घर से निकलने से पहले उसे लगा कि वह एक बार गहरी नींद में सोती निशा को नींद से उठाए। वैसे नहीं जैसे वह कभी उसे दोपहर की नींद से उठाता है, बल्कि झिंझोड़कर इस तरह उठाए जिससे उसकी सालों साल पुरानी नींद, जिसमें वह जागते हुए भी बनी रहती है, टूट जाए और फिर अपने सीने में दबे आए तमाम गुस्से को इक्ठ्ठा करके कहे कि वह इस घर से जा रहा है और वह भी कभी न लौटने के लिए। वह अपने जीवन से, उसकी रोज-रोज की खिट-खिट से ऊब गया है, आकंठ भर गया है। उसे सोते-जागते हमेशा ये एहसास होता है कि मानो वह फट पड़ेगा, बह निकलेगा- उसका दुख - कभी भी, कहीं भी। उसने सोचा कि वह उठा कर कहे उससे कि जिस दामपत्य की बात दिन की रोशनी में वह सबके सामने मुस्करा-मुस्कराकर करते हैं, रात में उसी दामपत्य का खोखलापन उसे निगलने के लिए मुँह फाड़ता है। वह एक साथ, एक छत के नीचे रहते हुए अलग-अलग दिशाओं के सफ़र पर हैं। एक ऐसे सफ़र पर जिसकी कोई मंज़िल नहीं है।

… पर उसने उसे नहीं उठाया। उसे लगा शायद उसे जगाकर उससे यह सब कह देने में उसकी बहादुरी नहीं बल्कि उसके भीतर की कोई कमज़ोरी है, वह अपने निर्णय से डिग जाने के लिए बहाना ढूँढ रहा है, वह जानता है कि उसके ऐसा करने पर कुछ भी हो सकता है पर उसका इस तरह घर से जाना नहीं हो सकेगा। वह फिर सदा कि तरह ऐसे ही इसी चारदीवारी में रहा आएगा। शायद इसीलिए उसके मन में यह ख्याल आ रहा है कि वह जाने से पहले उसे जगाए और वो एक-एक बात उससे कह डाले जो हमेशा किसी न किसी लिहाज में उसने नहीं कही पर वह जानता है कि यह सब कह चुकने के बाद उसका क्रोध चुक जाएगा, वह रीत जाएगा- इस क्रोध से, इस तनाव से और इस तरह, इस समय निमिष और निशा को छोड़ के, नहीं जा सकेगा।

क्षणभर बाद उसे अपने आप पर, अपने मान पर, अपनी घृणा और क्रोध पर ही सन्देह होने लगा। उसे लगा की यह सब शायद उसका अपने आप को समझाने का ढ़ोंग भर है, वह दरसल इस सबसे मुक्त होना ही नहीं चाहता, जाना ही नहीं चाहता यहाँ से या फिर उसमें साहस ही नहीं है, यहाँ से चले जाने का। वह सोचने लगा-क्या हर गृहस्थ ऐसे ही ऊबता होगा, अपनी गृहस्थी से? …भाग जाना चाहता होगा चुपचाप रात के अंधेरे में…पर ऐसा चाहते हुए भी बना रहता होगा अपने घर पर ही, अपने परिवार के साथ,…किसी अंजाने डर से घिरा हुआ, कोने में दुबका,…सालों-साल।

उसे विश्वास हो चला कि वह रोज छोटी-छोटी लड़ाइयाँ लड़कर अपने आपको किसी बड़ी लड़ाई के उस अप्रत्याशित खतरे से बचाता आ रहा है जिसके बाद वह सब वैसा नहीं रहा आएगा जिसकी शायद उसे आदत हो गई है। अपने भीतर झाँककर जैसे उसने ख़ुद को धिक्कारा- वह एक कायर, डरपोक और घरघुसरा आदमी है जो कई बार अपने को साहसी दिखाने के लिए बेवज़ह चिल्लाता, दहाड़ता, चिंघाड़ता है, यहाँ-वहाँ पाँव पटकता है पर कुछ कर नहीं पाता,… ऐसा करते हुए उसके अहम को बहुत गहरी चोट लगी।

…पर आज वह बहुत निर्मम था- जीवन के प्रति, अपने प्रति, अपनी दुर्बलताओं के प्रति, आज वह रेशा-रेशा अपने दुख को छील रहा था। वह किसी तरह उसके शान्त हो जानेपर, उसे किसी समझोते पर पहुँचते हुए नहीं देखना चाहता था बल्कि वह उस ऊब से जन्मे क्रोध पर सवार हो यहाँ से चले जाना चाहता था। वह जैसे लगातार अपने क्रोध पर धार धर रहा था। वह उस नामालूम से ज्वालामुखी के फटने की राह देख रहा था। वह अपने भीतर बैठे किसी आदमी के नाखून पैने कर रहा था। उसे लगा निशा के जागते ही यह सब एक तिलिस्म की तरह टूट जाएगा इसलिए उसने निशा को जगाकर उससे कुछ भी कहने का ख्याल छोड़ दिया।

……उसने कुछ अन्यमनस्क होकर कीले पर टंगा कोट उतारा जिसके नीचे नीले बल्ब की रोशनी में उसने अपनी, निशा और निमिष की तीन साल पुरानी तस्वीर देखी। वह एक पल उसको देखने के लिए वहीं खड़ा रहा, फिर जैसे सहसा खुदपर झुंझालाया- वह हमेशा से जानता था कि यहाँ ठीक इस कीले के नीचे यह तस्वीर है जिसे देखकर वह तमाम पुरानी बातों को, अच्छे दिनों को याद करने लगता है फिर आज वह क्यूँ इस तस्वीर के नीचे आ खड़ा हुआ। बाहर इतनी सर्दी तो है नहीं कि उसे कोट की ज़रूरत पड़ती।

उसने फिर ख़ुद को आइना दिखाया- वह दरसल कोट लेने यहाँ, इस तरफ़ आया ही नहीं था, वह इस सुनसान रात में बस ऐसा कोई बहाना ढूँढ रहा है जो उसे किसी तरह इस घर में रोक ले, हमेशा की तरह कमजोर करदे और सुबह वह यह कहकर अपने आपको बहला सके कि कल रात वह तो गुस्से में चला ही गया होता अगर उसके साथ फलाँ बात नहीं हो गई होती, या फलाँ के ख्याल ने उसे एन मौके पर रोक न लिया होता।

उसे अब अपने आप पर खीज हो रही थी। उसने गुस्से से कोट अन्धेरे में उछाल दिया। कोट पलंग के उस कोने में गिरा जहाँ अपने पैर सिकोड़े निमिष सो रहा था। उसे लगा कोट के गिरने की आवाज़ से निमिष जाग गया होगा। वह अभी पूछेगा- इतनी रात के आप कहाँ जा रहें हैं, या फिर कहेगा- इन कपड़ों में मोर्निंग वॉल्क पर क्यूँ जा रहे हैं। वह बहुत ध्यान से निमिष को देख रहा था। निमिष ने कुनमुनाकर करवट बदली, उसे लगा वह जाग रहा है पर उसके बाद वह बहुत देर तक बिलकुल भी नहीं हिला बल्कि उसके धीमे-धीमे लिए जा रहे खर्राटों से कमरे के उस कोने में पसरा अंधेरा गाढ़ा होने लगा। उसने सिर को झटका और बिना किसी से कुछ कहे घर से निकल जाने का फैसला किया तभी उसे लगा- उसे निकलने से पहले एक सिगरेट पीने की जरूरत है। वह सिगरेट पीकर बेहतर निर्णय ले पाता है।

……और वह अपनी पढ़ने की टेबल पर सिगरेट थथोलने लगा। बिना किसी आहट के डिब्बी उसके हाथ आ गई। माचिस भी ठीक वहीं उसीके पास ही होनी चाहिए,… पर वह वहाँ नहीं है। आज फिर निशा ने गैस जलाने के लिए उसकी टेबल से माचिस उठा ली होगी। कितनी बार मना किया इन लोगों को कि उसकी चीजें न उठाया करें पर वे अपनी आदतों से मजबूर हैं। दरसल यहाँ किसी को उसकी परवाह ही नहीं। उसने गुस्से में टेबल पर रखे सामान को फिर से टटोलना शुरू किया। टेबल के किनारे खड़ी करके रखी गई टार्च उसका हाथ लगने से गिरकर लुड़कने लगी जिसे उसने अंदाजे से पकड़ लिया। उसे अपने पर और गुस्सा आया। उसे पहले ही टार्च जला लेनी चाहिए थी, तब सिगरेट और माचिस आसानी से उसके हाथ आ गए होते। अभी वह टार्च जलाने की सोच ही रहा था कि घड़ी का अलार्म बज उठा।

पहले कभी इतनी जल्दी सुबह नहीं हुई।

आज उसकी गलती नहीं थी। आज उसकी ऊब, उसका गुस्सा, उसका निर्णय- सब पक्का था पर आज समय ने धोखा दे दिया और वह हमेशा-हमेशा के लिए यहाँ से भाग खड़े होने में विफल रहा। उसे लगा आज की विफलता सालों से चली आ रही विफलता से अलग थी।

यह अलार्म जैसे उसके गुस्से पर, उसकी किसी को बिना बताए घर से हमेशा के लिए चले जाने की योजना पर अप्रत्याशित हमला था। वह जानता था यह अलार्म फिर सबकुछ वैसा ही कर देगा जिसमें वह कुछ देर छटपटाने के बाद अवश्य ही फंस जाएगा। वह फिर मुस्कराते हुए एक और दिन जिएगा। उसने आखिरी कोशिश की और झपटकर बेड के बगल में रखी घड़ी का अलार्म बन्द कर दिया। इस कोशिश में सिगरेट की डिब्बी हाथों से छूटकर कहीं गिर गई।

उसे लगा घड़ी की आवाज़ से निशा जाग गई होगी। उसने बिना निशा की ओर देखे उसकी आहट ली। लगा वह अभी भी सो रही है। चैन की साँस ली। लगा अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ। सब सो रहे हैं, सुबह हुई है पर उजाला नहीं, उसमें देर है। अभी वह उजाला नहीं हुआ जिसमें उसका गुस्सा धुल जाता है, जिसमें तमाम नकली मुस्कराहटें उग आती हैं। उसने दम साधी, दिल कड़ा किया और दरवाजे की ओर क़दम बढ़ाया।

आज वह चला ही जाएगा। …तभी पीछे से निशा की आवाज़ आई, 'आज जब समय से उठ ही गए हो, तो चाय ही बना दो।' बस यही, यही तो वह नहीं चाहता था। वह चुपचाप किचिन में चला गया और लाइट खोली…

खिड़की में बैठे कबूतर पहले से ही जाग रहे थे, बतिया रहे थे, उसे चिढ़ा रहे थे। वे उसके खिड़की को बार-बार ठोकने पर भी वहाँ से टस से मस नहीं हुए। ……बाहर वही उजाला धीरे-धीरे फैल रहा था। उसका चेहरा काला पड़ने लगा।

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