ट्रेन

रात के नौ बज रहे थे । ट्रेन चल चुकी थी । धीरे-धीरे गाड़ी प्लेटफॉर्म से दूर जा रही थी । शहर की गहमा-गहमीयों से नाता टूट रहा था और शांत प्रकृति से जुड़ रहा था । साइड वाली बर्थ थी उसकी। लग्गेज सीट के नीचे रख कर आराम से मुस्कान बैठ गई । अचानक एक लड़का आ कर उसकी बाजू वाली सीट पर बैठ गया । वो चौंक उठी। चेहरा काफी जाना-पहचाना सा लगा । अरे, यह तो राज था।

राज ने भी उसे देखा। कुछ देर तक देखता ही रहा । फिर उठ कर थोड़ी दूर वाली सीट पर बैठ गया । हाँ, दूर वाली सीट पर । दूर। मुस्कान से दूर ।

मुस्कान ने भी अपनी पलकें झुका ली। सात साल बीत चुके थे । पहली बार वो दोनों एक फ्रेंड की शादी पर मिले थे। शादी के उस हंगामे में चुपचाप दो दिल मिल गए थे । फोन नंबर एक्सचेंज हुए और फिर मिलने का दौर शुरू हुआ । कभी नलबन,तो कभी साइंस सिटी,तो कभी माॅल में। एक बार नलबन में राज अचानक ही बातें करते-करते मुस्कान की गोद में सिर रख कर लेट गया । मुस्कान शर्मा गई । शर्म से पलकें झुक गई ।

"मैंने कुछ गलत किया क्या,मुसु"? राज ने पूछा । "मुझे लगा मेरा हक है तुम पे"। "क्या नहीं है हक मेरा तुम पे"?

मुस्कान ने चुपके से उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए । सारे सवालों का जवाब मिल चुका था राज को।

पर आज हालात कुछ और है। जब टीटी टिकट चैक करने आया तब मुस्कान को पता चला कि उसके सीट की ऊपर वाली बर्थ राज की थी। रात काफी हो चुकी थी । जिस सीट पर राज बैठा था वहाँ के पैसेंजर्स को सोना था । सो राज उठ कर चुपचाप मुस्कान के पास आकर बैठ गया । ऊपर से दोनों चुप थे पर मन में हाहाकार मचा हुआ था ।

"कैसे हो तुम, राज"? मुस्कान ने आहिस्ते से पूछा । राज ने कुछ जवाब नहीं दिया । "बोलोगे नहीं मुझसे"? "प्लीज़,कम से कम मुझसे बात तो करो"। कहते हुए मुस्कान ने अपना हाथ राज के हाथों पर रख दिया । राज उठा और गेट के पास चला गया । उसे अचानक बहुत बेचैनी सी होने लगी । उसने सिगरेट सुलगाई और वहीं खड़े होकर कुछ याद करने लगा।

"राज, मुझे जाॅब मिल गई है"। "ग्रेट। कब से ज्वॉइन कर रही हो"? राज ने पूछा? "पोस्टिंग दिल्ली में हुई है"। मुस्कान ने कहा । "दिल्ली ? तुम दिल्ली चली गई तो मैं रहूंगा कैसे? मत जाओ,मुसु। यहीं कोई जॉब कर लो"। "यह जाॅब मेरी करियर के लिए अच्छा है । इसे मैं नहीं छोड़ सकती "। मुस्कान ने कहा था ।

एक बार फिर करियर के हाथों मोहब्बत का बड़ी बेरहमी से गला घोंटा गया। फिर ना इसने कभी बुलाया और ना उसने कभी मुड़ कर देखा।दोनों ने खुद को काम में इतना मशगूल कर लिया कि एक दूसरे की खबर तक ना ली । पर मोहब्बत अपने आशिकों की ठीक खबर रखती है ।जैसे ही बिछड़े आशिक मिलते हैं,मोहब्बत दोनों के दिल में आग लगा देती है । कुछ ऐसा ही आज इन दोनों के साथ हुआ था ।

कम्पार्टमेंट की सारी बत्तियाँ बुझ चुकी थी । अधजली सिगरेट फेंक कर राज अपनी सीट पर लौट गया था । उसने देखा मुस्कान रो रही थी ।

मुस्कान ने अपनी नम आँखों से राज की लाल आँखों में झांका और कहा-" तुम इस तरह उठ कर क्यों चले गए? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते? क्या मेरा तुम पर कोई हक नहीं? क्या.........." अभी शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि राज उठा और अपने होंठो को मुस्कान के होंठो पर रख दिया और उसे बाँहों में भर लिया । सारे गिले-शिकवे धुल गये। कुछ देर दोनों यूँ ही बैठे रहे फिर राज मुस्कान की गोद में सिर रख कर लेट गया । बीता वक्त फिर लौट आया था । इस इस बार इनकी मोहब्बत की ट्रेन को स्टेशन मिल गई ।

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