आसमान टांग देता है इंद्रधनुष
बादल बरस जाते यूँ ही चलते फिरते
सागर लुटाता रहता अपनी निधि ...
टप्प से टपकता वो मदहोश महुआ
पलाश की खुशबू से बौराता आम

सूरज भी पैर पसार बैठ जाता
दिन भर के चबूतरे पर

चांदी सी चमकती नदी के आगोश में
मुस्कराता वो छोटा सार पत्थर ..

चल पड़ते कई जोड़ी पांव
पेट को लिए साथ...
फसल के गीत गाते हुए ...

इस भरे पूरे दृश्य के बीचों बीच
पता नहीं कौन
चुपके से रख जाता है
एक ऊब .......
कि कुछ जोड़ी पांव
ख़ंजर की ओर बढ़ जाते ...

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