बचपन से हीं भूत प्रेत की कहानियों सुनने में आती थी । लोग कुछ इसतरह अपना अपना अनुभव सुनाते थे कि उस पर अविश्वास भी नही किया जा सकता ? iबचपन से हीं मैं थोड़ा संकोची ज़रूर था पर निडर और साहसी था । मैं लोगों की भूत प्रेत की बातों को मज़ाक में उडा दिया करता था ।
कोई यदि भूत प्रेत के अस्तित्व को सही ठहराने की कोशिश करता तो मैं उससे कहता था कि चलो चलकर दिखाओ पर लोग टाल जाते थे ।
उस समय मैं मिडिल स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ता था । मेरा स्कूल घर से क़रीब डेढ़ किलोमीटर दूर पड़ता था । उन दिनो आठवीं के बच्चों को रात को स्कूल में टिकाकर पढ़ाया जाता था । अंधेरा होने से पहले हमलोग खाना खाकर हाथ में एक टार्च और लाठी लेकर निकल जाया करते थे ।
मेरे साथ गाँव के दो लड़के जाते थे ।

संयोग बस एक दिन मुझे अकेले जाना पड़ा । स्कूल और घर के बीच में एक तालाब पड़ता था जिसके विषय में लोगों का कहना था कि वहाँ कई लोगों ने भूतनी को देखा था । असल में नहाते समय दो लड़कियाँ उसमें डूब कर मर गई थीं । जल्दी जल्दी मैं टार्च और लाठी लिए स्कूल की तरफ़ बढ़ हीं रहा था कि तालाब से पहले मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि कोई मेरे पीछे पीछे चल रहा है। मुझे सिहरन सी महसूस होने लगी । पीछे मुडकर टार्च की रोशनी में देखा तो दूर दूर तक कहीं कोई दिखाई नहीं पड़ा ।
हिम्मत करके मैं यह सोचकर कि आज अकेले हूँ इसलिए थोड़ा भयभीत हो रहा हूँ आगे बढ़ चला । तालाब के नज़दीक आते हीं मुझे ऐसा लगने लगा कि तीन लड़कियाँ खड़ी आपस में बात कर रहीं हैं । वे सफ़ेद रंग की साडी में थी और साडी का पल्लू सर पर था । हिम्मत करके मैं थोड़ा और आगे बढ़ा तो लगने लगा कि वे आपस में बातें कर रहीं हैं और इधर उधर भी हिल डुल रहीं हैं ।
मन हीं मन मैं हनुमान चलीसा पढ़ने लगा । डर बढ़ता हीं जा रहा था । आगे जाऊँ या पीछे भाग लूँ कुछ समझ में न आया । दिल कड़ा करके सोचा कि यदि ये भूतनी हुई तो इनसे भागने पर भी बच पाना मुश्किल है और यदि ये तीन लड़कियाँ हैं तो मेरा क्या बिगाड़ लेगी ?
मैं आगे बढ़ा और तालाब के नज़दीक पहुँच गया । इतने में मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि तालाब में कोई कंकड फेक दिया है उसकी आवाज़ मैने स्पष्ट सुनी ।
तालाब के बिल्कुल क़रीब मैं पहँचा तो टार्च जलाकर देखा कही कुछ न दिखाई दिया हला की ऐसा फिर मुझे सुनाई पड़ा जैसे कोई पानी में पत्थर फेका हो । जलती टार्च के सहारे तालाब के पास से गुजरते समय मैं इधर उधर टार्च की रोशनी डालते हुए तालाब के टीले पर आ गया देखा यहाँ बबूल की चार पाँच छोटी झाडियों के सिवा कुछ भी नहीं है । तो ये लड़कियाँ जो अभी दिख रहीं थीं कहाँ ग़ायब हो गई ? हो सकता है कि ये झाडियाँ हीं भ्रमबस लड़कियों के रूप में दिखी हों ।
असलियत क्या थी यह तो तय कर पाना बड़ा मुश्किल था परन्तु पानी में ढेला डालने जैसी आवाज़ तो मछलियों के कूदने की वजह से थी जो सन्नाटे में भयावह लग रही थी ।
थोड़ा डर तो ज़रूर मन में समा हीं गया था जिसकी वजह से फिर पीछे मुडकर देखने की हिम्मत हीं न हुई
इसे तो मैं मन का भ्रम मान सकता हूँ पर अब जो घटना बताने जा रहा हूँ उसे पढ़कर आप भी मानने को मजबूर हो जाएँगे कि वास्तव में प्रेत योनि होती है ।

हमारे कई धर्म ग्रंथ यह मानते हैं कि प्रेत योनि होती है। श्रीमद् भागवद् में बताया गया है कि जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है या जो लोग आत्महत्या कर लेते हैं उनकी आत्माएँ प्रेत योनि में भटकती हैं ।
प्रेत संबंधी तो हर मुख से कथा सुनने को मिल जाएगी पर महान संत गोस्वामी तुलसी दास जी के संबंध में कहा गया है कि वे हर राम नवमी के अवसर पर काशी से अयोध्या जाया करते थे । एक बार राम नवमीं का दिन उन्हें याद हीं न रहा । जब किसी ने उनको याद दिलाया कि कल राम नवमी है इसबार आप अयोध्या नहीं गये तो वे बेचैन होकर घर से निकल पड़े । मूसलाधार वारिस में उन्होंने एक आदमी को भीगते हुए आराम से जाते देखा जब कि गोस्वामी जी पानी बंद होने के इंतज़ार में एक पेड़ के नीचे खड़े थे। वे भी थोड़ी हिम्मत करके भीगते चल पड़े । परन्तु अयोध्या पैदल पहुँच पाना असम्भव था ।
हनुमान जी की कृपा से उस जाते हुए प्रेत ने समय से उन्हें अयोध्या पहुँचा दिया । अयोध्या से लौटने के बाद जहाँ हनुमान जी की प्रेरणा से प्रेत मिला था वही पर गोस्वामी जी ने एक मंदिर बनवाया जो आज भी संकट मोचन नाम से मशहूर है ।
प्रेत योनि होती है या नहीं इसपर तो तमाम पुस्तकें भरी पड़ी हैं मैं उस घटना की तरफ़ ले चल रहा हूँ जो किसी के मुँह से सुनी नहीं है बल्कि खुद पर बीती है।

मेरा हाई स्कूल का आख़िरी पेपर था । सेन्टर हमारे यहाँ से दस किलो मीटर दूर था । शाम छ बजे पेपर देने के बाद मन में आया कि इम्तहान तो समाप्त हो चु का है और अभी एक घंटा दिन भी बाकी है यहाँ रुकने के बजाय घर हीं निकल चलते हैं ।
मैं जहाँ रुका था वहाँ से सामान बाँध कर क़रीब साढे छ: बजे निकल पड़ा अपने गाँव के लिए । सात किलोमीटर का रास्ता नदी के किनारे किनारे का था । उसे पार करते करते अंधेरा बढ़ चुका था ।
गाँव से दो किलोमीटर पहले रास्ता एक आम के बग़ीचे से होकर गुजरता है। बग़ीचे में तो घना अंधेरा था इसलिए साइकिल बहुत सँभाल कर धीरे धीरे चला रहा था । बग़ीचे में घुसने के चंद मिनट बाद हीं मुझे ऐसा लगने लगा कि कोई मेरी साइकिल को पीछे से ज़ोर से खींच रहा है और पिछला पहिया कभी दाँये तो कभी बायें फेक दे रहा है । मैं काफ़ी ज़ोर लगाकर पैडिल मार रहा था पर साइकिल आगे बढ़ हीं नहीं रही थी ।
मैं साइकिल से उतर कर पैदल चलने लगा तो दस कदम चलते हीं ऐसा लगने लगा कि कोई फिर वहीं हरकत कर रहा है । अं धेरे में कुछ साफ साफ़ दिखाई तो नहीं दे रहा था परन्तु इतना साफ़ था कि साइकिल के आस पास कोई नहीं था ।
मैं मन में यह सोचकर कि पैदल बग़ीचा पार करने में टाइम लगेगा साइकिल पर बैठ तेजी तेजी से पूरे ज़ोर से पैड ल मारने लगा परन्तु मुझे फिर लगा कि कोई मेरी साइकिल आगे बढ़ने हीं न दे रहा हो । मैं ज़ोर से चिल्लाया कौन है ? सामने क्यों नहीं आते हो ?
कोई उत्तर न पाकर मैने पूरा ज़ोर लगाकर साइकिल चलानी चाही पर लड़खड़ा कर गिर गया । कुछ मिनटों को शायद बेहोश भी हो गया था । उठकर मैं साइकिल उठा हीं रहा था कि सामने कुछ दूरी पर एक सफ़ेद साडि में एक औरत आती दिखी । मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर खड़ी होकर पूछने लगी ---- बेटा तुम डर रहे हो क्या ?
मैं कुछ उत्तर देता उसके पहले हीं बोल पड़ी । डरो नहीं आगे गाँव तक मैं तुम्हें छोड़ देती हूँ वहाँ से किसी को साथ ले लेना ।
साइकिल हाथ में लिए लिए पैदल हीं मैं उसके साथ चलने लगा । वह आगे आगे कुछ दूरी बनाकर चल रही थी और मैं उसके पीछे पीछे । गाँव पहुँचने के पहले हीं जाने कहाँ मेरे देखते देखते हीं ग़ायब हो गई ।
मैं बुरी तरह डर गया । मारे घबराहट के मैं पसीने से पूरी तरह भींग गया । अब थोड़ा भी आगे बढ़ने की मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी । बड़ी मुश्किल से एक परिचित के घर पहुँचते हीं मे बाहर पड़ी चारपाई पर निढाल हो पड़ गया । तेज बुखार से पूरा शरीर जलने लगा था ।इसके बाद मुझे कुछ भी नहीं मालूम कि क्या हुआ ।
मैने जब आँख खोली तो मैं अपने घर पर था और घर के लोग मुझे घेरे खड़े थे । आज भी मैं जब उस घटना को याद करता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।
दूसरे दिन झाड़ फूँक कराकर मुझसे सीवान के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे धार दिलवाई गई पर बुखार दो तीन दिन के बाद जाकर उतरा ।
पाठक गण इसे हमारे मन की शंका समझे या भ्रम । विश्वास करें या अविश्वास पर यह घटना काल्पनिक नहीं बल्कि अच्छरश: सत्य है और भूत प्रेत के अस्तित्व को नकारने वाला मैं खुद मानने लगा हूँ कि वास्तव में प्रेतयोनि का अस्तित्व है । इसे नकारा नहीं जा सकता ?

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