"बधाई हो बेटा हुआ है..." के सन्देश ने सारे घर में खुशियों का माहौल पैदा कर दिया था I हर कोई पिताजी को बधाइयां दे रहा था I पिताजी को लगा की चलो अब मेरे बाद मेरे वंश को आगे ले जाने वाला इस दुनिया में आ गया है I उस दिन किसी को ये नहीं पता था की मुझे तो आज के नारी प्रधान युग में अपना कदम आगे बढ़ाना मुश्किल होने वाला है, मै वंश को क्या आगे ले जाऊंगा?

समय बितता गया और मै बड़ा होता गया I ज्ञानियो के मोहल्ले मे रहकर भी मै ज्यादा ज्ञानी नहीं हो पाया था I बस इतना जान पाया था की अभी हम "कलयुग" मे जी रहे हैं और इस युग मे मानव अपने विकसित ज्ञान से ऐसी-ऐसी मशीनो का निर्माण कर लिया है की हर काम आसान हो गया है I उस वक़्त मै इस बात का अर्थ नहीं समझ पाया था I पर आज इतना जान पाया हूँ की इस कलयुग मे मानव भी मशीन हो गया हैं - अपने मर्यादा और मर्दानगी की रक्षा करने हेतु वह मशीन हो गया है I

बचपन मे पढाई करते वक़्त इस बात का कभी एहसास ही नहीं हुआ की हमारे चारोओर प्रतिस्पर्धाओ का दलदल गहराता चला जा रहा है, क़्योकि नारी भी चौका-चूल्हा छोड़कर, घर की चारदीवारी लांघ कर, नर के साथ प्रतिस्प्रधा मे कूद पड़ी है और हर छेत्र मे नर पर भरी पर रही है I उसकी सुन्दर काया, तेज दिमाग और शालीनता पुरुष को पुरुषोत्तम की उपाधि से वंचित करने लगा है I इस युग मे मेरा जन्म एक साधारण मध्यम वर्गीय परिवार मे हुआ I जैसे तैसे मैंने ग्रेजुएशन की पढाई पूरी की और नौकरी की तलाश मे जुट गया I

तक़रीबन दस इंटरव्यू मे फ़ैल होने के बाद लड़का होने का गुमान चकनाचूर होने लगा I न तो मेरे पास सिफारिश थी और न ही घुस देने को पैसे, न ही नौकरी का तजुर्बा था और न ही नारी की सुन्दर काया और सुन्दरता I मै निराश होने लगा I कई महापुरुष लोगो ने पिताजी को सलाह दी की लड़के की शादी कर दो तो शायद लड़की के भाग्य से ही चार पैसे कमाने लगे I लेकिन मुझ जैसे बेरोजगार को अपनी लड़की कौन देता I बड़ी खोजबीन और मेहनत के बाद मेरे शादी राधिका से हो गई I

राधिका पढ़ी-लिखी आज़ाद ख्यालो की चुलबुली सी लड़की थी, जिसके लिए नौकरी पाना बाएँ हाथ का खेल था और ऐसे ही हुआ I हाथ की मेहदी भी नहीं छुटी थी की राधिका काम पर लग गई I मेरी आर्थिक हालत सुधारने के लिए नहीं बल्कि अपनी आजादी बरकरार रखने के लिए I मै चाह कर भी कुछ नहीं कह सका I नाकामयाब लोगो की बात सुनता ही कौन है I मै निराशा के आगोश में समाता जा रहा था I

कई बार मै भगवान् को कोसता और कहता की इस तरह के जीवन से तो पैदा नहीं होता तो ही अच्छा था I जिस तरह उजाले की महिमा को दर्शाने के लिए अँधेरा जरुरी है, उसी तरह क्या औरो को श्रेठ बताने के लिए ही मुझे नकारा और नाकामयाब बनाया गया था ? अक्सर ऐसे ही उल-जुलूल सवाल दिमाग में आते रहते थे I उधर राधिका कामयाबी की सीढ़िया चढ़ रही थी और मै नाउम्मीदी के दलदल में धसता चला जा रहा था I मुझे यकीन होने लगा था की मुझे किसी पुराने युग के लिए बनाया गया था जो गलती से कही खो गया होगा और जब मिला तो इस युग में भेज दिया गया, जो मेरे लिए कतई नहीं है I पहले तो दिन का सूरज ही तपाता था, अब तो रात का दिया भी आँखों को चुभने लगा था I माँ-बाप और लोगो के ताने तथा बीबी की तरक्की ने मुझे आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया I मै सभी लोगो से धीरे-धीरे कटने लगा और इस दुनिया में अपने होने का अर्थ तलाशने लगा I

उस दिन मै जब सो कर उठा तो अपने आप को बहुत हल्का महसुस कर रहा था I क्योकि उस रात नींद बहुत अच्छी आई थी I बहुत दिनों के बाद मै ऐसी नींद सो पाया था I क्योकि सोने से पहले मेरे मन में उमड़ रहे सैकड़ो सवाल का जवाब मिल गया था I आत्ममंथन का अमृत था वो और मै भी मन ही मन उसी राह पर चलने की ठान लिया था I मै झटपट बिस्तर से उठ बैठा I राधिका अभी सो रही थी I ऑफिस में ऊंचे पद पर विराजमान लोगो का दाईत्व भी बड़ा होता है, सो राधिका को कई बार देर रात तक काम करना पड़ता था और वो बहुत थक जाती थी I आज से पहले इस बात पर मै गौर ही नहीं किया था I मैंने राधिका को सोता छोड़ अपने दिनचर्या का काम निपटाकर राधिका और घरवालों के लिए चाय नास्ता बनाया और चाय की ट्रे ले कर राधिका को जगाने चल पड़ा...वो अब भी बिस्तर पर बेसुध सो रही थी I

"राधिका ...राधिका उठो...उठो राधिका..."

"थोड़ी देर और सोने दिजिए न " कहकर राधिका करवट बदल कर सो गई

"राधिका उठो और चाय पी लो, मैंने बनाई है …"

राधिका एक झटके में उठ बैठी – “आपने चाय बनाई...क्यों...मै उठकर बना देती न...बाबूजी और माजी क्या सोच रहे होंगे...." राधिका एक सांस में सब बोले जा रही थी I

"कुछ नहीं सोचेंगे.... और सोचते हैं तो सोचने दो...अब तो हर दिन यही होने वाला है..." मेरे शब्दो में दृढ़ता थी I

"ऐसा क्यों कह रहे है आप..." राधिका को मेरा ये बदलाव समझ नहीं आ रहा था I

राधिका को चाय का कप थमाते हुवे मै बोला - "कितना काम करती हो तुम, घर-बाहर सब तुमने संभाल रखा है, क्या कुछ काम मेरे साथ बाँट नहीं सकती?" थोड़ा रूककर मैंने फिर बोलना शुरू किया - " बाहरवाली धनलक्ष्मी को मनाना तो नहीं आया मुझे इसलिए न नौकरी मिले और न ही धन, पर घरवाली लक्ष्मी को तो मना सकता हूँ I घर-गृहस्थी दोनों के सहयोग से बेहतर चल सकता है, प्रतिरोध से नहीं I प्रतिरोध से तकरार बढ़ता हैं और तकरार द्वेष को जनम देता हैं I द्वेष से शांति भंग होती हैं और अशांति प्यार को अपने पास नहीं फटकने देती I मुझे तुम्हारा प्यार और साथ चाहिए राधिका I इसलिए तुम घर के बाहर खूब आगे बढ़ो और तरक्की करो I बाहरवाली धनलक्ष्मी के साथ तुम्हारी अच्छी बनती है और मै घर सम्भालूंगा I "

"ये उलटी गंगा क्यों बहवाने की बात कर रहे है आप, लोग क्या कहेगे... बाबूजी और माजी क्या सोचेंगे" राधिका ने आश्चर्य से पूछा

"लोगो की परवाह नहीं है मुझे I ये वही लोग है जो मेरी नाकामयाबी पर खुश होते हैं और तुम्हारी तरक्की पर जलते है I हमे अपने जीवन में खुशियाँ लानी हैं, और लोगो को खुश करने के लिए कुछ नहीं करना है… (मै कहे जा रहा था)...हमे अपनी स्वेक्छा बेटी के लिए सोचना है...मै तुम्हारा नकारा पति बनने की वजाए तुम्हारा सहयोगी बनना पसंद करूँगा और आज के बाद घर का सारा काम मै सम्भालूंगा........(मै कहता ही जा रहा था, न जाने कब बाबूजी और माँ आकर दरवाजे पर खड़े हो गए थे और हमारी बाते सुनने लगे थे) सीधी राह पर चल कर इस कलयुग में कुछ हासिल नहीं हुवा मुझे...अब विलोमगामी बनकर देखता हूँ......... .(मेरे तर्क का किसी के पास जवाब नहीं था पर सभी के चहरे पर खुशी और शुकुन साफ़ नजर आ रही थी I)


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