बुआ, स्व• गिरिजा देवी

" ई अंग्रेज कहाँ से पकड़ ले अइला ?...कह द पहिले से...कि हम फीता काटे क भी पांच लाख ले ई ला..!"

यह कहते हुए उन्होंने सिल्वर-पानदान से बीड़ा बना कर मुँह में डाला और बड़े दुलार से "राय साहब" (स्व•चैतन्य राय) को अपने समीप बिठाया..और मुझे भी बैठने का संकेत किया...फिर "चैतन्य राय साहब" और "अजय गुप्ता" से हाल चाल लेने लगीं..

"अऊर बचवा! अम्मा कइसन हैं! ढेर दिन भइल देखले!...बहुत पुराना रिश्ता हौ तोसे...जब तू छोटा स् रहला तब तोहरे इहाँ खूब आइल-जायल लगल रहे...तोहार बाऊ जी बहुत प्रेम करत रहलन..बहिन मानें..!"

उनकी हर बात में स्नेह और स्मृति की महक थी...यूँ स्नेह और स्मृति को पृथक कहना मेरी भूल है...राय साहब भी स्मृतियों में डूब गए और लगभग पचास साल से ऊपर के हो चुके भीमकाय राय साहब उनके आगे कब निरीह बबुआ बन गए यह पता ही नहीं चला... मैंने देखा था उनकी पलकों को गीला करते अश्रु-बिन्दूओं को!...अचानक राय साहब को मेरा ख़याल आया उन्होंने कहा --

"बुआ" ई ओमा जी हउअन ! आपसे मिले क इच्छा रहल इन कर!"

"कौन देस से आइल हउवन ..अमेरिका ?" उन्होंने ने पूछा !

"नाही! बनारसी हउअन! ब्राह्मण! बहुत विद्वान जोतिसी!"

"देखे से नाही लगत हवें...(हँस कर)...हम त समझली कौनो अंग्रेज हउअन...ईss बनारसी बोली समझेलन?"(बड़े भोलेपन से पूछा)

"अरे एकदम समझेलन! ईहें क पैदाइश हो" (राय साहब बोले)

"अरे अरे..हाहाहा.." कहते हुए एक बनारसी ठहाका लगाया उन्होंने..."आइए आइए यहाँ आइये..(अपनी चौकी पर पास में बुलाते हुए) आपको देखने से हमने समझा अंग्रेज हैं!"

"कोई बात नहीं!' मैंने मुस्कुरा कर उत्तर दिया..और स्वभावतः तुरन्त अपने मूल-विषय पर आ गया---"हम आपको आमंत्रित करने आए थे..मुख्यअतिथि के रूप में..हमारे वार्षिक कार्यक्रम "चिराग़े-दैर"...जो आध्यात्मीक-प्रेम की स्थापना और "मिर्ज़ा ग़ालिब" की बनारस यात्रा की स्मृति में प्रतिवर्ष दिया जाता है...इस बार डॉ पुष्पा भारती जी जो डॉ धर्मवीर भारती जी की पत्नी हैं..और बहुत सुंदर लेखिका उन्हें...और बनारस की महान प्रतिभा श्री ज्योतिन भट्ट जी सरोदवादक-संत को प्रदान किया जाएगा...हमलोग चाहते थे उद्घाटन आप करें दीप प्रज्वलन करके..! (मैंने अपनी बात एक क्रम में समाप्त की)
वो मुस्कुरा के बोलीं--"बहुत अच्छी है आपकी भाषा.. पर आप हमको नहीं देंगे अवार्ड?"
इस पर मैं सन्न रह गया...क्या इतनी बड़ी कलाकार...पदमभूषण..मेरी छोटी सी संस्था का अवार्ड लेने में इतनी सहज होंगी...या इतनी बड़ी हस्ती को अपने यहाँ सम्मानित न करके कोई त्रुटि तो नही हो गई मुझसे...अभी मैं कुछ कहता कि वो बोल पड़ीं--

" कितने बजे आना है कल...?"

मैंने कहा --" वैसे तो सात बजे से कार्यक्रम है आप अपनी सुविधानुसार समय बता दीजिए !'

वो बोलीं--" मेरी सुविधा क्यों...मैं आपके कार्यक्रम कि अतिथि हूँ आपकी इच्छा से ही आऊंगी...बहुत बड़ा काम आप कर रहे हैं जो बनारस को ऐसा सुन्दर कार्यक्रम दे रहे हैं...मैं एकदम समय से आ जाऊँगी..!'

मैंने कहा--" गाड़ी आपके यहाँ कितने बजे भेज दुँ?"

उन्होंने कहा--" नहीं आप कष्ट मत उठाइये...मैं अपनी गाड़ी से आउंगी..आप अपने कार्यक्रम को अच्छे से कीजिये !...अच्छा ये बताइये हमे गाना भी होगा क्या कल..?

उनके इस सहज लेकिन उद्दात्तचित्त के उद्गार से मैं अचंभित हो गया..और एक बोध से युक्त भी हुआ कि सुर गले से नही चेतना से लगते हैं... मैंने हर्षविकम्पित-स्वर में कहा ---" नहीं आपका आना ही गाना है"

वो हँसी और बोलीं--" नहीं बता दीजिए तो आदमी उसी तैयारी से आएगा..वैसे तबियत उतनी ठीक नहीं है...पर गाते समय सब ठीक हो जाता है..अच्छा आपको शास्त्रीय संगीत में रुचि कैसे आ गई...सुनते तो हैं न..?

मैंने चाव से कहा--"हां... बहुत सुनते हैं...अच्छा लगता है...पर सुरों की समझ नहीं है...आपकी ठुमरियों को सुन सुन कर कितनी रातों और कितने सालों से सोया हूँ क्या बताऊँ..! वैसे मुझे सङ्गीत के प्रति आकर्षण लता जी को सुन कर पैदा हुआ!"

"अरे! लता जी तो बस लता जी हैं! आपको पता है हम लोग एक ही उम्र के हैं...उन्होंने तो अब गाना बहुत कम कर दिया...पर हम गाते रहते हैं...बहुत प्रेम करती हैं वो हमसे..और हम बहुत सम्मान करते हैं उनका !"

मैंने कहा --" जी मुझे पता है.. मैंने उनके इंटरव्यू में आपकी प्रशंशा पढ़ी है!...और ऐसा कौन है जो ठुमरी दादरा टप्पा खायल सुने और आपको न जाने!'

वो मुस्कुरा कर एक बीड़ा मुँह में रखती हैं और कहतीं हैं...आपको तो बहुत पता है...रुकिए हम आपको एक बहुत "रेयर चीज़" सुनाते हैं..कहीं अब नहीं मिलेगा..! (ये कह कर वो हारमोनियम मंगवाने लगीं/उस ओर साज़ बिठाने लगीं/सुर साधने लगीं/मैं सोचता रहा ये सहजता सङ्गीत का उपउत्पाद है या काशी की मिट्टी की स्वाभाविकता)...और फिर एक क्या और दो क्या टुकड़ों ने न मालूम कितने रत्न बिछा दिए उन्होंने सुरों के..लगभग आधा घण्टा उन्होंने कुछ गाया कुछ बताया ...
मैं उन्हें अक्षर-अक्षर बटोरता रहा...और गर्व करता रहा अपने भाग्य पर की मैं उसी मिट्टी में गूंद कर बनाया गया हूँ विधाता के हाथों...जिस मिट्टी ने इस सुर-मूर्ति को गढ़ा है।

गाने और खिलाने-पिलाने के बाद उन्होंने हमें आमंत्रण दिया अगले दिनों होने वाले "गण्डा-बंधाई" की रस्म में...जहाँ वो नव-पखेरूओं को संगिताकाश में उड़ने का संकल्प दे कर दीक्षित करने वाली थीं...हम लोग कृतज्ञ भाव से उठे...तो जाते-जाते राय साहब ने धीरे से पूछा--

"कुछ कहे के हौ आपके सेवा ख़ातिर त कह दें ओमा जी से!"

इस पर वो बोलीं--"अरे आपन बच्चा हौ! हम त समझली कौनो अंग्रेज-वन्ग्रेज हउए..त टरकाए बदे कह देली..(ठहाका)..हम कल आइब...खुश रहा!"

हमने उन्हें प्रणाम किया और बाहर निकल आए..कृतज्ञता के भाव से भरे-भरे...रास्ते भर उनके गायन और प्रेम की मिठास चखते हुए..क्या कोई इतना मधुर होता है!

"ग़ालिब" के वाराणसी प्रवास और इस नगर की स्नेहिल-वृत्ति को समर्पित सम्मान "चिराग़े-दैर" के उस कार्यक्रम में नियत समय पर अपनी पूरी ठाठ बाट के साथ वो पहुँच गईं.. अपने प्यारे से परिवार के साथ...ओह! कितना सुंदर था उनका रूप! कौन कहता है कि वृद्धावस्था में स्त्री का सौन्दर्य नष्ट हो जाता है..."महान भृतहरि" के "श्रृंगार-शतक" के वह श्लोक जो सुन्दर-युवती को वृद्धावस्था से पूर्व मृत्यु की कामना देते हैं...यदि इस गरिमामयी-स्त्री को जीवन के आठवें-दशक में देख पाते तो स्वतः स्वयम् को अक्षर-अक्षर विलीन कर देते श्वेत-पृष्ठ में...बड़े करीने से शरीर को ढके हुए उल्टे-पल्ले की कतान की "टसर" साड़ी.. जिस पर गहरे रंग के रेशम का खूबसूरत सा काम था...हाथों में सोने की चूड़ियाँ...कानो में हीरे-जड़े "टॉप्स"...और नाक में गोलकुण्डा के कीमती "सॉलिटीयर" की लौंग जिसका लश्कारा उनकी तान की तरह ही गूँजता हुआ था..और ललाट पर लगी पीली-संदली बिंदीया..मानो कार्तिकपूर्णिमा का चन्द्रमा शाम की गुलाबी होती अर्धचन्द्राकार गङ्गा में दर्पण देख रहा हो...वास्तव में एक चैतन्य-स्त्री अपनी वृद्धावस्था में उतनी ही सुन्दर लगती है जितनी हिमालय के शिखर पर चमकती बर्फ़..या गर्मियों की धूप में गङ्गा पार शान्त पड़ी रेत..! ऐसी सुन्दर और गरिमामयी-स्त्री जो सङ्गीत-संसार का स्वर्णिम-हस्ताक्षर थीं उनके हाथों प्रज्वलित होते हुए दीपों ने वस्तुतः "चरागे-दैर" के नाम को सार्थक किया...फिर उन्होंने अपनी कोमल और ममतामयी वाणी में कार्यक्रम के प्रीति शुभकामनाएं दीं और आशीष भी...फिर घण्टों बैठी हुई "प्रेम और ग़ालिब" पर मेरी और पुष्प जी की वार्ता सुनती रहीं..अंततः जाते हुए बोलीं --
"बहुत अच्छा बोला आपने! अग़र और बोलते तो और सुनती! ज्ञान की और साहित्य की बातों में बड़ा रस आता है...कुछ सीखने को मिलता है नया..!'
अस्सी साल की उम्र पार करके भी एक महिला को यदि नया सीखने की ललक हो तो उसके महान-कलाकार होने में कोई संदेह नही रह जाता..।
और ये महान कलाकार और सन्तचित्त नारी थीं काशी-गरिमा...सङ्गीत-गङ्गा... ठुमरी-साम्राज्ञी श्रीमती गिरिजा देवी जिन्हें श्रद्धा से सब अप्पा जी बुलाते रहे..!

बनारस की ये सुरीली बेटी...अपनी जन्मभूमि से दूर अपनी कर्मभूमि "कोलकाता" में थी जब देह को प्राणों के सुर छोड़ कर महानाद से जा मिले...आज उनकी देह की मिट्टी को लाया गया है उसी काशी की मिट्टी में...जिस मिट्टी को गूंद कर कभी विधाता ने ऐसी सुर-प्रतिमा बनाई की सङ्गीत-भक्तों के रोम-रोम पुलकित हो गए...जीवन के सात-दशकों तक निरन्तर सुर बिखराते हुई इस सङ्गीत-सुमन ने अगणित-हृदयों को सुरभित किया...किन्तु आज इसका हृदय मुरझा चुका है...देह पर वही गरिमामयी-श्रृंगार है...ललाट पर वही संदली-चन्द्रमा...किन्तु न अब उन स्नेहिल नेत्रों के पट खुलेंगे...न वाणी से वो माधुर्य की चाशनी टप-टप कर बरसेगी...न ठेठ काशिका में किसी ज्वलंत-विषय पर टिप्पणी होगी...न पान घुलाती आवाज़ में बैठ कर बतियाने का प्रेमिल-निमंत्रण...आज "गिरजा" निःशब्द है...मानो उसने अपने सारे स्वर अपने प्राणनाथ "महादेव" के उसी डमरू में समाहित कर दिए जिसकी "डम-डम" ने विश्व को नाद-स्वर-अक्षर का वरदान दिया है...अपने नेत्र बन्द किये वो चन्दन की चिता पर लेट गई है...मणिकर्णिका की महायज्ञ-वेदी में समिधा बन कर "स्वाहा" होने को...और क्यों न हो...काशी की गिरजा से बढ़कर यह सत्य कौन जान सकता है कि-- "बिना भस्म हुए मृत्युंजय का श्रृंगार नही हुआ जा सकता...बिना अग्निकुंड में समाहित हुए शिव की गोद नहीं मिलती...!"

"अप्पा" जा रही हैं...चिता की लौ पकड़े हुए प्रकाश-लोक में...शांत शांत..परन्तु घाट की सीढ़ियों पर पसरा गीलापन बता रहा है कि गङ्गा ने जाती हुई गिरजा के मुँह से अभी अभी सुना है-- "बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए/बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए/ चार कहार मोरी डोलिया उठावें/ मोरा अपना बेगाना छूटो जाए/ बाबुल मोरा नैहर...नैहर...नैssssssहsssरss.....!

26 ऑक्टूबर 2017

श्रधांजलि-- पद्मविभूषण स्व• गिरिजा देवी के देहावसान पर एक स्मृतिपत्र💐

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