इश्क़ तुझ से इस कदर सा हो गया
दिल मेरा आवारा शहर सा हो गया।

मैं अकेला और तुम तन्हा सी रहीं।
क्यों यह रिश्ता दर बदर सा हो गया।

ये प्यार ,मौसम ,हवायें और चांदनी।
जाने क्यों सब बीते सफर सा हो गया।

गुरुर जिस पर था वह गुनहगार था।
आसरा था जिसका वही कहर सा हो गया।

मुहब्बतें इस ज़माने में ऐसे भी हुईं।
रूह रोती रही इश्क़ जहर सा हो गया।

एक चेहरा निहायत भीड़ में ढूंढा बहुत।
जाने कहाँ वो एक लहर सा हो गया।

मेरे नाम को कब तक छुपाओगे दिल में ।
सरे बाजार अब वो एक खबर सा हो गया।

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