प्यार

गाँव की पतली गलियों से निकल कर विनोद अपनी संस्कृति का शहर बनारस आया. उसका एडमिशन बीएचयू में हुआ था. वो एक मेधावी लड़का था. उसे खेलने, गाने का बराबर शौक था. विनोद ने विश्वनाथ मंदिर में एक लड़की को देखा, जिसे देखते ही वो अपना दिल हार बैठा. वो उसके एक तरफ़े प्यार में इस कदर मशगूल हो गया और उससे मिलने को पागल. एक दिन अस्सी घाट पर सुबह ए बनारस की अलौकिक छ्टा के बीच उस लड़की का दीदार हो गया. विनोद उसके समीप पहुंच गया और मित्रवत बात चित करना चाहा. वो विनोद को युनिवर्सिटी में देख चुकी थी. तो उसे विनोद से बात करने में कोई दिक्कत नहीं लगी. उस लड़की का नाम अकांक्षा था. उनके बीच मिलन का दौर शुरू हो गया. पहली समेस्टर की अपनी सफ़लता के आवेग में बह विनोद ने आकांक्षा से बोला, " आकांक्षा ! अपनी कक्षा और युनिवर्सिटी में मेरा कई लड़कियों से वास्ता पड़ा मगर उनमें से किसी ने तुम्हारी तरह मेरे हृदय के तराने को भावविभोर करने में सक्षम नहीं हो सकी. सच कहुँ तो वो पहली लड़की तुम ही हो जिसके पहली दीदार ने ही मेरी आत्मा को अपने कब्जे में कर सकी हो.

आकांक्षा, " इसमें मेरा क्या कसूर ? विनोद! "

विनोद : इसमें न तो तुम्हारा कसूर है न किसी और का. नियति जो चाहे वो हो कर ही रहता है. मुझे तुमसे मुहब्बत है.

आकांक्षा : झूठे

विनोद : सच

आकांक्षा : ऐसा है तो एक सर्त है.

विनोद : क्या ?

आकांक्षा : कि तुम मेरी स्वतंत्रता के आड़े आने की कोशिश नही करोगे. और तुम वैसे ही रहोगे जैसा मेरा जी चाहेगा.

उसकी होठों पर जैसे उपेक्षापूर्ण मुस्कुराहट खेल रही थी.

विनोद को ऐसे लगा जैसे उसकी आजादी नीलाम हो रही . आकांक्षा उसका पहला प्यार थी. विनोद अपनी दाँतों को कसकर दाबे अपनी आंखों को धधकाकर उठ गंगा के तट पर जा पहुंच एक पत्थर पर बैठ गया और कराह उठा. उसकी कराह से गंगा का शांत जल भी व्याकुल हो उठा. कि कहीं विनोद टुकडे टुकडे हो बिखर न जाए. उसमें इतना सामर्थ्य नहीं था कि वह उठ वहाँ से कहीं चला जाए. उसे वहाँ बैठे घंटों हो गए.

तभी दूर से आकांक्षा आती दिख गई. वो उसे ही ढूंढ रही थी. विनोद के समीप जैसे जैसे आ रही थी उसे देख लगता था कि उसके कदम उठ ही नहीं रहे थे.

आकांक्षा, विनोद से ये क्या पागलपन है?

विनोद : कुछ नहीं. गंगा की प्रवाह देखो. काश हमारी जिंदगी भी इतनी हसीं और प्रवाहमयी होती . कितना प्यारा लगता न ?

आकांक्षा : मैं तुमसे प्यार करती हूँ. कुछ मेरा भी ख्याल करो. मैं कितनी घबरा गई थी. तुुुुम्हें कहाँ नहीं ढूंंढी.

विनोद सिर्फ़ कंधे उचकाकर रह गया. जैसे उसे अपने कानों पर से भरोसा उठ गया हो. उसकी गर्दन झुकी थी और बाहें चाबुक की डोरी की तरह निर्जीव. वो बोला, आकांक्षा! तुम ऐसा करती ही क्यों हो?

आकांक्षा : हंसी. बोली प्यार. और विनोद को आलिंगन में ले ली.

दोनों इतने खुबसुरत कि रुपहले आसमान और नदी के अलावा कोई देख नहीं रहा था.

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