गलत और गलती


सबसे तकलीफ-देह होता है अपने आप को बिना गलती के गुनहगार मान लेना, गलतियां स्वीकार करना गलत नहीं है बस गलत है की आप गलत ना होते हुए भी औरों के लिए खुद को गलत मान लें, बहुत बार लोगों से सुना है मै जानबूझकर खुद को गलत मान लेता हूँ / लेती हूँ, क्योंकि अगर एक के झुकने से रिश्ते बच जाये तो ठीक है,
पर मेरे हिसाब से ये बिलकुल ठीक नहीं है क्यंकि चुप रहना तो अपने आपको गलत स्वीकार करने से भी ज्यादा बुरा है,,
क्यंकि हम सही होते हुए भी अक्सर चुप्पी साध लेते है, अपना पक्ष् सामने नहीं रख्ते क्यंकि हम उन्हें खोना नहीं चाहते, पर सोचिये ना के उस रिश्ते का वजूद क्या होगा,उस रिश्ते का अंत क्या होगा? जिसे सिर्फ एक इंसान सम्भाल रहा हो, आप सामने वाले व्यक्ति, रिश्ते या अपने के लिए खुद को गुनहगार बना देते है,- चलो यार, मै ही गलत, तुम बिलकुल सही कह रहे।
पर इस बात का असर क्या होता है, सामने वाला आपके त्याग को समझने के बजाय, आपको सच में गुनहगार समझने लगता है, आप को उस गलती को जीना पड़ता है जो अपने कभी की ही नहीं,,,और अगर आपने एक बार खुद को गलत मान लिया भले सामने वाले रिश्ते को बचाने के लिए ही सही ,फिर तो धीरे-धीरे आप ही अपने आप को अंदर ही अंदर गलत मानना प्रारंभ कर देते है जैसे-
1-कुछ ना कुछ कमी तो होगी मुझे जो सारे अपने मुझे छोड़ देते है?
2-कही ना कही कुछ तो गलत किया है मैंने जो मेरे साथ ऐसा हो रहा?
3-ऐसी कौन सी गलती की है मैंने जो इतने झुकने के बाद भी वो इंसान या रिश्ता मेरे साथ नहीं? एक्सेट्रा,एक्सेट्रा

बस ऐसे होती है शुरुआत बिन गलती के खुद को गलत मानने की, आप ये क्यों नहीं समझते की , गलती आपकी नहीं, गलत आप नहीं , शायद सामने वाला इंसान या रिश्ता आपके काबिल नहीं, क्यंकि गाडी दोनों पहियों से चलती है , और जिस रिश्ते में बार-बार आपको खुद को गलत मानना पड़े वो कभी सही कहा होगा? शायद आप अब तक जिसे जिए चले जा रहे वो बस समझौता या आपकी एकतरफा कोशिस मात्र हो ।
और अगर आप ये कर रहे हैं तो छोड़ दीजिये,क्यंकि अच्छा होता है जब आप बोलते है, सही है तो अपने आप को साबित करते है, सामने वाला गलत है तो गलत बोलना शुरू करिये, क्यंकि आपकी खमोशी सामने वाले की ग़लतफ़हमी को सच्चाई में बदल देती है, अगर अपने रिश्ते को एक मोड़ पर ले जाके उस रिश्ते को ता-उम्र साथ रखना है तो दो खांचे में जिंदगी को खिंच दीजिय-- या तो सही या गलत??


सही है तो बोलिए ,जवाब दीजिए,सामने वाले से जवाब मांगिये और गलत हैं तो स्वीकार कीजिये सुधारिये। फिर देखिये जो आपके अपने होंगे छन के आपकी झोली में आ गिरेंगे क्यंकि अपनों के लिए, अपने रिश्तों के बीच आपको चुप रहने की, अपने आत्मसम्मान को मारने की जरूरत नहीं है,
झुकना या चुप रहना हमेशा गलत नहीं बशर्ते ये त्याग उनके लिए करिये जो योग्य हैं इसके, वरना आपकी मर्जी ये जिंदगी बड़ी छोटी है -इसे या तो सच के साथ अपने आत्मसम्मन के साथ जियो या बिना गलती के खुद को गलत मान के रोज उस गलती की सजा खुद देते हुए घुट-2 के मरो।


-रौशनी विनय गुप्ता



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