करवा चौथ

साडी से ले कर नेल पालिस तक खरीदी गितिका ने।गिरीश ने भी उसे किसी चीज के लिए नहीं टोका।वह आर्डर देती रही और वह चुपचाप भुगतान करता रहा। पैसे का हिसाब लगाकर वह व्यर्थ परेशान न होना चाहता था।रोज डी.टी.सी.को दो रूपये चूना लगाने वाला गिरीश, पत्नी की खुशी के लिए आज करौल बाग से उत्तम नगर तक टैक्सी में आया था। आज गीतिका की पहली करवा चौथ है।

पाँच बजे वे घर पहुँचे तो करवा चौथ की कहानी सुनने का समय हो चुका था।उनके नीचे वालों ने बताया कि मिसेज भाटिया उसे बुलाने के लिए दो बार आ चुकी है।गीतिका सामान बैड पर पटक कर तैयार होने लगी। आज खरीदी गई साडी और प्रसाधनों से सज-धज कर जब वह मिठाई और फलों का थाल लेकर कथा सुनने चली,तो परी सी सुन्दर, पूनम की चाँदनी सी शीतल,ताजा खिली कली सी मह-मह महकती,संगमरमर की मूर्ति सी बेजोड पत्नी पाने के गर्व में खिल उठाथा गिरीश।गीतिका के अनुपम सौंदर्य से अभिभूत गिरीश उसके प्रत्येक आदेश को शिरोधार्य कर प्यासे पपीहे सा उसके मुख की ओर देखता रहता था। वह उसकी खुशी के लिए सब कुछ करने को प्रस्तुत रहता था। किन्तु गीतिका पल भर को हँसती, तो फिर हफ्तों मुँह फुलाए रहती।गिरीश उसकी चिरौरी - विनती करते थक जाता, मगर वह सीधे मुँह बात नहीं करती।

कल दफ्तर से लौटते समय मिठाई और फल खरीदने में उसे आठ बज गए थे।जब वह घर पहुँचा तो गीतिका मिसेज भाटिया के साथ करवा चौथ के कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने नें व्यस्त थी। नौ बजे मिसेज भाटिया अपने घर गई तो गीतिका मेंहदी लगाने बैठ गई।आधी रात तक गिरीश उसके पास बैठा मेंहदी के नमूने देखता रहा।ऐसे में खाना कैसे बनता।पत्नी का तकिया चादर ठीक करके वह स्वयं एक गिलास दूध पी कर सो गया।दोपहर ढले गीतिका करवा चौथ की कथा सुन करआई, तो बहुत सुस्त सी दिखाई दे रही थी। वह पूजा का थाल एक तरफ रख कर निढाल सी बैड पर लेट गई।आज उसका पहली करवाचौथ का व्रत था। गिरीश ने भी निराहार पत्नी व्रत निभाया था।लेकिन उसे अब भी खाना मिलने की उम्मीद कम ही नजर आ रही थी।

“क्या हुआ गीतू ?” गिरीश ने पूछा।

“कुछ नही।“ उसने बिना हिले- जुले उत्तर दिया।

“अरे भई अब उठ कर खाना बनाओ।मारे भूख के दम निकला जा रहा है।“

“मैंने क्या छुआरे खाए हैं ? सुबह से एक बूंद पानी तक नही पीया।“ उसने काट खाने के स्वर में उत्तर दिया।

“इसलिए तो कह रहा हूँ कि उठ कर खाना बनाओ।तब तक चाँद भी निकल आएगा।“

“चाँद निकले या सूरज। अब मुझसे खाना नही बनेगा।“

“तो क्या खाना भी मैं बनाऊँ ?”

“मैं रोज बनाती हूँ। एक दिन तुम बना लोगे तो क्या फर्क पडेगा।“

“करवा चौथ के दिन तुम मुझसे खाना बनवाओगी ?”

“मैं बनाऊँगी तो क्या नाग पंचमी हो जाएगी ? देखो गुल्लू ,मेरा सिर फटा जा रहा है।तुम चाहो तो खाना बना लो।अगर मुझे नीद आ जाये, तो चाँद निकलने पर मुझे जगा देना।" गीतिका ने निर्णायक स्वर में कहा और करवट बदल कर आँखें बंद कर ली। पतिव्रता गिरीश भूखे पेट छत पर खड़ा चाँद निकलने की इंतजार करता रह गया . ***

-प्रभु मंढइया विकल

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