इक उम्र होती है न जब बचपन खत्म होने को हो और जवानी अभी आई न हो, वह अल्हड़ उम्र, जिसमें मन प्रेम के नए नए एहसासों को छू छू कर खिलता सा जाता है,,, शिखा उम्र के उसी दौर में थी। गेहुआँ रंग,,गहरी भूरी आँखें,, आँखों में हज़ारों सपने,, और मन को मोह लेने वाली आकर्षक मुस्कान। एक झल्ली सी लड़की,, जो अपनी मुस्कान से सबको अपना बना लेती लेकिन अपने जज़्बात कभी किसी से न कहती,, बस जो भी मन मे आता,, अपनी हर भावना को शब्दों में बाँध कर अपनी डायरी में छुपा लेती। अपनी कल्पना को साकार करने की कोशिश में रंगों से सजाती रहती।


शिखा के २०वें जन्मदिन पर पापा ने सोचा,, बेटी है! जाने कब तक साथ रहेगी! कुछ ऐसा तोहफा देते हैं जो जीवन भर याद रहे।। यही सोच कर पापा ने मसूरी जाने का कार्यक्रम बनाया। सारा परिवार कुछ यादगार पल जीने सफ़र पर निकल पड़ा। मसूरी के सबसे शानदार होटल का बड़ा सा कमरा,,, कमरे के बिल्कुल सामने टैरेस गार्डन और उसके आगे पर्वतक्षृंखला का मनमोहक दृश्य,,, शिखा को तो जैसे पंख ही लग गए। वह झूम कर माँ से बोली,,, “मम्मा,मेरा बस चले तो मैं ज़िन्दगी भर यहीं रह जाऊँ। माँ भी हँस कर बोली- “धीरे बोल, तेरे शिव ने सुन लिया तो सच में यहीं रख लेंगे।

हाय!! सच्ची!! सुन लो न शिव जी!जन्मदिन पर यही तोहफा दे दो। शिखा हँसते हुए बोले जा रही थी।

कोई था वहां,,,शिखा की बात सुनकर मुस्कुरा रहा था। जब नज़र उठाकर उसकी ओर देखा तो देखता ही रह गया।

शिखा की आवाज़,, उसकी हँसी उस शख्स के कानों से उतरती हुई उसके दिल में समाती गई। उस शख्स की आँखें अब हर पल शिखा को निहारती रहतीं। शिखा अपनी दुनिया में खोई सी थी और वह शख्स उसे अपनी दुनिया मान बैठा था।

अगले दिन, शिखा का जन्मदिन था। सुबह सबसे पहले वह अपने आराध्य शिव का आशीर्वाद लेना चाहती थी। सुबह के करीब 7 बजे थे,, सब सो रहे थे तो वह अकेले ही मंदिर की ओर निकल गई।

8:30 बजे मंदिर से निकली तो कोई रिक्शा न मिलने पर पैदल ही होटल की तरफ चल पड़ी लेकिन जल्द ही थक भी गई! अपनेआप पर गुस्सा आ रहा था उसे,,,”थोड़ी देर रुक नहीं सकती थी। माँ-पापा के साथ आती तो क्या बिगड़ जाता!! शिव जी कहीं जा थोड़े ही रहे थे!”

“भोले बाबा,,, आपके दर्शन करने आई थी,, अब कम से कम एक अदद रिक्शा ही भेज दो प्लीज़!!! बाबा,, किसी भले आदमी से लिफ्ट ही दिला दो!! थक गई मैं!! तभी एक गाड़ी उसके पास आकर रुकी। भीतर से एक प्रौढ़ महिला की आवाज़ आई, “आओ बेटी, हम आपको होटल तक छोड़ दें।“

शिखा कुछ घबरा सी गई! बोली,,, “जी,धन्यवाद! लेकिन मैं खुद चली जाऊंगी!” उस महिला ने फिर से आग्रह किया “आ जाओ बेटी, हम भी उसी होटल में हैं।” शिखा इंकार करने ही वाली थी कि 2-3 मोटरसाइकिल पर कुछ अजीब आवारा किस्म के लड़कों को देख कर झट से गाड़ी में बैठ गई! शिखा की घबराहट भाँप कर महिला उससे बात करने लगी,, “मेरा नाम सुजाता है। हम भी उसी होटल में हैं! आपका नाम क्या है?”

शिखा- जी, शिखा!

सुजाता जी- अच्छा नाम है। कहाँ से आई हो?

शिखा-जी, उदयपुर से!

सुजाता जी - क्या करती हो?

शिखा- जी,काॅलेज में हूँ। फाईनल ईयर!

सुजाता जी -क्या सबजेक्टस हैं?

शिखा- जी, लिटरेचर!

सुजाता जी -और?

शिखा-पेंटिंग का शौक है आँटी! खाली समय में यही करती हूँ!

सुजाता जी - लाईफ में कोई है बेटी?

शिखा- मैं समझी नहीं आँटी।

सुजाता जी – बाॅयफ्रेंड !!?

शिखा- (सकपकाते हुए)- नहीं आँटी! यह सब कभी सोचा ही नहीं। वैसे भी यह सब तो माँ-पापा तय करते हैं ना! जो वो चाहेंगे,, वही होगा ।

सुजाता जी यह सुनकर मुस्कुरा दीं।

यूँ बातें करते हुए वह होटल पहुंच गए! शिखा उन्हें धन्यवाद दे कर अपने कमरे की ओर चल दी।

परिवार के साथ इस तरह वक्त बिताना उसका सबसे बड़ा तोहफा था। इतने में कमरे की घंटी बजी। दरवाज़े पर सुजाता जी अपने पति और बेटे के साथ खड़ी थीं। उन्हें देखकर शिखा चौंक गई- “आँटी, आप! आईए!”

सुजाता जी- आपके पापा हैं यहाँ?

शिखा- जी आँटी!

अंदर से माँ की आवाज़ आई- कौन है शिखा?

वह सुजाता जी को सपरिवार भीतर ले जाती है।

“मम्मी, यह आँटी हैं इनहोने ने ही सुबह मुझे होटल तक लिफ्ट दी थी।“

“नमस्ते” ! मेरा नाम तृप्ता है। आपने मेरी बेटी की बहुत सहायता की, इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।”

“धन्यवाद न कहिए तृप्ता जी। बड़ी प्यारी है आपकी बेटी।”

मेरा नाम सुजाता है। यह मेरे पति चंद्रशेखर और यह मेरा बेटा है—राज। मै यहाँ राज के लिए आपकी बेटी का हाथ माँगने आई हूँ।”

अचानक आए विवाह प्रस्ताव से शिखा तो क्या उसके माँ-पापा भी चौंक गए। तृप्ता जी ने राज को गौर से देखा और फिर शिखा की ओर देख कर मुसकरा दीं। शिखा अपने दिल में उठते तूफान को छुपाए सिर झुकाए खड़ी थी। “क्या करते हैं आप?” पापा राज के बारे में जानना चाहते थे।

राज के पिता, चंद्रशेखर जी बोल, “अश्विन जी, यह 7 सितारा होटल और ऐसे कई होटल हैं हमारे। इसके अलावा कुछ और काम है.....जैसे कंस्ट्रक्शन, आदि। अपने बड़े से बिजनेस को थोड़े में बता दिया।

अश्विन जी और तृप्ता जी पसीने से लथपथ हो गए। शिखा की आँखों में शर्म की जगह घबराहट साफ दिखाई देने लगी। अश्विन जी हाथ जोड़ कर बोले, “ मेरी बेटी बहुत भाग्यशाली है जो आपने इसे अपने परिवार के लायक समझा, लेकिन, चंद्रशेखर जी, बुजुर्ग कहते हैं कि रिश्ते बराबर वालों में होने चाहिए। हम कभी आपकी बराबरी न कर पाएंगे। मेरी बेटी अपने पिता की हैसियत की वजह से ससुराल में शर्मिंदा हो यह मैं सह नहीं पाऊंगा। हमें क्षमा कीजिये।”

इधर चंद्रशेखर जी और सुजाता जी अश्विन जी को समझाने की विफल कोशिश करते रहे। उधर राज और शिखा अपलक एक दूसरे को देखते रहे। राज के सपने काँच की तरह टूट कर बिखर रहे थे और उनकी चुभन शिखा का दिल महसूस कर रहा था।

सुजाता जी अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर उसे संभालते हुए बोली “चलो बेटे”, फिर शिखा की ओर देखा,उसके सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया और बाहर की ओर चल दीं।

राज हसरत भरी आँखों से शिखा की ओर देख अपने आँसू पोंछ कर जाने लगा। फिर अचानक मुड़ा, “एक बार बात कर सकता हूँ? प्लीज़!”


अश्विन जी की आज्ञा ले कर राज शिखा की ओर मुड़ा-- “माॅम-डैड की शादी की 25वी सालगिरह पर कुछ लिया था, सोचा था,जिस लड़की की नज़र दिल पर असर करेगी, जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने की कल्पना कर सकेंगे, उसे देंगे। हमारी तरफ से यह एक छोटा सा तोहफा,,, आपके लिए।” राज ने शिखा की आँखों में झाँकते हुए अपनी मुट्ठी को उसकी हथेली में रखा। कुछ फिसल कर शिखा के हाथ में गिरा! शिखा की मुट्ठी बंद करते हुए बोला- “अगर हमारे दिल की आवाज़ आप सुन पा रही हैं तो यह हमारा एहसास बन कर,और अगर नहीं, तो भी हमारी याद बन कर हमेशा आपके साथ रहेगा।“

“एक बात और- आप हमारी जान-ए-मन हैं और हमेशा रहेंगी। आपकी जगह और कोई नहीं आएगी।”

सुजाता जी, दरवाज़े पर खड़ी देख रही थीं, राज उनकी तरफ मुड़ कर बोला-“आपको बहू नहीं दे पाएंगे माँ। साॅरी!! चलिए!”

शिखा बुत सी राज को जाते हुए देखती रही। राज क हर शब्द उसके दिल को चीर रहा था।मुट्ठी को यूँ भींच रखा था ज्यों ज़िन्दगी को थाम रखा हो,, कि ज़रा सी भी पकड़ ढीली हुई तो साँसों की डोर छूट जाए !!

राज को शिखा की हँसी पसंद थी ना! जाते-जाते उसे अपने साथ ले गया।

अश्विन जी अपने परिवार के साथ घर लौट आये।

उन्हें अपनी छोटी सी बिटिया अब बड़ी लगने लगी थी। सोचा,, शादी कर देते हैं, सब भूल जाएगी!

कई रिश्ते देखे, लेकिन कभी शिखा मना कर देती तो कभी उसका मुरझाया चेहरा और खामोशी देख बात बिगड़ जाती।

सुजाता जी भी राज को शिखा को भूल जाने को कहती रहतीं। कितने ही रिश्ते आए पर राज हर लड़की में शिखा को तलाशने की कोशिश करता और साॅरी बोल कर चल देता।तीन साल बीत गये। राज ने खुद को काम में व्यस्त कर लिया था और शिखा अब एक बहतरीन पेंटर बन चुकी थी। कई प्रदर्शनियाँ लगा चुकी थी।

अब पहली बार उसे अपनी पेंटिंगस की प्रदर्शनी उदयपुर से बाहर जा कर लगानी थी।दिल्ली की एक बड़ी आर्ट गैलरी में यह आयोजन होना था। खुद को समेटते हुए, अपनी बंद मुट्ठी को अपनी हिम्मत मान कर वह चल दी। अश्विन जी और तृप्ता जी अपनी बेटी की सफलता से बहुत खुश थे।उसके साथ गए। शिखा की पेंटिंगस की तारीफ बड़े-बड़े कला के पारखी करते थे।

दूसरा दिन था।कई लोग आए थे। सुजाता जी भी आईं थीं,, राज के साथ। राज बेदिली से पेंटिंगस पर सरसरी नजर डाल, यहाँ-वहाँ घूम रहा था। तभी अचानक ठिठक गया! पलट कर पीछे लगी पेंटिंग को देखा,---

पूरे चाँद की रोशनी भी गहरे अंधकार को दूर करने में नाकाम था। हलके कोहरे की चादर ओढ़े हुई उस अँधेरी राह पर सिर झुकाए, अपनी बंद मुट्ठी को अपने दिल से लगाये खड़ी वह लड़की, जिसके जीवन में रोशनी की एक मात्र किरण थी उसकी मुट्ठी में से अपनी झलक दिखाता हुआ इक हीरे सा दिल। टाइटल था—अ नाॅट अनटाइड

राज के कदम वहाँ से हटे ही नहीं!

वह कभी पेंटिंग देखता तो कभी उसे बनाने वाली को ढूंढता। तभी उसकी नज़र अश्विन जी पर पड़ी, जो उसे ही देख रहे थे। राज ने दूर से ही हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया तो अश्विन जी उससे मिलने आ गए। “कैसे हो बेटे?” अश्विन जी ने पूछा। राज ने जवाब में बस सिर हिला दिया और पेंटिंग की ओर देखने लगा। सुजाता जी भी वहां आ गईं। उन्हें अभिवादन कर अश्विन जी फिर बोले- “इस पर तो शिखा ने अपना नाम भी नहीं लिखा, आपने कैसे पहचाना कि यह शिखा ने बनाई है?”

“हमारे सिवा और कोई यह पहचान ही न सकता।” राज बोला। उसकी नज़र अब भी शिखा को तलाश रही थी। इतनी भीड़ में कैसे तलाशता!!किंतु कुछ साफ दिखाई देता भी कैसे! आँखें भी तो भीगी थीं! आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अश्विन जी अपनी बेटी की खामोशी तो समझते ही थे लेकिन राज की मनःस्थिति देख और भी हैरान थे। अपने फैसले पर आज पहले से भी ज्यादा अफसोस हो रहा था उन्हें। तभी तृप्ता जी शिखा के साथ वहाँ आईं।(अश्विन जी ने फोन करके बुलाया था।) शिखा राज को देख चौंक गई।

एक ही पल में कितने ही भाव आए और गए। हज़ारों एहसास एक पल में उसके मन और अरसे से सूखी आँखों को भिगो गए। अपनी मुट्ठी को थोड़ा और कस रही थी,शायद, अपनी हिम्मत समेटने की इससे बेहतर कोशिश नहीं कर सकती थी।

राज उसके सामने खड़ा था।
बहुत संभलते हुए बोली- “कैसे हैं आप?”

पेंटिंग की ओर देख राज बोला-“ अब ठीक हैं,, बिल्कुल ठीक।” फिर शिखा की बंद मुट्ठी की ओर देखने लगा जिसे शिखा अपनी साड़ी के पल्लू में छुपाने की कोशिश कर रही थी। राज ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ कर मुट्ठी खोलने का इशारा किया। शिखा ने घबरा कर अपने पापा की तरफ देखा तो राज ने उसका हाथ थोड़ा और कस के पकड़ लिया। “यह दिलों के बंधन हैं जान-ए-मन, यह नाॅट अनटाइड नहीं रह सकती।” शिखा ने बेबस हो कर अपनी मुट्ठी खोल दी और राज ने उसके हाथ से ले कर वह मंगलसूत्र उसके गले में डाल दिया। पीछे खड़े पेरेंटस की मुस्कान उनके रिश्ते को स्वीकृति दे रही थी।

कुछ देर से ही सही, लेकिन शिव ने उसके जन्मदिन का तोहफा उसे दे ही दिया।

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