बीमारी आदमी को कितना तोड़ देती है, इसका अहसास अर्पिता को अब हुआ है। कुछ दिन पहले तक वह बिल्कुल स्वस्थ थी। कभी उसके सिर में दर्द भी नहीं होता था। अचानक उसने महसूस किया कि उसके ब्रेस्ट पर एक गाँठ है। यद्यपि उस गाँठ में किसी तरह का दर्द नहीं था।वह अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ती रहती थी कि इस तरह की गाँठ कैंसर की भी हो सकती है। अत: उसने डॉक्टर को दिखाना उचित समझा। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट कराने को कहा था। तभी से वह मन-ही-मन परेशान थी कि कहीं यह कैंसर न हो। आज रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने उसके शक को सच्चाई में बदल दिया था। डॉक्टर ने स्पष्ट कहा था कि "उसे ब्रोस्ट कैंसर है और इसका एकमात्र इलाज ऑपरेशन .

हर समय प्रफुल्लित रहने वाला उसका चेहरा कुछ ही घंटों में कुम्हला गया है। उसे देखने से लगता है, जैसे वह बहुत दिनों से बीमार है। सरदर्द से उसका माथा फटा जा रहा है। लगता है, मस्तिष्क की नसें खिंच कर टूट जाएँगी। अब तक तो वह अपने रंगीले संसार में खोई हुई थी, जहाँ फूलों की महक थी, खुशियों का उजाला था और थे अनिल के साथ बिताए बहुत से पल। उनकी दूरियों के नजदीकियों में बदलने का समय जैसे-जैसे पास आता जा रहा था, उसकी बेताबियाँ बढ़ती जा रही थीं।
अचानक यह क्या हो गया। डॉक्टर के दो शब्दों "ब्रेस्ट केंसर' ने उसके सपनों के संसार को छिन्न-भिन्न कर डाला है। नयनों में मौत की परछाइयाँ तैरने लगी हैं। वह कुछ देर के लिए सब कुछ भूल कर चेतनाशून्य हो जाना चाहती है, पर बिलखती मम्मी और मौन अश्रु बहाती सुमी उसको स्थिति की गंभीरता की याद दिला देती हैं।
अच्छा है, अनिल के साथ विवाह-सूत्र में बँधने से पहले ही उसे इस बीमारी का पता चल गया। डॉक्टर तो कह रहे थे, डरने की कोई बात नहीं, अब यह रोग लाइलाज नहीं है। प्रारंभ में पता चल जाए, तब तो बिल्कुल खतरा नहीं होता और यह शुरुआत ही है किंतु वह जानती है कि ऑपरेशन तो आख़िर ऑपरेशन ही होता है। डॉक्टर तो मरीज को ऐसे सांत्वना देते ही हैं। हो सकता है कि यह कैंसर उसकी मौत का कारण बन जाए, जैसा मिसेज दमयंती के साथ हुआ था।

मृत्यु न भी हुई तो एक ब्रेस्ट तो ऑपरेशन में निकालना ही पड़ेगा। मिसेज जोशी का भी एक ब्रेस्ट निकाल दिया गया था। अब वह कृत्रिम ब्रेस्ट लगाती हैं। किंतु तब से वह बहुत उदास रहती हैं। उनमें हीनता की भावना घर कर गई है। वह विवाहित हैं, दो बच्चों की माँ हैं।पर उसकी तो अभी शादी भी नहीं हुई है। इन हालात में क्या विवाह करना उचित होगा ? पता लगने पर हो सकता है अनिल के प्यार का नशा उतर जाए। तभी तो माँ चाहती हैं कि वह अभी अनिल को कुछ भी न बताए। यह मान कर चले कि उसने अभी कोई टैस्ट नहीं कराया है, बल्कि उसे ब्रेस्ट कैंसर का पता ही नहीं है। विवाह के बाद गाँठ का जिक्र करके अनिल के साथ ही किसी डॉक्टर के पास जाए, तो अनिल यह भी नहीं कह सकेगा कि उसके साथ धोखा हुआ है।
किंतु उसने निश्चय कर लिया है कि वह यह बात अनिल को बता देगी। उसने प्यार किया है। वह अनिल को नहीं छलेगी। उसे धोखा नहीं देगी, परिणाम चाहे जो हो।
उसे सोया जान कर माँ व सुमी बात कर रही थीं। सुमी कह रही थी, "माँ, दीदी का कहना ठीक है, अनिल को सब कुछ बता देना चाहिए। उनकी सहमति से, ऑपरेशन के बाद, स्वस्थ होने तक के लिए विवाह स्थगित कर देना चाहिए।'
"अपनी दीदी की तरह तू भी नासमझी की बातें कर रही है। तू समझती है, इस बीमारी का पता लगने के बाद भी अनिल उससे विवाह करेगा।... मैंने दुनिया देखी है, सुमी। वह साफ कन्नी काट जाएगा। उसे एक से एक अच्छी लड़कियाँ मिल जाएँगी, साथ में ढेर सारा दहेज भी। लेकिन हमें अनिल सा दूसरा लड़का नहीं मिलेगा। लड़की को केंसर हो चुका है, यह जानने के बाद कोई भी उससे विवाह को राजी नहीं होगा। हमारे पास तो देने को दहेज भी नहीं है। वह तो अर्पिता की किस्मत अच्छी है, जो अनिल बिना दहेज के उससे शादी करने को तैयार है। मैं तो चाहती हूँ, अभी अनिल को कुछ भी न बताया जाए। एक-दो दिन में वह अर्पिता के साथ शॉपिंग करने के लिए आने वाला है।'
कॉलबेल की आवाज सुनकर अर्पिता ने ही दरवाजा खोला था।
"अर्पि, कौन है ?' माँ ने पुकारा ।
"माँ, अनिल आए हैं।'
"अरे अर्पि, तुम्हें क्या हुआ है...चेहरा कितना उतर गया है, बीमार थीं क्या ?'
अर्पिता के कुछ कहने से पहले ही माँ बोल पड़ीं -- "जैसे-जैसे शादी का दिन पास आता जा रहा है, इसकी उदासी बढ़ती जा रही है। शादी के बाद माँ का घर छूट जाता है न । शायद हर लड़की की यही दशा होती है।'
"तुम बैठो अनिल,' कह कर अर्पिता दूसरे कमरे में चली गई थी। माँ ने उसे पुन: समझाया था, --"अर्पि, मेरी बात मान ले बेटी, उसे अभी कुछ मत बता।'
अनिल से मुलाकात भी मात्र एक संयोग था। वह नृत्य का प्रोग्राम देने दिल्ली गई थी। अनिल उस प्रोग्राम की व्यवस्था करने वालों में से एक था। वही उसे स्टेशन लेने पहुँचा था। उस समय वह एक कॉलेज में लेक्चरर था और आई.ए.एस. की तैयारी कर रहा था। कुछ क्षणों के परिचय में ही दोनों एक-दूसरे से प्रभावित हो गए थे। अनिल ने ही पहले मैत्री का हाथ बढ़ाया था। उसे भी अनिल से दोस्ती करना अच्छा लगा था। एक मुलाकात में ही वह 'आप' की दीवार लाँघ गया था। उसे भी 'तुम' सुनना बुरा नहीं लगा था।
अपने शहर लौटने के बाद भी वे पत्रों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहे थे। पत्रों से ही उसे ज्ञात हुआ था कि उसकी माँ बचपन में ही कैंसर से मर गई थी । दो वर्ष पूर्व पिता की मौत भी एक दुर्घटना में हो गई थी। वह अपने माता-पिता की अकेली संतान था। अर्पिता ने महसूस किया था कि वह प्यार का भूखा है। दोनों की जातियाँ एक नहीं थीं, अत: अर्पिता के मन में शक था कि माँ इस विवाह की स्वीकृति नहीं देंगी। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। अनिल द्वारा विवाह की स्वीकृति माँगने पर माँ ने सहर्ष हाँ कर दी थी। सुमी के पूछने पर माँ ने कहा था, "अर्पिता की पसंद इतनी अच्छी है कि जाति के पचड़े में पड़ कर मैं उसकी खुशियों को ग्रहण लगाना नहीं चाहती।'
दूसरी बार वह आई.ए.एस. की ट्रेनिंग समाप्त होते ही आया था। तब एक छोटे-से समारोह में माँ ने उसकी मँगनी की रस्म पूरी करके शादी की तारीख भी निकलवा ली थी। अब पंद्रह दिन बाद उनकी शादी होनी है।
"अरे सुमी, तुम्हारी दीदी कहाँ गई.. बुलाओ न उसे, हमें बाजार जाना है। अपनी साड़ियाँ, ज्वेलरी वह स्वयं पसंद कर ले तो ठीक रहेगा।'
सुमी और उदास हो गई। वह जानती है, दूसरे कमरे में जाकर दीदी अपने बहते आँसुओं को रोकने व सहज होने की कोशिश कर रही होंगी।
"अर्पि, तुम्हारी पलकें सूजी क्यों हैं ?...कह दो, जुकाम हो रहा है। अरे, मैं शादी करके तुम्हें कोई विदेश तो नहीं ले जा रहा हूँ। जब चाहो, तुम यहाँ आ सकती हो। माँ व सुमी को भी वहाँ बुला सकती हो। चलो मार्केट चलते हैं। रात को मुझे लौटना है।'
"तुम बैठ कर चाय पियो, मैं अभी तैयार होकर आती हूँ।'
"अरे, तुम तो ऐसे ही बहुत अच्छी लग रही हो। चाय-कॉफी कहीं बाहर पी लेंगे। जल्दी से चलो।' अर्पिता का मन कहीं जाने को नहीं था। फिर भी जो वह कहना चाहती थी, वो बातें घर में माँ के समक्ष कहने में स्वयं को असमर्थ पा रही थी।

"अनिल पहले हम बाजार न जाकर कहीं और चलेंगे।'
"कॉफी हाउस चलें ?'
"नहीं, चलो किसी पार्क में बैठेंगे। तुमसे बहुत-सी बातें करनी हैं।'
"जैसी तुम्हारी इच्छा । वैसे मेरा मन भी तुमसे बहुत-सी बातें सुनने को कर रहा है। अब तुम जल्दी से आ जाओ। अब और इंतजार नहीं होता। एक-एक दिन गिन कर समय काट रहा हूँ।'
कोई और दिन होता, तो अर्पिता इन बातों से रोमांचित हो उठती। उसको भी कुछ-कुछ होने लगता। उसका भी तो यही हाल था। किंतु आज इस चर्चा से उदासी और निराशा का कोहरा घना हो उठा।
पार्क में बैठते ही अनिल कुछ अधिक ही उत्साहित नजर आ रहा था। अपनी संयमित प्रकृति के विपरीत कुछ रोमांटिक भी दिख रहा था। उसके गले में बाहें डाल कर बैठ गया और बोला, "अर्पि, मैंने कल एक बुरा स्वप्न देखा है। यों मैं स्वप्नों में विश्वास नहीं करता, फिर भी कुछ अभागा तो हूँ ही, जो माता-पिता की स्नेह छाया से वंचित हूँ। कभी-कभी डर लगता है कि यह खुशी का प्याला होठों तक आते-आते कहीं...अरे, मैं तो भावुक होने लगा। बताऊँ, मैंने क्या स्वप्न देखा ?'
"हाँ बताओ।'
"मैंने देखा, तुम दुल्हन की तरह सजी बैठी हो। मैं जैसे-जैसे तुम्हारे पास आने का प्रयास करता हूँ, तुम दूर होती जाती हो। मैं तुम्हारा आँचल थामना चाहता हूँ। तभी तुम्हारी साड़ी पंखों में बदल जाती है और तुम आसमान में उड़ जाती हो। मैं हताश तुम्हें पकड़ने के प्रयास में हाथ उठाए खड़ा रह जाता हूँ।'
"अनिल, हो सकता है, यह सपना सच ही हो जाए।'
"कैसी बातें करती हो। सपने भी कभी सच होते हैं।'
अर्पिता के अब तक सप्रयास रोके हुए आँसू बाँध तोड़ कर बह निकले।
"अर्पि, तुम्हें जरूर कुछ हुआ है। तुम मुझे स्वस्थ नहीं लग रहीं। पिछली बार तो तुम पूरे समय चिड़िया-सी चहकती रही थीं। कहाँ खो गई तुम्हारी वह चहचहाहट...और ये आँसू क्यों ? कुछ बोलो अर्पि, मुझे डर लगने लगा है।'
"हाँ अनिल, तुम ठीक कह रहे हो। इन तीन-चार दिनों में बहुत-कुछ बदल गया है। पता नहीं, इस नए जीवन-पथ पर तुम्हारे साथ चल पाऊँगी या नहीं।'
"प्लीज अर्पि, पहेलियाँ मत बुझाओ। मुझे बताओ, तुम्हें क्या हुआ है ?'
"कैसे कहूँ अनिल। हमारे स्वप्न पूर्ण होने से पहले ही बिखरने लगे हैं। शारीरिक रूप से मैं बिल्कुल स्वस्थ थी। एक दिन अचानक ब्रेस्ट की एक गाँठ पर ध्यान गया तो डॉक्टर को दिखाने चली गई।..कुछ टैस्ट कराने के बाद डॉक्टर का कहना है कि मुझे ब्रेस्ट कैंसर है। ऑपरेशन कराना होगा। हो सकता है, ब्रेस्ट निकालना पड़े। इस हालत में हमारी शादी कैसे हो सकती है। इसीलिए मैंने शापिंग का प्रोग्राम कैंसिल कर दिया है। मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखना चाहती थी। इसीलिए तुम्हें सब स्पष्ट बता दिया है।'
अर्पिता ने सोचा था कि वह तड़प उठेगा। फिल्मी हीरो की तरह कहेगा, "कैंसर तो क्या, तुम्हें मृत्यु भी मुझसे अलग नहीं कर सकती। यह बीमारी खतरनाक अवश्य है, पर लाइलाज नहीं। तुम मेरी हो, तुम्हें मुझसे कोई नहीं छीन सकता।'
वह कहेगी, "अनिल भावुक मत बनो, वास्तविकता को पहचानो।'
अनिल कहेगा, "नहीं अर्पि, मैं इतना स्वार्थी नहीं। विवाह के बाद ज्ञात होता तो क्या मैं तुम्हें त्याग देता। यह विवाह जरूर होगा। आगे जो मेरी नियति होगी, वह सह लूँगा।'
अरे, वह कहाँ कल्पना में भटकने लगी। अनिल तो एकदम चुप है, पत्थर के बुत की तरह।
अनिल के मन में विचारों का बवंडर उठा हुआ था। इसी बीमारी ने बचपन में उसे माँ के स्नेहिल प्यार व ममता से वंचित कर दिया था। क्या अब वह अपने पहले प्यार अर्पिता को भी नहीं पा सकेगा।...

लेकिन माँ को तो पेट का कैंसर था। उन्होंने बहुत शारीरिक कष्ट पाया था। अर्पिता को तो कोई शारीरिक कष्ट नहीं है। हो सकता है, यह कैंसर की प्रथम स्टेज हो। नहीं, उसकी जान को कोई खतरा नहीं होगा। ज्यादा-से-ज्यादा यह होगा कि डॉक्टर एक ब्रेस्ट निकाल देगा, लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि यह बीमारी दोबारा नहीं होगी। तो क्या विवाह को टालना ही उचित होगा... मैं क्या करूँ..हे भगवान ये क्या हो गया ।'
"भगवान ये क्या हो गया,' ये शब्द कुछ इस तरह से अनिल के मुँह से निकले थे कि अर्पिता के साथ वह स्वयं भी चौंक गया।
"क्या हुआ अनिल,.... कुछ तो बोलो ।'
"क्या बोलूँ अर्पि, लगता है, किसी ने जीवन शक्ति ही निचोड़ ली है। लेकिन तुम परेशान मत हो। मुझे विश्वास है, तुम्हें कुछ नहीं होगा। हाँ, शादी का प्रोग्राम हमें बदलना होगा। चलो, कॉफी हाऊस चलते हैं। कॉफी पीकर माँ के पास चलेंगे।'
अर्पिता के मन में कहीं एक टीस सी उठती है ।
घर पहुँचते ही अनिल ने माँ से कहा, "माँ,आप परेशान मत हो। अर्पि, जल्दी ही स्वस्थ हो जाएगी। दिल्ली में मेरे दोस्त के पिता कैंसर विशेषज्ञ हैं। मैं अर्पि को सीधे उनके पास ले जाऊँगा। हम शादी पंद्रह दिन बाद नहीं, एक-दो दिन में ही कर लेते हैं ताकि जल्दी-से-जल्दी उसका इलाज शुरू हो सके। अब देर करना ठीक नहीं है।'
"नहीं अनिल, इतना बड़ा निर्णय इतनी जल्दी करना ठीक नहीं है। शादी तो हम ऑप्रेशन के बाद भी कर सकते है। हो सकता है तुम ने यह निर्णय भावुकता में लिया हो । किंतु जिंदगी भावुकता से नहीं चलती। हो सकता है, बाद में तुम्हें अपने निर्णय पर पछतावा हो। इस समय तो मैंने जीवन की हर सच्चाई को झेलने की हिम्मत जुटा ली है। बाद में कुछ हुआ तो मैं सह नहीं पाऊँगी।'
" अर्पि तुम ठीक कह रही हो शादी बाद में भी की जा सकती है। पर एक दो दिन में ही शादी करने का फैसला मैंने भावुकता में नहीं लिया है ।सच बात तो यह है कि अपनी पत्नी रूप में मैं तुम्हें बैस्ट मेडिकल फैसिलिटी और ट्रीटमेंट दिला पाऊँगा ।लगता है तुम्हें मुझ पर, मेरे प्यार पर भरोसा नहीं है। मुझ पर विश्वास करो। शादी के बाद तुमको यह बीमारी होती, तो क्या मैं तुम्हें छोड़ देता।'
वह कुछ और कहती, इससे पूर्व ही अनिल कमरे से बाहर निकल गया था। सच्चाई अनिल को बता कर अर्पिता के मन का बोझ हल्का हो गया था। जीने की चाह पुन:सिर उठाने लगी थी।


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