लव जिहाद--एक प्रेम कहानी

भाग १

ओये शबनम कहाँ मर गयी तू , ये बकरियों को चारा कौन देगा ? सुबह सुबह ना जाने कहाँ चली जाती है ये , कुछ पता नहीं , इसके अब्बू को सम्भालो या फिर जानवरों को..........शकीना बडबडाते हुए अपना काम किये जा रही थी

शबनम एक 17 साल की अल्हड खुबसूरत लड़की थी , जिसके सिर्फ तीन काम थे , बकरियां चराना , आते जाते राहगीरों को परेशान करना और गाँव के बच्चों के साथ कंचे खेलना ,बाद के दो कामों की वजह से शकीना उसे ना जाने कितनी बार पीट चुकी थी,लेकिन उसके ऊपर इस मार पिटाई का कोई असर नहीं हो रहा था ,मार खाने के कुछ दिन बाद फिर वही काम शुरू ,शकीना के शौहर और शबनम के अब्बू असलम पैरालाइज थे ,जिसकी वजह से घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारी शकीना और शबनम पर थी लेकिन शबनम ने तो काम करने की बजाय शकीना के नाक में दम किये रहती थी

जब शकीना घर के जरुरी काम निबटा कर जब शबनम को ढूँढने लगी तो फिर उसे वहीँ कंचे खेलते हुए पाया ,और फिर वही धुनाई शुरू

कुछ दिनों के बाद----------

अशरफ़---

बहन ये यहाँ रहकर बर्बाद हो जायेगी,इसे मेरे साथ शहर भेज दो ,वहां सुधर भी जाएगी और कुछ पैसे भी कमा लेगी ,जिससे घर के खर्चे चलाने में आसानी होगी

शकीना –लेकिन अशरफ ?

अशरफ़—अरे शकीना तुम मेरी बहन जैसी हो और शबनम मेरी भांजी ,तो डर और संकोच किस बात का

शकीना ---ठीक है ले जाओ भैय्या ,लेकिन शब्बू का ख्याल रखना मेरी इकलौती औलाद है और वो अभी नादान है

अशरफ़---आप चिन्ता ना करो ,मैं उसको अपनी बेटी की तरह रखूँगा

शकीना ने शबनम को भेज तो दिया लेकिन उसका जी नहीं मान रहा था लेकिन उसकी रोज़ शबनम से बात हो जाती थी तो दिल को उसके तसल्ली मिल जाती थी.फिर धीरे धीरे शबनम पैसे भी भेजने लगी थी,पैसे जब आ गये तो उसने अपने घर पर लैंडलाइन भी लगवा लिया था की वो शब्बू से सीधी बात कर सके ,शकीना अब खुश थी की शब्बू अब सुधर गयी है

कुछ महीनों तक तो सब ठीक ठाक चलता रहा लेकिन फिर अचानक से फ़ोन आने बंद हो गये और जब भी शकीना फ़ोन करती तो उसे टरका दिया जाता था की वो कहीं बाहर है या फिर कहीं व्यस्त है ऐसा कुछ ,इसी बीच बीमारी से त्रस्त असलम की मौत हो गयी

शकीना ने जब अशरफ को कॉल किया तो वो साफ़ मुकर गया की वो शब्बू को अपने साथ लेकर गया था ,शकीना एकदम से स्तब्ध रह गयी ,अब वो बहुत परेशान थी की क्या करे ?उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था

कुछ दिनों बाद----

ट्रिंग ट्रिंग शकीना के घर के लैंडलाइन की घंटी बजी ,उधर से किसी की कड़कती आवाज आई ,

--क्या शबनम आपकी बेटी है?

--जी हाँ ,कहाँ है वो ?

--वो वेश्यावृत्ति में पकड़ी गयी है

---क्या ?

--आप लोगों को शर्म नहीं आती अपनी बेटियों को ऐसे धंधे में भेजते ,जब खिला पिला ,पालन पोषण नहीं कर सकते तो पैदा ही क्यों करते हो ?

--उधर पुलिसवाले का फ़ोन कटा ,इधर शकीना की सांसे , मैसिव हार्ट अटैक आने से उसकी मौत हो गयी थी

(अशरफ ह्यूमन ट्रैफिकिंग में लिप्त था ,जो लड़कियों की खरीद फ़रोख्त करता था लेकिन इस बात को शकीना नहीं जानती थी और उसने शब्बू को ले जाकर पहले कुछ दिन नौकरी करवाई फिर किसी कोठे पर बेच दिया ,जहाँ से वो वेश्यावृत्ति की शिकार हो गयी )

भाग २

--नाम क्या है तुम्हारा ?

कुछ नहीं बोली वो

--नाम बता नहीं तो टांगे तोड़ दूंगी ,इस बार एक लेडी कांस्टेबल की कड़कती हुई आवाज उसके कानों में पड़ी

--जी शबनम

--कब से है धंधे में?

--जी चार साल हो गये

--शर्म नहीं आती बताते हुए

अबकी बार उसकी झील से गहराई वाली आँखों में शून्य था ,जिस २१ साल की उम्र में लडकियाँ तमाम सपने देखती हैं उस उम्र में शबनम एक ऐसे दलदल में फंस चुकी थी जहाँ से निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था

--देख तेरा नाम मैंने डाला नहीं है FIR में ,अगर तू मेरा कहना मानेगी तो मैं तुझे यहाँ से निकलवा दूंगा ,थानेदार ने शबनम से ललचाई नज़रों से कहा

कुछ देर की ना-नुकुर के बाद शबनम ने हामी भर दी और उसे वहीँ पुलिस स्टेशन में एक बार फिर मसला गया

वो बाहर तो आ गयी लेकिन आसमान से गिरकर खजूर में आ लटकी थी ,थानेदार ने उसे पहले खुद रौंदा फिर उसे एक कोठे पर बेच दिया

उसकी ज़िन्दगी बिल्कुल नरक बन चुकी थी जहाँ उसे रोज़ रौंदा जाता था ,कम उम्र की होने की वजह से उसकी ज्यादा डिमांड थी उसे लगभग रोज़ 30-35 ग्राहक डील करने पड़ते थे,उसके सारे सपने टूट

चुके थे , गाँव की शरारती शबनम अब शहर आकर शबनम माल बन चुकी थी , “माल” उपनाम उसके ग्राहकों ने दिया था ,और वो इसी नाम से फेमस थी पूरे बदनाम मोहल्ले में

भाग २

३ साल बाद

उसको कोठे पर आये तीन साल हो चुके थे अब वो शबनम “लोची” बन चुकी थी , कोठे से वह कहीं और जाकर डील कर सकती थी ,अब कोठे की मालकिन को विश्वास था की उसकी शब्बू चिड़िया अब नहीं उड़ सकती,शबनम की उम्र अब 24 की हो चुकी थी , उसकी गदराया जिस्म देखकर सब उसे पसंद करते थे ,जिससे उसका भाव कोठे पर सबसे अधिक था...

अबे किशन ,जब वो तुम्हे पलट कर भी नहीं देखती तो तू उसके पीछे क्यूँ पड़ा रहता है ,हफ्ते में एक दिन ही दिखती है और वो भी तुम्हारी तरफ देखती भी नहीं फिर भी तू उस पर फ़िदा है

किशन ---यार उसमें मुझे मेरी राधा दिखती है ,मेरी हालत एक दम से एक बेताब आशिक़ की तरह हो गयी है ,

शबनम जाति की मुसलमान थी लेकिन जितना विश्वास उसे अल्लाह में था उतना ही श्री कृष्णा में , इतनी नरक ज़िन्दगी होने के बाद भी उसने ना तो इबादत छोड़ी थी ना ही भक्ति ,वो हर जुमे को नमाज़ पढ़ती थी और हर सोमवार को श्री कृष्णा के मन्दिर जाती थी

किशन मन्दिर के पुजारी का बेटा था और सोमवार को सिर्फ शबनम को देखने के लिए ही मन्दिर में आता था

नाम तो पता नहीं कर पाए हो बरखुरदार ,और चले हो इश्क लड़ाने , फिर उसके दोस्त ने ताना मारा

--आज मैं सीधा पूछूँगा चाहे जो हो जाए ....

लगभग ९:३० पर जब शबनम ने मन्दिर में कदम रखा तो किशन के दिल की घंटियां बज उठीं.......आज उनसे प्रण लिया था की आज वो नाम पूछ कर रहेगा

--आपका नाम क्या है ?

---आपसे क्या मतलब ,उधर से एक रूखा जवाब मिला

--मैं तो बस ऐसे ही

---आप अपनी हद में रहिये ,वरना हमें पुजारी जी से शिकायत करनी पड़ेगी....

शबनम जानती थी की किशन पुजारी जी का बेटा है और उसे छुप छुप कर देखता है लेकिन उसका अतीत और वर्तमान उसके भविष्य को बदलने की इज़ाज़त नहीं दे रहा था

रूखा जवाब पाकर भी किशन ने हार नहीं मानी और एकदिन उसका पीछा करने का निर्णय किया.........जब गाड़ी शहर के सबसे बदनाम गली की ओर मुड़ी तो किशन एक दम से बौखला गया और उसकी हालत एकदम से पागलों जैसी हो गयी

वो राधा (शबनम ) से प्रेम करता था ,सच्चा प्रेम और सच्चा प्रेम किसी का मोहताज़ नहीं होता वो हर बंदिश को तोड़ते हुए और हर रुकावट को पार करते हुए अपनी मंजिल की ओर बढ़ता है लेकिन यहाँ हालत ऐसे नहीं थे

क्या वो एक वेश्या है ? नहीं नहीं हो सकता है की उधर से उसके घर का रास्ता हो ? लेकिन अगर घर का रास्ता भी हो तो कोई लड़की उधर जाने से पहले सौ बार सोचेगी ?कुछ ऐसे ही विचार उसके दिमाग में घूम रहे थे

मैं एक हफ्ते इंतज़ार करूँगा..........वो अपने आप से बडबडाया

अगले हफ्ते जब शबनम दर्शन कर के फिर से वापिस जाने लगी तो उसने मन्दिर के बाहर उसका रास्ता रोक लिया

---तुम वहां क्यूँ गयी थी ?

--तुमने सही देखा बाबू जी , मैं अपने घर गयी थी और आइन्दा पीछा करने की कोशिश ना करना साहब वरना खामखाँ बदनाम हो जाओगे

इतना धक्का किशन को कभी लगा नहीं था............फिर भी उसने एक निर्णय लिया जो ना तो उसके संस्कार इज़ाज़त देते थे और ना ही ये समाज ............शबनम से मिलने का ,और उसे उस दलदल से निकलने का

भाग ३

किशन अब शबनम से मिलने रोज़ जाता था , शबनम भी उसका शिद्दत से इंतज़ार करती ,और अब उसने मन्दिर जाना बंद कर दिया था ,जब कृष्णा खुद किशन बनकर उसके दिल में आ गये थे तो उसे कहीं जाने की क्या जरुरत

--इस लडके पर नज़र रखो ये कुछ ज्यादा ही मिलता है “लोची” से .....कोठे की मालकिन और सभ्य समाज की अगुआ समाजसेवी जद्दनबाई ने कहा........लोगों की नज़र में वो मानव तस्करी के खिलाफ अभियान चलाने वाली एक सशक्त महिला थी लेकिन असलियत में कोठे की मालिकन.......

प्रेम पर ना कोई बंदिश काम आती है और ना ही कोई कानून चलता है , एक दिन किशन और राधा(शबनम) नाम के प्रेम के पंछी खुली हवा में उड़ने के लिए भाग गये.......जब सबसे कमाऊ लड़की हाथ से निकल गयी तो कोई और रास्ता ना देखकर जद्दनबाई ने उसे अपनी बेटी बताकर तथाकथित धर्म के ठेकेदारों से मिलकर “लव जिहाद” की अफवाह उड़ा दी , अब धर्म के ठेकेदार उन्हें मारने के लिए ढूँढने लगे ,पुजारी जी और उनके परिवार वालों की ज़िन्दगी बदतर हो चुकी थी........पुलिस और धर्मांध उन्हें हरदम धमकाते रहते थे...............शबनम की हकीक़त से सब वाफिक थे लेकिन जद्दन के पैसों और पोलिटिकल पहुँच के आगे किसी का मुंह नहीं खुल रहा था..........

धरती इतनी भी बड़ी नहीं है की किसी को ढूँढा ना जा सके आखिरकार वो दोनों एक गुट के हत्थे चढ़ ही गये...........दोनों को बहुत पीटा गया ,किशन के सामने ही कई लोगों ने शबनम का बलात्कार किया और फिर दोनों को जिंदा ही जला दिया गया

यह प्रेम कहानी जो एक मन्दिर से शुरू हुई थी वो एक कोठे से होते हुए एक अनचाही मौत पर आकर खत्म हुई

वो भले ही एक नहीं हो पाए लेकिन उनके शरीर से निकलने वाली लपट एक होकर उनके सच्चे प्रेम की गवाही दे रही थी,उनकी रूह अब ऐसे जगह जारही थी जहाँ लव जिहाद ,कोठा ,बलात्कार ,और जाति जैसे शब्द बेमानी थे ,वहाँ सिर्फ एक ही शब्द था “प्रेम” सिर्फ और सिर्फ

“प्रेम”

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