बिन ब्याही माँ


भाग -१

पिछले 2 घंटे में किशन मुझे कॉलेज रियूनियन में जाने की हजारों कारण दे चुका है ।और मैं अपने डिसीजन से टस से मस नहीं होना चाहता और वह है कि मेरे बिस्तर से टस से मस नहीं हो रहा है ...अक्सर वह मुझे बहुत जिद्दी कहा करता है पर आज मुझे मुझसे ज्यादा कोई जिद्दी लग रहा है तो वह किशन ही है ।न जाने क्यों इन कॉलेज वालों ने अचानक रियूनियन का प्लान बना लिया है ......आज तो लग रहा है कि शायद मुझे किशन का फोन भी नहीं उठाना चाहिए था न जाने कहां से उसने ढूंढ लिया नंबर और आ धमका है मेरे रूम पर ।

लगता है शायद आज मुझे हारना ही पड़ेगा ।वैसे उसका कहना सच भी है कि पिछले 2 सालों से ही मैंने अपनी दुनिया सिर्फ अपनी ऑफिस और अपने घर को बना लिया ।

मैं किसी से नहीं मिलता ,कहीं नहीं जाता। पर क्या करूं.... यह जिंदगी मुझे अच्छी लगती है मुझे किसी के सवालों का जवाब नहीं देना पड़ता मुझे किसी को नहीं बताना पड़ता कि मैं कैसा हूं ?मुझे किसी को नहीं दिखाना पड़ता है कि मैं सारी दुखों को जेल कर भी अच्छे से जी रहा हूं ।इस कमरे में शांत रहता हूँ ।खुश ना होकर भी खुश रहता हूं ।

2 साल पहले जब श्रेया मेरे होने वालेे बेबी के साथ अचानक मुझे छोड़कर चली गई |शायद मैंने भी मौत को गले लगा ही लिया था पर मौत ने मुझे धोखा दे दिया और श्रेया ने मुझसे ज्यादा वफादारी मौत से निभानी थी। खैर जो भी हुआ उसे मैं अब नसीब का नाम दे देता हुँ।श्रेया के साथ मेरी उस आने वाली बेटी ने भी मुझसे मिलने से पहले ही विदा ले लिया थाl

मुझे किशन मना चुका है उस कॉलेज रीयूनियन में जाने के लिए और मेरे सारे कपड़े और बाल से लेकर मेरी जूतों तक "कौन सा पहनना हैं " का डिसीजन उसका ही है |न जाने कौन सा कार्टून बनाकर ले जाने वाला है आज ...और तो और मेरी शेविंग भी आज उसी ने की है |खैर जो भी हो उस दोस्त की एक मुस्कुराहट के लिए मैं इतनी जहमत उठा ही सकता हूं| तो ऐसा है कि मैं आज पूरे 2 साल के बाद अपने ऑफिस और अपने घर से किस तीसरे दुनिया में कदम रखने जा रहा हूं वो 2007 था जब मैं बेफिक्र सा था अपने दोस्तों के जैसा ,,,इस पूरी दुनिया से अनजान ।

ग्रेजुएट होना शायद हम सब की बहुत बड़ी अचिव्मेंट हो जैसे उस समय ।समझ नहीं आता था ,अचीवमेंट के नाम पर इंक्रीमेंट और अप्रैजल भी होते हैं और सबसे बड़ा अचीवमेंट तो वह होता है ।जब आप किसी को बहुत शिद्दत से चाहो और इसकी उसकी आंखों में और उसके होठों पर वो 'हां'मिल जाए ।उस समय ग्रेजुएशन की डिग्री के साथ हमारी आंखों में कुछ आंसू भी थे ।क्योंकि जो खास दोस्त पिछले 3 साल में बने थे उनसे विदा लेना उतना आसान नहीं था हम सब के लिए। पर थोड़ीे उन आंखों में चमक की मिलावट भी थी क्योंकि उस चमक में बहुत सारे सपने थे किसी को यहां से निकलकर MBA करना था ,तो कोई यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली जाने वाला था, तो किसी को पत्रकारिता में अपने हाथ आजमाने थे जो। पर किशन इसलिए खुश था क्योंकि अब उसे पढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी अब वह एक अच्छा सा बिजनेस खोलेगा और खुश रहेगा ।

अब हम उसकी चमचमाती हुई ऑडी में होटल के बाहर पहुंच चुके थे जहां हमारे कॉलेज का रियूनियन हो रहा था ।हम पार्किंग में गाड़ी को रख कर थोड़ा अंदर तक पहुंच गए थे ।कि अचानक से किसी की मीठी आवाज कानों में आने लगी और वह प्यारा सा गाना न जाने मैंने कितनी सालों बाद सुना था ।

"लग जा गले कि..... फिर ये हंसी रात हो ना हो ,शायद इस जन्म में .....मुलाकात हो ना हो"

मैं 2 मिनट के लिए रुक गया था वहां पर और फिर मैंने किशन से पूछा "किशन ,उसी की आवाज है ना ?"
किशन ने मेरा मजाक उड़ाते हुए कहा " क्या बात है ....पाटनर इतने सालों बाद भी उसका आवाज पहचान गया"

मैंने कहा " यार ये आवाज दिल छू चुकी थी तू तो जानता ही है और मेरा दिल बहुत जल्दी टूट चुका था अगर श्रेया नहीं होती तो शायद मैं शादी ही नहीं करता ।"

जैसे-जैसे हम पास जा रहे थे वह आवाज मेरे कानों के ज्यादा करीब आ रही थी और मैं घुल जा रहा था उनमें ।

हमने एंट्री की तो देखा वो सामने स्टेज पर बैठी थी माइक लिए चेयर में। और अपने गाने में वैसे ही डूबी थी जैसे 10 साल पहले वह कॉलेज फंक्शन में डूब जाया करती थी। पूरा कॉलेज उस पर टकटकी लगाए रहता था और आज भी वही हाल था नीली कलर की साड़ी, गोल्डन ब्लाउज, उसके बाल कमर तक आ चुके थे अब और उसने उन्हें मनमर्जी करने खुला छोड़ा था आज ।कान में गोल्डन झुमके,और छोटी सी बिंदी उसके माथे पर चार चांद लगा रही थी।बिंदी काली लगाई थी उसने,शायद उसे पता था कि आज पूरा कॉलेज सिर्फ उसे ही घूरने वाला हैं और खुद को नजर लगने का भी अंदेशा था।

पुरा कॉलेज उसे देखने में और उसके गाने सुनने में मशगूल था तो किसी ने भी मुझ पर और किशन पर ध्यान नहीं दिया और हमने भी चुपचाप एक कोना पकड़कर बैठना ही मुनासिब समझा। वह गाने का आखिरी पैरा गा ही रही थी वैसे ही एक छोटी सी लड़की स्टेज पर आती हुई दिखी शायद 3 साल की थी वह पिंक कलर की परी वाली ड्रेस में बहुत प्यारी लग रही थी वो ।वह चुपचाप गई उसकी साड़ी के पल्लू को खींचा और उसने उसे गोद में बिठा लिया।

अचानक से उसने गाना चेंज कर दिया वह अब 'यशोमती मैया से बोले नंदलाला..... राधा क्यों गोरी ...मैं क्यों काला"गा रहीथी ।

जब तक वह गाना खत्म करती तब तक वह छोटी बच्ची उसकी साड़ी के आँचल में छुपकर सो चुकी थी हम सब थोडे सरप्राइज थे... कि कया यह बच्ची उसकी है? उसने कभी शादी का बताया नही था किसी को और न उसके माँग में सिंदूर था न मंगल सूत्र।

हम सब अपने हिसाब से अटकले लगा रहे थे कि शायद उसने ....उस बच्चे को गोद लिया होगा या ......उसने हम सबको बिना बताए शादी कर ली होगी फिर उसका तलाक हो गया होगा। ऐसा भी हो सकता है कि... शायद उसका हस्बैंड अब इस दुनिया में ना हो। और कुछ समाज के ठेकेदारों ने यह भी सोच लिया था कि शायद उसका बॉयफ्रेंड ....उसे प्रेग्नेंट करके भाग गया था।


भाग -२


लोरी खत्म करके उसने वहीं स्टेज से सबको थैंक यू और सॉरी दोनों कहा। क्योंकि उसे अचानक अपना गाना बदलना पड़ा ।पर शायद सॉरी की जरुरत नहीं थी क्योंकि हर कोई उस लोरी में खो गया था। उसने उस बच्ची को गोद में उठाया स्टेज से नीचे उतरने लगी ।पूरा कॉलेज तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज चुका था और वो शायद जान चुकी थी कि लोगों की नजरों में उसके लिए बहुत से सवाल है पर वह मुस्कुराते हुए उतर रही थी।

आज मैंने उसे इतने सालों बाद साड़ी में देखा ,तो मुझे अपना सेकंड ईयर वाला जूलॉजी का पेपर याद आ गया। उस दिन शायद उसके ऑफिस में कोई फंक्शन था और उसे एग्जाम देकर तुरंत ऑफिस जाना था ।तो उसने साड़ी पहनी थी क्योंकि वैसे तो वह बहुत खूबसूरत थी ही और उस दिन अचानक सबने उसे साड़ी में देखा तो पूरी कॉलेज की नजर उस पर ही टिकी हुई थी ।उसे पता था कि सब उसे ही देख रहे हैं इसलिए शायद वह उस दिन थोड़ा शरमाई हुई थी जब हम सबके पास आई गुड लक विश करने तो हम सब उसे देख रहे थे। जैसे उसे पहली बार देखे हो और उसने थोड़ा इरिटेट होकर कहा था "यार पूरा कॉलेज मुझे देख रहा है कम से कम तुम लोग मत घुरो ऐसे"।

हम लोगों ने बहुत जोर से हंसा था और मैंने उसे कहा कि "वैसे भी तो तुझे रोज कॉलेज घूरता ही है ,आठवाँ अजूबा जो हैं तू"

उसने अपनी काली काली आँखो से गुस्से से देखते हुए कहा
"अभी तो तु चुप ही रह और सुन मैंने कुछ पढ़ाई नहीं की है क्योंकि मेरा प्रजेंटेशन था तो मैं उस पर फोकस कर रही थी तो तू मुझे आंसर बता देना प्लीज आज ,आज थोड़ी हेल्प कर देना मेरी"
मैंने उससे कहा कि "ठीक है अगर कॉलेज के बाद एक कॉफी पर चलेगी तो बिल्कुल बता दूंगा" उसने कहा "चल अब फ्लर्टकरना बंद कर और पढ़ ले क्योंकि तुझे मेरे भी पेपर बनाने है"
हालांकि उसे पूरी जूलॉजी के पेपर में भी कहीं भी जरुरत नहीं पड़ी मेरी। वह अपनी पेपर बहुत अच्छे से कर रही थी म ैंहीं उस दिन खोया हुआ था आंसर लिखते-लिखते उसके उस रेड ब्लैक ब्लैक साड़ी में और उसके लंबे बालों में |जब मैंने उसे पहली बार देखा था कॉलेज में ,मैं तभी उस पर अपना दिल दे चुका था पर आज तो शायद मेरे लिए पूर्णिमा का चांद थी जैसे जितना भी देख लो नजर ही नहीं भर रही थी ।20 मिनट तक मैंने उसे टकटकी लगाकर देखा था और वह इस बात से बेखबर अपने पेन घिसे जा रही थी। अगर किशन मुझे बीच में नहीं टोकता तो शायद मैं पूरी 3 घंटे वैसे ही गुजार देता उसे देखते -देखते।

वह स्टेज से जैसे ही उ्तरी सबने उसे घेर लिया । एक के बाद एक सबने क्वेश्चन करना शुरु कर दिया उसकी एक सहेली ने उससे पूछा कि "यार तूने शादी कर ली और बताया भी नहीं, चल ठीक है शादी कर ली वह नहीं बताया कम से कम मासी बनने की खुशखबरी तो दे देती" उसने मुस्कुराकर कहा कि "हां मासी तो तू बन चुकी है पर मेरी शादी हुई नहीं तो मैं तुझे कहां बुलाती " अचानक से सब शांत हो गया अपने आप सब लोगों की जुबान में सवाल तो बहुत हैं पर शायद वो पूछ नही पा रहे थे ।धीरे से मैडम ने पूछा "इसके पापा ....?"उसने फिर मुस्कुरा कर कहा "इसकी मम्मी और इसके पापा दोनों मैं ही हूं .... मेरे लिए यह देवी मां का आशीर्वाद है बस यह समझ लीजिए आप लोग "
अब शायद लोगों के पास कुछ पूछने के लिए बचा नहीं था या बचा तो था पर अब हिम्मत नहीं थी| लोगों ने बहुत सारी सिंपैथी इकट्ठे कर रखी थी उसे जताने के लिए पर शायद उसे जरूरत ही नहीं थी और वह परी उसकी गोद में इस पूरी दुनिया के सवालों से छुपकर सो रही थी चुपचाप।

उसने मुझे देखा और हाथ हिलाकर हाय किया मैंने भी उसे मुस्कुरा कर जवाब दिया फिर वह किसी टीचर से बात करने में बिजी हो गई और मैं किशन से उसके बारे में बात ही कर रहा था वैसे तो मेरा पूरा ध्यान उस पर ही था पर मै ये दिखा रहा था कि मेरा ध्यान सिर्फ उस पर नहीं है हम बात ही कर रहे थे कि वह अचानक पीछे से आई और उसने पूछा...

"कैसे हो "

"हाय ......तुम कैसी हो"

"ब्यूटीफुल"

मैंने उसे हंसते हुए कहा" हां वह तो तुम हमेशा ही रहती हो"

"अगर तुम्हारी इजाजत हो तो मैं यहां बैठ सकती हूँ"

"अगर मेरी इजाजत ना हो तो भी बैठ सकती हो"

मैंने उससे कहा "वैसे एक बात कहना चाहूंगा कि आज तुमसे ज्यादा खूबसूरत तुम्हारी बेटी लग रही है "

उसने कहा "हां वह तो है ही "

मैंने उससे पूछा कि "क्या मैं इसे गोद में ले सकता हूं 2 मिनट के लिए"

"मुझे देने में तो कोई प्रॉब्लम नहीं है यार पर अगर यह अभी किसी की गोद में जाएगी तो उठ जाएगी ...प्रिंसेस है ना मेरी "

"हां सच है "

"यह बताओ मेरा टेम्पटेशन कहां है"

" वह तो मैं भूल गया "

"मतलब तो मुझे भी भूल चुके थे और वह कॉलेज की 3 साल पर भूल गए"

"हां शायद .....पर तुम्हारे टेम्पटेशन ने याद दिला दिया "

किशन तब तक हमारे खाने के लिए काफी कुछ ले आया था ।

सवाल तो मेरे भी मन में काफी थे पर मैं उससे पूछना नहीं चाह रहा था। मैंने बस उससे इतना ही पूछा "और क्या कर रही हो आज-कल "उसने कहा "मैंने अपना ड्रीम पूरा कर लिया पता है मैंने अपनी जॉब कंसल्टेंसी फर्म खोल ली "
मैंने कहा "ओह वाओ ग्रेट है ये तो "

कुछ देर शांत रहने के बाद मैंने उससे पूछा "कल क्या कर रही हो ... कल लंच में मिलते है अगर फ्री हो"

उसने कहा" यार कल थोड़ा कोर्ट का काम है "मैंने उससे पूछा "सब ठीक है ना "उसने कहा "अरे हां सब ठीक है अम्बर का एडमिशन करवाना है ना 3 साल की हो गई है तो मैं इसके स्कूल गई थी तो पापा के कॉलम में मुझे इसके पापा का नाम लिखना था अब वहां पर तो भगवान भी नहीं लिख सकती थी तो उन्होंने कहा कि मुझे सिंगल मदर का एक सर्टिफिकेट बनवाना होगा या एफिडेविट बनवा कर देना होगा ।वही बनवाना है मुझे,और कल इसके स्कूल के लिये शौपिंग भी करनी है।"

"ठीक ,तो अम्बर नाम है इस प्रिंसेस का ,बहुत प्यारा है "

उसने कहा " हाँ ,मैंने रखा है ,वैसे अगर तुम्हें कोई दिक्कत ना हो तो तुम डिनर में आ जाओ या शाम की कॉफी साथ में पी लेते हैं ।"

मैंने उसे " हां "कहा उसने कहा "चलो अब मैं निकलती हूं सब से मिलकर क्योंकि इसे भी दर्द हो रहा होगा ना बहुत देर से गोद में सोई है"

मैंने कहा "मैं छोड़ देता हूं "

"अरे नहीं मैं अपनी कार लेकर आई हूं और मुझे कार चलानी आती है इतनी चिंता मत करो'

"मुझे तुम्हारी चिंता नहीं है लोगों की है ...क्या है कि तुम्हें दाएं और बाएं में फर्क नजर नहीं आता ना"

उसने अपने आंखों को बड़ा करके गुस्से में देखा मुझे और मुझे जोर से हंसी आ गई।उसने सब से मुलाकात की और पार्किंग की तरफ जा ही रही थी कि मैं भी उस तरफ चल पड़ा नहीं पता क्यों थोड़ी सी चिंता थी मुझे उसकी ।वह अपनी कार पार्किंग से निकाल रही थी उसने मुझे देखा कारके शीशे से झांक कर और बोली "देखो मुझे चलाना आता है "

मैंने कहा " अरे हां मैं तो तुमसे नंबर लेने आया था तुमने कह तो दिया कि डिनर करेंगे साथ में या कॉफी में आ जाना पर ना तो तुमने अपना एड्रेस दिया और ना ही नंबर"
उसने कहा" तुम कितने बुद्धू हो ना लड़की से पहले उसका नंबर मांगना चाहिए मैंने कहा अभी एक मूर्ख से मिला था ना तो मेरा दिमाग भी काम करना बंद कर दिया"

और उसने फिर बड़ी बड़ी काली आंखों से मुझे घूर कर देखा , मैंने उसे देखकर मुस्कुरा दिया ।हम दोनों ने अपने नंबर एक्सचेंज किए उसके बाद वह अपने घर की तरफ निकल गई।

नहीं पता क्यों मैंने चिल्लाकर कह दिया था "घर पहुंच कर एक मैसेज डाल देना "मुझे पता था उसने नही सुना।

कुछ पन्ने अतीत के यहीं बिखरे हैं
कुछ धुंधले हैं ,कुछ उजले हैं

कुछ काली रातें है,
तो कुछ सुनहरी सुबहे हैं

यादें भी ऐसे ही होती हैं
कुछ रुला जाती है और
कुछ हंसा जाती है ।

कुछ अपने बिछड़े है जिंदगी में
तो कुछ बिछड़े फिर मिले हैं...!

"हम सेफलि घर पहुच चुके है गुड नाइट ,कल मिलते है "

एक कविता और उसके घर के एड्रेस के साथ उसका msg आया ।

भाग -३


आकृति के घर जाने के बाद मैं और किशन भी घर आ गए ।आज रात न जाने क्यों वो नन्ही सी परी मेरी आंखो के सामने बार बार आ रही थी। शायद जो बेटी मुझसे मिलने से पहले विदा हो गई, उस परी को देखकर मैं सोच रहा था कि वह भी ऐसे ही रहती ना प्यारी सी। एक और बात थी जो मेरे दिमाग में चल रही थी ।आकृति ने जो एड्रेस मुझे भेजा था वह एड्रेस नहीं था जहां मैं 10 साल पहले गया था फिर मैंने यह सोचा कि शायद वह लोग नए घर में शिफ्ट हो गए होंगे।

यह सारी बातें सोचते सोचते कब मुझे नींद आ गई ,मुझे भी पता नहीं चला। आज सुबह उठकर जल्दी ऑफिस चला गया था ।ऑफिस में मन नहीं लग रहा था ,जैसा की आकृति ने बताया था कि उसे आज कोर्ट जाना है,और उसके बाद उसे अंबर के एडमिशन के लिए स्कूल जाना है ,मैंने सोचा कॉल करके कहूँ कि मैं भी आ जाता हूं शायद उसे थोड़ी हेल्प हो जाए ।पर सोचा कि अगर उसने कोई डिसीजन लिया है तो उसे उसे अकेले ही फेस करना होगा ,और मैं सिर्फ आज ही तो उसका साथ दे पाऊंगा मैं उसका जीवन भर साथ थोड़ी दे सकता हूं ।उसे उस बच्चे को सिंगल मदर बनके अगर पालना है तो उसे सारी चीजें अकेली ही सीखनी पड़ेगी और वह कर भी लेगी मुझे पता है ।आज मैं सारे काम जल्दी जल्दी निपटा रहा था क्योंकि मुझे शाम को 5:00 बजे निकलना था पर आज नहीं पता कि वह घड़ी में 5:00 बज ही नहीं रहे थे अचानक 4:30 बजे आकृति का मैसेज आया।

"तुम आ रहे हो ना"

"हां बस थोड़ी देर में निकलूंगा"

"ओके मैंने यह बताने मैसेज किया था कि हम घर आ गए हैं
तुम जैसे ही फ्री हो आ जाना"

"हां 5:30 तक मिलता हूं"

"ओके"

ठीक 5:30 बजे मैं उसके घर के सामने था। उसके घर के सामने लगे नेम प्लेट में बड़े बड़े अक्षरों में अंबर और आकृति लिखा हुआ था ।मै मेन गेट के पास पहुंचा वहां देखा गार्डन में अम्बर किसी 4- 5 साल की लड़की के साथ खेल रही थी उसने मुझे देखा और एक प्यारी सी मुस्कान दी ।और जोर से चिल्लाई "मम्मा आपके फ्रेंड आ गए हैं "

अंदर से आकृति की आवाज आई "हां बेबी मैं आ रही हूं "
मैं 5 मिनट के लिए बाहर ही रुक गया अंबर के साथ थोड़ी बहुत बात की उसने तोतली आवाज में अपनी सारी बात बताई कि कल से उसे स्कूल जाना है और स्कूल यूनिफॉर्म में ही जाना होगा एक ही ड्रेस रोज पहनना होगा ।स्कूल जाना तो समस्या नहीं थी उसके लिए, एक ड्रेस रोज पहनना सच में शायद बोरिंग था। मैंने उसके लिए लाया हुआ उसे चॉकलेट का पैकेट दिया तो उसने अपनी तोतली से आवाज में प्यारा सा थैंक यू बोल कर मेरे गाल पर किस कर दिया और साथ ही यह पूछ भी लिया कि 'क्या मैं यह चॉकलेट मम्मा और मेरी फ्रेंड के साथ शेयर कर सकते हूँ' मैंने उस मुस्कुराकर कहा 'नहीं इसे आप अकेले खाना' उसने कहा 'नही ,मम्माने सिखाया है अपनी चाकलेट शेयर करनी चाहिए आपकी मम्मा ने नहीं सिखाया '।

आकृति पर बाहर आ चुकी थी मैंने उसे हाय किया उसने कहा "अंदर आ जाओ।"
अंबर अपनी फ्रेंड के साथ खेलने में मस्त थी हम अंदर जाकर ड्राइंग रूम में बैठे थे मैंने आकृति से पूछा कि 'सारी फॉरमैलिटी हो गई 'उसने बताया कि
'हां यार दिनभर लग गया पर सारी चीजें हो गई अब कल से अंबर स्कूल जाएगी वह तो बहुत एक्साइटेड है पर मैं थोड़ी नर्वस हूं उसका पहला दिन है ना'
'हां मुझे याद है तुम अपने कॉलेज के पहले दिन में भी ऐसे ही नर्वस थी '

उसने मुश्किल से मुस्कुरा कर हां कहा 'सुनो तुम बैठो मैं कॉफी बना कर आती हूं'
उस घर में अंबर और आकृति थे बस।। मेरे जहन में बहुत सारे सवाल चल रहे थे क्योंकि आकृति की फैमिली अच्छी खासी बड़ी थी उसके दादा -दादी, चाचा -चाची ,पापा- मम्मी साथ रहते थे क्योंकि जब 10 साल पहले मैं उसके घर गया था तब मैं उसकी पूरी फैमिली से मिला था पर ।इस घर में अकेले उन दोनों को देखा तो अपने आप सवाल मन में उठने लगे पर उससे पूछना मुनासिब नहीं समझा मैंने ।आकृति कॉफी बना रही थी और मैं उसके ड्राइंगरूम को देख रहा था तभी अचानक बाहर किसी की चिल्लाने की आवाज आई ।

मैं बाहर निकला तो देखा कोई औरत अम्बर की फ्रेंड को खींच कर ले जा रही थी और अंबर और उसकी दोस्त दोनों रो रहे थे न वह बच्ची जाना चाह रही थी और ना अंबर उसे जाने देना चाह रही थी अंबर की आवाज सुनकर आकृति भी किचन से दौड़ते हुए बाहर आई ।

उसने दौड़कर अंबर को गोद में उठा लिया और उस औरत से कहने लगी।

"खेलने दीजिए ना बच्चे ही तो है,

रो रहे हैं अच्छा लगता है आपको ऐसे"

उसने गुस्से से आकृति की और देखा और कहा
"हां मुझे भी अच्छा नहीं लगता मेरी बच्ची को रोज रुलाना पर तुम अपनी बच्ची को खेलने क्यों देती हो किसी और बच्चे के साथ मैंने तुमसे कहा है ना कि अगर मेरी बच्ची तुम्हारे घर आए तो तुम भगा दिया करो"

आकृति ने कहा
'मेरे संस्कार ऐसे नहीं है और ना ही अंबर के'

उस औरत ने हंसते हुए कहा ' देखो तो कौन संस्कार की बात कर रहा है जिसके ना किसी कोई परिवार का पता है और ना ही आदमी का ....बेवकूफ समझती हो हमें 3 साल से हमें बता रही हो कि यह बच्चा तुम्हें भगवान ने दिया है ,भगवान ने दिया है'

हाँ भगवान ने हीं दिया है मुझे अंबर को और आपको बता दू अम्बर को किसी दोस्त की जरूरत नहीं है मैं हूं उसके लिए जैसे मम्मी और पापा हूं वैसे ही उसकी दोस्त भी बन सकती हूं '

अंबर यह लड़ाई देख कर शायद सहम सी गई वो माँ से जाकर चिपक गई। उस औरत ने एक नजर मेरी तरफ भी देखा मैं एक बार सोचा कि मैं जाकर कुछ कहूं पर मुझे सही नहीं लगा क्योंकि यह आकृति की लड़ाई थी और उसे अकेले ही लड़ना था।

उस औरत ने अपनी बच्ची को खीचा और उसे ले जाते हुए न जाने क्या क्या बड़बड़ा रही थी

"आमि कोबे थेके बोलेछि न ,ए खोराब मेए र काछे खेलते आस्बि न ....बुझते पारिश न न कि, तुई....माँ बाबर खोबोर नई, अमा के सोंस्कॉर सिखाबे ...कि बोलि रोज के एक टा नया छेले आशे "

मैं समझ नहीं पाया कि वह क्या बोल रही थी पर हां कुछ बुरा जरूर बोल रही थी आकृति के बारे में और अंबर के बारे में ।

आकृति ने कहा" अरे जो कहना है हिंदी में कहो ना क्या बड़बड़ाए जा रही हो अगर सही हो तो मेरे लैंग्वेज में बोल कर बताओ।"

उस औरत ने चिल्लाकर कहा " मुझे तुमसे कुछ नही कहना"

नहीं पता क्यों मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था यह सब देखकर ।आकृति की आंखों में आंसू भर गए थे , पर उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे ।

उसने अंबर को गोद में उठाया अंबर रो तो नहीं रही थी पर एकदम शांत थी, शायद डर गई थी। हम तीनों अंदर आ गए थे ।उसने मुझे बैठने को कहा मैंने पूछा "सब ठीक है ना "

उसने कहा
"यह तो रोज का है उसे लगता है कि मुझे बंगाली समझ नहीं आती"

" मतलब तुम समझ रही थी वह क्या बोल रही थी "

"हां बहुत अच्छी तरह से .....उसने अपनी बेटी से कहा कि मैंने तुझे कब से कहा है ना कि इस गंदी बच्ची के साथ खेलने मत आना इस लड़की के मां बाप की खुद की कोई खबर नहीं है और मुझे संस्कार सिखाने आई है, हर रोज कोई नया लड़का इसके घर पर आता है"

" शायद नहीं आना चाहिए था मुझे मेरे कारण इतनी प्रॉब्लम हो गई तुम्हें"

" ऐसा नही है अभ्युत........मेरा घर है मुझे जिसेे बुलाना होगा मैं बुलाऊंगी। मेरे घर जिसे आना होगा वह आएगा ।यह कौन होते हैं डिसाइड करने वाले, मुझे मेरे मां पापा ने इतने संस्कार दिए हैं कि मुझे पता है क्या गलत है और क्या सही अगर मैं गलत नहीं हूं तो मैं किसी से नहीं डरती"

" हां पर दुनिया ऐसे ही है ना आकृति"

अंबर हमारी बातें शांत होकर सुन रही थी फिर अचानक उसने पूछा

'मम्मा ...वह आंटी दीदी को क्यों डांट रही थी मेरे साथ खेलने के लिए क्या'
आकृति ने कहा 'नहीं बेबी वह इसलिए डांट रही थी क्योंकि दीदी ने होमवर्क ही नहीं किया है आपको पता है ना दीदी स्कूल जाती हैं अगर वह होमवर्क करके आती तो उनकी मम्मा उन्हीं नहीं डांटती'

अम्बर ने प्यारा सा मुंह बनाकर कहां' आप भी मुझे डांटोगी अगर मैं होमवर्क नहीं करूंगी तो क्योंकि कल से तो मुझे भी स्कूल जाना होगा ना'

आकृति ने उसे चूमते हुए कहा 'हां बेबी थोड़ा सा तो डाटूंगी 'अंबर ने कहा 'ठीक है थोड़ा सा डाट लेना '
उसकी यह बातें सुनकर हम तीनो मुस्कुरा दिए

अम्बर अपने टॉयज के साथ खेलने चले गई और मैं और आकृति कॉफी पीने लगे हम दोनो थोड़ी देर के लिए शांत थे फिर आकृति ने कहा ।

"अभ्युत... तुम्हें पता है ,3 साल पहले मैं नवरात्रि के अष्टमी के दिन ऑफिस से लौट रही थी तुम्हें तो पता ही है कि मैं 9 दिन उपवास रहती हूं। और अष्टमी के दिन मुझे हवन करना था ।अचानक शाम को बहुत बारिश हो रही थी उस दिन।अचानक मेरी गाड़ी रास्ते में बंद हो गई,क्योंकि बारिश थी और वह जगह थोड़ी सुनसान थी। वहां दूर दूर तक कोई मैकेनिक भी नहीं था मैं हैरान परेशान सोच रही थी किस से मदद मांगु पर कोई गाड़ी जाए तब ।इसी परेशानी में मैं कुछ दूर आकर खड़े हो गई देखने के लिए कि शायद कोई गाड़ी आती हो ।

पर वहीं पर मैंने देखा कि एक वेंन आ रही थी ।मैंने उन्हें हाथ दिया हेल्प के लिए पर वह लोग फर्राटे से निकल गए मैंने देखा थोड़ी दूर जाकर वेंन रुकी, एक औरत उस वेन से निकली.... अंधेरा था तो मुझे कुछ साफ दिखा नहीं और उस औरत ने एक पोटली डस्टबिन में रखी और वापस जाकर उस वेन में बैठी और वह वेन फर्राटे हुए निकल गई ।और मैं स्टुपिड .....पोटली को देखने के चक्कर में वे्न का नंबर भी नहीं नोट कर पाई मुझे लगा की शायद कचरा ही होगा ।पर अजीब लग रहा था इतनी ज्यादा तेज बारिश में वेन आना और पोटली को डस्टबिन में डालना कुछ अजीब ही था .......


अंतिम भाग

......2 मिनट के लिए मैंने इग्नोर कर दिया था और मैं अपनी परेशानी में वापस आ गई। पर नहीं पता क्यों बार-बार मेरी नजर उस पोटली में ही जाकर अटक जाती थी ।मैं अपनी स्कूटी को किक मारने में बिजी थी कि अचानक मुझे एक बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी।

हालांकि थोड़ा मुश्किल था ..वह आवाज सुनना ,पर मैंने पोटली की तरफ देखा तो मुझे समझ आया कि पोटली से वह आवाज आ रही थी । मैंने उस पोटली को खोला और देखा तो उसमें यह नन्ही सी जान तड़प रही थी और रो रही थी।
शायद थोड़ी देर पहले ही यह दुनिया में आई थी ।पहले तो अपने स्कार्फ़ से इसे लपेटा मैंने,,मेरे गोद में आने के बाद थोड़ी शांत हुई ।मुझे थोड़ी देर तो कुछ समझ नहीं आया पर मैं इतना जानती थी कि मैं उसे वापस वहां तो नहीं छोड़ सकती थी मैं अपनी स्कूटी को वहीं छोड़ी और उसके बाद मैं कुछ दुर पैदल चलकर गई ।

किस्मत से कुछ देर में ही मुझे ऑटो मिल गई मैं इसे लेकर सबसे पास वाले हॉस्पिटल में गई वहां उसका चेकअप करवाया कि कहीं इसे कोई दिक्कत तो नहीं है ,पर डॉक्टर ने बताया बस इसे भूख लगी है इसलिए इतना रो रही।मैंने डॉक्टर को सारी बात बताई। डॉक्टर ने मुझे कहा कि मैं चाहूं तो उसे उनके यहां छोड़ सकती हूं बस मुझे पुलिस में इंफॉर्मेशन देनी पड़ेगी वह किसी अनाथालय में इसे सौंप देंगे।

मैंने डॉक्टर से बात की और उनसे कहा कि आप इसे रात के लिए एडमिट कर लीजिए ऑब्सेरवशन में रख कर देख लीजिये ...मैं सुबह आकर आपसे मिलती हूँ, तो डॉक्टर ने उसे रखने से मना कर दिया बिना किसी पुलिस को इंफॉर्मेशन दिए या FIR कीये।

अब मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था मैंने माँ पापा और भाई को कॉल किये पर बारिश की वजह से कॉल नहीं लगा 11 बज चुके थे इन सब में इतनी रत को पॉलिस स्टेसन जाना भी ठीक नही लगा ।मुझे एक ही चीज़ समझ में आई मैंने वहां हॉस्पिटल से उसके सारे प्रिस्क्रिप्शन उठाए सारी दवाइयां ली इसकी जरूरत की सारी चीजें ली और वापस आटो पकड़कर घर आ गई।

सच कहूं तो मुझे खुद नहीं पता था कि मैं क्या कर रही थी जो मुझे सही लगा मैंने वह किया ।घर आकर मां पापा और भाई को सारी बात बताई ।तो उन्होंने मुझे बहुत डांटा उन्होंने कहा कि डस्टबिन से उठाया तुमने वह तो ठीक किया पर कम से कम इसे हॉस्पिटल में छोड़ देना चाहिए था। अब पुलिस तुम से 10 सवाल पूछेगी और तुम परेशान होगी ।मैंने कहा कोई बात नहीं मैं सुबह ले जाकर छोड़ दूंगी ।पुलिस में भी बात कर लेंगे। शायद उसके मां-बाप ढूंढने आए इसे ।खैर मैंने रात को अम्बर को दूध पिलाकर सुला दिया था और रात भर मैं इसे एक टक देखती रही और सोचती रही ।

जिस माँ ने इसे जन्म दिया होगा, वह क्या तड़प नहीं रही होगी इसके लिए ...जिसनेे 9 महीने रखा होगा उसे कैसा लग रहा होगा कि उसका बच्चा उससे दूर हैं।उसे पता भी है या नहीं... बच्चा डस्टबिन में डाल दिया गया है ।वो कैसी औरत थी जिसने इस नन्ही जान को उस डस्टबिन में यु ही मरने छोड़ दिया ,,इसकी ये नन्ही आँखे ,छोटे छोटे हाथ ,ये मासूम सा चेहरा देखकर उसका दिल न पसीजा होगा।

तुम्हें पता है अगले 15 दिन तक मैं इस बच्ची को लेकर कभी पुलिस स्टेशन जाती, तो कभी किसी हॉस्पिटल जाती और हर जगह मुझसे 10 तरह के सवाल पूछे जाते हर जगह मैंने सच्चाई बता दी पर कोई उस सच को स्वीकारने के लिए तैयार ही नहीं था। हर किसी को यह लगता था कि यह बच्चा मेरा ही है और मैं उससे पीछा छुड़ाना चाहती हूं और हर कोई मुझ से लेकर मेरे मां बाप तक पहुंच जाता मेरी फैमिली तक पहुंच जाता ।

पुलिस ने तो न जाने कितना परेशान किया है मेरी फैमिली को और मेरी फैमिली भी परेशान हो चुकी थी इन सब चीजों से ।उनका यह कहना था कि इस सारी परेशानी की जड़ मैं हूँ,,,ना मैं उस बच्चे को उठाती उस दिन और ना हम इतने परेशान होते ।

15 दिन बाद एक प्राइवेट अनाथालय में बात हुई मेरी।मैं छोड़ कर तो आई थी इसे, पर जब मैं वहां से निकली, तो मुझे लगा जैसे मैंने अपना ही कुछ छोड़ दिया है ।कुछ देर वही बाहर बैठ गयी।उस दिन न मई ऑफिस में काम कर पाई न रात को सो पायी।

मुझे पता था जो मेरे दिमाग में चल रहा था वह शायद बहुत बड़ा डिसिजन था और मेरे घरवाले कभी मेरा साथ नहीं देंगे ।मैं दूसरे दिन सुबह वापस गई और उस अनाथालय से हमेशा के लिए इसे अपने साथ लेकर आ गई ।मैं तो इसे अपना चुकी थी पर मेरे परिवार ने इसे नहीं अपनाया था ।भाई भाभी भी मा पापा से बहुत नाराज थे क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी को इतना ज्यादा फ्रीडम दे दिया था कि उसने इतना बड़ा डिसीजन अकेले ही ले लिया था, बिना किसी से पूछे ।
इस बीच मुझे बहुत से लड़के देखने भी आए शादी के लिए और हर किसी की नजर में अंबर को देख कर बहुत से सवाल उठते थे ।हमने किसी से झूठ नहीं कहा था ।मैं नहीं चाहती थी कि मैं कोई नया रिश्ता किसी झूठ झूठ के साथ शुरू करू। पर सच बताने के बाद भी कोई सच को स्वीकार ही नहीं करना चाहता था रोज-रोज के इन सवालों ने मुझे भी परेशान कर दिया था ।और अपनों से लड़ना मुश्किल हो जाता है वह भी किसी अपने के लिए ।खैर पापा ने यह घर मुझे दहेज में देने के लिए लिया था तो मैंने इस घर को उनसे हमेशा के लिए ले लिया ,और मैं और अम्बर अपनी इस छोटी सी दुनिया में एक दूसरे के साथ रहने लगे।

उस दिन रियूनियन में सबने मुझसे बहुत सारे सवाल पूछे पर तुमने मुझसे एक भी सवाल नहीं पूछा।'

आकृति के इतना कहने के बाद मैं निशब्द था। पिछले 2 साल से मैं इसलिए रो रहा था कि श्रेया और मेरी बच्ची मुझे अकेला छोड़ चले गए।
पर आकृति के अपने तो यहीं थे ..इसी शहर में बस कुछ दूरी पर।

मेरे मौन को तोड़ते हुए उसने कहा

"अरे देखो ना कॉफी तो ठंडी हो गई मैं गर्म करके लाती हूं "

मैं जानता था कि कॉफी एक बहाना थी असल में वह आंसुओं को मेरे सामने रोक नहीं पा रही थी मैंने मुस्कुराकर हामी भरी और मैं अंबर के साथ खेलने चला गया ।वो अपने सारे डॉल्स मुझे दिखा रही थी उसके पास क्या क्या टॉयज है खेलने के लिए और वह कल स्कूल जा कर क्या क्या करने वाली है उसने मुझे सारी बात बताइ।

मैंने उससे पूछा कि क्या तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड बनोगी उसने कहा कि बेस्ट फ्रेंड तो उसके मम्मा है पर वह फ्रेंड जरुर बन सकती है मेरी ।

आकृति हम दोनों की कॉफी और अंबर का दूध लेकर उसके रूम में ही आ गई थी अगले 2 घंटे में हमने एक दूसरे के साथ डिनर किया और बहुत सारी बातें भी की पर कुछ खामोशी भी थी हमारे बीच ।अगले दो-तीन घंटे में मुझे इतना भी समझ आ गया था कि अंबर और आकृति एक दूसरे के लिए ही बने हैं आकृति को अंबर से और अंबर को आकृति से अलग करना शायद नामुमकिन है।ये दुनिया भले ही उसे बिन ब्याही माँ कह कर कितनी भी बातें सुना ले ।

पर अम्बर को इतना प्यार शायद उसे जन्म देने वाली मां भी नहीं कर पाती जितना आकृति उससे करती है और अंबर का पूरा आसमान तो आकृति ही है।

चार महीने बाद

आज दुर्गा अष्टमी है ,और अंबर का बर्थडे भी है।आकृति अंबर का बर्थडे साल में तीन बार मनाती है दो नवरात्रि की अष्टमी में और एक उस दिन जिस दिन अंबर उससे मिली थी ।अंबर सबको बहुत खुश हो कर बताती है कि उसका बर्थडे साल में तीन बार आता है क्योंकि वह स्पेशल है क्योंकि बाकी सारे बच्चों का तो बर्थडे एक ही बार आता है ।

खैर आज मैं थोड़ा नर्वस हूं आज मैं आकृति और अम्बर को प्रपोज़ करने वाला हूँ की अपने उस छोटे से जहाँ में थोड़ी जगह मुझे भी दे दे ।
मैंने अम्बर के लिए बहुत सारी शॉपिंग की है मैंने सोचा कि आकृति के घरवालों से पहले बात करु ।पर पहले उससे पूछना मैंने मुनासिब समझा। सच कहूं तो इन चार पांच महीनों में मुझे आकृति से ज्यादा प्यार अंबर से हो गया है अरे मैंने एक छोटी सी डायमंड रिंग अंबर के लिए भी ली है।

डरते सहमते मैंने अम्बर को प्रपोज़ किया

" कि क्या आप आज से मुझे पापा कहोगी "

अम्बर ने मासूमियत से जवाब दिया मुझे

" पर मम्मा तो मेरी मम्मी और पापा दोनों हैं"

मैंने कहा "ठीक है आज से आप हमेशा के लिए मुझे अपना दोस्त बना लो"

और मैंने वह छोटी सी रिंग उसके उंगली में पहना दी अम्बर को शायद कुछ समझ नहीं आया पर वह आकर मुझसे मुझसे लिपट गई न चाह कर भी मेरी आंखों से दो आंसू निकल ही गए ।

आकृति दूर से खड़े होकर हम दोनों को देख रही थी मैं अंबर को लेकर उसके पास गया और वह डायमंड रिंग उसे दिखा कर पूछा ।

"क्या तुम अपने इस अम्बर में थोडा हक मुझे दे सकती हूँ...विल यु मेरी मी, मिस आकृति दुबे"

उसने कुछ कहा तो नहीं पर उसके आंखों से बहते हुए आंसू और चेहरे पर आई मुस्कुराहट ने मुझे उसकी हां का पता दे दिया था।

थोड़ी देर बाद उसने अम्बर कहा " बेबी, आज से मैं बस आपकी मम्मा हूँ आज से मिस्टर अभ्युत प्रताप सिंह आपके पापा है "

मुझे मेरे हिस्से का आसमान मिल चूका था अम्बर और आकृति के साथ ।



समाप्त





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