ओढ़ाते हुए आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करना ठीक समझा। जय-जय।

-पं. प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया

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