वो अनकही कहानी

क्या पापा मोबाइल को इस तरह क्यों लगातार देखें जा रहे हो? अक्षिता ने बरबस सौम्य को देखकर पूछा. कुछ नहीं सोच रहा हूं तुम बच्चे आखिर मोबाइल की तिलिस्मी दुनिया में क्यों इतना खोये रहते हो क्या है इसमे ऐसा? सौम्य ने मुस्कुराते हुए अक्षिता से कहा. इसमें मैजिक क्या है कालेज से आकर बताती हूं. कहकर अक्षिता बैग उठाकर निकल गई. सौम्य अनायास ही सोचने लगे कितना अच्छा होता काष मोबाइल,सोषल नेटवर्किग साइटस सब उनके जमाने में भी होते तो आज राधिका उनकी जीवन संगिनी होती. हां, राधिका उनकी सबसे अच्छी दोस्त जिसे वो बेइतंहा चाहते थे पर कभी कह ना सके. कालेज के दिन यूं तो सबके लिए बेहद दिलकष और स्मरणीय होते हैं लेकिन उनके लिए तो उनका कालेज टाइम उनके जीवन का स्वर्णिम युग था. राधिका उनके ही कालेज में उनसे एक साल जूनियर थी पर तब तक वह राधिका को जानते तक नहीं थे.

मध्यम परिवार की सांवली सलोनी अपने ही आप में खोये रहने वाली साधारण सी लड़की में भला किसी की क्या रूचि हो सकती है. लेकिन साधारण व्यक्तिव वाली असाधारण गुणों से युक्त राधिका के गुणों को तो हर बार की तरह इस बार भी धीरे धीरे ही प्रकट होना था. उस समय तो नन्दनी की खूबसूरती का जादू उन पर छाया रहता था. नन्दनी अमीर पिता की इकलौती बेटी थी तो हर तरह की सुविधा के साथ महंगी डैसिस, सजना संवरना यहीं उसकी दिनचर्या थी. अब तक कालेज की डांस प्रतियोगिता में जीतने वाली जोड़ी का खिताब नन्दनी और सौम्य के ही नाम था, तो इस बार भी यह टाफी उन्हें ही मिलेगी इस बात की दोनों को ही पक्की उम्मीद थी.

लेकिन यह उम्मीद उस वक्त धराषाई हो गई जिस पल राधिका ने डांस मंच पर कदम रखा उस वक्त ऐसा लग रहा था, जैसे र्स्वग से उतरी अप्सरा ने ही पैरो में बिजली के घुंघरू बांध लिए है. त्वरित गति से नाचती राधिका पर जैसे उस समय उनकी दृष्टि ठहर गई थी केवल वह ही नहीं कई जोड़ी आंखें इस समय उस पर जमी थी. इस बार टाफी की हकदार बनी राधिका. सभी उसे बधाईया देने में जुटे थे. उनका मन किया वे भी उसे जाकर बधाई दे लेकिन जाने क्यों ऐसा कर नहीं सके. क्यों कभी भी वह ऐसा नहीं कर सके जो वह अपनी खुषी से करना चाहते थे. हमेषा पिताजी के डर से वहीं किया जो उन्होनें चाहा. इतना पैसा इतना रूतबा फिर ऐसी कौन सी कमी थी जो मेरी खुषियों को भी ग्रहण लगा दिया. कभी कभी लगता है कि उनके इस खालीपन के लिए वहीं जिम्मेदार है क्यों विरोध नहीं कर सके.

अब तो इस रीतेपन के साथ ही जीना है. नन्दनी को तो क्लब और पार्टीज से ही र्फुसत नहीं है. कभी नन्दनी सौम्य को बेहद पसंद थी पर राधिका को जैसे जैसे जानने लगे थे वह दिल में गहरी जगह बनाती जा रही थी. कालेज में दोनों का समय अब अक्सर साथ गुजरने लगा था. रातों को राधिका का भोला भाला सौंदर्य सपने में अठखेलियां करने लगा था. कई बार सोचा राधिका को कह दू कि उसे चाहने लगा हूं अब फैसला उसे करना है पर कह नहीं सका. राधिका ने जिस दिन नाटक में साहिबा का और मैंने मिर्जा का किरदार निभाया, उस ेदिन नाटक में हमारे अभिनय की प्रंषसा के ही साथ नाटक पहले स्थान पर रहा.

राधिका की आंखों से छलकता प्रेम उसका करीब बने रहना सबको लगने लगा था कि हमारे बीच कुछ है पर नन्दनी को यह सब नागवार गुजरता. सौम्य उसके लिए ऐसा खिलौना था जो उसे हर हाल में चाहिए था. जब एक डिबेट में राधिका और सौम्य एक साथ विजयी हुए उस दिन कालेज में उल्लास का वातावरण था. सोचा था घर जाकर मां से राधिका के लिए बात करूगा पर उनकी यह खुषी ज्यादा देर तक टिकी न रह सकी. घर पंहुचते ही पिताजी ने फरमान जारी कर दिया सेठ नारायण दास की इकलौती बेटी मेरी सहचरी बनेगी इस साल एक्जाम होते ही वह इस घर की बहू बनेगी. दबे स्वर में मैंने कई बार विरोध किया मैं नन्दनी से विवाह नहीं करना चाहता.

पर मेरी एक भी न चली एक दिन नन्दनी इस परिवार की बहु बनकर आ गई. राधिका को भुलाना मेरे लिए आसान नहीं था. दिल में अपराध भावना थी कि राधिका से यूं तो प्रेम का इजहार नही किया था पर क्या हमारे प्रेम को षब्दों की आवष्यता थी. मैं जाने अनजाने स्वयं को राधिका का गुनहगार समझने लगा था. कब षाम हो गई पता ही नहीं चला. अक्षिता घर वापिस आ चुकी थी. रात को खाने के बाद अक्षिता कमरे में आई नन्दनी अभी पार्टी से नहीं लौटी थी. पापा आप पूछ रहें थें ना मोबाइल में ऐसा क्या है तो देखिए फिर अक्षिता ने मोबाइल के फीर्चस समझाए फेस बुक पर एकाउंट बनाया.पापा अब मैंने आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी है आप एक्सेप्ट कीजिए.

इस तरह आप फेसबुक पर दोस्त बना सकते हैं. आपको लिखने का षौक है आप अपना ब्लाग भी बना सकते है, कहने के साथ ही अक्षिता ने ब्लाग बना कर उनकी कुछ रचनाएं उस पर पोस्ट कर दी. अब चाहे तो आप इस पर कुछ भी नया लिख सकते हैं. अक्षिता ने मुझे एक तरह से जीने की नई राह दिखा दी थी. अब ऑफिस से जो समय मिलता मैं कुछ नया लिखता. इसी तरह मैंने खुद की एक स्टोरी साइट बना दी जिस पर नए लेखकों को पूरा मंच दिया जाता था कहानी के लिए. एक दिन एक कहानी आई जिसे पढ़कर लगा षायद किसी ने मेरी और राधिका की ही कहानी उतार दी हो, घबरा कर नाम देखा तो नाम नहीं था.

कहानी का टाइटल था ‘वो अनकही कहानी’ इस कहानी ने झकझोर कर रख दिया था. अंत तो और भी रोचक था कहानी अभी अधूरी थी, अब उनके बच्चे अक्षिता और कुंज आपस में प्रेम करते हैं तो क्या उनकी प्रेम कहानी भी अनकही ही रहेगी या उनका प्यार पूरा होगा? कहानी में अक्षिता नाम पढ़कर जैसे सब समझ आ गया था. तुम्हारी प्रेम कहानी अनकही नहीं होगी सोच कर मुस्कुरा उठे थें सौम्य.


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