प्यारी घटना


बात कुछ ज्यादा पुरानी नही थीं, यही कोई 2 साल 8 महिने 22 दिन और कुछ घंटे हुए होगें । आप इतना मत सोचिये, ये मेरी जिन्दगी की सबसे प्यारी घटना हैं इस लिये इसका एक एक़ छड़ मुझे याद रहता हैं ।
ये बात तब की हैं जब मेरी 12 वीं की परिक्षा खत्म हुईं थी और सिविल सर्विसेस की तैयारी के लिये मुझे भोपाल से बनारस जाना पडा। कद काठी में ठिक था, पढ़ाई भी काम भर कर लेता था और घर का एकलौता था तो पिता जी ने छुट दे रखीं थी की तुझे जो करना है वो कर, तो 12 वीं की परिक्षा के तुरंत बाद मैं आ गया बनारस घर से दुर माँ-बाप से दुर, अपने परिवार से दुर, अपने गाँव से दुर (जब आप पहली बार घर से हास्टल जाते हैं तो आप को हर उस चीज़ की याद आती हैं जो आप घर पे देखते या करते थे।)। कुछ दिन तक तो घर की बहुत याद आयी पर घीरे-घीरे सब ठीक हो गया, नये दोस्त भी बन गयें और फिर क्लासेज मे इतना व्यस्त हो गया कि घर की याद धीरे -धीरे कम हो गईं ।ऐसे ही एक रविवार की शाम को मैं और मेरे कुछ दोस्त धूमने के मन से गंगा धाट की ओर निकल पडे, शाम का समय होने के कारण भीड कुछ ज्यादा थी और कन्याओ की भीड भी । इतने दिनों से लगातार क्लास कर कर के दिमाग का दही हो रखा था और अगर आप बनारस के हो तो आप जानतें होंगें की शरीर और मस्तिष्क की थकान मिटाने के लिये आदमी गंगा घाट जाता हैं और वहा बैठ कर सारे विचारो का मंथन करता हैं और आगे क्या करना हैं उसके बारे में विचार करता हैं, मैं भी यही कर रहा था । धाट का नजारा, धन्टीयों की आवाज और मंत्रो का उच्चारण किसी भी इन्सान का मन मोहने के लिये काफी था, कुछ गलत नही कहा जाता हैं कि बनारस मे भगवान रहते हैं, इतनी प्यारी जगह को छोड़कर कर कोई कैसे जा सकता हैं ।जिन्दगी कैसे करवट लेतीं हैं मैं यही सोच रहा था अभी कल ही तो माँ के हाथ का बनाया खाना खा रहा था, अभी कल ही तो पापा से रिमोट के लिये लडाई हुईं थीं, अभी कल ही तो ग्लास तोड़ने पे माँ से डाँट खायीं थीं और अभी कल ही तो पापा को बाईक पे बैठा कर सब्जी लेने गयें थें और आज सबसे दूर हूँ बस यादें हैं पास में हैं। इन्हीं सब विचारों में ढूबा हुआ मैं गंगा मे चल रहें नाव देख रहा था, नाव के चले जाने के बाद पानी काफी देर तक हिलता रहा और मेरा मन भी । इसी बीच मेरी निगाह कुछ दूर से आ रहीं नाव पर पडीं उसमे कुछ नवयुवक व नवयुवतीया बैठें थें और आपस में ही हसीं ठिठोली कर रहे थे, ऐसा ज्ञात हो रहा था की सारे लोग यहीं के रहने वाले हैं । उन्हीं मे से एक लड़की भी थीं, काले कपडों में बडी़ बडी गोल गोल आँखें, बाल ऐसे जैसे काले बादल हों, आवाज जैसें कोयल की तरह हों।पहली मुलाकात बस कुछ ही क्षण की हुईं थी पर ऐसा लगा उस क्षण मे बहुत कुछ हो गया, ऐसे समय रांझणा मूवी का वो डायलाग याद आता हैं की "बनारस शहर का सारा भांग हमारी खोपड़ी मे उतर आया हों।" उस चहरे को एक बार फिर से देखने की ईच्छा दिल मे जगी और अपने एक बनारसी मित्र को लेकर निकल पडा उसकी खोज में, पर वो कहते हैं ना कि जिस चीज को आप ढूंढ रहे हो वो इतनी जल्दी नहीं मिलती और हुआ भी यही बहुत ढूँढने पर भी वो मुझे न मिली, रात हो गई थी तो मैं और मेरे दोस्त हास्टल की ओर चल पडे।कुछ दिन और बित गये पर अभी भी उस लडकी का प्यारा सा चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम रहा था, ऐसा पहले कभी नही हुआ था, और उसे दुबारा देखने की चाह में मैं फिर से धाट की ओर चला पर इस बार भी वो नहीं दिखीं अब मैने उसे भूल जाना ही ठीक समझा, पर दो दिनों बाद कुछ ऐसा हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी, मैने उसे अपने कोचिंग से निकलते हुए देखा और अगले दिन ही उसने हमारे बैच में पर्सेनाल्टी डेवलपमेंट की क्लासेस ज्वाइन कर ली, पहले दिन ही उसने अपनी आवाज और अपनी अदाओं से सबका मन मोह लिया, उसका नाम आशिमा था । पढने मे अच्छा होने के कारण हमारे सर ने उसे मेरे साथ बैठा दिया, एक दो दिन तक तो कुछ बात करने की हिम्मत नही हुईं पर धीरे धीरे रोज साथ बैठने से हमारी बाते शुरु हुईं और फिर कुछ ही दिन में मैं और वो काफी अच्छे दोस्त हो गये और इतने अच्छे की मै उसके घर तक हो आया, उसके अम्मी अब्बू बहुत अच्छे हैं मुझे बिलकुल अपने बेटे कि तरह प्यार किया और पेट भर के खाना खिलाया ( हास्टल का खाना बेकार होने के कारण मुझे इस बात का जिक्र करना अनिवार्य लगा )।खैर धीरे -धीरे दिन बितते गये और हमारी दोस्ती कब प्यार मे बदल गई पता नहीं चला और ऐसे ही एक दिन मैने उससे अपने प्यार का इजहार कर दिया और भगवान की दया से उसने मेरा प्यार स्वीकार कर लिया, पर अब आगे इससे बडी़ मुसीबत थी और वो ये कि अपने-अपने परिवार वालो को मनाने का पर आशिमा ने कहा अभी घर वालो को ना बता कर हम बाद में बतायेंगें मुझे भी ये बात पसंद आई और मैने भी बाद मे बताना ठिक समझा । कुछ दिन तो चैंन से कट गये पर हमारे रिश्ते के कारण पढ़ाई में बाधा आने लगीं और फिर हमने तय किया की पहले पढ कर कुछ काबिल बन जाये उसके बाद हम दोनो एक दुसरे के बारे में अपने अपने घर वालों से बात करेंगें।खैर धीरे धीरे समय बिताता गया और हमारा प्यार समय के साथ साथ और भी गहरा होता चला गया मेरा डिफेंस मे सेलेक्शन हो गया और मुझे लेफ्टिनेंट की पोस्ट मिल गई और पहली पोस्टिंग कश्मीर मे हुई और उधर आशिमा की भी नौकरी लग गई एक कालेज में अब हम दोनो अपने अपने पेरौ पर खडे़ हो गये थे अब हमे अपने घर वालो से बात करनी थीं तो पहले मैंने ये कदम उठाने का सोचा पर तब तक कश्मीर के हालात कुछ बिगड़ गये और हालातों को संभालने के लियें मुझे वहीं रुकना पड़ गया । ऐसे ही एक रोज मैं अपनें कैंप में बैठा था की तभी बहुत जोरों की आवाज हुईं बाहर आया तो पता चला की बम फटा हैं। मैं घायलों को देखने के लिये दौड़ा ही थी की तभी मेरे पास आकर एक र्गैनेड गिरा और इससे पहले में सम्भल कर कुछ दूर जा पाता वो फट चुका था और मैं बहुत दूर गीरा...!!!! 4 दिन बाद मेरी आॅखें खुलीं वहीं के हास्पिटल में, मेरे पास में मेरी माँ और पापा खडे़ थे उनको देख के मेरी आंखो मे आँसू आ गयें खैर जैसे तैसें मैने खुद पर काबू किया और अपना चहरा दूसरी तरफ धूमा लिया पर ये क्या बेढ के दूसरी तरफ थोडी दूर पर आशिमा खडी़ थी ब्लैक और ओरेंज कलर का सूट पहन कर। उसको देखते ही मेरे होश उड गयें मै कुछ बोल पाता उससे पहले ही बेहोश हो गया आंखें दुबारा 2 घंटे बाद खुलीं माँ पापा और आशिमा अभी भी मेरे बगल में खडे़ थे। कुछ देर तक इधर-उधर की बात करने पर माँ ने बताया की उन्हे बहु पसंद हैं। मैंने बोला माँ मैं आपको बताने ही वाला था पर टाइम नही मिला। माँ बोली कोई बात नहीं हम समझते हैं, और ये बोल कर वो मुझे और आशिमा को अकेला छोड कर बाहर चलीं गयीं । अब मैं और आशिमा बस थे एक दुसरे के पास, थोडी देर खिड़की के पास खडे़ रहने के बाद वो मेरे पास आई और बगल में बैठ गईं पर बात करने की हिम्मत ना उसमें थी ना मेरे में पर किसी ना किसी को तो बात करनी ही थी तो मैंने पहल की पर जैसें ही मैं कुछ बोलना शुरु करता उसने अपना हाथ मुंह पर रख कर मुझे शांत कर दिया और बोला की अब बस वो बोलेगी और मैं सुनुगा़ । बोली "क्या समझते हो खुद को इतनी आसानी से छोड़ कर मुझे चले जाओगे, प्यार किया हैं तुमने मुझसे और मैने तुमसे, इतनी आसानी से नहीं जाने दुंगी। अभी शादी करनी हैं साथ साथ दुनिया देखनी हैं और तुम मुझे आज ही धोखा दे रहें थे ।" मैं बस उसे देख रहा था मुझे नही पत वो क्या कह रही थी बस इतना पता हैं वो बहुत प्यारी लग रहीं थी मुझे नही पता की उसे कैसे पता चला की मैं उसे सुन नही रहा बस देख रहा और तभी वो मेरे सीने पर सर रख कर रोने लगीं मैने उसे जैसे तैसे काबू किया और खुद को भी। तभी पापा आये और मेरा सामान उठा कर ले जाने लगें मैने पुछा पापा कहा जा रहें हो वो बोले घर ।और फिर सब मुझे डिस्चार्ज करा कर भोपाल लेते आये पर उससे पहले पापा ने आशिमा को वाराणसी छोड दिया । घर आ कर कुछ दिन मैने आराम किया पर इसी बीच मुझे पता चला की पापा ने मेरी शादी फिक्स कर दी। मैं इस शादी के खिलाफ था और मैने माँ से बात की पर माँ ने कहा की बेटा पापा से वो बात नही कर सकती, उनके में इतनी हिम्मत नही हैं और इतनी हिम्मत तो मेरे में भी नही थी पर फिर भी मैं एक बार तो पापा से बात करूंगा ही ये बात मन में सोच कर मैने आशिमा को फोन मिलाया पर उसने फोन नहीं उठाया मैने दुबारा किया पर फिर भी नहीं उठाया कई बार करने पर भी नहीं उठाया, दवा के असर के वजह से मुझे नींद आ रही थी और कब मेरी आंख लग गयीं पता भी नही चला 2 घंटे बाद जब आंख खुली तो आशिमा का एक मैसेज आया हुआ था जिसमे लिखा था की उसकी शादी हो रही हैं कही और उसके पापा की मर्जी से और मैं उसे दुबारा फोन ना करू तभी सही होगा, ये पढ कर मेरे पैरो तले जमीन खिसक गयीं मैने उसे दुबारा फोन किया फिर तिबारा पर एक बार भी उसने फोन नहीं उठाया मैने आनन फानन में बैग पैक किया और निकलने लगा बनारस के लिये पर माँ ने मुझे अपनी कसम देकर रोक लिया। मैं रूक तो गया पर मेरा दिल और दिमाग बस आशिमा पर ही था। रात को पापा आये खाने के टेबल पर सब साथ बैठे थे मेरा खाना खाने का जरा सा भी मन नही था पर माँ के बहुत कहने पर मैं आ गया टेबल पर वहाँ पापा भी थे तो मैने पापा से बात करना ठिक समझा मैने पापा से बोला की मुझे ये शादी नही करनी पर पापा ने कुछ नही कहा वो अपना फैसला सुना चुके थे। खाना खा कर जाते समय उन्होने टेबल पर एक लिफाफा रखा और बोला कि इसमे लडकी की फोटो हैं वो चाहे तो देख सकता हैं वरना शादी तो इसी से ही होनी हैं । खैर खाना खा कर मैने दुबारा आशिमा को फोन किया पर उधर से कोई भी जवाब नहीं आया और थक कर मैं बिस्तर पर लेट गया अब मेरा किसी भी काम मे मन नही लग रहा था और बिस्तर पर पडे पडे कब नींद लग गईं पता ही नही चला रात मे प्यास लगी तो उठा और फिर्ज की तरफ जाकर पानी पीने लगा वापस रूम मे जाते वक्त मेरी निगाह टेबल पर रखे लिफाफे पर गई वो अभी भी वही पर था मैने उसे उठा कर साइड में रखने के लिये जैसे ही उठाया उसमे से फोटो निकल कर जमीन पर गिर गई और वो फोटो और किसी की नही आशिमा की ही थी । अब मुझे पापा की कही हुई बात याद आने लगी की "शादी तो तेरी इसी से होगीं फोटो देखना हैं तो ठीक वरना...!!!!" मैं दौड़ कर माँ पापा के कमरे मे गया पर वो दोनो सो रहे थे सो मैं बिना जगाये वापस आ गया पर एक समस्या अभी भी थी वो ये कि आशिमा की शादी कही और हो रही थी और मुझे कैसे भी कर के ये रोकना था । सुबह हुई और मैं दौड़ कर पापा के पास गया और उन्हे कस कर गले लगाया । पापा ने कहा की "बेटा मैं तेरा पिता हूँ मैं वही काम करूंगा जो तुझे पसंद हो मैं तेरी पसंद ना पंसद बचपन से जानता हूँ फिर तुने कैसे सोच लिया की मैं तेरी शादी तेरे मरजी के खिलाफ कर दूंगा " मेरी आखों मे आंसू थे मै कस कर पापा से लिपट गया और उनसे माफी मांगी। फिर मैने पापा से बोला की पापा आशिमा की शादी कही और हो रही हैं उसके पापा की मर्जी से इस पर पापा मुस्कुरा दिये और बोला की बेटा उसकी शादी भी तुमसे ही हो रही हैं मैं जब बनारस गया था तभी बात कर ली थी और वे लोग भी मान गये थे। ये मेरी और आशिमा की चाल थी की तुम्हें थोडा परेशान किया जाये वो तब तक तुम्हारा फोन नही उठायेगी जब तक मैं उसे फोन ना करू और ये कह कर पापा ने आशिमा को फोन किया और मुझे अचम्भे मे डालने के लिये फोन एक ही घंटी मे उठ गया पापा ने थोडी देर बात कर हाल समाचार ले कर मुझे फोन पकड़ा दिया और मैं फोन पर बात करते करते बाहर आ गया उस दिन मैने आशिमा से बहुत सारी बाते की कितनी बार रोया कितनी बार हसा मुझे कुछ याद नहीं । आशिमा ने बताया की शादी अगले महीने हैं।खैर जैसै तैसें ये महीना कट गया और हमारी शादी का दिन आ गया बहुत इंतजार के बाद ये दिन आया था । क्योंकि आशिमा का गांव बनारस मे ही हैं सो हमे बनारस मे ही जाकर शादी करनी थी इस लिये मै अपने रिश्तेदारों के साथ पहले ही बनारस पहुँच कर होटल मे रह रहे थे । शादी वाले दिन पूरी बारात के साथ मैं आशिमा को अपना बनाने के लिये चला गया। शादी पूरे हिन्दू रीति रिवाज के साथ हुई और जैसे ही मैं मंडप छोड कर उठने वाला था पिताजी ने आदेश दिया बैठे रहो और पता नही कहाँ से मौलवी साहब को पकड कर लेते आये और बोला की "आशिमा के पिताजी की भी कोई इच्छा रही होगी अपनी बेटी की शादी को लेकर इस लिये मैने मौलवी साहब को बुला लिया हैं आपकी जो भी इच्छा हो वो पूरी कर ले "। ये देख कर आशिमा के साथ साथ उसके पिताजी की भी आंखें भर आयीं और फिर उस रोज मेरी दूबारा शादी हूईं पर इस बार मुस्लिम रीति रिवाज से। मैं अपनी शादी से बहुत खुश था पर मुझसे भी ज्यादे कोई खुश था तो वो थे मेरे माँ और पापा सही कहा गया हैं माँ पापा मे इश्वर या खुदा रहते हैं इन्हें जो खुश करेगा वही खुश रहेगा । ये हमारी खुशी के लिये कुछ भी कर सकते हैं और हम भी । कभी भी अपने माँ और पापा का दिल ना दुखाना वरना याद रखना बाप या माँ तुम भी बनोगे ।

पिता पर चंद शब्द कहना चाहूंगा जो की मैने लिखा हैं ।

"पिता पर मैं क्या लिखू,

जिन्होंने मुझे लिखा उनपे क्या लिखू,

भगवान पिता का एक स्वरूप हैं,

उनके हाथों ये भी मजबूर हैं ।

रात भर जागते हैं हमे सुलाने को,

दिन भर पिसते हैं हमारे सपने पालने को ।

उनके कोई सपने नही होते,

वो हमारे सपने से अपने सपने जोड़ लेते हैं ।

तुम्हारे लिये खुशीयो की चादर ओढं लेते हैं ।

सपनों को वो अपने मार लेते हैं,

हम बिमार हो जाये तो रात भर जाग लेते हैं ।

अपने लिये वो कभी कुछ लाते नहीं,

दुख वो अपना किसी को बतलाते नहीं ।

अकेले-अकेले सब झेल लेते हैं,

कभी तो भूखे पेट भी रह लेते हैं ।

सबसे पहले तुम्हारे बारे मे सोचते हैं,

कभी-कभी पापा भी तन्हा रो लेते हैं।

हमारे लिये वो जान देते हैं,

सारी ख्वाहिशें को वो अपने मार देते हैं ।

कभी - कभी वो डाटं देते हैं,

फिर अपना मिठा दूध भी बाँट देते हैं ।

लफडो झगडों से वो हमे बचाते हैं,

सच की राह पे चलना सिखाते हैं।

स्कूल छोड़ने से लेकर लाने तक,

टाॅफी से लेकर घर के बटवारे तक।

सब जिम्मेदारीयाँ पापा पे होतीं हैं,

फटी पुरानी शर्ट पहन कर घूम लेते हैं ।

हर समस्या को अपने शर्ट के उधडे काॅलर मे बुन लेते हैं ।

साईकिल से लेकर बाईक तक दिलाते हैं,

हमारी पढ़ाई के लिये पैसे भी उधार लाते हैं ।

फिर जब हम बडे़ हो जाते हैं,

उनके कर्ज़ को हम भूल जाते हैं ।

हमारे लियें कोई और खास हो जाता हैं ।

उन से भी ज्यादा कोई पास हो जाता हैं।

अपनी जिम्मेदारीयाँ हम भूल जाते हैं,

अपने फर्ज को हम भूल जातें हैं।

देख कर भी अनदेखा कर जातें हैं ।

उनकी देखभाल करना हमारा फर्ज हैं,

उनका ख्याल रखना हमारा फर्ज हैं ।

जैसे उन्होने पाला वैसे हमें सम्भालना हैं,

हो तुम अच्छे बेटे ये बतलाना हैं ।

चुका नही सकतें हो उनका कर्ज़,

बस अदा कर देना अपने बेटे होने का फर्ज़ ।

~ > भूपेंद्र मिश्रा ।


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