जो घर में नही था मेरे,
उसकी क़ीमत चुकाई है ।

तू भी न बन इस देश का किसान,
कल ही लोकतंत्र ने फांसी लगाई है।

उन्होंने तसब्बुर नही किया था आज का हिंदुस्तान,
क्या वही सरकार नाम बदल कर आई है ?

सोचा था अब इतिहास नही दोहराएंगे हम,
ग़र यह कैसी मज़हबी बेड़ी हर पैर में लगाई है ।

सबको हक़ है आज़ादी से जीने का यहाँ,
यहाँ तो गाय-भैंस के चक्कर में भीड़ पगलाई है ।

उसको पकड़ो नाम उसका अब्दुल्ला है,
जाँच सरकार करेगी,हमारा काम पिटाई है ।

उसके दो बच्चे और बूढ़े माँ-बाप से क्या लेना हमको,
उसको मार डालो यह मज़हब की लड़ाई है ।।

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