बूँदें

मन के राग छेड़ो

कि गुनगुनाओ तुम

पलकों पे सजा मुस्कान

कोई गीत गाओ तुम !

करो नेत्र आह्लादमयी

बनो आँख का पानी

बूढ़ी नदियाँ पाएँ तुमसे

फिर से नई जवानी

मरुस्थली दाघ में

झर-झर जाओ तुम

उम्मीद की कोंपल खिला

नया चमन बनाओ तुम!

सीप के गर्भ में पलो

मोती बन निखर जाओ

स्मित सूनी वाटिका में

सुरभि बन बिखर जाओ।

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