चरित्रहीन मर्द या औरत

"माँ मैं खेलने जाऊँ ? "

उस महीन जालीदार टाट के एक कोने से झांकते हुए उसने पूछा ।

" नही सुनयना"

दो टूक जवाब देकर वो फिर से मसरूफ़ हो गयी अपनी होठों की रंगत को चटक करने में ।

आँखों में आज भी सुरमा सजाया था उसने ।

"अरी ओ सुन्नी की अम्मा अब बिजली गिराएगी क्या आँखों से हम सब भसम होइ जायेंगे इहइ " गिलौरी चबाते हुए लाल पीक कोने में मारते हुए गुलाबो ने कहा ।

" अरे भसम होइ जाओ न एही बहाने टंटा खत्म होवे "

मलेच्छिन सबेरे सवेरे आई जाये है , मन में बुदबुदाते हुए रागिनी ने कहा ।

रागिनी हाँ यही नाम तो था उसका पर अब किसे याद है अब तो उसकी साँसे भी चम्पा नाम पहचान गयी थी जबसे वो रंगबाज़ार के खोली नम्बर 8 में आई थी ।

साज श्रृंगार के बाद चम्पा ने लोटे का जल उठाया और सामने की सीढ़ियों से होते हुए ऊपर छत की ओर बढ़ चली , एक माटी के गमले में तुलसी लगाया था उसने जिससे उसने एक आत्मा बांधी थी ,अपने विश्वास की डोर से.....

जल देने के बाद उसी दीवार की टेक लेकर बैठ गयी चम्पा और खो गयी शून्य में , हाँ शून्य में क्यों की उन इत्र से गमकते मोहल्ले की गलियों में हवा भी आज़ाद न थी तो क्षितिज़ नही मिल सकता था ख़्यालों के समन्दर का ना ही सपनो का इंद्रधनुष पर उस अपने शून्य में उसने बहुत से उम्मीद संजो रखे थे ।


"माँ ! बापू भैया को इतना प्यार करते हैं मुझे बिल्कुल भी नई न " 12 साल की रागिनी ने कुछ मचलते हुए कहा ।

"ना मेरी लाडो , बापू और मैं तो तेरे से बहुत प्रेम करे हैं का हुआ मेरी गुड़िया को " माँ ने आँचल में हाथ पोछते हुए कहा ।

"फिर बापू मुझे मेला में क्यों नही जाने देते भैया तो चला गया ,उसे 10 रूपये भी दिया बापू ने " रागिनी गुस्से को बरकरार रखते हुए बोली "मुझे भी जाना है पूजा ज्योति और उमा भी जा रही हैं हमको भी जाना है अम्मा , जाये दो न ,"

" बिटिया बापू गुस्सा करेंगे लड़की जात अकेले कैसे जायेगी तुम सब"

अम्मा दिन डूबने के पहले आ जाउंगी न

अच्छा जा ये ले 10 रूपये कुछ खाई पी लेना

और खुश होकर निकल गयी रागिनी उस रोज एक ही गलती हो गयी उससे जो उसने उमा के बाप पर भरोसा कर लिया की वो घर छोड़ देगा उसे जबकि सारी लड़कियां अपने घरों को लौट गयी और रागिनी उमा के साथ अपने मिट्टी के बर्तन दिखाने में उलझी रह गयी ।

चाचा ने घर छोड़ने के नाम पर रंगबाज़ार को ही घर बना दिया ।

ऐसा नही की रागिनी लौटी नही घर जब 4 सालों बाद गांव को गयी तो खबर हुयी बापू ने फांसी लगा के जान दे दी और अम्मा भैया को लेकर जाने किस देस चली गयी गांव वालों ने कहा था की रागिनी अपने आशिक़ के साथ रफूचक्कर हो गयी । चरित्रहीन लड़की ने घर उजाड़ दिया आशिक़ी में ।

उस रोज कहीं और ठिकाना न था जब लौटी तो इस बात का अहसास हुआ कि इक नया बीज उसके भीतर पल रहा है अबोध सी उम्र में सुनयना आ गयी थी उसकी गोद में।

"अरी ओ चम्पा जल दे रही है कि मर गयी आ नीचे तेरी करमजली ने क्या उत्पात ढाया है देख "

ख़्यालों से बाहर आकर जब दौड़ी दौड़ी नीचे पहुची तो पाया की सुनयना हाथ में पत्थर लिए खड़ी है और एक आदमी दर्द में बिलबिला रहा था ।

"क्या हुआ बेटा" आँचल में सुनयना को समेटते हुए उसने पूछा

"अरे मुझसे पूछ बड़ी सावित्री बनी फिरती है तेरी बेटी बित्ते भर की औकात और नखरे तो देख महारानी के ग्राहक ने हाथ क्या लगाया बिदक के पत्थर मार दिया अरे रंगबाज़ार में जन्मी है कुलच्छिनी तो लक्ष्मी बनने के सपने मत पाल" बिफरते हुए गुलाबो ने सुना दिया।

"बच्ची है वो अभी बख़्श दो उसे" "ख़बरदार जो कोई सुनयना के पास आया तो "

जलते हुए रागिनी ने उसका हाथ पकड़ा और कमरे में चली गयी

"माँ मैंने गलत किया कुछ "

"ना मेरी बच्ची , तू भूल जा ये सब "

अगली सुबह बहुत कुछ बदल चुका था गुलाबो ने बखेड़ा खड़ा कर दिया "इसकी बेटी के नखरे रोका नही तो हम सभन के पेट पर लात मारेगी ये जीजी कुछ करो वरना सबकी दुकान बन्द होगी और भुख्खे मरेंगे सब "

जीतन बाई के पास पहुच गयी थी गुलाबो , इस रंगबाज़ार की मालकिन

"क्यों रे चम्पा तेरी बेटी को स्कूल भेजा जाये ये गलती थी का हमारी जो ये तेवर दिखा रही है धंधा नही करेगी तो क्या करेगी "

"जीजी बच्ची है ये अभी और मैं नही चाहती की मेरी बेटी इस दलदल में आये " शांत मगर निश्चयपूर्वक बोली रागिनी

"बहुत ज़ुबान चलने लगी है तेरी इत्ते साल इसीलिए नही पेट पाला इस पाप का , कल ही सुन्नी की नथ उतराई होगी ख़बर फैला दो बोली कल लगेगी "

जीतन बाई उठ गयी इतना बोलकर

रात भर जागते हुए और एक जंग अंदर अंदर लड़कर कटी रागिनी की और सुबह जीत हुयी एक औरत की एक माँ की

सब आये सुनयना को ले जाने के लिए

"ए सुन्नी चल "सुनयना निरीह की तरह माँ की ओर नज़र डालने को थी कि रागिनी गरज उठी

"खबरदार जो मेरी बेटी को हाथ लगाया काट डालूंगी मेरी बेटी इस धंधे में नही आएगी जीजी मानना हो तो मानो वरना आर या पार आ जाओ "

डर के सब किनारे हो गए हँसिया हाथ में लिए चण्डी लग रही थी रागिनी

"मर्द नही है तू किस किस से बचाएगी तू इसको बोल "

"अच्छा है मेरी बेटी मर्द नही वरना मैं डर में जीती उम्र भर कि खुद के जानवर की भूख मिटा कर कहीं किसी को चरित्रहीन न बना दे ये , मेरे बाप को सज़ा में मौत मिली क्यों की उसकी बेटी चरित्रहीन बताई गयी क्यों की किसी का जानवर जाग उठा था , मेरी बेटी मुझ सा नही बनेगी , समझी , चल हट किनारे नही तो काट दूंगी "

8 साल बाद

"माँ, कैसी लग रही हूँ" पुलिस की वर्दी में सुनयना मुस्कुरा रही थी और रागिनी के शून्य वाले सपने भी ।

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