"अरे ओ बिशुना की माई, तनिक हुक्का तो फिर से सुलगा दो एक बार, एकदम ठंडा हो गया है", खांसते हुए बुढऊ ने अपना कम्बल एक बार फिर अपने चारो ओर कस के लपेटा और बिस्तर पर बैठ गए| ठंड अपने पूरे उफान पर थी, दरवाजे की दरार से बरछी की तरह ठंडी हवा सांय सांय करते घुस रही थी| बुढ़िया ने आवाज़ सुना लेकिन मंहटिया गयी| बुढऊ ने थोड़ी देर इंतज़ार किया और फिर से खांसते हुए चिल्लाये "अरे एकदम से बहिर हो गयी है का, कब से कह रहा हूँ कि हुक्का सुलगा दो लेकिन सुनती ही नहीं हो"| अब बुढ़िया के लिए खटिया पर लेटे रहना मुश्किल हो गया, कंहरते हुए उठी और कांपते हुए हुक्के की तरफ बढ़ी|

"पूरा सनक गए हो बुढऊ, इतनी रात को भी भला कोई हुक्का पीता है, ये हवा तो जैसे प्राण ले लेगी ठंडी में", बड़बड़ाते हुए उसने अंगीठी से थोड़ी आग निकाली और हुक्के में भर कर उसे बुढऊ की तरफ ले गयी| "लो मरो इसे पीकर, कितना मना करती हूँ कि मत पियो लेकिन कभी सुने हो मेरी"|

बुढऊ ने हुक्के की पाइप मुंह में लगायी और एक बार कस के साँस खींची| गुड़ गुड़ करते हुए थोड़ा धुआं निकला और अगली बार में पाइप में से आग जल गयी| लेकिन इसके साथ ही बुढऊ को जोर की खांसी आयी और वह खांसते खांसते वहीँ बिस्तर पर निढाल हो गया|

"थोड़ा आराम से, अब क्या जान ही दे दोगे", बुढ़िया हड़बड़ा कर बिस्तर से उठी और बुढऊ की पीठ सहलाने लगी| कुछ देर में बुढऊ सामान्य हुए और धीरे धीरे कुछ और बार हुक्का पिया| हुक्के को रख कर जब बुढऊ लेटने को हुए तो उनकी नज़र बुढ़िया पर गयी जो अपने खटिया पर बैठी उनको ही देख रही थी| "कल से नहीं पियूँगा हुक्का, बस आज पी लिया| वैसे बिसुना तो ठीक होगा न शहर में, बहुत दिनों से खबर नहीं मिली उसकी", बुढऊ ने जैसे खुद से ही सब कहा|

बुढ़िया ने सब सुना लेकिन कुछ नहीं बोली| पता उसको भी था कि बुढऊ हुक्का पीना नहीं छोड़ेंगे, बिसुना की याद जितना आती है, बुढऊ उतना ही हुक्का पीते हैं| दर्द तो उसको भी होता था लेकिन बुढऊ की तरह वह बता नहीं पाती थी| उसने अपनी आँखों के कोरो में आये पानी को अपने साड़ी से पोंछा और बिस्तर पर लेट गयी|

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