एक गुजारिश ऐसी भी. ..

आज सुबह से ही पास वाली मल्टी में शोर के साथ हलचल ज्यादा ही थी, मुझे कुछ अंदेशा सा हो रहा था,मन में बहुत उत्सुकता थी जानने की आखिर माजरा क्या है, मैंने पहले खिड़की से झाँका ,फिर भी बात ना बनी तो बालकनी में जाने का रुख किया, तभी पतिदेव की आवाज आई भाई आज रविवार है….तो क्या चाय की भी छुट्टी है? कम से कम एक कप कड़क प्याली चाय तो पिलाओ भाई, मैं खिसिया गई मन तो बाहर लगा था ,पर किचन में चाय चढाई और जैसे तैसे चाय उबली छानी और बेडरूम की तरह चल पड़ी, पतिदेव को चाय का कप पकड़ा कर बालकनी का दरवाजा खोल कर देखा तो पहले से ज्यादा शोर और हलचल थी, उत्सुकता चरम पर तभी निगाह कामवाली बाई पर गई…झट से मैं ने आवाज लगाई सुनीता ओ सुनीता उसने इशारे से बोला रुको, मैंने भी इशारे से पूछा -क्या हुआ यहॉ ?उसने ठहरने का इशारा कर हमारी मल्टी के तरह आने लगी, मैं भी झट से बालकनी से मुख्य द्वार पर से तेज कदमो से बढ़ी,

ज्यो ही वो दरवाजे पर पाई आई उसने मुझे देख बोला-अरे …भाभी जो पास में मेडम रहती है न, जो सुबह होते ही उनकी आरती और पूजा और ॐ के उच्चारण के स्वर सुनाई देते है, वो नही रही... , मैं सन्न रह गई, कल ही कोमल को उन्होंने बड़ी सी चॉकलेट दी थी, कभी उनको कॉलोनी में बेवजह घूमते, या किसी से सिवाय नमस्कार के अलावा बात करते नही देखा था, बस वो अपने ऑफिस के लिए 10 बजे सुबह निकलती और शाम 6 बजे सब्जी या कोई और सामान से लदी हुई आती दिखती थी इसके अलावा उनका कोई क्रियाकलाप नही था……फिर क्यू ऐसा किया उन्होंने ?उनके घर में भी शायद कोई नही है ना सुनीता ? हाँ भाभी सुनीता बोली, उनकी एक लड़की की शादी हुए 3 साल हो गए है और वो हैदराबाद में रहती है, उनके पति भी नही है ,करीब 10 साल पहले इस मल्टी में आई तब से उन्हे ऐसे ही देखा हमने, सुनीता की आवाज सुन पतिदेव भी हॉल में आ चुके थे,और हमारी बातें सुन रहे थे।

सुनीता अपनी बात पूरी कर 2 बजे आने का कह चली गई, पर मेरा मन में अभी भी व्याकुलता थी, आखिर क्यू ?इतना बड़ा कदम उठाया होगा, तभी पतिदेव कार धोने पार्किंग में पहुँचे तो पास के वर्मा जी ने बताया कि इनके (मेडम)पति मेरे जीजाजी के मित्र थे, उन्होंने ही मुझे बताया कि

बेटी 2 साल की थी तभी उनके पति की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी, उसके बाद ससुराल वालों ने भी सहारा नही दिया ,पिताजी ने प्राइवेट 8 वी की परीक्षा दिलवाई और फिर 10 का फार्म भरवा दिया थाऔर तभी उन्हें भी लकवा हो गया था करीब 5 साल बिस्तर पर रहे मेडम ने उनकी बहुत सेवा की थी और फिर वो भी दुनिया से बिदा हो गए,इस बीच मेडम ने 12वी पास कर टायपिंग की परीक्षा पास कर ली और कृषि विभाग में अस्थाई पद पर नोकरी लग गई, माँ तो पहले ही जा चुकी थी, दो छोटे भाई थे उनको पढ़ाया नोकरी करने लगे तो दोनों की शादी भी कर दी इस सब को करते करते उनकी बेटी भी 10 वी में आ गई थी।मेडम भी स्थायी नोकरी मैं आ चुकी थी।

भाइयो ने तो बहन को माँ माना पर भाभियो को वो फूटी आँख नही सुहाती थी, सो कुछ समय में भाई भी भाभियो के रंग में रंगने लगे, उन्हें बहन और भांजी खटकने लगी और एक दिन दोनों माँ बेटी को अंतः घर से बेइज्जत कर निकल दिया।

अब बिचारी जाये तो कहाँ जाये? बेटी यही से आई आई टी की कोचिंग कर रही थी तो उसने भी कह सुन कर ,कुछ ले दे के अपना ट्रांसवर भी यही करवा लिया ,और इस मल्टी में एक फ्लैट अपने जेवर बेच कर और कुछ लोन ले कर ये फ्लेट ले लिया और तब से यही रह रही थी।

पर भाईसाहब अभी ऐसा क्या हुआ जो अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली ? भरे मन से वर्मा जी और राहुल(मेरे पतिदेव)अपने अपने फ्लैट की तरफ चले।

दिन बीता बोझिल सा, रात में भी आज की घटना दस्तक दे रही थी ,सोचते सोचते सो गई थी, 6 बजे के अलार्म से नींद खुली ,रोज की तरह पेपर लेने बालकनी में गई तो चारो और शांति थी, पेपर ले कर उसकी मुख्य खबरें पड़ दूसरे पन्ने को जैसे पलटा मेडम के फोटे के साथ उनका अंतिम पत्र भी छपा था, कुछ यूं था,

मेरे परमात्मा,

सादर नमन

बचपन में कभी आपने मुझे हँसने खिलखिलाने का मौका दिया हो तो उसके लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

जब से मैंने होश संभाला आपने एक निश्चित अंतराल के बाद एक से बढ़ कर एक दुःखद समय दिखाया, मैंने सब तेरी परीक्षा समझ स्वीकार किया, बनते कोशिश पास भी हुई, आज जब मैं उम्र के जिस पड़ाव पर थीअपने आप ही कुछ साल में आपकी शरण में आती ,पर ये जानलेवा ब्लड कैंसर मुझे दे कर क्यू जल्दी बुलाने का बुलावा भेजा, इसलिए आज मैं खुद तेरे दरबार में हाजिर हूँ । अगला जन्म में इंसान छोड़ कुछ भी बना देना,बस यही गुजारिश है………….सुमन

खबर पढ़ते-पढ़ते कब पेपर मेरे आंसुओ से गीला हो चूका था,पता नही चला …. पर मेरे आंसू रुकने को तैयार नही थे,ऐसे भी कोई जिंदगी होती है क्या?सोचते हुए मैं भारी मन से काम में मन लगाने का प्रयास करने लगी।

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