जब कभी व्यसित या अव्यसित लोगों में मांसाहार की चर्चा छिडती है तो साधारणतयः ब्राह्मण समाज को इन सब चर्चाओं से दूर ही रखा जाता रहा है उनके समक्ष इनका जिक्र करना भी हमेशा से ही ईश्वर का अपमान करना रहा है ,खैर ये तो हो गयी पुरानी बातें | आज हर 10 में से 6 जनेऊधारी पंडित भी जनेऊ कान पर चढाकर या जनेऊ जैसी पवित्र मन्यताओं का मान रखते हुए बदन से कुछ समय के लिये किसी भगवान की फोटो पर टांग कर मांसाहार व मदिरापान की सभा गोष्ठियों में बढ-चढ कर हिस्सा लेने का दम खम रखते हैं |

ऐसे ही थे एक ईश्वरनाथ जी, शरीर से दुबले पतले, साइकिल की शक्ल सूरत देखकर उनकी आर्थिक हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता था, पेशे से डाकिया थे | थकान, कम पगार की चिंता, लोगों के घर में समय पर संदेश पहुचाने या किसी के बच्चे की सरकारी नौकरी के चयन में मिले ईनाम मे शराब की बोतलों से कब इश्क हो गया ईश्वरनाथ जी को भी नहीं याद |

पंडित जी अक्सर ही कुछ मूंगफली के दाने खरीदते और ठेके पर अकेले ही सबसे सस्ती वाली शराब खुद को होश मे रखने तक की सीमा मे चढाकर घर लौटते | यूं ही एक दिन पंडित जी ने मूंगफली खरीदी ही थी कि कंधे पर हाथ रख दिया किसी ने… पंडित जी सकपका गये जैसे किसी ने कत्ल करते हुए पकड लिया हो मुडकर देखा तो डाकघर के बडे बाबूजी थे “ अरे! पंडित तुम भी आते हो यहां? तुम्हे देख कर लगता नहीं कि तुम भी पीते हो..पंडित मुस्कुराये... रमेशचंद्र जी आगे बोले सुना है तुम्हारी बिरादरी में सब तो बहुत बडा गुनाह है “? “लोगों की अपनी अपनी मन्यतायें हैं बाबू जी.. मदिरा पान तो देवतागण भी करते थे इसमें क्या बुरायी? मैं नहीं मानता इतने ढकोसले “ अपराधबोध पंडित जी ने अपना अपराध ढकने की कोशिश की | “ हम्म...तो चलो आओ आज तुम्हें मैं स्वर्ग - दर्शन कराता हूं” कहते हुए पंडित जी को एक टेबल पर बैठा दिया और ब्लेंडर्स प्राइड की बॉटल ऑर्डर कर पनीर की पकौडियां मंगवा लीं | शानदार डिब्बे में पैक ब्रांडेड बॉटल देखते ही पंडित जी की बांछें खिल गयीं मूंगफली का लिफाफा जेब में रखा और पहला पैक तो ऐसे ढकोला जैसे किसी भिखारी को भीख में राजभोग मिल गया हो बीच बीच मे पकौडियां भी गटकते रहे | यू.पी की राजनीती, बाप बेटे की लडाईयों की सुलह व सुझाव भी शामिल हुए नशे की आवाज़ में अनायास ही पुरानी तथाकथित प्रेमिका से असफल प्रेम प्रसंग व पत्नी से नोक झोक के कारणों की जब पुंनरावृत्ती होने लगी तो बाबू जी ने महफिल का अंत करना ही ठीक समझा सबकी नज़र बचाते हुए पंडित जी के घर के दरवाज़े पर किसी तरह से छोडा और नदारद हो गये |

पंडित जी ने भरसक प्रयासकर दरवाजे का सहारा लिया व कुछ बड्बडाते हुए दरवाज़ा पीटा | दरवाज़े की इतनी जोर की पिटायी सुन गुस्से से तमतमायी गरियाते हुए पंडितायिन अंदर से बाहर आयीं ये हरामखोर मुहल्ले के शराबी.. इतनी रात को पीकर दूसरे दूसरे का दरवाज़ा पीटते फिरते हैं आज तो हो ही जाये ढंग से....पंडितायिन ऐसा वाक्या पहले भी झेल चुकी थी | लेकिन आज अपने ही पति को इस हालत में देखकर सन्न रह गयी | पंडित हांलाकि पहले भी पीकर आये थे किंतु क्या मज़ाल कि बगल में खडा आद्मी भी पहचान पाये | बोतल घर पर लाते सोते समय एक पैग पीते और पीने के बाद इलायची जरूर खाते और इस कदर तो कभी भी मदहोश नहीं हुए |

हडबडायीं घबरायीं पंडितयिन ने पूरे मुहल्ले का सरसरी निगाह से अवलोकन किया व पंडित जी को जल्दी से अंदर खीचा| आगबबूला पंडितायिन ने पत्नीव्रत धर्म का पालन करते हुए जूते उतारे कपडे ढीले किये व जल्दी से रसोई मे भागकर नींबू पानी लेने चली कि तभी पंडित के मुंह से सडांध सी बदबू ने पंडितायिन को गुसलखाने की ओर मोड दिया और एक जोरदार उल्टी से रात का खाया सारा कढी चावल बाहर | पंडितायिन ने खुद को संभाला फिर पंडित को नींबू पानी पिलाने चलीं गयीं | नींबू पानी लिये खडी पंडितायिन पंडित की हरकतों को देखकर खडी रह गयीं|

पंडित बडबडा रहे थे ...मेरी गुलबब्बो ... मेरी जान... मैं शबको मार दूंगा ....तूने मुझे नहीं समझा...हं? (रोते हुए) मैं तुझे कितना प्यार करता हूं पता है तेरे को ....नई पता तेरे को कुछ नई पता हेहेहेहे.... तुने मौका ही नही दिया मौका ही नई दिया तुने… अब तो मेरी शादी हो गई ....मैं शबको मार दूंगा... मार के दिखाऊं.... (झट्के से उठे पंडितजी बगल मे रखी छतरी उठायी बंदूक की तरह तानी किसी काल्पनिक शख्श पर) धाये..धायें..धायें... और झटके से... धडाम से पलंग पर गिर गये | तमतमायी पंडितायिन ने नींबू पानी पिलाने का प्रयास किया तो धक्का देकर गिलास गिरा दिया | हट जाओ मेरे सामने से.... सब मेरे दुस्मन .... सब के सब मेरे दुश्मन...सबको मार दूंगा.... धांयें धांय...धडाम... पंडित जी बारी बारी से यही सारे वाक्य, फुर्ती से उठना धायें धांये.... तब तक दोहराते रहे जब तक बेहोश न हो गये | क्रोधित पंडितायिन पंडित को उनके हाल पर बैठक में ही छोड्कर सोने चली गयीं |

(सुबह का समय ... पंडित दफ्तर के लिये तैयार हो रहे हैं) अँ मेरा टिफिन... पंडित जी शीशे मे बाल बनाते हुए बोले तो पंडितायिन उनकी बात को अनसुना करते हुए मेथी काटने में ही लगी रही | अरे मेरा टिफिन मिलेगा कि नहीं..? पंडितजीने फिर दोहराया | पंडितायिन गुस्से से पूरी आंखें निकाल कर घूरते हुए बोली उसी कमीनी से ले लो जाकर जिसके लिये सबकी जान ले रहे थे | पंडित भौचक्के से रह गये ये सब इसको किसने बता दिया, बिना वक़्त गवांये बाबू जी पर अपनी शक की बंदूक तान दी, चलो ठीक है थोडे बहुत एहसान किये हैं उन्होने तो क्या जान ले लेंगे किसी की ?.... बात को बढने से रोकने के लिये चुपचाप घर से निकल लेना ही भला समझा |

घर में तनाव का माहौल शांत कराने के लिये धीरे से पंडितायिन को समझा दिया गया हां पसंद करते थे वो बगल वाले यादव जी की बडी वाली को ...लेकिन खाली हमाये पसंद करने से क्या होता वो तो हमायी तरफ देखती भी नही थी... तुम पिता जी को तो जानती ही हो.. कट्टर ब्राम्ह्ण है.... अब छोडो पुरानी बातें बक दिये होंगे नशे में...| पंडित ने पंडितायिन की कसम वसम खा के दारू से तौबा की तो बडी मुश्किल से पंडितायिन मुस्कुरायीं और जिंदगी की गाडी फिर से पटरी पर चल दी|

कुछ महीने बीते तो एक लम्बे समय से दफन दारु की इच्छा फिर से सर उठाने लगी उस पर शाम को झूमते दारूडिये पिपासा बढा जाते | फिर एक शाम दफतर में किसी ने अपनी बीती हुई अंग्रेजी महफिल का किस्सा छेड दिया आज तो पंडित जी से रहा न गया और पंडितायिन की कसम को दरकिनार कर मदिरापान का निर्णय ले लिया | बाबू जी को भी दावत दी गयी क्यूं कि उनके ब्रांड की बात ही अलग थी दूसरा उस दिन की दावत भी उधार थी पंडित पर |

बाबू जी आज भी बिल्कुल वही वाली दावत जमाओ वही पनीर की पकौडिया वही शराब का ब्रांड आज मेरी तरफ से.. ईश्वरचंद्र जी बोले | क्यूं भई कोई लॉटरी लगी है कि बीवी ने आज ज्यादा प्यार दे दिया या आज फिर गुलब्बो याद आ गयी ...? हहहा... बाबू जी ने चुट्की ली.. पंडित जी मुस्कुराये और बोले ,” नही बस ऐसे ही मन हो आया... और उस दिन की बात याद दिला के मूड न बिगाडो.. बडा बवाल किया था पंडितायिन ने कई दिन उसी ने बताया हम पीके गुलब्बो को घर पर भी याद करने लगे थे.. दोनो ने ठहाका लगाया |

एक पॉश लेते हुए बाबू जी बोले “ अरे पंडित वो उस दिन के लिये मैं तुमसे माफी मंगना चाहता हूं” पंडितजी समझने की कोशिश करते हुए आश्चर्य से बोले किस बात की बाबू जी... बल्कि वो दिन तो मेरे खुशी के पलो में शामिल हो गया है माफी काहे की...? बाबू जी ने हिम्मत जुटाकर कहा “अ‍ॅ... वो दरअसल... उस दि... न... मैंने तुम्हे नशे में पनीर की पकौडी के साथ मछली की पकौडी खिला दी थी “ पंडित जी वही सन्न रह गये और लगभग उबकाने भागे... वापस आये तो शिकायत की .. ये आपने ठीक नहीं किया बाबू जी... हम आप पे भरोसा किये आपने हमारा भरोसा तोड दिया .... हाय राम हमायी पंडितायिन... बाउ जी... और बिरादरी वालों को पता चलेगा तो न जाने का करेंगे हमाये साथ... आपने.. धर्म भ्रष्ट कर दिया हमारा.. अब हम का करे पंडित जी माथा पकड कर बैठ गये | अब देखो पंडित हमे तो उसी के साथ स्वाद आता है सो हमने मंगवाया था अपने लिये हमारी प्लेट से तुम खुद ही खाने लगे थे नशे मे अब हम हाथ कैसे पकड लेते तुम्हारा... और तुम्ही तो कह रहे थे न.. कि तुम ये सब ढकोसले नहीं मानते हो फिर अब..? बाबू जी ने अपना पल्ला झाड्ने की कोशिश की | हां वो हमने सिर्फ पीने के लिये कहा था वो तो देवता गण भी पीते थे तो हम भी पीने लग गये लेकिन मांस तो दैत्यों की निशानी है हमें नरक में भी जगह न मिलेगी... सब शराब की वजह से हुआ हमे कोई शराब वराब नही पीनी अब.. हमें क्षमा कीजियेगा बाबू जी “ पंडित जी चलने को हुए तो बाबू जी ने हाथ पकड कर बैठाते हुए कहा “ ठीक हैं तुम्हे जाना है तो चले जाना और पीना नहीं चाहते तो पीना भी मत.. पर बैठो तो सही... अब यहां तक लाये हो तो हमे तो पीने दो कम से कम ...| और ये भला बुरा रीति रिवाज खाना पीना समाज के चोंचले हैं सब.. हमारे ही फैलाये हुए हैं जरा सोचो अगर हमारे लिये मांस खाना ईश्वर की मर्जी के खिलाफ होता तो क्या वो हमें इसे पचाने की शक्ति देता? नहीं न... आदि काल में भी मानव मांस खाता था और डॉक्टर भी खाने की सलाह देते हैं देखो अपनी हड्डी के ढांचे को घास फूस खा कर ही ये हाल है तुम्हारा ...और भी काफी कुछ दलीलें दे डालीं...

अंततः महफिल फिर से सजी एक बार .... ब्लेंडर्स प्राइड के साथ पनीर की पकौडी .... दोनो के हाथ मे शराब की गिलास दो पेग के बाद पंडित जी नशे की आवाज़ में बोले बाबू जी... सलाम आपको एकदम ठीक कहा आपने.. हमारे यहां तो बस घास फूस ही खाते हैं और इतनी बंदिशें ये न करो वो न करो.... भगवान को जैसे सारी उम्मीदें बस हमीं से हैं.. हमारी जात वालों ने ठेका ले रखा है सबको रस्ता दिखाने का... हम लोगों को साला गाइड बना के रख दिया | ससुरा अगर पंडित न होते तो हमायी सुनीता हमायी गुलब्बो.... यादव न होती.. तो पक्का हमायी होती सिर्फ एक ही जात होती वो भी इंसान होती हम भी इंसान होते … न हम भगवान होते न वो यादव होती ... अ‍पनी ही बात को काटते हुए पंडितायी को दरकिनार कर पंडित बोले... बाबू जी आज भी ले चलो आदि युग में.. मजा नहीं आ रहा आज... मंगवाओ वही वाली मछली की पकौडी .... |

पंडित जी ने ब्रांड का नाम ढंग से रट लिया और अक्सर ही बियर शॉप की शोभा व घर की कलह बढाने लगे | पंडितायिन समाज लज्जा से बचने के लिये सब सहने लगी बिटिया का पिता मोह भी कम होने लगा |

सहसा ही एक दिन पंडित को अपनी महफिल की बुराईयों एवं बिटिया की युवावस्था का एहसास हो आया, चिंता सताने लगी बेटी की शादी की... अब अपनी लत मजबूरी लगने लगी | पंडित ठहरे जनम से विद्वान सो एक अत्यंत अचूक उपाय खोज निकाला... हिसाब लगाया बियर बोटल व हाफ प्लेट पकौडी का तो कुल खर्चा 300- 400 रुपये बैठा | अचूक उपाय अनुसार पंडित जी उस दिन दफ्तर से निकलकर सीधे बिअर शॉप गये रेगुलर बोतल खरीदी फिर मछली बाज़ार से छः पीस के वजन की मछली कटवायी पंसारी से आधा किलो बेसन व अन्य सामान खरीदकर घर पहुंच गये, अब तक पंडितायिन पंडित का विरोध कर कर के थक चुकी थी और उनके लिये पंडित का पीकर कर आना आम बात हो गयी थी, पंडित जैसे ही घर में घुसे पंडितायिन उनकी चाल देखकर खुश हुई व मन को थोडा सुकून मिला कि चलो कम से कम आज तो पीकर नहीं आये हैं ... पंडितायिन खुशी खुशी पानी का गिलास लिये पंडित के पास पहुंची और प्यार से बिटिया के शादी लायक हो जाने का एहसास दिलाने लगी | ‌अरे पंडितायिन! तुम्हें क्या लगता है... मुझे शालू की शादी की चिंता नही है देखो अज मैं पीकर आया हूं नहीं न... अरे हमे पता है ये शराब वराब में कितना खर्चा हो जाता है | पंडितायिन मुस्कुरायी और सुकुन से लम्बी सांस ली, चलो देर से ही सही शाम के भूले घर तो आये | पंडित आगे बोले ये साला हर बार दारू वारू में चार सौ तक खर्चा हो ही जाता है इसीलिये मैने छोड दी, पंडितायिन की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, मछली तो 100-150 की हाफ प्लेट न मन भरे न पेट... जबकि कच्ची मछली का रेट 100 -120 रूपये किलो है .... इसलिये हम मछली घर पर ही बनायेंगे... सुनते ही पंडितायिन के पैरों तले जमीन खिसक गई लगा मानो भाग जाए अभी ये घर छोड कर किंतु जमीर गिराये हुए पंडित की बातों को बदहवास सा सुनती रही ... पंडित बोलते रहे.. एकदम पनीर की पकौडी की तरह ही बनायी जाती हैं ..... पंडितायिन प्लीज बना दो... डॉक्टर भी तो खाने को कहता है ... अब तो पंडितायिन के सब्र का बांध टूट गया... दोनो में घमासान युद्ध हुआ पंडित ने सारे पैतरे अपना कर देख लिया निष्कर्ष निकला कि पंडित छत पर पुराने बर्तन व चूल्हे मे बना सकते हैं

पाक शास्त्र अनाडी पंडित ने आलू की तरह मछली के टुकडे धोये बेसन का घोल मान मनौवल कर के पंडितायिन से बनवाया ... पुरानी लाइट वाली गैस पर चूल्हा जमाया व तेल भरी कढाई तेज आंच पर चढा दी ... बेसन मे लपेट कर जैसे ही एक टुकडा तेल में डाला तेल छिटक छिटक कर पंडित जी के हाथ पर पडने लगा लेकिन किसी वीर योद्धा की तरह पंडित जी ने हार नही मानी और डटे रहे कि तभी एक छींटा उनकी दोनो आंख के एकदम बीचोबीच नाक पर पडा पंडित जी तिलमिला उठे व आंखों की सलामती के लिये ईश्वर का धन्यवाद दिया | इन परेशानियों से बचने की अनोखी तरकीब पंडित ने ढूंढ निकाली आंखों पर गॉगल चढाया व बदन पर हाथों को ढकते हुए एक पुरानी चादर ओढी .... पुनः युद्ध मे जुट गये | पकौडियों का सुनहरा रंग व धनिया पत्ती की सुगंध पंडित को बेचैन करने लगी | एक बार तो लार कूद ही पडी मुह से... अब तक पंडित जी कांटे निकालना व खाना बारीकी से सीख चुके थे ... पंडित ने प्लेट व पेग तैयार कर खाना शुरू किया किंतु आज चबाने मैं बडी मेहनत लग रही थी... पडित ने ये बेस्वाद भोजन बेमन से खत्म किया इस दौरान कई बार कुत्ते को खिला देने का मन तो किया किंतु कीमत ने करने न दिया |

दरअसल तेज आंच पर पकाया हुआ मांस कच्चा रह जाता है दूसरा कच्चे मांस को साफ करने का तरीका भी कुछ अलग होता हैं वो आप घर के किसी भी पाक निपुण से पूछ सकते हैं या इस विषय पर कभी और....

पंडित जी के पेट में पडे कच्चे मांस ने देर रात अपना काम करना शुरू किया... उल्टियां व पेट दर्द का जो सिलसिला शुरु हुआ डॉक्टर की सलाह मशविरा के बावजूद लगभग एक हफ्ते चला |

पंडित:- पंडितायिन तुम्हारे सांत्वना प्यार मे लिपटे तानों ने मुझे मांस मदिरा से कोसो दूर कर दिया ... कान पकडता हूं.. आज के बाद कभी नहीं |

(कुछ माह बाद का दृश्य... पडितायिन के मायके में शादी है पंडितायिन पंडित को फोटो खिचाने के लिये ढूंढ रही है....) देखती हैं गेस्ट हाउस से लगे पार्क मे एक अंधेरी जगह पर अशोक के पेड के नीचे पंडित, पंडितायिन के जीजा जी व मामा जी हाथों मे बिअर से भरे डिस्पोजल व कट्लेट की प्लेटे रखे महफिल जमाये हैं|

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