चावल पर लिखे अक्षर

दशहरे की छुट्टियों के कारण पूरे एक महीने के लिए सावित्री वर्किंग वूमेन हास्टल खाली हो गया था |सभी लड़कियां हँसती-मुसकुराती अपने-अपने घर चली गयी थीं |बस सलमा,रूखसाना व नगमा ही बची थीं |मैं उदास थी |बार-बार माँ की याद आ रही थी |बचपन में मुझे सभी त्योहार अच्छे लगते थे |दशहरे में पिताजी मुझे स्कूटर पर बैठाकर रामलीला और दुर्गापूजा दिखाने ले जाते थे |दीपावली के दिन माँ नाना प्रकार के पकवान बनाती |पिताजी घर सजाते |शाम को धूम-धाम से लक्ष्मी-गणेश का पूजन होता ,फिर पापा ढेर सारे पटाखे जलाते |मैं पटाखों से डरती थी ,इसलिए फूलझरियाँ ही घुमाती रहती |उस रात जगमगाता हुआ शहर कितना अच्छा लगता था |इस दीपावली भी यह शहर जगमगाएगा पर मेरे मन में फिर भी अंधेरा होगा |सलमा पूछती हैं कि मैं त्योहार में भी अपने घर क्यों नहीं जाती?अब मैं उससे कैसे बताऊँ कि मेरा कोई घर ही नहीं ?

मन उलझने लगा तो सोचा कि कमरे की सफाई करके ही मन बहलाऊँ |सफाई के क्रम में अपनी छोटी सी पुरानी सन्दूकची को खोला तो सुनहरे डिब्बे में बंद एक शीशी मिली |छोटी और पतली शीशी ,जिसके भीतर एक सींक और रूई के बीच चावल का एक दाना चमक रहा था |जिस पर अङ्ग्रेज़ी के अक्षरों में लिखा था –‘नोरा ,आई लव यू...|’मैंने उस शीशी को चूम लिया और अतीत में डूबती चली गयी |यह उपहार मुझे अनवर ने दिया था |दिल्ली के प्रगति मैदान में एक छोटी सी दुकान हुआ करती थी |जहां एक लड़की छोटी से छोटी चीजों पर कलाकृतियाँ बनाया करती थी |अनवर ने उसी लड़की से इस चावल पर अपने प्रेम का यह प्रथम संदेश लिखवाया था |

अनवर मेरे बड़े भाई के मित्र थे |अक्सर घर आया करते |पहले माँ ....फिर पिताजी की लंबी बीमारी और मृत्यु के बाद उन्होंने हमारी बहुत मदद की थी |भाई उनपर बहुत विश्वास करता था |वे उसके मित्र,भाई,राजदार सब थे पर भाई का व्यवहार मेरे साथ ठीक नहीं था |कारण यह था कि पिताजी ने अपनी आधी संपत्ति मेरे नाम लिख दी थी | वह चाहता था कि जल्द से जल्द मेरी शादी करके मेरे हिस्से की जायजाद भी अपने नाम कर ले |पर मैं आगे पढ़ना चाहती थी |

एक दिन इसी बात को लेकर उसने मुझे काफी भला-बुरा कहा |मैंने गुस्से में सलफ़ास खा लिया |भाई घबरा गया उसने अनवर को बुलाया |अनवर तत्काल मुझे लेकर अस्पताल गए |भाई पुलिस केस के डर से मेरे साथ आया तक नहीं |ज़हर के प्रभाव से मेरा बुरा हाल था |लगता था पूरे शरीर में आग लग गयी हो |कलेजे को जैसे कोई निचोड़े जा रहा हो |उफ़,इतनी तड़प!इतनी पीड़ा! मौत जैसे मेरे सामने खड़ी थी...और जब डाक्टर ने ज़हर निकालने के लिए नलियों का प्रयोग किया ,तो मैं अचेत हो गयी |जब होश आया तो देखा अनवर मेरे सिरहाने उदास बैठे हुए हैं |मुझे होश में देखकर उन्होंने अपना ठंडा हाथ मेरे तपते माथे पर रख दिया |आह...!ऐसा लगा किसी ने मेरी सारी पीड़ा खींच ली हो|मेरी आँखों से आँसू बहने लगे ,तो उनकी आँखें भी नम हो गईं |बोले—पगली ...रोती क्यों है ?उस जालिम की बात पर जान दे रही थी |इतनी सस्ती है तेरी जान !इतनी बहादुर लड़की और यह कायरता !मैंने रोते-रोते कहा-‘मैं अकेली पड़ गयी हूँ ...कोई मेरे साथ नहीं है |मैं क्या करूं ?’

वे बोले –आज से यह बात मत कहना ...मैं हूँ न !तुम्हारा साथ दूँगा |बस आज से इन प्यारी आँखों में आँसू न आने पाए |समझी ...वरना मारूँगा ...|मैं रोते-रोते हँस पड़ी थी |

अनवर ने भाई को राजी कर मेरा एमoएo में एडमीशन करा दिया |फिर तो जैसे मेरी दुनिया ही बदल गयी |अनवर घर में मुझसे कम बातें करते पर जब बाहर मिलते ,तो खूब चुटकुले सुनाते ...हँसाते |मेरी जरूरतों के बारे में पूछते रहते |धीरे-धीरे वे मेरी जिंदगी की एक ऐसी जरूरत बनते जा रहे थे कि मुझे डर लगने लगा था कि कहीं वे अन्यत्र चले गए तो मैं कैसे जी पाऊँगी ?जिस दिन वे नहीं मिलते सूना-सूना सा लगता |उनसे एक आत्मीय रिश्ता बन गया था पर उस रिश्ते का कोई नाम नहीं था |

एक दिन मैं अपने घर में पड़ोसियों के नन्हें बच्चों के साथ खेल रही थी |जब वे बेईमानी करते ,मैं उन्हें चूम लेती |तभी अनवर आ गए और हमारे खेल में शामिल हो गए |जब मैंने एक बच्चे को चूमा ,तो उन्होंने भी अपना दायाँ मेरी तरफ बढ़ा दिया |मैंने शरारत से उसे चूम लिया ,फिर उन्होंने अपने होंठ बढ़ाए |मैं शरमा गयी पर उनकी आँखों का चुम्बकीय आकर्षण मुझे खींचने लगा था |मैंने बच्चों को घर जाने को कह दिया |बच्चों के जाते ही उन्होंने फिर अपने होंठों की ओर ईशारा किया |फिर न जाने क्या हुआ कि अगले ही पल हमारे अधर एक हो गए |एक अजीब- सा थरथराता ...कोमल....सिनग्ध ,मीठा ,नया अहसास ...अनोखा सुख ....|लगा होंठों की शिराओं से उतरकर विद्युत-तरंगें रक्त के साथ प्रवाहित होने लगी हैं |देह एक मद्धिम आंच में तपने लगी और सितार के कसे तारों में संगीत बजने लगा .....तभी भाई की चीखती आवाज से हमारा सम्मोहन टूट गया |अनवर भौचक्के से खड़े हो गए थे |भाई की लाल आँखों ने बता दिया कि हम कुछ गलत कर रहे थे |-‘’क्या कर रही थी तू ...बेशर्म....मैं जान से मार डालूँगा तुम्हें ....|’’उसने मुझे मारने के लिए हाथ उठाया ,तो अनवर ने उसका हाथ थाम लिया| -‘’इसकी कोई गलती नहीं ...जो कुछ दंड देना हो ...मुझे दो ....|’’ भाई चीखा- ‘कमीने ,मैंने तुम्हें अपना दोस्त समझा ...और तुम ही.....मुसलमान हो न ...!.जाओ ,चले जाओ ,फिर कभी अपना मुंह मत दिखाना ...मैं गद्दारों से दोस्ती नहीं रखता ....|’अनवर आहत दृष्टि से कुछ क्षण भाई को देखते रहे |कल तक वे उसके लिए आदर्श थे ...मित्र थे और आज एक पल से इतने बुरे ...उन्होंने लंबी सांस ली और धीरे-धीरे बाहर चले गए ||मेरा मन तड़पने लगा –‘ये क्या हो गया ?अनवर अब कभी यहाँ नहीं आएंगे ...मैंने क्यों चूम लिया उन्हें ?वे बच्चे नहीं ,पुरूष थे ...|अब क्या होगा ...|उनके बिना मैं कैसे जी सकूँगी ?’ मैं अपने दुख में इस तरह गुम थी कि भाई क्या कह रहा है ,मुझे सुनाई ही नहीं दे रहा था |

उस घटना के कई दिन बाद अनवर मिले और मुझे बताया कि भाई उन्हें उनके घर से आफिस तक बदनाम कर रहा है |उनके हिन्दू मकान-मालिक ने उनसे कह दिया है कि जल्द मकान खाली करो |आफिस में भी काम करना मुश्किल हो रहा है |सब उन्हें अजीब निगाह से घूरते और मुसकुराते हैं |मानों कह रहे हों –‘बड़ा शरीफ बनता था |’ सबसे बड़ा गुनाह तो उनका मुसलमान होना बना दिया गया है |मुझे भाई पर क्रोध आने लगा |अनवर चारों तरफ बेहद सुलझे ,समझदार ,ईमानदार इंसान के रूप में प्रसिद्ध रहे थे पर उसने ....|कहीं अनवर बदनामी के डर से कुछ कर न बैठें |मैंने दुखी स्वर में कहा –‘यह सब मेरी नासमझी के कारण हुआ ,मुझे माफ कर दें ...|’वे प्यार से बोले ...’नहीं पगली ....इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं ,दोष तो उम्र का है ...मैंने ही कब सोचा था कि तुमसे ....|’

वाक्य अधूरा था पर मुझे लगा खुशबू का एक झोंका मेरे मन को छूकर गुजर गया हो ....और मन तितली बनकर उस सुगंध की तलाश में उड़ने लगा और जब उसने देखा अनवर की आँखों में खिले फूलों से आ रही है वह सुगंध ...तो वहीं मंडराने लगा ....|

अचानक उन्होंने चुप्पी तोड़ी-‘सीमा मुझसे शादी करोगी ...?ये क्या ...मैं अपने-आप को आकाश के रंग-बिरंगे बादलों के बीच दौड़ते-भागते ...खिलखिलाते देख रही थी |...

’सीमा... बोलो सीमा ,दोगी मेरा साथ ....|’मैं सम्मोहित व्यक्ति की तरह सिर हिलाने लगी |वे बोले –‘मैं दिल्ली जा रहा हूँ|वहीं कोई नौकरी ढूंढ लूँगा ....यहाँ तो हम चैन से नहीं जी पाएंगे ....|’

अनवर जब दिल्ली से लौटे थे ,तो मुझे चावल पर लिखा यह प्रेम संदेश देते हुए कहा था ...’आज से तुम नूर हो ...सिर्फ मेरी नूर ...|’और सच ही उस दिन से मैं सिर्फ नूर बनकर जीने लगी थी |

अनवर देर कर रहे थे |उधर भाई की ज़्यादतियाँ बढ़ती जा रही थीं |वह सबके सामने मुझे अपमानित करने लगा था |उसका प्रिय विषय ‘मुस्लिम बुराई पुराण’ था |इतिहास और वर्तमान से छांट-छांटकर उसने मुसलमानों की गद्दारियों के किस्से एकत्र कर लिए थे और उसे रस ले-लेकर सबको सुनाता|मैं कटकर रह जाती |मुझे पता था वह यह सब मुझे जलाने के लिए कर रहा है |मैं अभी उससे उलझना न चाहती थी |मुझे अनवर की नौकरी लग जाने का इंतजार था |भाई जितना ही अनवर की बुराई करता ,उतनी ही मैं उनके नजदीक जा रही थी |हम अक्सर मिलते |कभी-कभी तो पूरे दिन एक टेम्पो से दूसरे टेम्पो में शहर का चक्कर लगाते ,ताकि देर तक साथ रह सकें |मिलकर बैठने की कोई जगह खतरे से खाली नहीं थी |अजीब दिन थे वे दहशत और मोहब्बत से भरे हुए |उनकी एक नजर ...एक मुस्कुराहट ...एक बोल ...एक स्पर्श ...कितना महत्वपूर्ण हो उठा था ...मेरे लिए ...|वे अपने प्रेम- पत्र कभी मेरे घर के पिछवाड़े कूड़े की टंकी के नीचे ,तो कभी बिजली की पोल के पास ईंटों के नीचे दबा जाते ...|मैं कूड़ा फेंकने के बहाने जाकर उन्हें निकाल लाती |पत्रों में वे अपना दिल निकालकर रख देते |मेरे लिए वे प्रेम –पत्र दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्रेम –पत्र होते थे ...|उन्हें मेरा सतरंगी दुपट्टा विशेष प्रिय था |जिसे ओढ़ कर मैं शाम को टहलती और वे दूर ....सड़क से गुजरते ...फोन पर विशेष संकेत देकर वे अपनी बेचैनी प्रकट करते |भाई मुझे घूर-घूर कर देखता और मैं मन ही मन रोमांचकारी खुशी से भर उठती| प्रेम मनुष्य को चतुर-चालाक भी बना देता है ,उन्हीं दिनों जाना |लाख प्रतिबंधों के बावजूद भाई हमें मिलने से नहीं रोक पाया था |

एक दिन जब मैं कालेज से घर पहुंची ,तो ड्राइंगरूम से भाई के ज़ोर-ज़ोर से बोलने की आवाज सुनाई दी |अंदर झांक कर देखा तो धक से रह गयी |अनवर भाई के सामने सिर झुकाए खड़े थे |अनवर को यह क्या सूझा ...आखिर वही पागलपन कर बैठे न ....कितना मना किया था मैंने ...पर ये मर्द अपनी ही बात चलाते हैं |इतना आसान तो नहीं है जाति-धर्म का भेदभाव मिट जाना |चले आए भाई से मेरा हाथ मांगने ...इतना समझाने के बावजूद |अरे सामान्य स्थिति में भी भाई इसके लिए राजी नहीं होता और अब तो बात इतनी बिगड़ चुकी है |

उफ,न जाने क्या-क्या न कहा होगा भाई ने उन्हें |मुझे देखकर भाई और भी शेर हो गया |उनका हाथ पकड़कर बाहर की तरफ धकेलते हुए गालियां बकने लगा |मैं किंकर्तव्यविमूढ़ थी |बाहर कालोनी के कुछ लोग जमा हो गए थे |मैं तमाशा बनने के डर से अपने कमरे में बंद हो गयी |रात-भर तड़पती रही |मेरे हाथ दुआ के लिए ऊपर उठे –‘या अल्लाह ,रहम कर !उनको सहने की शक्ति दे....उनकी रक्षा कर ...उन्हें मोहब्बत की सजा मिली है ...उस मोहब्बत की ....जो तेरा ही एक नाम है .....|अब तेरा ही सहारा है |

दूसरे दिन शाम को किसी ने मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया ...खोलकर देखा तो अनवर के एक मित्र उमेश थे |किसी भावी आशंका से मेरा मन काँप उठा |वे बोले –‘अनवर ने काफी मात्र में जहर खा लिया है ...और मेडिकल कालेज में मौत से लड़ रहा है ...बार-बार नूर –नूर कह रहा है |जल्दी चलिए |’मैं घबरा गयी |जल्दी से पैरों में चप्पलें डालीं और सीढ़ियाँ उतरने लगी |आखिरी सीढ़ी पर कमर पर हाथ रखे भाई खड़ा था |और नीचे कालोनी के कुछ लोग ,जिन्हें भाई बुलाकर ले आया था |

मैं ठिठक गयी ,फिर साहस सँजोकर कहा =मुझे जाने दो ...बस एक बार देखना चाहती हूँ उन्हें ...|’

-नहीं ...तुम्हें नहीं जाना है ...मरता है तो मर जाए साला ...पाप का प्रायश्चित कर रहा है ...|

-‘प्लीज भाई ...तुम भी साथ चलो ...बस एक बार मिलकर आ जाऊँगी ...|’

-कदापि नहीं ...उस गद्दार का मुंह देखना भी पाप है ...|

-‘भाई ,मेरी विनती सुन लो ...फिर तुम जो चाहोगे ,वही करूंगी |अपने हिस्से की जायजाद भी तुम्हारे नाम कर दूँगी ...|’

-सच,तो यह लो कागज ...इस पर हस्ताक्षर कर दो ...उसने जेब से न जाने कब का तैयार दस्ता वेज निकालकर मेरे सामने लहरा दिया |मेरा मन घृणा से भर उठा |जी तो चाहा उस कागज के टुकड़े करके उसके मुंह पर दे मारूं|पर इस समय अनवर की जिंदगी का सवाल था |समय बिलकुल नहीं था ...और बाहर कालोनी वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी |मैंने भाई के हाथ से पेन लेकर उस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिया और तेजी से लोगों के बीच से रास्ता बनाती उमेश के स्कूटर पर बैठ गयी |जाते-जाते भाई के कुछ शब्द कानों में पड़े –‘देख रहे हैं न आप लोग ....यह अपनी मर्जी से जा रही है ...कल कोई ये न कहे कि मैंने घर से निकाल दिया ...कटुए की मोहब्बत ने इसे पागल कर दिया है |अब मैं कभी इसे घर में घुसने नहीं दूँगा |मेरे खानदान का नाम और धर्म सब भ्रस्ट कर दिया इस कुल -कलंकिनी ने .....|’

स्कूटर मेडिकल कालेज की तरफ भागा जा रहा था |मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे –‘’तो यह ...यह है ...माँ के घर से मेरी विदाई ....!

अनवर खतरे से बाहर आ चुके थे |थोड़ी ही देर में उन्हें होश आ गया पर मुझे देखते ही वे थरथरा उठे .....’तुम...तुम ...कैसे आ गयी ...जाओ ...लौट जाओ ...कहीं पुलिस ....कहीं हिन्दू संगठन के लोग .....|’मैंने अनवर का हाथ दबा कर कहा –‘आप चिंता न करें ...कुछ नहीं होगा ...देश का कानून हमारे साथ है |मैं नाबालिक भी नहीं हूँ ...ना जबरन यहाँ लाई गयी हूँ ...|’

पर वे उसी तरह थरथराते रहे और मुझे वापस जाने को कहते रहे और फिर बेहोश हो गए |डाक्टर ने बताया कि उन्हें आराम की जरूरत है आप सब कुछ देर के लिए बाहर जाएँ |

मैं बाहर आकर इमली के पेड़ की घनी छाया में बैठ गयी और सोचने लगी कि किस्मत ने मुझे किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है | अनवर को कैसे समझाऊँ कि सब कुछ छोड़ आई हूँ |अब मेरी वापसी कभी नहीं होगी |

थोड़ी देर बाद मैं फिर अनवर के पास गयी और उनके पैताने बैठ गयी |वे गहरी नींद में थे |उनका चेहरा आज पहली बार मैं ध्यान से देख रही थी |वे बिलकुल भी सुंदर नहीं थे पर उनका मन बहुत सुंदर था |उनके इसी मन को मैंने प्यार किया था |यह मन जाति-धर्म के बंधनों से सर्वथा मुक्त था |पर अनवर का यह डर...!आगे का रास्ता मुझे सुझाई नहीं पड़ रहा था |

पक्षी चहचहाने लगे तो पता चला कि सुबह हो चुकी है ...|मैं अनवर के सिरहाने बैठकर उनका सिर सहलाने लगी |उन्होंने आँखें खोल दी और मुस्कुराए |उनकी मुस्कुराहट ने मेरे रातभर के तनाव को धो दिया ....खुशी के मारे मेरी आँखें नम हो आईं |....सच ही सुबह हो गयी है क्या....?मैंने उनकी ओर शिकायती नजरों से देखा ---तुमने ऐसा क्यों किया अनवर ...क्यों ?मुझे बीच रास्ते में छोड़कर पलायन करना चाहते थे ?एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा ...?अनवर ने मेरी आँखें पढ़ ली|कमजोर स्वर में बोले –‘मैंने बहुत सोचा नूर ....और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये मजहबी लोग हमें कहीं भी साथ जीने नहीं देंगे |इनके मनों में एक-दूसरे के लिए इतनी नफरत है कि हमारा प्रेम कम पड़ जाएगा |नूर तुमने सुना होगा ...बाबरी मस्जिद गिरा दी गयी है ...चारों तरफ दंगे-फसाद ...आगजनी ...उफ,इतनी जानें जा रही हैं पर इनकी खून की प्यास नहीं बुझ रही है ...मैं दिल्ली गया था नौकरी की तलाश में ...वहाँ तो यह आग और धधक रही है ...मैं घबरा गया ...भाग आया वहाँ से ....सोचा ...तुम्हें पाने का एक ही उपाय है ...तुम्हारे भाई से तुम्हारा हाथ मांग लूँ ...आखिर वह मेरा पुराना मित्र है ...शायद इंसानियत की कोई किरण बाकी हो उसमें ....पर नहीं ....|’अनवर की आँखों से आँसू टपक पड़े |मेरे मन में हाहाकार मचा हुआ था |मैं एक पहाड़ को टूटते देख रही थी ....|मैंने कहा –‘पर हमें हारना नहीं है अनवर ....जैसे भी जीने दिया जाएगा ...हम जीएंगे ...यह हमारा अधिकार है ...तुम ठीक हो जाओ ...फिर सोचेंगे कि हमें क्या करना है ?मैं यहाँ से कुछ दिनों के लिए सावित्री वर्किंग वूमन हास्टल चली जाऊँगी ....|’बात अधूरी रह गयी ...उसी समय कुछ लोग वहाँ आकर खड़े हो गए |उनकी वेशभूषा ने बता दिया कि वे अनवर के रिश्तेदार हैं |वे लोग मुझे ऐसी नजरों से देख रहे थे कि मैं कटकर रह गयी |अनवर ने मुझे चले जाने का संकेत किया |मैं वहाँ से सीधे बस स्टैंड आ गयी |

महीनों गुजर गए |अनवर का कोई समाचार नहीं मिला |न जाने उनके रिश्तेदार उन्हें कहाँ ले गए थे |मेरे पास सब्र के सिवा कोई रास्ता नहीं था |एक दिन अचानक उनका खत मिला |मैंने काँपते हाथों से खोला –‘नूर ...मुझे माफ करना ....तुम्हारा साथ न निभा सका |सब अपनी राह चलाना चाहते हैं मुझे ...अपनी शर्तों पर जीने को कहते हैं ...मैं कमजोर पड़ गया हूँ ...| तुम्हें खोकर जी नहीं सकता और पाने के लिए लड़ने की ताकत नहीं है मुझमें ...इसलिए तुमसे दूर जा रहा हूँ बहुत दूर ...कभी न लौटने के लिए ...|तुम सबल हो ...समर्थ हो ...अपना रास्ता खोज लोगी |अलविदा नूर...........|’

छनाक की आवाज से मेरी तंद्रा टूटी ,तो देखा वह पतली शीशी टूट गयी है पर चावल का वह दाना साबुत था और उसपर लिखे अक्षर उसी ताजगी से चमक रहे थे ,जिस लिखा था –noor I love you …..|

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