एक नई सुबह

यादों के धुंदले बादल छंटने से लगे और उम्मीद की किरणों ने फिर से एक बार मालिनी के मन रूपी धरा को रोशन करदिया ! कसैली पड़ी स्मृतियों का डेरा जो कुछ समय से दिलो दिमाग पर अपना वर्चस्व जमाये बैठा था, वो भी हटने लगा था ! जैसे सर्दिओं में औस भी बर्फ की शिला में तब्दील होने लगती है लेकिन अपने एक निश्चित समय के बाद वो सर्द बर्फ की शीला भी पिघलने लगती है वैसे ही मनुष्य मन पर भी पड़ी कड़वी यादों की शिला भी पिघल जाती है, ख़ुशी या सुख की किरणो के प्रभाव से ! अंतर्मन स्वतः ही सुख को अपनाने के लिए लालायित होने लगता है, जब उसे आभास होने लगता है कि दुःख की घड़िया बस अपने अंतिम पड़ाव पर हैं !

मालिनी. ..जिसे इस वीमेन होस्टल में आये तीन साल हो गए थे ! ज़िन्दगी में अभी तक कुछ खास बदला नहीं था ! केवल चहरे पर नज़र का चश्मा और खुले बालों की एक चोटी जिसने कॉटन की साड़ी में लिपटे बदन को एक सम्पूर्णता प्रदान की हुई थी !व्यवहार में सादगी सौम्यता ने उम्र की गतिशीलता को भी मानो ठहराव सा दिया हुआ था ! लेकिन मालिनी अपनी ज़िन्दगी में आए इस खूबसूरत पड़ाव को लेकर अचंभित थी ! एक अजीब कश्मकश में थी ! उसकी शिथिल पड़ी ज़िन्दगी में आज एक हरारत सी हुई थी ! बार बार आलोक के पत्र को पढ़ती जा रही थी ! आंसू ख़ुशी के अतिरेक से बहते जा रहे थे ! ऐसा तो नहीं था कि उस में भावनाए नहीं थी, या उसने कोई सपने ही नहीं देखे थे ! आम लड़कियों की तरह वो भी अपने ख्वाब बुनती थी ! लेकिन उन ख्वाबो को ताबीर देना बाक़ी था कि उन ख़्वाबों को मात देती हकीकत ने नींद ही खोल दी मानो ! ''अपनों के ख्वाबो को पूरा कर लू, फिर खुद के ख़्वाबों को पूरा करने के लिए आराम से सोचूंगी'' !.एक यही सोच होती है, उस लड़की की जो एक परिवार में सबसे बड़ी होती है और उस पर जब अचानक से बड़े होने के कर्तव्यों का बोझ आन पड़ता है ! संस्कार, फ़र्ज़ और अपनों की ज़िम्मेवारियों को निभाते निभाते अक्सर उसके ख्वाब भी उम्र के साथ साथ परिपक्व होने लगते हैं ! उम्र की परिपक्वता चेहरे से झलकने लगती है तो सपने बिखरने लगते हैं ! छोटे भाई बहनों की ज़रूरतें ,उनके ख्वाब इस कदर सर्वोपरि हो जाते हैं कि खुद बड़ी बेटी के अरमानों का गला घूँटते देख ही नहीं पाता परिवार ! अगर खुद कभी अपनी ख्वाइशों को तव्वज्जो दे भी तो कोई स्वीकार भी कर नहीं पाता ! मालिनी भी यही सोच सोच कर दुखी होती थी कि क्या गलत किया मैंने ...अगर फ़र्ज़ के साथ साथ अपनी ख्वाइशों को जीने की चाहत की ? आज आलोक ने भी तो उसे वही सब कहा जिसकी उसने भी कभी आरज़ू की थी ! अपने पक्ष को आलोक की स्वीकृति मिलने से मालिनी को एक सम्बल मिला ! रिश्तों में आये बदलाव को जब उसने समझा पहचाना तब तक देर हो चुकी थी ! यह एक ऐसा रिश्ता था अनछुआ सा ... पाक साफ़ सा उसके समक्ष दृढ़ खड़ा था बिना किसी स्वार्थ के ...!''

जब से इस महिला हॉस्टल में नौकरी करने और रहने आई थी तब से अपने काम और अपने आप में मशगूल रही ! बस एक सखी बनी निशा, जिसने उसके मन को अच्छी तरह समझा पढ़ा क्यूंकि वो भी उसकी तरह ही अकेलेपन का दंश झेल रही थी ! एक ही कश्ती की सवार दोनों सखियों ने अपने ज़िन्दगी के अच्छे बुरे अनुभव और अपने सपने भी साझा किये थे ! आज मालिनी ने अपनी इस दुःख सुख की सखी को बुलाया था ताकि वो अपनी इस ख़ुशी में शामिल कर सके ! कुछ भी पर्दा नहीं था अब उनके बीच !

''मालिनी ....!'' निशा की आवाज़ ने मालिनी को उसको उसके विचारो के भंवर से निकाला ! हाँ ..आओ निशा ...'' ! मालिनी की आवाज़ में ख़ुशी लरज़ रही थी पर एक संकोच सा चेहरे पर फिर भी झलक रहा था !

''क्या बात है मालिनी ..? कुछ खास बात है ?'' निशा ने मालिनी को गौर से देखते हुए कहा !

''मैंने तुम्हे बताया था न आलोक के लिए ..जो एक दोस्त था मेरा !.. ये लैटर आया है आज उसका '' ! मालिनी ने निसंकोच पत्र निशा की तरफ बड़ा दिया ! निशा ने उत्सुकता से पत्र खोला और पढ़ने लगी !

' 'मालिनी ..''

''.क्या कहूं ? इक वक़्त था जब तुम्हें जान कहता था ! आज वो लिख भी नहीं पा रहा ! हालाँकि मैं जानता हूँ लिख भी दूँ तो क्या तुम आकर मेरे हाथ बांध दोगी ? नहीं न ...? तुमने अगर वो हक़ मुझसे छीन भी लिया है तो क्या हुआ ? दिल में आज भी वही हसरत, वही प्यार है मेरे दिल में कि तुम्हे कुछ भी कह कर पुकार सकू !बहरहाल मैं आज तुम्हे मालू ही कहूंगा जो अक्सर तुम्हे कहता था बेशक तुम चिढ़ती रहो ''! '' मालू ..मेरा यह पत्र पढ़कर हैरान हो न कि कैसे मुझे मालूम हुआ कि तुम यहाँ हो ? तुमने मुझे बेशक अपना न समझा पर मैं तुम्हे खुद से जुदा कभी नहीं कर पाया'' !

'' तुम अकेले ही चल पड़ी अपने दुखो का बोझ ,अपनी मुश्किलों को अपने साथ धकेलते हुए ,अनचाहे भारी भरकम सामान कि तरह ! किसी को पुकारोगी नहीं कि कोई.चंद कदमो तक ही सही, तुम्हारा साथ दे दे ...! जानता हूँ स्वाभिमानी हो ! किसी की सहायता तुम्हें एहसान लगती है ! तुमने कभी ये बात स्वीकार ही नहीं कि दोस्ती और प्यार में एहसान शब्द मायने नहीं रखता ! जानती हो क्यों ...क्यूंकि तुमने खुद को , अपनों की परिधि में इस कदर कैद करके रखा हुआ था कि तुमने कभी खुद के अस्तित्व को कुरेदने की किंचित मात्र भी कोशिश नहीं की ! अपनों की खुशियां ..अपनों की ज़रूरतें ..इसी मकसद को जीती गई.. जीती गई ! न तुमने कभी सोचा ,न किसी ने तुम्हें टटोल कर ही देखा कि तुम भी इंसान हो !लेकिन जब किसी ने दोस्त बनकर तुम्हारा साथ देने का प्रयत्न किया तो तुमने उसे अपने दायरों की ..अपने कर्तव्यों की लम्बी सी सूची हाथ में थमा दी !

''मालू ...रो रही हो न ?'' लेकिन अब क्यूँ ? आज हाथ से रेत की तरह वक्त फिसल गया, उस का पछतावा हो रहा है ? जानती हो.. मैंने एक दिन कहा था कि इक दिन खुद को आईने के सामने खड़े होकर देखो ...खुद से बात करो ...कि तुम क्या हो ..तुम्हारे अंदर व्याप्त तुम्हारी सरगोशी करती तमन्नाएँ क्या है ...? क्या तुम्हारे अंदर की अकुलाहट को किसी ने देखा ..ढूंढा ? नहीं न ?'' फिर एक दिन तुम्हीं ने बताया था कि ''आलोक ,मुझे लगता है कि मैं कहीं दूर ...बहुत दूर एक अनजानी डगर पर चलती जा रही हूँ ..एक उम्मीद से बार बार ठिठकती हूँ कि शायद कोई पीछे से आवाज़ देगा कि रुक जाओ ..मत जाओ ...रुक जाओ ...'' पर मुझे कोई नहीं पुकारता ...मैं अनवरत सी बढ़ती जा रही हूँ उसी डगर पर और न पुकारे जाने के दुःख- क्षोभ से चलती हुई खुद को एक गहरी खाई में पाती हूँ ...जहाँ से मेरी आवाज़ ही मेरे कंठ से निकल कर भी बाहर नहीं आ पा रही है और फिर एक अँधेरा सा छा जाता है ! ''

'' याद करो ...मालू ..मैंने उस दिन कहा था कि तुम परिकल्पना कर रही हो पर तुम्हारा हश्र यही होगा भविष्य में अगर खुद को इन्ही अनगिनत ज़िम्मेवारियों से मुक्त नहीं करोगी ! लेकिन उस वक़्त तुम्हें मेरी इन्हीं बातों पर गुस्सा आता था ! तुम्हें लगता था कि शायद मैं तुम्हे तुम्हारे कर्तव्यों से विमुख करना चाहता हूँ ! दरअसल जिन बंधनो में तुम बंधी थी न, उनकी डोर से तुम इस कदर बंधी थी कि उसका सिर कहीं छूट न जाए ..इस कल्पना से भी तुम डरती थी ! बुरा मत मानना..आज सब रिश्ते पीछे छूट गए न ? सब अपनी अपनी ज़िन्दगी में मस्त , और तुम कहाँ खड़ी हो आज ?''

'' मालू ..मैं तुम्हें तुम्हारी यादों से निकालना चाहता हूँ ! निकलो ..देखो ..एक नए सूरज को ...अपनी ज़िन्दगी को ठहराव मत दो ! जीवन बहता दरिया है ...इसे बहने दो ..! अपनी सोच को एक नया आयाम दो ! रिश्ते नातों के लिए जीते जीते खुद से बहुत लड़ भी चुकी हो ! एक आत्मविश्वास का सूरज तुम्हें बांह फैलाकर थामने को खड़ा है ! बहुत मुश्किल से तुम्हारा पता ढूंढा है ...बस तुम्हे ढूंढ़ने की कवायद में हूँ ...कि कब एक खिलखिलाती मुस्कुराती मालिनी ..अपनी हसरतों का आँचल लहराती आएगी ! अब अपनी उन्हीं दकियानूसी बातों का सहारा मत लेना ! तुम्हारे लिए टिकट भेजी है प्लेन की.और एक अंगूठी भी .! आज ज़मीर और खुद को टटोल कर फैसला करना !ये कोई सहायता नहीं है !.मेरा निवेदन है ..प्रेम भरा ! स्वीकार्य हो तो कल ही चली आना ! मौका भी है दस्तूर भी ...वैलंटाइन डे भी ! तुम्हारा ...अगर हो सका ..तो ...आलोक ..! निशा की आँखों से भी आंसू बहने लगे ! आखिरी लफ्ज़ आसुओं से भीग गए ! पत्र हाथ में और नज़रे अब मालिनी के चेहरे पर थी निशा की, मानो टटोल रही हो . ''मालिनी सोच क्या रही हो ?और क्या चाहिए तुम्हे ज़िन्दगी से ? मालिनी को गले से लगाकर निशा कहने लगी ,'' लो जी तुम्हारा वैलेंटाइन तो आ गया ..अब देर किस बात की मालू ..''? निशा ने मालू शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा ! ''

''निशा ...क्या तुम भी ..! मालू मत बोलो ! ये तो बस आलोक ही कहता था ''! मालिनी ने बनावटी गुस्से से कहा !

''अच्छा जी ...अभी से आलोक की तरफदारी ...? खैर, मैं मज़ाक कर रही थी ! अब तुम बताओ कि उसे फ़ोन किया के नहीं कि तुम आ रही हो ?'' निशा ने मालिनी को पूछा..!

''निशा मैं कोई फैसला नहीं ले पा रही ... '' मालिनी ने झिझकते हुए कहा !

''क्यों ..मालिनी ..अब क्या संदेह है तुम्हारे मन में ! देखो न ,कोई है जो आज भी तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है ! वो दूर रहकर भी तुम्हें कितने करीब से जानता है ,समझता है दिल की गहराइयों से ....! निस्वार्थ प्रेम करता है ! पर तुमने उसके प्रेम को समझा ही नहीं ! ये दोस्ती नहीं थी ! मालिनी ये प्रेम था जो आज तक वो तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है ! तुमने उस वक़्त उसकी मुहब्बत को नहीं समझा क्यूंकि तब तुम मजबूर थी, अपने फ़र्ज़ और कर्तव्यों में बंधी थी ! लेकिन आज तुम्हें उस खाई से निकालने के लिए किसी ने हाथ बढ़ाया है ...जहाँ से सुप्त विलुप्त पड़े रिश्तों के दलदल में से निकलने के लिए तुम हाथ पाँव मारती रही हो !''

''हाँ ...आज तुम्हारे वज़ूद को सूरज के आलोक ने नया जीवंन दिया है ! .जिसने तुम्हें एक नई ऊर्जा दी है जीने की ...! अपना आत्मविश्वास समेटो और जाओ अपने आलोक के पास ! निशा ने पत्र लौटाते हुए कहा ! हाँ, मैं तुम्हे मिस करुँगी पर खुश हूँ , तुम्हारी ज़िन्दगी की इस नई ख़ुशी से ! कहते हुए निशा ने गले लगते हुए 'ऑल डी बेस्ट ' कहा और चली गई ! पत्र पास रखे अपने पर्स में रख कर मालिनी आईने के पास जाकर खड़ी खुद को निहारने लगी ! सेफ्टी पिन से सिमटे पल्लू को हाथ पर फैला कर अपने बालो को खोल लिया ! पलकें खुद के अक्स को देख कर झुक गईं ! मन में एक दृढ़ निश्चय के साथ अपना सामान समेटने लगी ! संयोग से वैलेंटाइन डे की ये सुबह उसके जीवन की भी नई सुबह बन कर आने वाली थी !

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