ये जो मोबाइल स्क्रीन है न ! बूंद के टपकने की सी आवाज के साथ इस पर एक नोटिफिकेशन आता है। गोल खिड़की उभरती है। उसमें उभरता है मेसेजे भेजने वाले का डिस्प्ले पिक्चर। और वह संख्या भी, जितने मेसेज उसने किए।

काफी दिन हो गये मेरे मोबाइल से अब यह आवाज नहीं आती, वह खिड़की भी नहीं उभरती। वो भी क्या दिन थे जब सुबह उठते ही उस खिड़की को देख मन मयूर नाच उठता। रात को सोने तक ताक-झांक चलती रहती। उस खिड़की में तुम्हारी प्यारी सी तस्वीर उभरती। उसे खोलकर मैं तुम्हारे मन की बात को पढ़ता। अपने मन की बात भी उसी से तुम तक पहुंचाता।

उस अनोखे रास्ते से दिल की बातों की यह आवाजाही अब कहां बची। अब तो मेरे मोबाइल की स्क्रीन सूनी-सूनी रहती है। बूंद की आवाज से ठिठक कर कभी देखता हूं तो किसी ग्रुप की खिड़की खुली पाता हूं। तुम्हारी वो खिड़की तो अब खुलना ही बंद हो गई है। सच कहूं तो बहुत कशिश थी उस खिड़की के खुलने के इंतज़ार में। बहुत राहत थी उस बूंद के टपकने की आवाज में। बहुत लगाव था तुम्हारी बातों से।

अब ऐसा नहीं होता। क्यों कि तुम मेरे पास हो। दुविधा में हूं कि तुम्हारे साथ रहने से ज्यादा खुशी मिलती है या तुमसे दूर रहकर...!

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