व्यथित मन. ..

ये मन बड़ा व्यथित है दुःख तो तथाकथित है

क्यों आज के मानव का बस स्वार्थ परमहित है

ये जानकर रो रहा आज मेरा चित्त है

जीवन है नाम जिसका वह सुख -दुःख सहित है ;

कठिनाइयों में गर जो देता तुम्हें सहारा

संसार के भंवर में वही तो सच्चा मीत है

कर्त्तव्य पथ पर जो सदैव सैयमित है

जिओ और जीने दो यही तो विश्व हित है

परमार्थ कर्मण्ये ही जीवन का अमित है l


उतार दो ये केंचुल जो तूने धारण किया है

तुम्हारे हाँथ में ही स्वराष्ट्र का दिया है

वरदान में ये जीवन प्रभु ने तुम्हें दिया है

बदले में उसने तुमसे क्या कुछ पा लिया है ???

हशरत यही है उसकी इंसान बन रहो तुम

कमी क्या भला इस जग में, तुम्हे ये बता दो

अपने गुण-धर्म से एक नवीन सिलसिला दो l


क्षमा ,दया, ममता, करुणा ही जीवन का गीत है

मृत्यु सत्य है ,ये सत्य अमिट है ;

है यही आकांक्षा 'आकांक्षी' के मन की

सार समझ मानव तू अपने जीवन की.... l


-प्रवीण कुमार 'आकांक्षी'

hindi@pratilipi.com
+91 8604623871
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.